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सर्वकोश
बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)

Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary

महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished800 पृष्ठ

पृष्ठ 381, कुल 800 में से

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पृष्ठ 381

अथ दशाध्यायः ३८३
अथ द्विसप्ततिकां दशामाह-
लग्नेशे सप्तमे यत्र लग्ने वै मदनाधिपे।
चिन्तनीया दशा तत्र द्व्यधिका सप्ततिः समाः ।।३७।।
यदि लग्नेश सप्तम में हो और सप्तमेश लग्न में हो तो द्विसप्ततिका
(७२ वर्ष की) दशा से फल विचारना चाहिए।।३७।।
नव वर्षाणि सर्वेषां विकेतूनां ग्रहात्मनाम् ।
मूलाज्जन्मर्क्षपर्यन्तं गणयेदष्टभिर्हरेत् ।
शेषे दशा विचिन्त्या च फलं तस्माद्विचारयेत् ।।३८।।
मूल नक्षत्र से जन्मनक्षत्र तक गिनकर ८ से भाग देने से शेष तुल्य केतू
को छोड़कर सूर्यादि ग्रहों की ९ नव वर्ष की दशा होती है।।३८।।
अथ द्विसप्ततिकादशाचक्रम्-

सू.चं.मं.बु.बृ.शु.श.रा.ग्रहाः
९९९९९९९९वर्षाणि
मू.<br>रे.<br>पु.<br>वि.पू.षां.<br>अ.<br>श्ले.<br>अनु.उ.षा.<br>भ.<br>म.<br>ज्ये.श्र.<br>कृ.<br>पू.फा.ध.<br>रो.<br>उ.फा.श.<br>मृ.<br>ह.पू.भा.<br>आ.<br>चि.उ.भां.<br>पुन.<br>स्वा.नक्षत्राणि

इति द्विसप्ततिका दशा।
अथ षष्ट्यब्दिकां दशामाह-
यदार्को लग्नराशिस्थश्चिन्त्या षष्टिसमा दशा।
दास्त्रास्त्रयं चतुष्कं च त्रयं वेदं पुनः पुनः।।३९।।
यदि सूर्य जन्मलग्न में हो तो षष्टिहायनी (६० वर्ष की) दशा का
विचार करना चाहिए। अश्विनी नक्षत्र से ४ नक्षत्र के बाद ३ नक्षत्र, पुनः
४ नक्षत्र, फिर ३ नक्षत्र इस क्रम से ।।३९।।
गुर्वर्कभूसुतानां च वर्षाणि दिङ्मितानि च।
ततः शशिज्ञशुक्रार्कपुत्रागूनां समाश्च षट् ।।४०।।
गुरु, सूर्य, भौम, दश-दश वर्ष, इसके बाद चन्द्रमा, बुध, शुक्र, शनि,
और राहु की ६-६ वर्ष की दशा होती है।।४०।।