बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
अथाष्टवर्गाध्यायः ३२१
अथ गुर्वष्टकवर्गचक्रम्-
| बृ. | शु. | श. | सू. | चं. | मं. | बु. | ल. |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| १ | २ | ३ | १ | २ | १ | १ | १ |
| २ | ५ | ५ | २ | ५ | २ | २ | २ |
| ३ | ६ | ६ | ४ | ७ | ४ | ४ | ४ |
| ४ | ९ | १२ | ५ | ९ | ७ | ५ | ५ |
| ७ | १० | ७ | ११ | ८ | ६ | ६ | |
| ८ | ११ | ८ | १० | ९ | ७ | ||
| १० | ९ | १२ | १० | ९ | |||
| ११ | १० | ११ | १० | ||||
| ११ | ११ |
अथ शुक्राष्टकवर्गः-
चन्द्रो व्यस्तारिखेषु व्यरिमदननभोऽन्त्येषु लग्नात्प्रशस्तो।
व्यन्तास्तारातिषु स्वाद्व्ययनिधनभवेष्वर्कतो दैत्यमन्त्री ।।
धीधर्माष्टाप्तिबन्धुत्रिदशसु रविजाद्धीतपःस्वाष्टलाभे।
जीवात् ज्ञाद्धीत्रिलाभक्षतनवसुकुजाद्धीभवापोक्लिनेषु ।।७।।
शुक्र चन्द्रमा से ७,६,१० स्थानों को छोड़कर शेष
१,२,३,४,५,८,९,१०,११,१२ स्थानों में शुभफल देता है। लग्न से
६,७,१०,१२ को छोड़कर शेष स्थानों में, अपने स्थान से १२,६,७, को
छोड़कर शेष स्थानों में, सूर्य से १२,८,११ स्थानों में, शनि से
५,९,८,११,४,३,१० स्थानों में, गुरु से ५,९,२,८,११, स्थानों में, बुध
से ५,३ ,११,६,९ स्थानों में और भौम से ५,११,३,६,९,१२ स्थानों में शुभफल
देता है।।७।।
अथ शुक्राष्टकवर्गचक्रम्-
| शु. | श. | सू. | चं. | मं. | बु. | बृ. | ल. |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| १ | ३ | ८ | १ | ३ | ३ | ५ | १ |
| २ | ४ | ११ | २ | ५ | ५ | ८ | २ |
| ३ | ५ | १२ | ३ | ६ | ६ | ९ | ३ |
| ४ | ८ | ४ | ९ | ९ | १० | ४ | |
| ५ | ९ | ५ | ११ | ११ | ११ | ५ | |
| ८ | १० | ८ | १२ | ८ | |||
| ९ | ११ | ९ | ९ | ||||
| १० | ११ | ११ | |||||
| ११ | १२ |
३२० बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
अथ बुधाष्टकवर्गः—
ज्ञः शुक्रात्स्वाद्यलाभाष्टमनवमसुखेसत्रिपुत्रेकुजार्क्याः।
साङ्गादारेऽथ जीवाद्द्वयरिपुनिधनायेषुशस्तो दिनेशात्।।
धीधर्मान्त्यारिलाभे त्रितनुदशयुते स्वात्सषडाप्तिरन्ध्रे।
व्योमाम्बुधिरिन्दुतोऽरिस्वमृतितनुव्योम लाभाब्धिलग्नात् ।।५।।
बुध शुक्र से २,१,११,८,९,४,३,५ स्थानों में शुभफल देता है। शनि
से १,२,३,४,५,६,७,८,९,१०,११ स्थानों में, गुरु से १२,६,८,११ स्थानों
में, सूर्य से ५,९,१२,६,११ स्थानों में, अपने स्थान से ५,९,१२,६,३,१,१०
स्थानों में, चन्द्रमा से २,४,६,८,१०,११ और लग्न से ६,२,८,१,१०,११,४
स्थानों में शुभफल देता है।।५।।
अथ बुधाष्टकवर्गचक्रम्-
| बु. | बृ. | शु. | श. | सू. | चं. | मं. | ल. |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| १ | ६ | १ | १ | ५ | २ | १ | १ |
| ३ | ८ | २ | २ | ६ | ४ | २ | २ |
| ५ | ११ | ३ | ४ | ९ | ६ | ४ | ४ |
| ६ | १२ | ४ | ७ | ११ | ८ | ७ | ६ |
| ९ | ५ | ८ | १२ | १० | ८ | ८ | |
| १० | ८ | ९ | ११ | ९ | १० | ||
| ११ | ९ | १० | १० | ११ | |||
| १२ | ११ | ११ | ११ | ||||
| अथ गुर्वष्टकवर्गः— | |||||||
| जीवो भौमात्स्वकेन्द्रागममृतिषु रखेः सधीधर्मेष्वथ स्वात्। | |||||||
| स्वत्रिष्विन्दुजात्षट्स्वसुखसुततनुव्योमधर्मार्गमेषु ।। | |||||||
| लग्नात्सास्तेषु चन्द्रात्स्मरगुरुधनधीप्राप्तिभेष्वर्कपुत्रात्। | |||||||
| धीषट्त्र्यन्तेषु शुक्रात्स्वसुतशुभमतोलाभविद्वेषिभेषु ।।६।। | |||||||
| गुरु भौम से २,१,४,७,१०,११,८ स्थानों में शुभफल देता है, सूर्य से | |||||||
| १,२,४,५,८,९,१०,११ स्थानों में, बुध से ६,२,४,५,१,१०,९,११ स्थानों | |||||||
| में, लग्न से १,२,३,४,५,६,७,९,१०,११ स्थानों में, चन्द्रमा से ७,९,२,५,११ | |||||||
| स्थानों में, शनि से ५,६,३,१२ स्थानों में, शुक्र से २,५,९,११,६ स्थानों | |||||||
| में शुभफल देता है।।६।। |
अथाष्टवर्गाध्यायः ३२१
अथ गुर्वष्टकवर्गचक्रम्—
| बृ. | शु. | श. | सू. | चं. | मं. | बु. | ल. |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| १ | २ | ३ | १ | २ | १ | १ | १ |
| २ | ५ | ५ | २ | ५ | २ | २ | २ |
| ३ | ६ | ६ | ४ | ७ | ४ | ४ | ४ |
| ४ | ९ | १२ | ५ | ९ | ७ | ५ | ५ |
| ७ | १० | ७ | ११ | ८ | ६ | ६ | |
| ८ | ११ | ८ | १० | ९ | ७ | ||
| १० | ९ | १२ | १० | ९ | |||
| ११ | १० | ११ | १० | ||||
| ११ | ११ | ||||||
| अथ शुक्राष्टकवर्गः— | |||||||
| चन्द्रो व्यस्तारिखेषु व्यरिमदननभोऽन्त्येषु लग्नात्प्रशस्तो। | |||||||
| व्यन्तास्तारातिषु स्वाद्व्ययनिधनभवेष्वर्कतो दैत्यमन्त्री।। | |||||||
| धीधर्माष्टाप्तिबन्धुत्रिदशसु रविजाद्धीतपःस्वाष्टलाभे। | |||||||
| जीवात् ज्ञाद्धीत्रिलाभक्षतनवसुकुजाद्धीभवापोक्लिनेषु।।७।। | |||||||
| शुक्र चंद्रमा से ७,६,१० स्थानों को छोड़कर शेष | |||||||
| १,२,३,४,५,८,९,१०,११,१२ स्थानों में शुभफल देता है। लग्न से | |||||||
| ६,७,१०,१२ को छोड़कर शेष स्थानों में, अपने स्थान से १२,६,७, को | |||||||
| छोड़कर शेष स्थानों में, सूर्य से १२,८,११ स्थानों में, शनि से | |||||||
| ५,९,८,११,४,३,१० स्थानों में, गुरु से ५,९,२,८,११, स्थानों में, बुध | |||||||
| से ५,३,११,६,१ स्थानों में और भौम से ५,११,३,६,९,१२ स्थानों में शुभफल | |||||||
| देता है।।७।। | |||||||
| अथ शुक्राष्टकवर्गचक्रम्— | |||||||
| शु. | श. | सू. | चं. | मं. | बु. | बृ. | ल. |
| --- | --- | --- | --- | --- | --- | --- | --- |
| १ | ३ | ८ | १ | ३ | ३ | ५ | १ |
| २ | ४ | ११ | २ | ५ | ५ | ८ | २ |
| ३ | ५ | १२ | ३ | ६ | ६ | ९ | ३ |
| ४ | ८ | ४ | ९ | ९ | १० | ४ | |
| ५ | ९ | ५ | ११ | ११ | ११ | ५ | |
| ८ | १० | ८ | १२ | ८ | |||
| ९ | ११ | ९ | ९ | ||||
| १० | ११ | ११ | |||||
| ११ | १२ |
३२२ . बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
अथ शनेरष्टकवर्गः
स्वात्सौरिस्त्र्यायपुत्रारिषु धरणीसुतात्सव्ययाज्ञेषु।
सूर्यात्केन्द्रेस्वाष्टाष्टसु ज्ञाद्वायमृतिस्वभवारातधर्मेषु।
चन्द्रात्षट्त्र्यायस्थोविलग्नादुपचयहिबुकाद्येषु षट्त्र्याप्ति-
रिष्केषुशुक्राद्वाचस्पतेश्चव्ययतनयभवारातिषु सुप्रशस्तः ॥८॥
शनि अपने स्थान से ३,११,५,६, स्थानों में शुभफल देता है। भौम से
३,५,६,१२,१० स्थानों में, सूर्य से १,४,७,१०,२,११,८ स्थानों में, बुध
से १२,८,२,११,८ स्थानों में, चन्द्रमा से ६,३,११ स्थानों में, लग्न से
३,६,१०,११,१ स्थानों में, शुक्र से ६,३, ११,१२ स्थानों में, गुरु से
१२,५,११,६ स्थानों में शुभफल देता है॥८॥
अथ शनेरष्टकवर्गचक्रम्-
| श. | सू. | चं. | मं. | बु. | बृ. | शु. | ल. |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ३ | १ | ३ | ३ | ६ | ५ | ६ | १ |
| ५ | २ | ६ | ५ | ८ | ६ | ११ | ३ |
| ६ | ४ | ११ | ६ | ९ | ११ | १२ | ४ |
| ११ | ७ | १० | ० | १२ | ३ | ९ | |
| ८ | ११ | ११ | १० | ||||
| १० | १२ | १२ | ११ | ||||
| ११ | |||||||
| अष्टकवर्गसाधन- | |||||||
| सूर्याष्टकवर्ग में सूर्य अपने स्थान से (जन्म के समय जिस राशि में | |||||||
| है) १।२।४।७।८।९।१०।११ स्थान में शुभ फल देता है; अन्यत्र स्थानों में | |||||||
| अशुभ फल देता है। जैसे निम्नलिखित जन्मांगचक्र में सूर्य कर्क राशि | |||||||
| में है, अतः ४।५।७।१०।११।१२।१।२ राशियों में शुभ फलसूचक रेखा | |||||||
| देगा, अन्य राशियों में बिन्दु रूप अशुभसूचक रेखा को देगा। इसी प्रकार | |||||||
| सभी ग्रह अपने-अपने स्थान से शुभ और अशुभ सूचक रेखा और बिन्दु | |||||||
| को देते हैं। जैसा कि नीचे चक्र में दिया है- | |||||||
| जन्माङ्गम् \qquad सूर्याष्टकवर्गः | |||||||
| [जन्माङ्ग चक्र (कुण्डली):] | |||||||
| लग्न (प्रथम भाव): १० | |||||||
| द्वितीय भाव: मं. ११ | |||||||
| तृतीय भाव: १२ | |||||||
| चतुर्थ भाव: १ | |||||||
| पञ्चम भाव: २, के. | |||||||
| षष्ठ भाव: चं. ३, शु. | |||||||
| सप्तम भाव: सू. ४ | |||||||
| अष्टम भाव: बु. ५, बृ. | |||||||
| नवम भाव: ६ | |||||||
| दशम भाव: ७ | |||||||
| एकादश भाव: ८, रा., श. | |||||||
| द्वादश भाव: ९ | |||||||
| [सूर्याष्टकवर्ग चक्र (कुण्डली - रेखा एवं बिन्दु सहित):] | |||||||
| १० राशि (मकर): ।।। (३ रेखाएँ), .... (४ बिन्दु) | |||||||
| ११ राशि (कुम्भ): मं. ।।। (३ रेखाएँ), ...... (६ बिन्दु) | |||||||
| १२ राशि (मीन): ।।।। (४ रेखाएँ), ... (३ बिन्दु) | |||||||
| १ राशि (मेष): ।।।।। (५ रेखाएँ) | |||||||
| २ राशि (वृष): के. ।।।।। (५ रेखाएँ), ... (३ बिन्दु) | |||||||
| ३ राशि (मिथुन): शु. चं. ।।।। (४ रेखाएँ), .... (४ बिन्दु) | |||||||
| ४ राशि (कर्क): सू. (केन्द्र) - ...... (६ बिन्दु) | |||||||
| ५ राशि (सिंह): बु. बृ. ।।।। (४ रेखाएँ), .... (४ बिन्दु) | |||||||
| ६ राशि (कन्या): ..... (५ बिन्दु) | |||||||
| ७ राशि (तुला): ।।।। (४ रेखाएँ) | |||||||
| ८ राशि (वृश्चिक): रा. श. ।।।।। (५ रेखाएँ), .... (४ बिन्दु) | |||||||
| ९ राशि (धनु): ।।।।।। (६ रेखाएँ), .. (२ बिन्दु) |
अथाष्टवर्गाध्यायः ३२३
सूर्याष्टकवर्गः ४८ चन्द्राष्टकवर्गः ४९
| ग्रह | सू. | चं. | मं. | बु. | बृ. | शु. | श. | ल. | योग | ग्रह | चं. | मं. | बु. | बृ. | शु. | श. | सू. | ल. | योग |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| रा. | ४ | ३ | ११ | ५ | ५ | ३ | ८ | १० | रा. | ३ | ११ | ५ | ५ | ३ | ८ | ४ | १० | ||
| ४ | । | । | । | ३ | ३ | । | । | । | । | । | ५ | ||||||||
| ५ | । | । | । | । | ४ | ४ | । | । | २ | ||||||||||
| ६ | । | । | २ | ५ | । | । | । | । | । | ४ | |||||||||
| ७ | । | । | । | । | ४ | ६ | । | । | । | ३ | |||||||||
| ८ | । | । | । | । | । | ५ | ७ | । | । | । | । | ४ | |||||||
| ९ | । | । | । | । | । | । | ६ | ८ | । | । | । | । | । | ५ | |||||
| १० | । | । | । | ३ | ९ | । | । | । | । | । | ५ | ||||||||
| ११ | । | । | । | ३ | १० | २ | । | । | २ | ||||||||||
| १२ | । | । | । | । | ४ | ११ | । | । | । | । | ४ | ||||||||
| १ | । | । | । | । | । | ५ | १२ | । | । | । | । | । | । | । | ७ | ||||
| २ | । | । | । | । | । | ५ | १ | । | । | । | । | । | ५ | ||||||
| ३ | । | । | । | । | ४ | २ | । | । | । | ||||||||||
| भौमाष्टकवर्गः बुधाष्टकवर्गः | |||||||||||||||||||
| ग्र. | मं. | बु. | बृ. | शु. | श. | सू. | चं. | ल. | योग | ग्र. | बु. | बृ. | शु. | श. | सू. | चं. | मं. | ल. | योग |
| :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: |
| रा. | ११ | ५ | ५ | ३ | ८ | ४ | ३ | १० | रा. | ५ | ५ | ३ | ८ | ४ | ३ | ११ | १० | ||
| ११ | । | २ | ५ | । | । | । | । | । | ५ | ||||||||||
| १२ | । | । | २ | ६ | । | । | । | । | ४ | ||||||||||
| १ | । | । | । | ३ | ७ | । | । | । | । | ४ | |||||||||
| २ | । | । | । | । | । | ५ | ८ | । | । | । | । | ५ | |||||||
| ३ | । | । | । | । | ४ | ९ | । | । | । | । | ४ | ||||||||
| ४ | । | । | २ | १० | । | । | । | । | । | ५ | |||||||||
| ५ | । | । | । | ३ | ११ | । | । | । | । | ४ | |||||||||
| ६ | । | । | । | ३ | १२ | । | । | । | । | ४ | |||||||||
| ७ | । | । | २ | १ | । | । | । | । | ४ | ||||||||||
| ८ | । | । | । | । | । | । | ६ | २ | । | । | । | । | ४ | ||||||
| ९ | । | । | । | ३ | ३ | । | । | । | । | । | । | ६ | |||||||
| १० | । | । | । | । | ४ | ४ | । | । | । | । | । | । | ५ |
३२४ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
गुर्वष्टकवर्गः शुक्राष्टकवर्गः
| ग्र. | बृ. | शु. | श. | सू. | चं. | मं. | बु. | ल. | ग्र. | शु. | श. | सू. | चं. | मं. | बु. | बृ. | ल. | ||
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| रा. | ५ | ३ | ८ | ४ | ३ | ११ | ५ | १० | रा. | ३ | ८ | ४ | ३ | ११ | ५ | ५ | १० | ||
| ५ | । | । | । | । | ४ | ३ | । | । | । | । | । | । | । | ७ | |||||
| ६ | । | । | । | । | ४ | ४ | । | । | । | । | ४ | ||||||||
| ७ | । | । | । | । | । | । | ६ | ५ | । | । | । | । | ४ | ||||||
| ८ | । | । | । | । | । | । | ६ | ६ | । | । | । | । | ४ | ||||||
| ९ | । | । | । | ३ | ७ | । | । | । | । | ४ | |||||||||
| १० | । | । | । | । | ४ | ३ | । | १ | |||||||||||
| ११ | । | । | । | । | । | । | ६ | ९ | । | । | । | ८ | |||||||
| १२ | । | । | । | । | । | ५ | १० | । | । | । | । | । | । | ६ | |||||
| १ | । | । | । | । | । | । | ६ | ११ | । | । | । | । | । | ५ | |||||
| २ | । | । | । | । | । | ५ | १२ | । | । | । | । | ४ | |||||||
| ३ | । | । | । | ३ | १ | । | । | । | । | । | । | ६ | |||||||
| ४ | । | । | । | । | ४ | २ | । | । | । | । | ४ | ||||||||
| शन्यष्टकवर्गः लग्नाष्टकवर्गः | |||||||||||||||||||
| ग्र. | श. | सू. | चं. | मं. | बु. | बृ. | शु. | ल. | ग्र. | ल. | सू. | चं. | मं. | बु. | बृ. | शु. | श. | ||
| --- | --- | --- | --- | --- | --- | --- | --- | --- | --- | --- | --- | --- | --- | --- | --- | --- | --- | --- | --- |
| रा. | ८ | ४ | ३ | ११ | ५ | ५ | ३ | १० | रा. | १० | ४ | ३ | ११ | ५ | ५ | ३ | ८ | ||
| ८ | । | । | । | ४ | १० | । | । | । | । | ४ | |||||||||
| ९ | । | १ | ११ | । | । | । | । | ४ | |||||||||||
| १० | । | । | । | । | । | । | ६ | १२ | । | । | । | ३ | |||||||
| ११ | । | १ | १ | । | । | । | । | । | । | ६ | |||||||||
| १२ | । | । | ३ | २ | । | । | । | ३ | |||||||||||
| १ | । | । | । | । | । | । | । | । | ८ | ३ | । | । | । | । | । | ५ | |||
| २ | । | । | । | ३ | ४ | । | । | २ | |||||||||||
| ३ | । | । | । | । | ४ | ५ | । | । | । | । | । | ५ | |||||||
| ४ | । | । | । | । | ४ | ६ | । | । | । | । | । | ५ | |||||||
| ५ | । | । | २ | ७ | । | । | । | ३ | |||||||||||
| ६ | । | १ | ८ | । | । | । | । | । | । | ६ | |||||||||
| ७ | । | । | २ | ९ | । | । | । | ३ |
अथाष्टवर्गाध्यायः ३२५
त्रिकोणशोधनम्—
त्रिकोणं तु चतुःप्रोक्तं मेषसिंहधनुस्तथा।
वृषकन्यामृगाख्येषु तुलाकुम्भयुगेषु च॥१९॥
सम्पूर्ण राशिचक्र (१२ राशि) में चार (४) त्रिकोण हैं। त्रिकोण का
अर्थ है— प्रथम, पंचम और नवम राशि। प्रत्येक त्रिकोण की प्रथम राशि
क्रम से मेष, वृष, मिथुन और कर्क हैं। इसके अनुसार मेष, सिंह,
धन प्रथम त्रिकोण; वृष, कन्या, मकर दूसरा; मिथुन, तुला, कुम्भ तीसरा
और कर्क, वृश्चिक, मीन चौथा त्रिकोण है॥१९॥
कर्कवृश्चिकमीनास्ते त्रिकोणाः स्युः परस्परम्।
त्रिकोणेषु च यन्न्यूनं तत्तुल्यं त्रिषु शोधयेत्॥२०॥
प्रत्येक त्रिकोण की तीनों राशियों में जिस राशि की रेखा संख्या कम
हो उसे त्रिकोण की अन्य दो राशि के रेखा की संख्या में घटावे।
शेष उसी राशि के नीचे रख दे॥२०॥
एकस्मिन्भवने शून्यं तत्त्रिकोणं न शोधयेत्।
३२६. बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
सिंह की ४ रेखाओं में से ४ घटाने से सिंह राशि में ० शून्य रहेगा
एवं धनराशि की ६ रेखाओं में से ४ घटाने से धन राशि में २ रहेगा।
अर्थात् त्रिकोण-शोधन के बाद मेष में १, सिंह में शून्य एवं धन में २ फल
आया। इसी प्रकार उपर्युक्त नियम के अनुसार सूर्यादि सात ग्रहों
और लग्न के अष्टक वर्ग का त्रिकोण-शोधन करना चाहिए। कहीं २
निम्नलिखित प्रकार से भी अष्टक वर्ग लिखने की प्रथा है—
सूर्याष्टकवर्गः ४८ चन्द्राष्टकवर्गः ४९
[सूर्याष्टकवर्गः]
मेष (१): रेखाएं ५ (।।।।।)
वृष (२): रेखाएं ४ (।।।।)
मिथुन (३): रेखाएं ४ (।।।।), चं., शु.
कर्क (४): रेखाएं ३ (।।।), सू.
सिंह (५): रेखाएं ५ (।।।।।), बु.
कन्या (६): रेखाएं ५ (।।।।।), बृ.
तुला (७): रेखाएं ४ (।।।।)
वृश्चिक (८): रेखाएं ५ (।।।।।), श.
धनु (९): रेखाएं ६ (।।।।।।)
मकर (१०): रेखाएं ३ (।।।)
कुम्भ (११): रेखाएं ३ (।।।), मं.
मीन (१२): रेखाएं ४ (।।।।)
[चन्द्राष्टकवर्गः]
मेष (१): रेखाएं ५ (।।।।।)
वृष (२): रेखाएं ३ (।।।)
मिथुन (३): रेखाएं ५ (।।।।।), चं., शु.
कर्क (४): रेखाएं २ (।।), सू.
सिंह (५): रेखाएं ४ (।।।।), बु., बृ.
कन्या (६): रेखाएं ३ (।।।)
तुला (७): रेखाएं ५ (।।।।।), श.
वृश्चिक (८): रेखाएं ४ (।।।।)
धनु (९): रेखाएं ५ (।।।।।)
मकर (१०): रेखाएं २ (।।)
कुम्भ (११): रेखाएं ३ (।।।), मं.
मीन (१२): रेखाएं ६ (।।।।।।)
भौमाष्टकवर्गः ३९ बुधाष्टकवर्गः ५४
[भौमाष्टकवर्गः]
मेष (१): रेखाएं ३ (।।।)
वृष (२): रेखाएं ४ (।।।।)
मिथुन (३): रेखाएं ४ (।।।।), शु., चं.
कर्क (४): रेखाएं २ (।।), सू.
सिंह (५): रेखाएं ३ (।।।), बु., बृ.
कन्या (६): रेखाएं ३ (।।।)
तुला (७): रेखाएं २ (।।)
वृश्चिक (८): रेखाएं ६ (।।।।।।), श.
धनु (९): रेखाएं ३ (।।।)
मकर (१०): रेखाएं ४ (।।।।)
कुम्भ (११): रेखाएं २ (।।), मं.
मीन (१२): रेखाएं ३ (।।।)
[बुधाष्टकवर्गः]
मेष (१): रेखाएं ४ (।।।।)
वृष (२): रेखाएं ४ (।।।।)
मिथुन (३): रेखाएं ५ (।।।।।)
कर्क (४): रेखाएं ५ (।।।।।), सू.
सिंह (५): रेखाएं ५ (।।।।।), बु., बृ.
कन्या (६): रेखाएं ५ (।।।।।)
तुला (७): रेखाएं ४ (।।।।)
वृश्चिक (८): रेखाएं ५ (।।।।।), श.
धनु (९): रेखाएं ४ (।।।।)
मकर (१०): रेखाएं ५ (।।।।।)
कुम्भ (११): रेखाएं ४ (।।।।), मं.
मीन (१२): रेखाएं ४ (।।।।)
गुर्वष्टकवर्गः ५६ शुक्राष्टकवर्गः ५२
[गुर्वष्टकवर्गः]
मेष (१): रेखाएं ५ (।।।।।)
वृष (२): रेखाएं ५ (।।।।।)
मिथुन (३): रेखाएं ३ (।।।), शु., चं.
कर्क (४): रेखाएं ४ (।।।।), सू.
सिंह (५): रेखाएं ५ (।।।।।), बु., बृ.
कन्या (६): रेखाएं ४ (।।।।)
तुला (७): रेखाएं ६ (।।।।।।)
वृश्चिक (८): रेखाएं ५ (।।।।।), श.
धनु (९): रेखाएं ४ (।।।।)
मकर (१०): रेखाएं ५ (।।।।।)
कुम्भ (११): रेखाएं ६ (।।।।।।), मं.
मीन (१२): रेखाएं ४ (।।।।)
[शुक्राष्टकवर्गः]
मेष (१): रेखाएं ५ (।।।।।)
वृष (२): रेखाएं ४ (।।।।)
मिथुन (३): रेखाएं ६ (।।।।।।), चं., शु.
कर्क (४): रेखाएं ५ (।।।।।), सू.
सिंह (५): रेखाएं ५ (।।।।।), बु., बृ.
कन्या (६): रेखाएं ४ (।।।।)
तुला (७): रेखाएं ४ (।।।।)
वृश्चिक (८): रेखाएं १ (।) श.
धनु (९): रेखाएं ३ (।।।)
मकर (१०): रेखाएं ६ (।।।।।।)
कुम्भ (११): रेखाएं ५ (।।।।।), मं.
मीन (१२): रेखाएं ४ (।।।।)
अथाष्टवर्गाध्यायः ३२७
शन्यष्टकवर्गः ३९ लग्नाष्टकवर्गः ४९
[शन्यष्टकवर्गः ३९]
८ (।।।। श.) | ९ (।।) | १० (।।।।।।) | ११ (। मं.) | १२ (।।।) | १ (।।।।।।।) | २ (।।।) | ३ (।।।। चं. श.) | ४ (।।।। सू.) | ५ (।। बृ. बु.) | ६ (।) | ७ (।।)
[लग्नाष्टकवर्गः ४९]
११ (।।।।। मं.) | १२ (।।।) | १ (।।।।।।) | २ (।।। बृ.) | ३ (स ४ । १४) | ४ (। सू.) | ५ (।।।।।। बु.) | ६ (।।।।।) | ७ (।।।) | ८ (।।।।। श.) | ९ (।।।) | १० (।।।।।।)
अथैकाधिपत्यशोधनम्—
एवं त्रिकोणं संशोध्य पश्चादेकाधिपत्यता।
क्षेत्रद्वये फलानि स्युस्तदा संशोषयेद्बुधः ।।१२।।
इस प्रकार त्रिकोण शोधन के बाद एकाधिपत्य शोधन करे। एक ग्रह की
दो राशियों में त्रिकोण-शोधन के फलों से एकाधिपत्य शोधन होता है ।।१२।।
क्षीणेन सह चान्यस्मिञ्छोधयेद्ग्रहवर्जिते।
ग्रहयुक्ते फले हीने ग्रहाभावे फलाधिके ।।१३।।
अनेन सह चान्यस्मिञ्छोधयेद्ग्रहवर्जिते।
फलाधिके ग्रहैर्युक्ते चान्यस्मिन् सर्वमुत्सृजेत् ।।१४।।
उभयोर्ग्रहसंयुक्ते न संशोध्यः कदाचन।
उभयोर्ग्रहहीनाभ्यां समत्वे सकलं त्यजेत् ।।१५।।
सग्रहा ग्रहतुल्यत्वात्सर्वं संशोध्यमग्रहात्।
एकत्र नास्ति चेत् सर्वहानिरन्यत्र कीर्त्तिता।
कुलीरसिंहयो राश्योः पृथक् क्षेत्रं पृथक् फलम् ।।१६।।
यदि एक ग्रह की दोनों राशियों में कोई ग्रह न हो तो अल्प संख्या को
अधिक संख्या में घटाकर शेष को अधिक संख्या के नीचे रख दे और
अल्पसंख्या को ज्यों का त्यों रख दे (१)। यदि एक राशि में ग्रह हो और
दूसरी राशि में ग्रह न हो और जिस राशि में ग्रह हो उसकी संख्या
ग्रहहीन राशि की संख्या से अल्प हो तो ग्रहहीन राशि की संख्या में अल्प
संख्या को घटाकर शेष ग्रहहीन के नीचे रख दे और अल्प संख्या यथावत्
३२८ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
रख दे (२)। यदि ग्रहयुक्त राशि की संख्या अधिक हो और ग्रहहीन राशि
में अल्प संख्या हो तो ग्रहहीन राशि में शून्य और ग्रहयुक्त राशि की संख्या
यथावत् रखनी चाहिए (३)। यदि दोनों राशियाँ ग्रहयुक्त हों तो संशोधन
नहीं करना चाहिए, यानि दोनों जगह यथावत् अंक रहने दे (४)। यदि एक
ग्रहयुक्त हो और दूसरी राशि ग्रहहीन तथा दोनों की संख्या बराबर हो तो
ग्रहहीन राशि के नीचे शून्य और ग्रहयुक्त राशि के नीचे वही संख्या
रहेगी (५)। यदि दोनों ग्रहयुक्त वा ग्रहहीन हों अथवा दोनों में एक ग्रहयुक्त
और एक ग्रहहीन हो किन्तु त्रिकोण-शोधन में किसी एक में शून्य हो तो
दोनों में शून्य ही होगा (६)। कर्क और सिंह राशि के फल ज्यों के त्यों रहते
हैं, इनमें एकाधिपत्य शोधन नहीं किया जाता है ।। १२-१६ ।।
इति एकाधिपत्यशोधनम्।
अथ पिण्डोत्पत्त्याध्यायः
शोध्यावशेषं संस्थाप्य राशिमानेन वर्धयेत्।
ग्रहयुक्तेऽपि तद्राशौ ग्रहमानेन वर्धयेत् ।।१।।
एकाधिपत्य शोधन के उपरान्त जिस राशि के नीचे जो संख्या हो उसे
उस राशि के नीचे रखकर उस राशि के गुणक से गुणा करे। यदि
राशि में ग्रह हो तब भी उस संख्या को उस ग्रह के गुणक से गुणा कर फल
को उसके नीचे रख दे।।१।।
अथ राशि-ग्रहगुणकध्रुवाङ्कानाह-
गोसिंहौ दशगुणितौ दशभिर्मिथुनालिनौ।
वणिग्मेषौ तु मुनिभिः कन्यकामकरौ शरैः।।२।।
वृष-सिंह राशि को १० से, मिथुन-वृश्चिक को १० से, तुला और मेष
को ७ से, कन्या-मकर को ५ से।।२।।
शेषाः स्वमानतो गण्या ग्रहगुणकमथोच्यते।
जीवारशुक्रसौम्यानां दशाष्टमुनिसायकाः ।।३।।
और शेष राशियों को उनकी संख्या से ( एकाधिपत्य शोधन के
उपरान्त जो अंक जिस राशि के नीचे है उसे गुणाकर गुणन फल को
राशि के नीचे रखना चाहिए। इसी प्रकार जिस राशि में जो ग्रह हो उस ग्रह
के गुणक से राशि के नीचे वाले की संख्या (एकाधिपत्य शोधनोपरान्त
अथ पिंडोत्पत्याध्यायः ३२९
शेष अंक को) गुणाकर गणन फल को उस राशि के नीचे रख दे। यदि
एक राशि में दो-तीन ग्रह हों तो उनके गुणकों से अलग-अलग उस संख्या
को गुणाकर सभी का योगकर उस राशि के नीचे रखना चाहिए। गुरु,
भौम, शुक्र और बुध का क्रम से १०, ८, ७, ५, गुणक है।।३।।
बुधस्य संख्या शेषाणां ग्रहगुणैर्गुणयेत्क्रमात्।
सर्वेषां फलयोगोऽपि पिण्डमानं प्रकथ्यते ।।४।।
इस प्रकार गुरु का १०; भौम का ८, शुक्र का ७, बुध का ५ और शेष
ग्रहों का ५ गुणक है। सभी फलों के योग को पिण्ड कहते हैं।।४।।
| राशि | मे. | वृ. | मि. | क. | सिं. | क. | तु. | वृ. | ध. | मं. | कुं. | मी. |
| :--- | :--- | :--- | :--- | :--- | :--- | :--- | :--- | :--- | :--- | :--- | :--- |
| गुणक | ७ | १० | ८ | ४ | १० | ५ | ७ | ८ | ९ | ५ | ११ | १२ |
| ग्रह | सू. | चं. | मं. | बु. | बृ. | शु. | श. |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| गुणक | ५ | ५ | ८ | ५ | १० | ७ | ५ |
| सूर्याष्टकवर्गशोधनम् | |||||||
| जन्मकालीन ग्रहाः | चं. शु. | सू. | बु. बृ. | ||||
| :--- | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: |
| राशयः | १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ |
| रेखा | ५ | ५ | ४ | ३ | ४ | २ | ४ |
| त्रिकोण शोधन | १ | ३ | १ | ० | ० | ० | १ |
| एकाधिपत्य शोधन | १ | २ | ० | ० | ० | ० | १ |
| राशिगुणन फल | ७ | २० | ० | ० | ० | ० | ७ |
| ग्रहगुणन फल | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० |
: ३३० · बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् ·
चन्द्राष्टवर्गशोधनम्
| जन्मकालीन ग्रहाः | चं. शु. | सू. | बु. बृ. | श. | मं. | योग | ||||||||
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| राशयः | १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | ||
| रेखाः | ५ | ३ | ५ | २ | ४ | ३ | ४ | ५ | ५ | २ | ४ | ७ | ४९ | |
| त्रिकोण शोधनं | १० | १ | १ | ० | ० | १ | ० | ३ | १ | ० | ० | ५ | १३ | |
| एकाधिपत्य शोधन | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ३ | ० | ० | ० | ४ | ७ | |
| राशिगुणन फल | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ४२ | ० | ० | ० | ४८ | ७२ | राशिपिंड योग पिंड |
| ग्रहगुणन फल | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | १५ | ० | ० | ० | ० | १५ | ग्रहपिंड ८७ |
भौमाष्टकवर्गशोधनम्
| जन्मकालीन ग्रहाः | चं. शु. | सू. | बु. बृ. | श. | मं. | योग | |||||||
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| राशयः | १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | |
| रेखाः | ३ | ५ | ४ | २ | ३ | ३ | २ | ६ | ३ | ४ | २ | २ | ३९ |
| त्रिकोण-शोधन | ० | २ | २ | ० | ० | ० | ० | ४ | ० | १ | ० | ० | ९ |
| एकाधिपत्य शोधन | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० |
| राशिगुणन फल | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० |
| ग्रहगुणन फल | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० |
अथ पिंडोत्पत्याध्यायः ३३१
बुधाष्टकवर्गशोधनम्
| जन्मकालीन ग्रहाः | चं. शु. | सू. | बु. बृ. | श. | मं. | योग | ||||||||
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| राशयः | १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | ||
| रेखाः | ४ | ४ | ६ | ५ | ५ | ४ | ४ | ५ | ४ | ५ | ४ | ४ | ५४ | |
| त्रिकोण-शोधन | ० | ० | २ | १ | १ | ० | ० | १ | ० | १ | ० | ० | ६ | |
| एकाधिपत्य फल | ० | ० | ० | १ | १ | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | २ | |
| राशिगुणन शोधन | ० | ० | ० | ४ | १० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | १४ | राशिपिंड |
| ग्रहगुणन फल | ० | ० | ० | ५ | १५ | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | २० | ग्रहपिंड |
| गुर्वष्टकवर्गशोधनम् | ||||||||||||||
| जन्मकालीन ग्रहाः | चं. शु. | सू. | बु. बृ. | श. | मं. | योग | ||||||||
| :--- | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: |
| राशयः | १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | ||
| रेखाः | ६ | ५ | ३ | ३ | ५ | ४ | ६ | ५ | ४ | ४ | ६ | ५ | ५६ | |
| त्रिकोण-शोधन | २ | १ | ० | ० | १ | ० | ३ | २ | ० | ० | ३ | २ | १४ | |
| एकाधिपत्य शोधन | ० | १ | ० | ० | १ | ० | २ | २ | ० | ० | ० | ० | ६ | |
| राशिगुणन फल | ० | १० | ० | ० | १० | ० | १४ | १६ | ० | ० | ० | ० | ५० | राशिपिंड |
| ग्रहगुणन फल | ० | ० | १५ | ० | ० | १० | ० | ० | ० | ० | २५ | ग्रहपिंड |
३३२ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
शुक्राष्टकवर्गशोधनम्
| जन्मकालीन ग्रहाः | १ | २ | चं. शु. | सू. | बु. बृ. | | | श. | | | मं. | | योग | |
| :--- | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: |
| राशयः | १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | | |
| रेखाः | ६ | ४ | ७ | ४ | ४ | ४ | ४ | १ | ३ | ६ | ५ | ४ | ५२ | |
| त्रिकोण-शोधन | ३ | ० | ३ | ३ | १ | ० | ० | ० | ० | २ | १ | ३ | १६ | |
| एकाधिपत्य शोधन | ० | ० | ० | ३ | १ | ० | ० | ० | ० | १ | १ | ० | ६ | |
| राशिगुणन फल | ० | ० | ० | १२ | १० | ० | ० | ० | ० | ५ | ११ | ० | ३८ | राशिपिंडयोग | पिंड |
| ग्रहगुणन फल | ० | ० | ० | १५ | १५ | ० | ० | ० | ० | ० | ८ | ० | ३५ | ग्रहपिंड | ७३ |
शन्यष्टकवर्गशोधनम्
| जन्मकालीन ग्रहाः | | | चं. शु. | सू. | बु. बृ. | | | श. | | | मं. | | योग. | |
| :--- | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: |
| राशयः | १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | | |
| रेखाः | ७ | ३ | ४ | ४ | २ | १ | २ | ४ | ५ | ६ | १ | ३ | ४२ | |
| त्रिकोण-शोधन | ५ | २ | ३ | १ | ० | ० | १ | १ | ० | ५ | ० | ० | १८ | |
| एकाधिपत्य शोधन | ४ | १ | ० | १ | ० | ० | १ | १ | ० | ० | ० | ० | ८ | |
| राशिगुणन फल | २८ | १० | ० | ४ | ० | ० | ७ | ८ | ० | ० | ० | ० | ५७ | राशिपिंडयोग | पिंड |
| ग्रहगुणन फल | | | ० | ५ | ० | ० | ० | ५ | ० | ० | ० | ० | १० | ग्रहपिंड | ६७ |
अथ पिंडोत्पत्त्याध्यायः ३३३
लग्नाष्टकवर्गशोधम्
| जन्मकालीन ग्रहाः | चं. शु. | सू. | बु. बृ. | श. | मं. | योग | |||||||
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| राशयः | १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | - |
| रेखाः | ६ | ३ | ५ | २ | ५ | ५ | ३ | ६ | ३ | ४ | ४ | ३ | ४९ |
| त्रिकोण-शोधन | ३ | ० | २ | ० | २ | २ | ० | ४ | ० | १ | १ | १ | १६ |
| एकाधिपत्य शोधन | ० | ० | ० | ० | २ | ८ | ० | ४ | ० | ० | १ | १ | ८ |
| राशिगुणन फल | ० | ० | ० | ० | २० | ० | ० | ३२ | ० | ० | ११ | १२ | राशिपिंड ७५ |
| ग्रहगुणन फल | ० | १० | २० | ८ | ग्रहपिंड ३८ |
प्रत्येक अष्टकवर्गों में मेषादि राशियों में कितनी-कितनी रेखायें प्राप्त
हुई हैं और उनका योग क्या हुआ इत्यादि बातों को जानने के लिए सर्वाष्टक-
वर्ग चक्र दिया जाता है—
सर्वाष्टकवर्गचक्रम्
| राशयः | १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | योग |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| सूर्याष्टकवर्ग | ५ | ५ | ४ | ३ | ४ | २ | ४ | ५ | ६ | ३ | ३ | ४ | ४८ |
| चन्द्राष्टकवर्ग | ५ | ३ | ५ | २ | ४ | ३ | ४ | ५ | ५ | २ | ४ | ७ | ४९ |
| भौमाष्टकवर्ग | ३ | ५ | ४ | २ | ३ | ३ | २ | ६ | ३ | ४ | २ | २ | ३९ |
| बुधाष्टकवर्ग | ४ | ४ | ६ | ५ | ५ | ४ | ४ | ५ | ४ | ५ | ४ | ४ | ५४ |
| गुर्वष्टकवर्ग | ६ | ५ | ३ | ३ | ५ | ४ | ६ | ५ | ४ | ४ | ६ | ५ | ५६ |
| शुक्राष्टकवर्ग | ६ | ४ | ७ | ४ | ४ | ४ | ४ | १ | ३ | ६ | ५ | ४ | ५२ |
| शन्यष्टकवर्ग | ७ | ३ | ४ | ४ | २ | १ | २ | ४ | ५ | ६ | १ | ३ | ३९ |
| लग्नाष्टकवर्ग | ६ | ३ | ५ | २ | ५ | ५ | ३ | ६ | ३ | ४ | ४ | ३ | ४९ |
| ग्रह | चं. शु. | सू. | बु. बृ. | श. | मं. | ||||||||
| योग | ४२ | ३२ | ३८ | २५ | ३२ | २६ | २९ | ३७ | ३३ | ३४ | २९ | ३२ | ३८९ |
३३४ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
अष्टकवर्गयुक्तजन्माङ्गम्
┌──────┬──────┬──────┐
│ (२९) मं. ११ │ (३४) १० │ ९ (३३) │
│ १२ (३२) │ │ ८ (३७) श. │
├──────┼──────┼──────┤
│ (४२) १ │ │ (२९) ७ │
├──────┼──────┼──────┤
│ २ (३२) │ ४ (२५) सू. │ ६ (२६) │
│ ३ शु. (३८) चं. │ │ ५ बु. (३२) बृ. │
└──────┴──────┴──────┘
इति पिण्डोत्पत्याध्यायः।
अथाष्टकवर्गफलाध्यायः
आत्मस्वभावशक्तिश्च पितृचिन्ता रवेः फलम् ।
मनोबुद्धिप्रसादश्च मातृचिन्ता मृगाङ्कतः ।।१।।
आत्मा, स्वभाव, शक्ति और पिता का विचार सूर्य से करना चाहिए।
मन, बुद्धि, प्रभाव और माता का विचार चन्द्रमा से करना चाहिए ।।१।।
भ्रातृसत्त्वं गुणं भूमिं भौमेन तु विचिन्तयेत् ।
वाणिज्यकर्मवृत्तिश्च बुधेन तु विचिन्तयेत् ।।२।।
भाई, सत्त्वगुण, भूमि का विचार भौम से करना चाहिए। व्यापार वृत्ति
का विचार बुध से करना चाहिए ।।२।।
गुरुणा देहपुष्टिश्च बुद्धिपुत्रार्थसम्पदः।
भृगोर्विवाहकर्माणि भोगस्थानं च वाहनम् ।।३।।
गुरु से शरीर की पुष्टता, बुद्धि और पुत्र का विचार करना चाहिए। शुक्र
से विवाह, भोगस्थान, वाहन ।।३।।
वेश्यास्त्रीजनगात्राणि शुक्रेणैव निरीक्षयेत् ।
आयुष्यं जीवनोपायं दुःखशोकं महद्भयम् ।।४।।
वेश्या का विचार करना चाहिए। आयुष्य, जीविका, दुःख, शोक,
भय ।।४।।
अथाष्टकवर्गफलाध्यायः ३३५
सर्वक्षयं च मरणं मन्देनैव निरीक्षयेत्।
रविः पिता शशी माता भ्रातां भौमो बुधः सुहृत् ॥५॥
सर्वनाश और मृत्यु का विचार शनि से करना चाहिए। रवि पिता कारक
बुध है।।५।।
मातुलेयः स्मृतो जीवो ज्ञानंपुण्ये स्त्रियः सितः।
एषामृक्षे च तत्काले मरणं कुरुते शनिः॥६॥
ज्ञान, गुण का कारक गुरु और स्त्री (पत्नी) का कारक शुक्र है। इनकी
राशि में जब शनि जाता है तो इन लोगों को कष्ट होता है।।६।।
तत्तद्भावफलेन च गुणितं योगैक्यपिण्डं फलम्।
विंशत्या सह सप्तभिश्च विहृतं तच्छेषताराशनौ ॥७॥
जिन भावों का विचार करना हो उन २ भावों के फल (अष्टक वर्ग
की रेखा) को उस ग्रह के योगपिंड को गुणाकर गुणनफल में २७
का भाग देने से जो शेष बचे तत्तुल्य अश्विनी से गिनने से जो नक्षत्र आवे
उस पर जब शनि आता है।।७।।
तातः स्याज्जननी सहोदरजवो बन्धुःसुतः स्त्री स्वयम्।
तत्तुल्यं विलयं प्रयाति विपुलं श्रीनाथहेतुश्च वा॥८॥
तब पिता, माता, भाई, बंधु, पुत्र, स्त्री आदि को कष्ट होता है अथवा
लक्ष्मी की प्राप्ति होती है।।८।।
सूर्याष्टकवर्गफलम्-
आदित्याष्टकवर्गं च निक्षिप्याकाशचारिषु।
अर्कस्थितात्तु नवमो राशिः पितृगृहं स्मृतम्॥९॥
सूर्याष्टक वर्ग का न्यासं ग्रहं सहित करे। सूर्य से नवम स्थान पिता का
होता है।।९।।
तद्राशिफलसंख्याभिर्वर्धयेद्योगपिण्डकम्।
सप्तविंशोद्धृतं शेषं नक्षत्रं याति भानुजः॥१०॥
उस राशि के फल को (रेखा को) योगपिंड से गुणाकर गुणनफल में
२७ का भाग देने से जो शेष हो, तत्संख्या के तुल्य अश्विनी से गिनने से
जो नक्षत्र हो उस नक्षत्र पर जब शनि जाता है।।१०।।
तस्मिन् काले पितृकष्टो भवतीति न संशयः।
तत्त्रिकोणगते वापि पितापितृसमोऽपि वा।
मरणं तस्य जानीयाद्दशा छिद्रेषु कल्पयेत् ॥११॥
३३६ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
तो उस समय पिता को कष्ट होता है, इसमें संदेह नहीं। अथवा
उस नक्षत्र से त्रिकोण में (१०वें, ९वें नक्षत्र) जब शनि होता है तब पिता
या पिता के तुल्य (चाचा आदि) का मरण होता है। उस समय की दशां
को छिद्रदशा कहते हैं।।९१।।
अथ पित्रोररिष्टकालमाह-
अर्कभात्तु तुर्येगे राहौ मन्दे वा भूमिनन्दने।
गुरुशुक्रेक्षणमृते पितृहा जायते नरः।।९२।।
सूर्य से चौथे स्थान में राहु, शनि, भौम में से कोई हो और गुरु-शुक्र
से न देखा जाता हो तो पिता को अरिष्टकारक होता है।।९२।।
लग्नाच्चन्द्राद्गुरुस्थाने याते सूर्यसुते यदि।
पित्रोर्नाशं तदा काले वीक्षिते पापसंयुते।।९३।।
लग्न वा चन्द्रमा से नवम स्थान में जिस समय शनि हो और पापग्रह
से युत तथा देखा जाता हो तो उस समय पिता का मरण कहे।।९३।।
दशानुकूलकालेन योजयेत्कालवित्तमः।
लग्नात्सुखेश्वरानिष्टदशायां च पितृक्षयः।।९४।।
यदि अनुकूल दशा हो तो अरिष्ट नहीं होता है। लग्न से सुखेश
(चतुर्थेश) की अनिष्ट दशा में भी पिता का नाश होता है।।९४।।
पितृकर्मकर्त्ता योगः-
पितृजन्माष्टमी जातस्तदीशे लग्नगेऽपि वा।
तेनैव पितृकर्माणि कारयेन्नात्र संशयः।।९५।।
पिता के जन्मलग्न से आठवीं राशि में जन्म हो और उस राशि के स्वामी
लग्न में हों तो वह पिता के कर्म को करने वाला होता है।।९५।।
अथ पितृसुखयोगः-
सुखनाथदशायं तु बहुप्राप्तेश्च सम्भवः।
सुखेशे लाभलग्नस्थे चन्द्रलग्नाद्विशेषतः।।९६।।
सुखेश की दशा में अधिक सुख पाने की संभावना होती है। सुखेश ११
वें भाव में हो अथवा चन्द्रमा से ११वें वा दशम भाव में हो तो जातक
पिता के वश में रहने वाला होता है।।९६।।
पितृगृहे समायुक्ते जातः पितृवशानुगः।
पितृजन्मतृतीयर्क्षे जातः पितृधनाश्रितः।।९७।।
अथाष्टकवर्गफलाध्यायः ३३७
पिता के जन्मलग्न से तीसरी राशि में जन्म हो तो वह पिता के धन
का आश्रित होता है॥१७॥
पितृकर्मगृहे जातः पितृतुल्यगुणान्वितः।
तदीशे लग्नसंस्थेऽपि पितृश्रेष्ठो भवेन्नरः॥१८॥
पिता के जन्मलग्न से १०वीं राशि में उत्पन्न हो तो जातक पिता के गुणों
के सदृश गुण वाला होता है और दशम राशि का स्वामी लग्न
में हो तो पिता से श्रेष्ठ होता है॥१८॥
अथ विशेषफलमाह-
सूर्याष्टवर्गे यच्छून्यं मासे तद्दिवसेऽपि वा।
विवाहव्यवहारादि मासेऽस्मिन्वर्जयेत्सदा ॥१९॥
सूर्याष्टक वर्ग में जिस राशि में शून्य हो उस राशि संबंधी मास और
दिन में विवाह आदि शुभ कार्य, व्यवहार आदि न करे॥१९॥
कलहोत्पातदुःखानि शून्यमासे भवन्ति च।
संशोध्यपिण्डं सूर्यस्य रन्ध्रमानेन वर्धयेत् ॥२०॥
शून्य वाले मास में कलह, उत्पात आदि दुःख होते हैं। सूर्य के पिंड का
शोधन कर अष्टम स्थान की फल रेखा से योगपिंड को गुणाकरं ॥२०॥
द्वादशहृतावशेषं मेषादिगणयेत्पुनः।
तस्मिन्मासे मृतिं विद्यात्तत्त्रिकोणगतेऽपि वा॥२१॥
उसमे १२ से भाग दे, शेष मेषादि से गिनने से जो राशि हो उस राशि
के मास में अरिष्ट होता है अथवा उससे त्रिकोण राशि के मास में अरिष्ट
होता है॥२१॥
इति सूर्याष्टकवर्गफलविचारः।
अथ चन्द्राष्टकवर्गफलविचारः-
चन्द्राच्चतुर्थगे मातुः प्रासादग्रामचिन्तनम्।
चन्द्राष्टवर्गे यच्छून्यं तत्र राशिगते विधौ॥२२॥
चन्द्रमा से चौथे माता, गृह, ग्राम का विचार करना चाहिए। चन्द्राष्टक
वर्ग में जिस राशि में शून्य हो उस राशि में जब चन्द्रमा हो॥२२॥
तन्नक्षत्रं परित्यज्य शुभकर्माणि कारयेत्।
चन्द्राष्टमेशनक्षत्रे त्रितयेषु विशेषतः॥२३॥
३३८ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
अथवा वह राशि जिन २ नक्षत्रों से बनती है उन २ नक्षत्रों पर जब चन्द्रमा
हो तो शुभ कर्म नहीं करना चाहिए। चन्द्रमा से अष्टमेश जिस नक्षत्र
पर हो, उससे त्रिकोण के दो नक्षत्र अर्थात् इन तीनों नक्षत्रों पर ।।२३।।
आयामव्याधिदुःखानि लभते नात्र संशयः।
चन्द्रात्सुखफलात्पिण्डं वर्धयेत्सप्तद्भिभाजयेत् ।।२४।।
आयाम- व्याधि और दुःख की प्राप्ति होती है। चन्द्रमा से चौथे स्थान
के फल को चन्द्राष्टक वर्ग के पिंड को गुणाकर गुणन फल में २७ का
भाग देने से ।।२४।।
शेषमृक्षे शनौ याने मातृहानिं विनिर्दिशेत्।
तत्त्रिकोणेषु वा केचिन्मातृकष्टं समादिशेत् ।।२५।।
शेष तुल्य अश्विन्यादि नक्षत्र में शनि के रहने से माता की हानि
होती है अथवा उससे त्रिकोण के नक्षत्रों पर शनि के रहने से माता को
कष्ट होता है ।।२५।।
उदाहरण- जैसे चन्द्रमा मिथुन राशि में है, उससे अष्टम मकर
राशि के स्वामी शनि विशाखा नक्षत्र के चौथे चरण में वृश्चिक राशि
में हैं, अतः विशाखा, शतभिषा और पुनर्वसु में आयामादि फल होंगे। चन्द्रमा
से चौथे स्थान में फल ३ है, इससे योगपिंड ८७ को गुणने से
२६१ हुआ। इसमें २७ का भाग देने से १८ शेष हुआ। अश्विनी से गिनने
से १८वाँ ज्येष्ठा नक्षत्र हुआ, अतः ज्येष्ठा नक्षत्र पर जब शनि आयेगा
तो माता की हानि होगी।
इति चन्द्राष्टकवर्गफलम्।
अथ भौमाष्टकवर्गफलम्—
भौमाष्टंवर्गे सञ्चिन्त्यं भ्रातृविक्रमधैर्यकम्।
भौमस्थितस्य सहजो राशिर्भ्रातृगृहं स्मृतम् ।।२६।।
भौम के अष्टक वर्ग से भाई, पराक्रम, धैर्य का विचार करना
चाहिए। भौम जिस राशि पर हो उससे तीसरी राशि भाई की होती
है।।२६।।
त्रिकोणशोधनं कृत्वा यत्र भूयांसि वै फलम्।
भूमेर्भवति भार्याया भ्रातृगेहसुखं तथा ।।२७।।