बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ दशाध्यायः ३८१
द्वादशारभ्य धृत्यन्ताः एकोत्तरदशा समाः।
क्रमात्सदा ग्रहाणां च राहुकेतू विना दशा ।।३०।।
१२ से आरम्भ कर एक-२ बढ़ाने से १८ पर्यन्त क्रम से इनके दशा
वर्ष होते हैं। यह दशा राहु-केतु को छोड़कर सात ही ग्रह की होती है।।३०।।
पञ्चोत्तरी दशा चिन्त्या निर्विशङ्कं द्विजोत्तम।
बलाबलविवेकेन यथान्यायेन योजयेत् ।।३१।।
बलाबल के विचार से शुभ-अशुभ समझना चाहिए।।३१।।
अथ पञ्चोत्तरीदशाज्ञानाय चक्रम्—
| सू. | बु. | श. | मं. | शु. | चं. | बृ. | ग्रहाः |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ | १८ | वर्षाणि |
| अनु. | ज्ये. | मू. | पू.षा. | उ.षा. | श्र. | ध. | |
| शत. | पू.भा. | उ.भा. | रे. | अ. | भ. | कृ. | नक्षत्राणि |
| रो. | मृ. | आ. | पुन. | पु. | श्ले. | म. | |
| पू.फा. | उ.फा. | ह. | चि. | स्वा. | वि. |
इति पञ्चोत्तरी दशा।
अथ शताब्दिकां दशामह—
वर्गोत्तमगते लग्ने दशा चिन्त्या शताब्दिका।
पौष्णभाज्जन्मभं यावत् गणयेत्सप्तभिर्भजेत् ।।३२।।
यदि लग्न में वर्गोत्तम नवांश हो तो शताब्दिका (१०० वर्ष की)
दशा को लेना चाहिए। रेवती से जन्मनक्षत्र तक गिनकर सात से भाग
देने पर शेष तुल्य।।३२।।
शेषाङ्के रवितो ज्ञेया दशा शतसमाभिधा।
रविश्चन्द्रो भृगुश्चान्द्रिर्जीवो विश्वम्भरात्मजः ।।३३।।
सूर्य से गिनकर शताब्दिका दशा में दशेश होते हैं। रवि, चन्द्र, शुक्र,
बुध, गुरु, भौम।।३३।।
दैवाकरिः क्रमादेते बाणा बाणा दिशो दश।
नखा नखाः खरामाश्च वर्षाणि दिनपादितः ।।३४।।
और शनि— ये दशेश और क्रम से ५, ५, १०, १०, २०, २० और
तीस वर्ष इनकी दशा होती है।।३४।।
नोट— दशा का भुक्त-भोग्य पूर्ववत् निकालना चाहिए।