बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
अथ पूर्वजन्मशापद्योतकाध्यायः ३७१
लग्नेश से युत अंशेश आठवें भाव में हो और पंचमेश क्रूरग्रह से षष्ठ्यंश
में हो तो अनपत्य योग होता है।।१२१।।
गुरुलग्नेशदारेशपुत्रस्थानाधिपेषु च।
सर्वेषु बलहीनेषु वक्तव्या त्वनपत्यता।।१२२।।
गुरु, लग्नेश, सप्तमेश और पंचमेश निर्बल हों तो अनपत्य योग होता
है।।१२२।।
लग्नपुत्रेश्वरौ दुःस्थौ कारके नीचराशिगे।
अनपत्यग्रहे पुत्रे अनपत्यत्वमादिशेत्।।१२३।।
लग्नेश और पंचमेश ६, ८, १२ भाव में हों, कारक नीच राशि में हो,
कोई अनपत्यग्रह (पापग्रह) पाँचवें भाव में हो तो अनपत्य योग होता
है।।१२३।।
क्रूरषष्ठ्यंशके जीवे पुत्रस्थे नाशराशिपे।
पुत्रेशे नाशराशिस्थे अनपत्यत्वमादिशेत्।।१२४।।
गुरु क्रूरग्रह के षष्ठ्यंश में हो, पाँचवें भाव में अष्टमेश हो और पंचमेश
आठवें भाव में हो तो अनपत्य योग होता है।।१२४।।
इत्यनपत्ययोगाः।
अथ चिरकालात्पुत्रप्राप्तियोगः-
लग्नाधिपे कुजे स्वोच्चे रन्ध्रे मन्दयुते रवौ।
शुभदृष्टिसमायोगे चिरात्पुत्रमुपैति सः।।१२५।।
लग्नेश भौम अपनी उच्चराशि में, आठवें भाव में शनि से युत रवि हो
और शुभग्रह से देखा जाता हो तो अधिक दिन में संतान होती है।।१२५।।
लग्ने मन्दे गुरौ रन्ध्रे व्यये भौमसमन्विते।
शुभदृष्टे स्वतुङ्गे वा चिरात्पुत्रमुपैति सः।।१२६।।
लग्न भाव में शनि, गुरु आठवें भाव में, बारहवें भाव में भौम हो
वा शुभदृष्ट अपने उच्च में हो तो बहुत दिनों में संतान होती है।।१२६।।
पुत्रस्था मन्दजीवज्ञा लग्ने पुत्राधिपे शुभे।
पुत्रेशे शुभराशिस्थे चिरात्पुत्रमुपैति सः।।१२७।।
संतान भाव में शनि, गुरु और बुध हों, पंचमेश शुभग्रह हो, पंचमेश
शुभग्रह की राशि में हो तो अधिक समय में संतान होती है।।१२७।।
३७२. बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
सुते राह्वर्कशुक्रेज्याः शुभर्क्षे शुभवीक्षिते।
पुत्रेशे शुभराशिस्थे चिरात्पुत्रमुपैति सः॥१२८॥
पाँचवें भाव में शुभग्रह की राशि में राहु, सूर्य, शुक्र, गुरु हों, शुभग्रह
से देखे जाते हों और पंचमेश शुभ राशि में हो तो बहुत दिनों में संतान
होती है॥१२८॥
लग्ने सौम्ये धने पापे तृतीये पापखेचरे।
पुत्रेशे शुभराशिस्थे चिरात्पुत्रमुपैति सः॥१२९॥
लग्न में शुभग्रह, दूसरे भाव में पापग्रह, तीसरे में पापग्रह और पंचमेश
शुभराशि में हो तो बहुत समय में संतान होती है॥१२९॥
अथ दत्तकपुत्रयोगः-
पुत्रस्थाने कुजे मन्दे बुधक्षेत्रे विलग्नगे।
बुधदृष्टे युते वापि तदा दत्तसुतादयः॥१३०॥
पंचम भाव में भौम, शनि हों, जन्मलग्न में बुध की राशि हो और बुध
से दृष्ट वा युत हो तो दत्तक पुत्र होता है॥१३०॥
पुत्रस्थाने बुधक्षेत्रे मन्दक्षेत्रेऽथवा भवेत्।
मन्दमान्दियुते दृष्टे तदा दत्तादयः सुताः॥१३१॥
पंचम भाव में बुध वा शनि की राशि हो और शनि तथा गुलिक से
युत वा दृष्ट हो तो दत्तक पुत्र होते हैं॥१३१॥
पुत्रेशे मन्दसंयुक्ते कुजे सौम्यनिरीक्षिते।
लग्नाधिपे बुधांशे वा दत्तपुत्रा भवन्ति हि॥१३२॥
पंचमेश शनि से युत हो, भौम-बुध से देखा जाता हो, लग्नेश बुध के
नवांश में हो तो दत्तक पुत्र होता है॥१३२॥
कामेशे लाभभावस्थे पुत्रेशे शुभसंयुते।
पुत्रे मन्दे बुधे वापि दत्तपुत्रा भवन्ति हि॥१३३॥
सप्तमेश एकादश भाव में, पंचमेश शुभग्रह से युक्त हो, पाँचवें भाव में
शनि वा बुध हो तो दत्तक संतति होती है॥१३३॥
पुत्रेशे भाग्यभावस्थे भाग्येशे कर्मराशिगे।
पुत्रे मन्देन संदृष्टे दत्तपुत्रेण सन्ततिः॥१३४॥
पंचमेश भाग्यभाव में, भाग्येश कर्मभाव में, पाँचवें भाव को शनि देखता
हो तो दत्तक पुत्र होता है॥१३४॥
अथ पूर्वजन्मशापद्योतकाध्यायः ३७३
लग्नाधिपे भृगुः स्वोच्चे पुत्रे मन्दसमन्विते ।
कारके बलसंयुक्ते दत्तपुत्रा तु सन्ततिः ॥ १३५ ॥
लग्नेश और शुक्र उच्च में हो, पाँचवें भाव में शनि हो और कारक बली
हो तो दत्तक पुत्र होता है ॥ १३५ ॥
पुत्रस्थानाधिपे चन्द्रे लग्ने पुत्रे शनैश्चरे ।
परिपूर्णबले जीवे दत्तपुत्रात्सुतो भवेत् ॥ १३६ ॥
पंचमेश चन्द्र लग्न में, पाँचवें भाव में शनि हो, गुरु बलवान् हो तो दत्तक
पुत्र होता है ॥ १३६ ॥
पुत्राधिपे रवौ लग्ने पुत्रस्थौ शनिसोमजौ ।
पुत्राधिपे बलयुते दत्तपुत्रात्सुतो भवेत् ॥ १३७ ॥
पंचमेश रवि लग्न में और पंचम में शनि-बुध हों, पंचमेश बली हो
तो दत्तक पुत्र होता है ॥ १३७ ॥
लग्नाधिपे बुधे पुत्रे कुजदृष्टिसमन्विते ।
कारके लाभराशिस्थे दत्तपुत्रात्सुतो भवेत् ॥ १३८ ॥
लग्नेश बुध पाँचवें भाव में भौम से देखा जाता हो और कारक लाभभाव
में हो तो दत्तक पुत्र होता है ॥ १३८ ॥
लग्नाधिपे गुरौ पुत्रे शनिदृष्टिसमन्विते ।
पुत्रेशे भौमराशिस्थे दत्तपुत्रा भवन्ति हि ॥ १३९ ॥
लग्नेश गुरु पाँचवें भाव में शनि से देखा जाता हो और पंचमेश भौम
की राशि में हो तो दत्तक पुत्र होता है ॥ १३९ ॥
अस्य शान्तिमाह-
वंशान्तो हरिकृष्णगो त्रिपुरहाऽब्जे भूसुते रुद्रियं
सौम्ये सम्पुटकांस्यपात्रविविधवज्जीवेन पैत्र्यातिथिः ।
शुक्रे गोप्रतिपालनं च कथितं मन्दे च मृत्युञ्जयः
कन्यादानभुजङ्गकेतुकपिलाः सन्तानसौख्यप्रदाः ॥ १४० ॥
यदि संतान के बाधक सूर्य हो तो हरिवंशपुराण सुनना चाहिए। चन्द्रमा
के लिए शिवपूजन, भौम हो तो रुद्राभिषेक, बुध हो तो विधिवत् कांस्यपात्र
और संपुट, गुरु हो तो पितृपूजन (गयाश्राद्ध), शुक्र हो तो गो-सेवा, शनि
हो तो मृत्युञ्जय का जप, राहु हो तो कन्यादान और केतु हो तो
कपिला गौ का दान करने से सन्तान का सुख होता है ॥ १४० ॥
३७४ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
यावत्संख्या भवेद्राशिस्तावद्वारं विनिर्दिशेत्।
शिवविष्णुस्थापनाद्वा लक्षजापात्सुखं भवेत्।।१४१।।
पाँचवें भाव की राशिसंख्या के समान वार हरिवंश सुनना चाहिए।
अथवा शिव-विष्णु की मूर्त्ति की स्थापना करे और लक्ष जप करावें
तो अवश्य संतान का सुख होता है।।१४१।।
इति पूर्वजन्मशापद्योतकोध्यायः।
अथ दशाध्यायः
अथ दशाभेदमाह-
अथातः सम्प्रवक्ष्यामि दशाभेदाननेकशः।
विंशोत्तरी दशा चोक्ता षोडशोत्तरी तथैव च।।२।।
पराशरजी बोले- मैं अनेक प्रकार के दशा के भेदों को कह रहा
हूँ, उसे सुनो। विंशोत्तरी दशा, षोडशोत्तरी दशा।।२।।
द्वादशोत्तरीका ज्ञेया तथैवाष्टोत्तरी दशा।
पञ्चोत्तरी दशा तद्वद्दशा शतसमा स्मृता।।३।।
द्वादशोत्तरी दशा, अष्टोत्तरी दशा, पंचोत्तरी दशा, शतसमा दशा।।३।।
दशा हि चतुरशीतिः प्राह चाथ द्विसप्ततिः।
तथा षष्टिसमा चोक्ता दशा षड्विंशतिः समा।।४।।
चतुरशीतिसमा दशा, द्विसप्ततिसमा दशा, षष्टिसमा दशा,
षड्विंशतिसमा दशा।।४।।
नवमांशनवदशा राश्यंशकदशाः स्मृताः।
दशा कालाभिधा चक्रदशा चक्र मुनीश्वरैः।।५।।
नवमांशनव दशा, राश्यंशक दशा, काल दशा, कालचक्र दशा, चक्र
दशा।।५।।
चरपर्या दशा चाथ स्थिरदशा च द्विजोत्तम।
अथोत्तरदशा विप्र ब्रह्मता चापरा दशा।।६।।
चरपर्याय दशा, स्थिर दशा, उत्तर दशा, ब्रह्मग्रह दशा।।६।।
केन्द्राद्या च दशा ज्ञेया कारकादि दशा मता।
माण्डूकी च दशा प्रोक्ता तथा शूलदशापि च।।७।।
केन्द्रादि दशा, कारकादि दशा, मांडूकी दशा, शूल दशा।।७।।
अथ दशाध्यायः ३७५
योगार्धजा दशा विप्र दृग्दशां कथयाम्यहम्।
दशा त्रिकोणनामा वै राशीनां च दशा तथा।।८।।
योगार्धदशा, दृग्दशा, त्रिकोण दशा, राशि दशा।।८।।
तारा दशा तथा ज्ञेया दशा रोगा च वर्णदा।
पञ्चस्वरदशा विप्र योगिनी च दशा स्मृता।।९।।
तारा दशा, वर्णद दशा, पंचस्वर दशा, योगिनी दशा।।९।।
ततः पैण्ड्यदशा ज्ञेया तथांशकदशा द्विज।
नैसर्गिकदशा विप्र अष्टवर्गदशा स्मृता।।१०।।
पिंड दशा, अंश दशा, नैसर्गिक दशा, अष्टवर्ग दशा।।१०।।
सन्ध्या दशा च ज्ञातव्या पाचका च दशा द्विज।
द्विचत्वारिंशद्भेदाः स्युः कथयामि तवाग्रतः।।११।।
सन्ध्या दशा और पाचक दशा— इस प्रकार ४२ प्रकार की दशा होती
है।।११।।
अथ विंशोत्तरीदशामाह—
आनयनप्रकारं च शृणुष्व द्विजपुङ्गव।
नामनक्षत्रपर्यन्तमार्क्षादि कृत्तिकादितः।।१२।।
हे द्विजश्रेष्ठ ! उसके आनयन प्रकार को कह रहा हूँ। कृत्तिका से
राशिनाम पर्यन्त ही गिनना चाहिए।।१२।।
सैषा कृष्णेऽर्कहोरायां चन्द्रहोरागते सिते।
दहनात्स्वर्क्षपर्यन्तं गणयेन्नवभिर्हरेत्।।१३।।
कृष्णपक्ष में रवि के होरा में और शुक्लपक्ष में चन्द्रमा की होरा
में कृत्तिका से कृत्तिका नक्षत्र से अपने जन्मनक्षत्र तक गिन कर ९
से भाग देने पर शेष तुल्य।।१३।।
सूर्येन्दुक्ष्माजतमसो वाक्पतिर्मन्दचन्द्रजा।
केतुशुक्रौ क्रमादेते विज्ञेयाश्च दशाधिपाः।।१४।।
क्रम से सूर्य, चन्द्र, भौम, राहु, गुरु, शनि, बुध, केतु, शुक्र की दशा होती
है।।१४।।
रसाशामुनिधृत्यब्दा भूपविधृतिवत्सराः।
सप्तेन्दवो नगा व्योमबाहवो क्रमतो मताः।।१५।।
३७६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
और क्रम से ६,१०,७,१८,१६,१९,१७,७,२० वर्ष इन की दशा के वर्ष
होते हैं॥१५॥
अथ दशायाः भुक्तभोग्यानयनम्—
दशामानं भयातघ्नं भभोगेनोद्धृतं फलम्।
भुक्तवर्षादिकं ज्ञेयं दशावर्षाच्च संशोध्यम्।
शेषं वर्षादिकं भोग्यं दशायाः भवति ध्रुवम्॥१६॥
जिस ग्रह की दशा में जन्म हो, उसके वर्षमान से भयात को गुणाकर
गुणन फल में भभोग से भाग देने से लब्धि वर्ष- मास- दिन- घटी-
पल भुक्त दशा होती है। इसे दशा के सम्पूर्ण वर्ष में घटा देने से भाग्यदशा
शेष होती है॥१६॥
स्फुटतरो हि मगुः कलिकात्मकः खखगजैर्विभजेद्गत ऋक्षकम्।
तदुडुवर्षगुणं च समादिकं खखगजैर्विभजेत्फलमत्र हि॥१७॥
अथवा स्पष्ट चन्द्रमा की कला बनाकर ८०० से भाग देने से लब्धि गत
नक्षत्र होता है। उससे दशा का ज्ञान कर दशावर्ष से शेष को गुणा कर
८०० से भाग देने से मास आदि भुक्त होते हैं। उसे दशावर्ष में घटाने से
शेष भोग्य वर्षादि होता है॥१७॥
अथ विंशोत्तरीदशाज्ञानार्थं चक्रम्—
| सू. | चं. | मं. | रा. | बृ. | श. | बु. | के. | शु. | ग्रहाः |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ६ | १० | ७ | १८ | १६ | १९ | १७ | ७ | २० | दशावर्षाणि |
| कृ. | रो. | मृ. | आ. | पुन. | पु. | श्ले. | म. | पू.फा. | |
| उ.फा. | ह. | चि. | स्वा. | वि. | अनु. | ज्ये. | मू. | पू.षा. | नक्षत्राणि |
| उ.षा. | श्र. | ध. | शत. | पू.भा. | उ.भा. | रे. | अ. | भ. | |
| उदाहरण— पुनर्वसु नक्षत्र के प्रथम चरण का भयात १०।३२ भभोग | |||||||||
| ५५।५३ है। कृतिका से गिनने से गुरु की दशा में जन्म हुआ। गुरु | |||||||||
| के दशा वर्ष १६ से भयात के पल ६३२ को गुणाकर गुणनफल १०११२ | |||||||||
| में पलात्मक भभोग ३३५३ से भाग देने से लब्धि ३ वर्ष हुआ। | |||||||||
| शेष ५३ को १२ से गुणाकर गुणनफल ६३६ में भभोग का भाग देने से |
अथ दशाध्यायः ३७७
लब्धि शून्य मास और शेष ६३६ को ३० से गुणाकर गुणनफल १९०८०
में भभोग का भाग देने से लब्ध ५० दिन हुआ। शेष २३१५ को
६० से गुणाकर गुणनफल १३८९०० में भभोग का भाग देने से लब्धि ४१
घटी हुआ। शेष १४२७ को ६० से गुणाकर गुणनफल ८५६२० में भभोग
से भाग देने से लब्धि २५ पल हुआ। इस प्रकार जन्म के पूर्व गुरु की दशा
३ वर्ष मास ५ दिन ४१ घटी और २५ पल भुक्त हो चुकी। इसे गुरु
के दशावर्ष १६ में घटाने से भोग्य अर्थात् शेष दशावर्ष १२, मास ११, दिन
२४, घटी १८ और ३५ पल भोग्य था।
विंशोत्तरीदशाचक्रम्—
| बृ. | श. | बु. | के. | शु. | सू. | चं. | मं. | रा. | ग्रहाः |
| १२ | १९ | १७ | ७ | २० | ६ | १० | ७ | १८ | वर्ष |
| ११ | | | | | | | | | मा. |
| २४ | | | | | | | | | दि. |
| १८ | | | | | | | | | घ. |
| ३५ | | | | | | | | | प. |
| २०१३ | २०२६ | २०४५ | २०६२ | २०६९ | २०८९ | २०९५ | २१०५ | २११२ | २१३० |
| ३ | ३ | ३ | | | | | | | |
| १८ | १२ | १२ | | | | | | | |
| २६ | ४४ | ४४ | | | | | | | |
| १४ | ४९ | ४९ | | | | | | | |
इति विंशोत्तरीदशाक्रमः।
अथ षोडशोत्तरीदशाक्रम—
एकोपचयते रुद्राद्धृत्यन्तं वत्सराः क्रमात्।
रविर्भौमो गुरुर्मन्दः केतुश्चन्द्रो बुधो भृगुः॥१९८॥
११ में एक-एक १८ तक जोड़ने से दशावर्ष
११।१२।१३।१४।१५।१६।१७।१८ क्रम से सूर्य, भौम, गुरु, शनि, केतु,
चन्द्रमा, बुध और शुक्र का होता है॥१९८॥
अष्टौ दशाधिपाः प्रोक्ता राहुहीना नवग्रहाः।
पुष्यभाज्जन्मभं यावद्गणयेद्वसुभिर्हरेत् ॥१९९॥
राहु को छोड़कर नवग्रह में आठ ही ग्रह दशेश होते हैं। पुष्य से जन्म-
नक्षत्र तक गिनने से जो संख्या हो उसमें ८ से भाग देने पर शेषांक तुल्य
सूर्य आदि की दशा होती है॥१९९॥
३७८ . . बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
सूर्यहोरागते शुक्ले चन्द्रस्य कृष्णपक्षके।
तदा नृणां फलार्थाय विचिन्त्या षोडशोत्तरी ॥२०॥
शुक्लपक्ष में जन्म हो और लग्न में सूर्य की होरा हो अथवा कृष्णपक्ष
में जन्म हो और लग्न में चन्द्रमा की होरा हो तो दशाफल जानने
के लिए षोडशोत्तरी दशा लेना चाहिए।॥२०॥
अथ षोडशोत्तरीदशाज्ञानाय चक्रम्—
| सू. | मं. | बृ. | श. | के. | चं. | बु. | शु. | ग्रहाः |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ | १८ | वर्षाणि |
| पु. | श्ले. | म. | पू.फा. | उ.फा. | ह. | चि. | स्वा. | |
| स्वा. | वि. | अनु. | ज्ये. | मू. | पू.षा. | उ.षा. | श्र. | नक्षत्राणि |
| ध. | शत. | पू.भा. | उ.भा. | रे. | अ. | भ. | कृ. | |
| रो. | मृ. | आ. | पुन. | × | × | × | × |
नोट— इस दशा का भुक्त-भोग्य विंशोत्तरी दशा के समान ही भयात भोग द्वारा लाना चाहिए।
इति षोडशोत्तरीदशाक्रमः।
अथ द्वादशोत्तरीदशाक्रमम्—
सूर्यो गुरुः शिखी ज्ञोऽगुः कुजो मन्दो निशाकरः।
शुक्रहीना दशा ह्येतद्द्विचयात्सप्तमात्समाः ॥२१॥
सूर्य, गुरु, केतु, बुध, राहु, भौम, शनि और चन्द्रमा ये ही शुक्र को
छोड़कर दशेश होते हैं और सात से दो-दो जोड़ने से इनके दशा वर्ष भी
होते हैं॥२१॥
जन्मभात्यौष्णपर्यन्तं गणयेदष्टभिर्भजेत्।
नवामांशे यदा जाता शुक्रस्य द्वादशोत्तरी ॥२२॥
जन्मनक्षत्र से रेवती पर्यन्त गिनकर जो संख्या हो उसमें ८ का भाग
देने से शेष तुल्य दशेश होते हैं। यदि शुक्र के नवमांश में जन्म हो तो
द्वादशोत्तरी दशा से फल कहना चाहिए॥२२॥
नोट— यहाँ भी विंशोत्तरी दशा के समान ही भुक्त-भोग्य लाना चाहिए।
अथ दशाध्यायः ३७९
अथ द्वादशोत्तरीदशाचक्रम्—
| सू. | बृ. | के. | बु. | रा. | मं. | श. | चं. | ग्रहाः |
| ७ | ९ | ११ | १३ | १५ | १७ | १९ | २१ | वर्षाणि |
इति द्वादशोत्तरीदशाक्रमः।
अथाष्टोत्तरीदशामाह—
सूर्य्यश्चन्द्रः कुजः सौम्यः शनिर्जीवस्तमो भृगुः।
एते दशाधिपाः प्रोक्ता विकेतुश्च नवग्रहाः॥२३॥
केतु को छोड़कर नवग्रहों में सूर्य, चन्द्र, भौम, बुध, शनि, गुरु, राहु और
शुक्र दशा के स्वामी होते हैं॥२३॥
रसाः पञ्चेन्दवो नागाः शैलचन्द्रनभेन्दवः।
गोब्जाः सूर्यकुनेत्राश्च समाः प्रद्योतनादयः॥२४॥
इनके ६, १५, ८, १७, १०, १९, १२, २१ ये क्रम से सूर्यादि के दशावर्ष
होते हैं॥२४॥
लग्नेशात्केन्द्रकोणस्थे राहौ लग्ने सितं विना।
अष्टोत्तरी दशा प्रोक्ता शिवाद्या द्विजसत्तम॥२५॥
यदि लग्नेश से केन्द्र-त्रिकोण में राहु हो और लग्न में शुक्र हो तो
अष्टोत्तरी दशा लेनी चाहिए। इसका आरम्भ आर्द्रा नक्षत्र से आरम्भ
कर अपने जन्मनक्षत्र तक गिनना चाहिए॥२५॥
चतुष्कं त्रितयं तस्माच्चतुष्कं त्रितयं पुनः।
यावत्स्वजन्मभं तावद्गणयेच्च यथाक्रमात्॥२६॥
आर्द्रा से चार नक्षत्र के अन्तर्गत अपना जन्मनक्षत्र हो तो सूर्य की दशा,
इसके बाद ३ नक्षत्र में चन्द्रमा की, इसके बाद के चार नक्षत्रों में भौम की,
इसके बाद ३ नक्षत्र में बुध की, इसके बाद ४ नक्षत्र में शनि
की, इसके बाद ३ नक्षत्र में गुरु की, इसके बाद ४ नक्षत्र में राहु की और
शेष ४ नक्षत्र में शुक्र की दशा होती है॥२६॥
अष्टोत्तरी द्विधा प्रोक्ता शिवादि कृत्तिकादितः।
लग्ने सग्रहे शैवाद् विग्रहे कृत्तिकादितः॥२७॥
अष्टोत्तरी दशा दो प्रकार की होती है। यदि लग्न में कोई ग्रह हो तो
आर्द्रा नक्षत्र से और यदि कोई ग्रह न हो तो कृत्तिका से गणना करना
चाहिए॥२७॥
नोट— दशा का भुक्त-भोग्य साधन पूर्ववत् करना चाहिए।
३८० बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
अष्टोत्तरीदशाज्ञानाय चक्रम्—
| सू. | चं. | मं. | बु. | श. | बृ. | रा. | शु. | ग्रहाः |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ६ | १५ | ८ | १७ | १० | १९ | १२ | २१ | वर्षाणि |
| आर्द्रा. | म. | ह. | अनु. | पू.षा. | घ. | उ.भा. | कृ. | |
| पु. | पू.फा. | चि. | ज्ये. | उ.षा. | श. | रो. | रो. | |
| पु. | उ.फा. | स्वा. | मू. | ध. | पू.भा. | अ. | मृ. | |
| श्ले. | वि. | श्र. | भ. | |||||
| ७२ | १८० | ९६ | २०४ | १२० | २२८ | १४४ | २५२ | मासाः |
| विशेष— यहाँ दशा के भुक्त-भोग्य के लाने में भभोग और दशा वर्ष | ||||||||
| का मान इस प्रकार लेना चाहिए। नक्षत्र का जितना चरण बीत गया | ||||||||
| हो उतना भभोग में से घटाकर शेष को भभोग मानना चाहिए। जैसे किसी | ||||||||
| का जन्म नक्षत्र के दूसरे चरण में है और भभोग ६४।१६ है और | ||||||||
| भभोग का चतुर्थांश १६।४ एक चरण का मान हुआ। इसे भभोग में घटा | ||||||||
| देने से ४८।१२ यही भभोग हुआ, क्योंकि एक चरण बीतने के बाद जन्म | ||||||||
| हुआ है। इसी प्रकार जिस ग्रह की दशा में जन्म हो उसके वर्ष का | ||||||||
| भी ४ या ३ भाग करके अर्थात् उस ग्रह की दशा ४ नक्षत्रों की हो तो | ||||||||
| ४ भाग अन्यथा ३ भाग कर दशावर्ष लेना चाहिए। जैसे सूर्य की दशा चार | ||||||||
| नक्षत्रों की है और उसका दशावर्ष ६ है, अतः एक नक्षत्र का दशामान | ||||||||
| १८ मास हुआ, इससे भयात को गुणा कर भभोग का भाग देने से भुक्त | ||||||||
| वर्षादि आते हैं। | ||||||||
| अथ पञ्चोत्तरीदशामाह— | ||||||||
| पातौ विनानुराधादि विज्ञेयं जन्मभावधि। | ||||||||
| गणयेत्सप्तभिर्भक्ते शेषे कल्या दशा शुभाः॥१२८॥ | ||||||||
| पात (राहु-केतु) को छोड़कर अनुराधा से जन्मनक्षत्र तक गिनकर ७ | ||||||||
| से भाग देने से शेष तुल्य क्रम से॥१२८॥ | ||||||||
| रविज्ञार्कसुतो भौमो भार्गवो रजनीकरः। | ||||||||
| वाक्पतिश्च कर्काङ्गे तस्यैव द्वादशाङ्गके ॥१२९॥ | ||||||||
| सूर्य, बुध, शनि, भौम, शुक्र, चन्द्रमा और गुरु की दशा होती है। किन्तु | ||||||||
| कर्क लग्न और उसी के द्वादशांश में जन्म हो तो पंचोत्तरी दशा लेनी | ||||||||
| चाहिए॥१२९॥ |
अथ दशाध्यायः ३८१
द्वादशारभ्य धृत्यन्ताः एकोत्तरदशा समाः।
क्रमात्सदा ग्रहाणां च राहुकेतू विना दशा ।।३०।।
१२ से आरम्भ कर एक-२ बढ़ाने से १८ पर्यन्त क्रम से इनके दशा
वर्ष होते हैं। यह दशा राहु-केतु को छोड़कर सात ही ग्रह की होती है।।३०।।
पञ्चोत्तरी दशा चिन्त्या निर्विशङ्कं द्विजोत्तम।
बलाबलविवेकेन यथान्यायेन योजयेत् ।।३१।।
बलाबल के विचार से शुभ-अशुभ समझना चाहिए।।३१।।
अथ पञ्चोत्तरीदशाज्ञानाय चक्रम्—
| सू. | बु. | श. | मं. | शु. | चं. | बृ. | ग्रहाः |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ | १८ | वर्षाणि |
| अनु. | ज्ये. | मू. | पू.षा. | उ.षा. | श्र. | ध. | |
| शत. | पू.भा. | उ.भा. | रे. | अ. | भ. | कृ. | नक्षत्राणि |
| रो. | मृ. | आ. | पुन. | पु. | श्ले. | म. | |
| पू.फा. | उ.फा. | ह. | चि. | स्वा. | वि. |
इति पञ्चोत्तरी दशा।
अथ शताब्दिकां दशामह—
वर्गोत्तमगते लग्ने दशा चिन्त्या शताब्दिका।
पौष्णभाज्जन्मभं यावत् गणयेत्सप्तभिर्भजेत् ।।३२।।
यदि लग्न में वर्गोत्तम नवांश हो तो शताब्दिका (१०० वर्ष की)
दशा को लेना चाहिए। रेवती से जन्मनक्षत्र तक गिनकर सात से भाग
देने पर शेष तुल्य।।३२।।
शेषाङ्के रवितो ज्ञेया दशा शतसमाभिधा।
रविश्चन्द्रो भृगुश्चान्द्रिर्जीवो विश्वम्भरात्मजः ।।३३।।
सूर्य से गिनकर शताब्दिका दशा में दशेश होते हैं। रवि, चन्द्र, शुक्र,
बुध, गुरु, भौम।।३३।।
दैवाकरिः क्रमादेते बाणा बाणा दिशो दश।
नखा नखाः खरामाश्च वर्षाणि दिनपादितः ।।३४।।
और शनि— ये दशेश और क्रम से ५, ५, १०, १०, २०, २० और
तीस वर्ष इनकी दशा होती है।।३४।।
नोट— दशा का भुक्त-भोग्य पूर्ववत् निकालना चाहिए।
३८२ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
अथ शताब्दिकादशाज्ञानाय चक्रम्—
| सू. | चं. | शु. | बु. | बृ. | मं. | श. | ग्रहाः |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ५ | ५ | १० | १० | २० | २० | ३० | वर्षाणि |
| रे. | अ. | भ. | कृ. | रो. | मृ. | आ. | |
| पुन. | पु. | श्ले. | म. | पू.फा. | उ.फा. | ह. | नक्षत्राणि |
| चि. | स्वा. | वि. | अनु. | ज्ये. | मू. | पू.षा. | |
| उ.षा. | श्र. | ध. | श. | पू.भा. | उ.भा. | + |
इति शताब्दिका दशा।
अथ चतुरशीत्यब्दिकां दशामाह—
रविश्चन्द्रः कुजः सौम्यो जीवः शुक्रः शनैश्चरः।
तमध्वजौ विना सर्वे ग्रहा द्वादश हायनाः॥३५॥
रवि, चन्द्र, भौम, बुध, गुरु, शुक्र और शनि की राहु-केतु को छोड़कर
१२, बारह वर्ष की दशा होती है॥३५॥
षवनाज्जन्मभं यावत्सप्ततष्टे दशा भवेत्।
चतुरशीतिका ज्ञेया कर्मेशे कर्मसंस्थिते॥३६॥
स्वाती से जन्मनक्षत्र तक गिनकर सात से भाग दें, शेष तुल्य सूर्यादि
की दशा होती है। इसे चतुरशीत्यब्दिका (८४ वर्ष की) दशा कहते हैं।
यदि कर्मेश कर्मस्थान में हो तो उस समय इस दशा को लेना चाहिए॥३६॥
अथ चतुरशीत्यब्दिकादशाचक्रम्—
| सू. | चं. | मं. | बु. | बृ. | शु. | श. | ग्रहाः |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| १२ | १२ | १२ | १२ | १२ | १२ | १२ | वर्षाणि |
| स्वा. | वि. | अनु. | ज्ये. | मू. | पू.षा. | उ.षा. | |
| श्र. | ध. | श. | पू.भा. | उ.भा. | रे. | अ. | |
| भ. | कृ. | रो. | मृ. | आ. | पुन. | पु. | नक्षत्राणि |
| श्ले. | म. | पू.फा. | उ.फा. | ह. | चि. | + |
इति चतुरशीत्यब्दिका दशा।
अथ दशाध्यायः ३८३
अथ द्विसप्ततिकां दशामाह-
लग्नेशे सप्तमे यत्र लग्ने वै मदनाधिपे।
चिन्तनीया दशा तत्र द्व्यधिका सप्ततिः समाः ।।३७।।
यदि लग्नेश सप्तम में हो और सप्तमेश लग्न में हो तो द्विसप्ततिका
(७२ वर्ष की) दशा से फल विचारना चाहिए।।३७।।
नव वर्षाणि सर्वेषां विकेतूनां ग्रहात्मनाम् ।
मूलाज्जन्मर्क्षपर्यन्तं गणयेदष्टभिर्हरेत् ।
शेषे दशा विचिन्त्या च फलं तस्माद्विचारयेत् ।।३८।।
मूल नक्षत्र से जन्मनक्षत्र तक गिनकर ८ से भाग देने से शेष तुल्य केतू
को छोड़कर सूर्यादि ग्रहों की ९ नव वर्ष की दशा होती है।।३८।।
अथ द्विसप्ततिकादशाचक्रम्-
| सू. | चं. | मं. | बु. | बृ. | शु. | श. | रा. | ग्रहाः |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ९ | ९ | ९ | ९ | ९ | ९ | ९ | ९ | वर्षाणि |
| मू.<br>रे.<br>पु.<br>वि. | पू.षां.<br>अ.<br>श्ले.<br>अनु. | उ.षा.<br>भ.<br>म.<br>ज्ये. | श्र.<br>कृ.<br>पू.फा. | ध.<br>रो.<br>उ.फा. | श.<br>मृ.<br>ह. | पू.भा.<br>आ.<br>चि. | उ.भां.<br>पुन.<br>स्वा. | नक्षत्राणि |
इति द्विसप्ततिका दशा।
अथ षष्ट्यब्दिकां दशामाह-
यदार्को लग्नराशिस्थश्चिन्त्या षष्टिसमा दशा।
दास्त्रास्त्रयं चतुष्कं च त्रयं वेदं पुनः पुनः।।३९।।
यदि सूर्य जन्मलग्न में हो तो षष्टिहायनी (६० वर्ष की) दशा का
विचार करना चाहिए। अश्विनी नक्षत्र से ४ नक्षत्र के बाद ३ नक्षत्र, पुनः
४ नक्षत्र, फिर ३ नक्षत्र इस क्रम से ।।३९।।
गुर्वर्कभूसुतानां च वर्षाणि दिङ्मितानि च।
ततः शशिज्ञशुक्रार्कपुत्रागूनां समाश्च षट् ।।४०।।
गुरु, सूर्य, भौम, दश-दश वर्ष, इसके बाद चन्द्रमा, बुध, शुक्र, शनि,
और राहु की ६-६ वर्ष की दशा होती है।।४०।।
३८४ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
अथ षष्टिहायनीदशाचक्रम्-
| सू. | गु. | मं. | चं. | बु. | शु. | श. | रा. | ग्रहाः |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| १० | १० | १० | ६ | ६ | ६ | ६ | ६ | वर्षाणि |
| श्र. | रो. | फा. | स्वा. | ज्ये. | श्र. | पू.भा. | ||
| भ. | मृ. | श्ले. | उ.फा. | वि. | मू. | ध. | उ.भा. | नक्षत्राणि |
| कृ. | आ. | म. | ह. | घ. | पू.षा. | श. | रे. | |
| पुन. | चि. | उ.षा. | ||||||
| इति षष्टिहायनी दशा। | ||||||||
| अथ षट्त्रिंशतिकां दशामह- | ||||||||
| श्रवणाज्जन्मभं यावद्गणयेदष्टभिर्भजेत्। | ||||||||
| शशाङ्कार्कसुरेज्य secret/कार्कजौशुक्रराहवः ॥४१॥ | ||||||||
| श्रवण नक्षत्र से जन्मनक्षत्र तक गिनकर ८ से भाग देने से शेषतुल्य | ||||||||
| क्रम से चन्द्र, सूर्य, गुरु, भौम, बुध, शनि, शुक्र, राहु की दशा होती | ||||||||
| है॥४१॥ | ||||||||
| एकौपंचयतश्चैकाद्वर्षाण्येषां क्रमात्स्मृताः। | ||||||||
| दिवसे सूर्यहोरायां रात्रौ वै चन्द्रहोरके ॥४२॥ | ||||||||
| और १ से एक अंक के वृद्धि तुल्य इनकी दशा का वर्ष होता है। दिन | ||||||||
| में सूर्य की होरा में और रात में चन्द्र की होरा में जन्म हो तो यह दशा | ||||||||
| लेनी चाहिए॥४२॥ | ||||||||
| अथ षट्त्रिंशदब्दिकां दशाचक्रम्- | ||||||||
| चं. | सू. | बृ. | मं. | बु. | श. | शु. | रा. | ग्रहाः |
| :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: |
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | वर्षाणि |
| श्र. | ध. | श. | पू.भा. | उ.भा. | रे. | अ. | भ. | |
| कृ. | रो. | मृ. | आ. | पुन. | पु. | श्ले. | म. | नक्षत्राणि |
| पू.फा. | उ.फा. | ह. | चि. | स्वा. | वि. | अनु. | ज्ये. | |
| मू. | पू.षा. | उ.षा. | + | + | + | + | + | |
| इति षट्त्रिंशदब्दिका दशा। |
अथ दशाध्यायः ३८५
अथ कालदशामाह-
सन्ध्या पञ्चघटी प्रोक्ता दिनषष्ट्यंशनाडिका।
सूर्यबिम्बांदधः पूर्वं परस्तादुदयादपि ।।४३।।
दिन-रात्रि का मान ६० घटी होता है, इसका चार विभाग किया गया,
सूर्य के बिम्ब के आधा उदय के पहले ५ घटी और बाद में ५ घटी;
यों दोनों मिलाकर १० घटी की प्रातः सन्ध्या एवं अर्धास्त सूर्यबिम्ब के पूर्व
५ घटी तथा इसके पश्चात् ५ घटी अर्थात् १० घटी की सायं सन्ध्या
होती है।।४३।।
सन्ध्याद्वयं विंशत्याघटिकाभिः प्रकीर्त्तितम्।
दिनस्य विंशतिर्घट्यः पूर्णसंज्ञा उदाहृता।।४४।।
इस प्रकार से दोनों संध्यायें २० घटी की होती हैं। शेष दिन के २० घटी
की पूर्ण संज्ञा।।४४।।
निशायाम्मुग्धसंज्ञाश्च घटिका विंशतिश्च याः।।४५।।
सूर्योदयस्य या सन्ध्या खण्डाख्या दशनाडिकाः।।४५।।
और इसी प्रकार रात्रि के २० घटी की मुग्धा संज्ञा होती है। सूर्योदय
के सन्ध्या की खण्ड संज्ञा।।४५।।
अस्तकालस्य या सन्ध्या सुधाख्या दशनाडिकाः।
पूर्णमुग्धे गतघटीषड्गुणे नवधा लिखेत्।।४६।।
और सायंकाल की संध्या को सुधा कहा है। यदि पूर्णा या मुग्धा में
जन्म हो तो दोनों के गतघटी को ६ से गुणा कर एकत्र रख दें।।४६।।
तथा खण्डसुधासूर्ये हते तु नवधा लिखेत्।
विभक्तानीन्द्रिययुगैर्मानख्यानफलानि च।।४७।।
यदि खंड या सुधा में जन्म हो तो १२ से गुणाकर एकत्र रखकर दोनों
जगह ४५ से भाग देने से जो फल आवे उसें नव जगह रखकर।।४७।।
क्रमात्सूर्यादिकानां च मानमुक्तं मुनीश्वरैः।
स्वस्वमानं स्वसंख्याभिर्गुणिते स्युः समादयः।।४८।।
सूर्यादि ग्रहों की संख्या १,२ आदि से गुणा कर देने से उनके दशावर्षादि
होते हैं।।४८।।
उदाहरण- जैसे किसी का दिन इष्टकाल २।२६- है, इसमें से सूर्योदय
के संध्यामान घटी में घटा देने से शेष ७।४४ बचा, अतः खण्ड
३८६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
दशा में जन्म हुआ। इसे ६ से गुणा करने से गुणनफल ४६।२४ हुआ।
इसमें ४५ से भाग देने से १।०।२४।०।१० इसे ९ जगह लिखकर
१,२,३,४,५,६,७,८,९ से गुणा करने से सूर्य आदि ग्रहों के क्रम से दशा
वर्ष हुए।
इति कालदशा।
अथ चक्रदशामाह-
राशीश्वराद्दशा ज्ञेया सूर्यादीनां क्रमात्पुनः।
दिवारात्रिस्तथा सन्ध्यात्रिकाले त्रिविधा दशा ।।४९।।
दिन, रात और संध्या के अनुसार राशी और राशीस्वर के अनुसार ३
प्रकार की दशा होती है।।४९।।
दिवालग्रेशस्थिताद्भाच्च रात्रौ लग्नश्रितात्तथा।।५०।।
सन्ध्यायां धनभावस्थाद् ज्ञेया चक्रदशा बुधैः ।।५०।।
दिन में जन्म हो तो लग्नेश जिस राशि में हो उस राशि से, रात में
जन्म हो तो लग्न में जो राशि हो उससे और संध्या में जन्म हो
तो द्वितीय भाव की राशि से सूर्यादि ग्रहों की दशा होती है।।५०।।
राशीनां दश वर्षाण्येकेकस्य दशा भवेत्।
क्रमाद् द्वादशराशीनां विज्ञातव्या द्विजोत्तम।।५१।।
क्रम से १२ राशियों की प्रत्येक का दश-दश वर्ष दशा का प्रमाण होता
है, इसे चक्रदशा कहते हैं।।५१।।
उदाहरण- दिन में जन्म है (पृ. २४ का चक्र देखो), लग्नेश शनि
वृश्चिक राशि में है, अतः वृश्चिक राशि से दशा का आरम्भ हुआ। स्पष्टार्थ
चक्र देखिए।
| वृ. | ध. | म. | कुं. | मी. | मे. | वृ. | मि. | क. | सिं. | कं. | तु. |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| १० | १० | १० | १० | १० | १० | १० | १० | १० | १० | १० | १० |
| ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० |
| ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० |
| ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० |
| ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० |
| २०१३ | २३ | ३३ | ४३ | ५३ | ६३ | ७३ | ८३ | ९३ | २१०३ | १३ | २३ |
| ३ | ३ | ३ | ३ | ३ | ३ | ३ | ३ | ३ | ३ | ३ | ३ |
| १८ | १८ | १८ | १८ | १८ | १८ | १८ | १८ | १८ | १८ | १८ | १८ |
इति चक्रदशा।
अथ दशाध्यायः ३८७
मतान्तर से चक्रदशा-
चक्राख्याथ दशां वक्ष्ये तवाग्रे द्विजनन्दन।
लग्नस्थस्य दशा चादौ ततो वित्तस्थितादयः।।१।।
यह दशा दो प्रकार की होती है। प्रथम भावस्थ ग्रह की और दूसरी
भावों की। हे द्विजनंदन ! मैं तुमसे चक्रदशा को कहता हूँ। पहले जन्मलग्न
में बैठे ग्रह की, उसके बाद धन आदि भावों में बैठे हुए ग्रहों की दशा होती
है।।१।।
द्वित्र्यादयो यदैकस्था तदा भागादयोऽधिकात्।
तत्रापि तुल्ये नैसर्गाद्बलात्सर्वाधिकस्य च।।२।।
यदि एक ही भाव में दो या तीन ग्रह हों तो उनमें जिसका अधिक अंश
हो उसका पहले, इसके बाद उससे न्यूनांश की दशा होती है। यदि
अंशादि भी समान हों तो नैसर्गिक बल जिसका अधिक हो उसी की पहले
दशा होगी।।२।।
राशिप्रमितवर्षाणि भागाह्नश्चानुपातः।
भावानामपि लग्नाच्च वर्षाणि दिङ्मितानि च।।३।।
जिस भाव में ग्रह है उस भाव की राशि से संख्या तुल्य वर्ष प्रमाण दशा
वर्ष और अंश से अनुपात द्वारा मासादि लेना चाहिए। भावों की दशा
जन्मलग्न से आरम्भ कर प्रत्येक भावों की दशा होती है। इनका दशा
वर्ष प्रत्येक भाव का दश-दश वर्ष का होता है।।३।।
भुक्ता दशाऽनुयाताद्वा विज्ञेया स्वस्वकल्पनात्।
अन्तर्दशापि सुधिया सूक्ष्मादेशाय चिन्तयेत्।।४।।
दशा का भुक्त अनुपात द्वारा लाना चाहिए। इसी प्रकार सूक्ष्म फल
कहने के लिए अन्तर्दशा का भी साधन करना चाहिए।।४।।
अथ कालचक्रदशामाह-
वन्देऽहं गोपिकानाथं भारतीं गणनायकम्।
पार्वत्यै कथिता पूर्वं कालचक्रं पिनाकिना।।५२।।
श्रीकृष्ण, सरस्वती एवं गणेशजी को प्रणाम कर जो कि शंकरजी ने
पार्वती से पूर्व में कालचक्र को कहा था।।५२।।
तच्चक्रसारमुद्धृत्य लघुमार्गेण कथ्यते।
शुभाशुभं मनुष्याणां भूतभव्यं च भावि तत्।।५३।।
उसके तत्त्व को लेकर लाघव से मैं कालचक्र को कह रहा हूँ, जो
३८८ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
मनुष्यों के भूत, वर्तमान और भविष्य के शुभ-अशुभ को बताने वाला
है।।५३।।
द्वादशारं लिखेच्चक्रं तिर्यगूर्ध्वं समानकम्।
गृहा द्वादश जायन्ते सव्यचक्रे यथाक्रमम् ।।५४।।
खड़ी और आड़ी रेखाओं से १२ कोष्ठ का चक्र बना के।।५४।।
द्वितीयादिषु कोष्ठेषु राशीन्मेषादिकाँल्लिखेत्।
एवं द्वादशराश्याख्यं कालचक्रमुदीरितम्।।५५।।
उसके दूसरे आदि कोष्ठ में मेषादि राशियों को लिखे। उनके आगे
कहे अनुसार नक्षत्रों का न्यास करे। इसी प्रकार एक दूसरा चक्र भी बनावे।
दोनों में एक की सव्य और दूसरे की अपसव्य कल्पना कर आगे
कहे हुए रीति के अनुसार राशि तथा नक्षत्रों का न्यासं करे। इसी को १२
राशि का कालचक्र कहते हैं।।५५।।
चक्रे नक्षत्रन्यासविधिः-
अश्विन्यादित्रयं चैव सव्यमार्गे प्रतिष्ठितम्।
रोहिण्यादि त्रयं चैव अपसव्ये यथाक्रमम् ।।५६।।
अश्विनी से तीन नक्षत्रं सव्य चक्र में, रोहिणी से ३ नक्षत्र अपसव्य चक्र
में।।५६।।
अश्विन्यादितिहस्तर्क्षमूलवाताहिवह्नयः।
विश्वर्क्षपूर्वाभाद्रं च रेवती सव्यतारकाः।।५७।।
पुनर्वसु से ३-३ नक्षत्र सव्य-अपसव्य चक्र में लिखने से सव्य चक्र
में अश्विनी, पुनर्वसु, हस्त, मूल, स्वाती, श्लेषा, कृत्तिका, उत्तराषाढ़,
पूर्वाभाद्रपद और रेवती- ये १० नक्षत्र सव्य चक्र में हुए।।५७।।
एतद्दशोडुपादानामश्विन्यादौ च वीक्षयेत्।
विशदस्तत्प्रकारस्तु कथ्यते शृणु पार्वति।।५८।।
इन नक्षत्रों के चरणों को अश्विनी के चरणों के समान ही देखना
चाहिए। इसका विशद प्रकार आगे कह रहा हूँ।।५८।।
देहजीवज्ञानप्रकारमाह-
देहजीवौ मेषचापौ दस्रादाद्यचरणस्य च।
मेषादि चापपर्यन्तं राशिपाश्च दशाधिपाः।।५९।।
अश्विनी नक्षत्र के पहले चरण मेष देह और धनराशि जीव संज्ञक होती
है और मेष से धन पर्यन्त नव राशियाँ (मेष, वृष, मिथुन, कर्क,
अथ दशाध्यायः ३८९
सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक, धन) और इनके स्वामी क्रम से दशाधीश होते
हैं।।५९।।
देहजीवौ नक्रयुग्मौ दिगीशार्काष्टभूधराः।
षड्वेदशरलोकानां राशिपाश्च दशाधिपाः।।६०।।
अश्विनी के दूसरे चरण में मकर देह और मिथुन जीव संज्ञक होता
है और १०, ११, १२, ८, ७, ६, ४, ५, ३ राशियों अर्थात् मकर, कुम्भ,
मीन, वृश्चिक, तुला, कन्या, कर्क, सिंह और मिथुन के स्वामी दशाधिपति
होते हैं।।६०।।
दास्त्रादि दशताराणां तृतीयचरणेषु च।
गौर्देहो मिथुनं जीवो द्वेकार्केशदशाङ्ककाः।।६१।।
क्वक्षिरामाख्यनाथास्ते दशाधिपतयः क्रमात्।
अश्विन्यादिदशोडूनां चतुर्थचरणेषु च।।६२।।
अश्विनी आदि १० नक्षत्रों के ३ रे चरण में वृष देह और मिथुन राशि
जीव संज्ञक होती है और २, १, १२, ११, १०, ९, १, २, ३ राशियों
के स्वामी क्रम से दशा के स्वामी होते हैं। अश्विनी आदि १० नक्षत्रों के
चौथे चरण में।।६२।।
कर्कमीनौ देहजीवौ कर्कादिनवमेश्वराः।
दशाधिपाश्च विज्ञेया श्रृणु पार्वति निश्चितम् ।।६३ ।।
कर्क देह और मीन राशि जीव संज्ञक होती है और कर्क से मीन पर्यन्त
९ राशियों के स्वामी दशेश होते हैं।।६३।।
याम्येज्यचित्रातोयर्क्ष उत्तराभाद्रपदांस्तथा।
एतत्पञ्चजोडुपादानां भरण्यादौ च वीक्षयेत् ।।६४।।
भरणी, पुष्य, चित्रा, पूर्वाषाढ़, उत्तराभाद्रपद इन पाँच नक्षत्रों के चरणों
का भरणी नक्षत्र के समान ही विचार करना चाहिए।।६४।।
याम्यप्रथमपादस्य देहजीवावलिर्झषः।
नागागर्तुपयोधीषु रामाक्षीन्द्वर्कभेश्वराः।।६५।।
भरणी के प्रथम चरण में वृश्चिक देह और मीन राशि जीव संज्ञक
हैं। ८।७।६।४।५।३।२।१।१२ राशियों के स्वामी क्रम से दशेश होते
हैं।।६५।।
३९० बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
याम्यद्वितीयपादस्य देहजीवौ घटाङ्गने।
रुद्रदिङ्नन्दचन्द्राक्षिश्रामाब्धीषु दशेश्वराः।।६६।।
भरणी के दूसरे चरण में कुम्भ देह और कन्या जीव संज्ञक है।
११।१०।९।१।२।३।४।५।६ राशियों के स्वामी क्रम से दशेश होते
हैं।।६६।।
याम्यतृतीयपादस्य देहजीवौ तुलाङ्गने।
सप्ताष्टाङ्कदिगीशार्कगजाद्रिरसराशिपाः।।६७।।
भरणी के तीसरे चरण में तुला देह और कन्या जीव संज्ञक होते
हैं। ७।८।९।१०।११।१२।८।७।६ राशियों के स्वामी क्रम से दशेश होते
हैं।।६७।।
देहजीवौ कर्कचापौ चतुर्थचरणे स्मृतौ।
वेदबाणाग्निनेत्रेन्दुसूर्येशदशनन्दपाः ।।६८।।
भरणी के चौथे चरण में कर्क देह और धन राशि जीवसंज्ञक है।
४।५।३।२।१।१२।११।१०।९ राशियों के स्वामी क्रम से दशेश होते
हैं।।६८।।
सव्यमेवं विजानीयादपसव्यं तु कथ्यते।
द्वादशारं लिखेच्चक्रं तिर्यगूर्ध्वं समानकम्।।६९।।
उपर्युक्त सव्य चक्र को कहा, अब अपसव्य चक्र को कह रहा हूँ। १२
कोष्ठ का ऊपर-नीचे चक्र को लिखकर।।६९।।
द्वितीयादिषु कोष्ठेषु वृश्चिकाद्व्यस्तमालिखेत्।
प्राजापत्यमघेन्द्राग्निं श्रवणं च चतुष्टयम्।।७०।।
दूसरे आदि कोष्ठ में वृश्चिकादि उलटे राशियों को लिखे। उसमें
रोहिणी, मघा, विशाखा और श्रवण इन चार नक्षत्रों को लिखे।।७०।।
धातृवद्दीक्षयेद्देहजीवौ कर्कधनुर्धरौ।
नवदिग्रुद्रसूर्येन्दुनेत्राङ्गीष्वब्धिराशिपाः।।७१।।
उपर्युक्त चार नक्षत्रों में रोहिणी के समान ही देह-जीव का विचार करना
चाहिए। यथा रोहिणी के प्रथम चरण में कर्क देह और धन राशि जीवसंज्ञक
है। ९।१०।११।१२।१।२।३।५।४ राशियों के स्वामी दशेश होते हैं।।७१।।
धातृद्वितीयचरणे तुलास्त्रीदेहजीवकौ।
षष्ठसप्ताष्टार्करुद्रा दिगङ्कवसुसप्तपाः।।७२।।