बृहत्पाराशर होरा शास्त्र (महर्षि पराशर - सम्पूर्ण फलित ज्योतिष महाकोश सान्वय सटीक)
Brihat Parashara Hora Shastra of Maharshi Parasara with Commentary
महर्षि पराशर (टीकाकार: पं. गणेशदत्त पाठक / सीताराम झा) द्वारा
३१४ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
अथ मारकभेदाध्यायः
त्रिविधाश्चायुषो योगाः स्वल्पायुर्मध्यमोत्तमाः।
द्वात्रिंशात्पूर्वमल्पायुर्मध्यमायुस्ततो भवेत्।
चतुःषष्ट्याः पुरस्तात्तु ततो दीर्घमुदाहृतम् ।।१।।
तीन प्रकार के आयु के योग कहे गये हैं, जो कि अल्पायु, मध्यमायु
और उत्तमायु वा दीर्घायु के नाम से प्रसिद्ध हैं। ३२ वर्ष से पूर्व अल्पायु
होती है। इसके बाद ६४ वर्ष की अवस्था तक मध्यमायु होती है। इसके
बाद दीर्घायु होती है।।१।।
उत्तमायुः शतादूर्ध्वं ज्ञातव्यं मुनिसत्तम।
चतुर्विंशतिवर्षान्तमायुर्ज्ञातुं न शक्यते।।२।।
इसके बाद १०० वर्ष तक दीर्घायु और इसके ऊपर उत्तमायु होती है।
जन्म से २४ वर्ष पर्यन्त आयु का ज्ञान नहीं होता है अर्थात् उक्त समय
तक आयु के ऊपर निर्भर नहीं रहना चाहिए।।२।।
जपहोमचिकित्साद्यैर्बालरक्षां तु कारयेत्।
पितृदोषैर्मृताः केचित्केचिन्मातृग्रहैरपि ।।३।।
तब तक यानि २४ वर्ष की अवस्था पर्यन्त जप, होम, चिकित्सा आदि
से बालकों की रक्षा करनी चाहिए। उक्त वर्ष के अंदर कोई पिता
के ग्रहों से, कोई माता के ग्रहों से।।३।।
अपरेऽरिष्टयोगाच्च त्रिविधा बालमृत्युवः।
अल्पायुर्योगजातस्य विपत्तारां मृतिं वदेत् ।।४।।
और कोई अरिष्ट योग से मर जाते हैं। इस तरह तीन प्रकार से बालकों
की मृत्यु होती है। जिनकी अल्पायु होती है उनकी विपत्तारा की दशा
में ।।४।।
जातस्य मध्यमायुष्ये प्रत्यरौ च मृतिर्भवेत्।
दीर्घायुर्योगजातानां वधभे तु मृतिर्भवेत् ।।५।।
मध्यमायु योग वाले की प्रत्यरि तारा की दशा में और दीर्घायु योग वाले
की वध तारा की दशा में मृत्यु होती है।।५।।
अष्टमर्क्षं तृतीयं च लग्नादायुरुदाहृतम्।
द्वितीयं सप्तमस्थानं मारकस्थानमुच्यते ।।६।।
अथ मारकभेदाध्यायः ३१५
जन्मलग्न से तीसरा और आठवाँ स्थान आयु का होता है और दूसरा
तथा सातवाँ मारक स्थान होता है।।६।।
महामारकसंज्ञौ तौ मान्दिकेतू इति स्मृतौ।
जायाकुटुम्बकाधीशौ मारकावष्टमेश्वरौ।।७।।
मांदि और केतु महामारक होते हैं और सप्तम, द्वितीय और आठवें
भाव के स्वामी मारकेश होते हैं।।७।।
प्रायेण मारको राशिदशास्तत्राविशेषतः।
षष्ठभे पापभूयिष्ठे षष्ठेशो मुख्यमारकः।।८।।
प्रायः इन स्थानों की राशियाँ मारक होती हैं। छठे स्थान में अधिक पाप
ग्रह हों तो षष्ठेश मुख्य मारक होता है।।८।।
षष्ठत्रिकोणगो वापि मुख्यमारक इष्यते।
मध्यायुषि मृतिः षष्ठदशायामष्टमस्य वा।।९।।
छठे से त्रिकोण भी मारक होता है। मध्यायु में छठे या आठवीं दशा
में मृत्यु होती है।।९।।
षष्ठात् त्रिकोणस्य पुनर्दीर्घाल्पविषयो भवेत्।
षष्ठे बलयुते तस्य त्रिकोणे मृतिमादिशेत्।।१०।।
दीर्घायु में षष्ठ से त्रिकोण की दशा में मृत्यु होती है। षष्ठ स्थान वा
षष्ठेश बली हो तो उसके त्रिकोण की दशा में मृत्यु होती है।।१०।।
षष्ठेशश्चेद्वलाढ्यः स्यात्तत्त्रिकोणे मृतिं वदेत्।
व्यवस्थेयं समस्तापि कारकादिदशास्वपि।।११।।
यह व्यवस्था सम्पूर्ण मारक दशा के लिए हैं।।११।।
मारकेशदशाकाले मारकस्थस्य पापिनः।
पाके पापयुजां पाके सम्भवे निधनं भवेत्।।१२।।
मारकेश की दशा में मारक स्थान स्थित पापग्रह की अन्तर्दशा में
संभावना हो तो मृत्यु होती है।।१२।।
असम्भवे व्ययाधीशदशायां मरणं नृणाम्।
अभावे व्ययभावेशसम्बन्धिग्रहभुक्तिषु।।१३।।
यदि असंभव हो तो व्ययेश की दशा में मृत्यु होती है। इसके अभाव
में व्ययेश के संबंधी ग्रह के अंतर में मृत्यु होती है।।१३।।
३१६ : बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
तदभावेऽष्टमेशस्य दशायां निधनं पुनः।
मन्दश्चेत्पापसंयुक्तो मारकग्रहयोगतः।।१४।।
इसके अभाव में अष्टमेश की दशा में मृत्यु होती है। शनि पापग्रह से
युक्त हो और मारकेश के साथ योग करता हो तो।।१४।।
तिरस्कृत्य ग्रहान्सर्वान्निहन्ता पापकृच्छनिः।
मारकग्रहसम्बन्धी पापकत्र्ता शनिस्तदा।
तिरस्कृत्य ग्रहान्सर्वान्निहन्ता भवति ध्रुवम्।।१५।।
सभी ग्रहों को छोड़कर वही मारक हो जाता है।।१५।।
एतद्दशान्तर्भुक्त्यादौ विचार्य्यैव मृतिं वदेत्।
षष्ठद्रेष्काणपश्चैव तथा वैनाशिकाधिपः।।१६।।
छठे द्रेष्काण (लग्न से २२वें द्रेष्काण) का स्वामी और २३वें
नक्षत्र का स्वामी।।१६।।
विपत्ताराप्रत्यरीशौ वधमेशस्तथैव च।
आद्यन्तपौ च विज्ञेयौ चन्द्राक्रान्तगृहात्तथा।।१७।।
विपत्तारा, प्रत्यरितारा, वधतारां का स्वामी, चन्द्र राशि से द्वितीय,
द्वादश के स्वामी।।१७।।
दशाक्षिप्तेषु कालेषु मारकौ मरणप्रदः।
दुष्टतारापतेः पाके निर्याणं कथितं बुधैः।।१८।।
अपनी-अपनी दशाकाल मे मारक होते हैं अथवा पूर्वोक्त दुष्ट ताराओं
के स्वामी की दशा में मृत्यु होती है।।१८।।
मारकग्रहाश्रितो राशिर्मारकस्वामिनोऽथवा।
ताभ्यां महादशाकाले विंशोत्तर्य्याः स्थिरादिकः।।१९।।
मारकेश के आश्रित राशि वा मारकेश जिस भाव में बैठा हो, उस राशि
की महादशा में पापग्रह के अंतर में विंशोत्तरी के अनुसार मृत्यु होती
है।।१९।।
पापे मृत्युर्विजानीयान्निर्विशङ्कं द्विजोत्तम।
मारका बहवः खेटा यदि वीर्यसमन्विताः।।२०।।
यदि बलवान् बहुत से ग्रह हों तो सबसे बली होता है।।२०।।
तत्तद्दशान्तरे विप्ररोगकष्टादिसम्भवः।
षष्ठाधिपदशायां च निधनं भवति ध्रुवम्।।२१।।
·अथ मारकभेदाध्यायः ३१७
वही मारक होता है, किन्तु उन लोगों की दशा-अन्तर के समय कष्टादि
होता है तथा षष्ठेश की दशा में मृत्यु होती है।।२१।।
न्यूनातिरिक्तभेदेन बहुखेटास्तु मारकाः।
दुर्बलाश्रयराशीशदशास्वल्पार्तिदा भवेत्।।२२।।
न्यूनातिरिक्त अधिक मारक हों तो दुर्बल राशीश की दशा में अल्प
कष्ट होता है।।२२।।
प्रबलस्य दशायां च महारोगार्त्तिमृत्युवत्।
भयशोकमृताद्भीतिस्तस्कराग्निभयं भवेत्।।२३।।
मारकस्य दशायां च महत्या निधनाश्रयी।
भूतामन्तर्दशामाह तवाग्रे कथयामि भोः।।२४।।
प्रबल की दशा में महारोग से कष्ट और मृत्यु होती है और भय, शोक,
मृत्युभय, चोरभय तथा अग्निभय होता है।।२४।।
मारकग्रहाश्रयीभूतमहापाके विचिन्तयेत्।
कारकाच्च विलग्नाद्वा सप्तमाद्वा द्वितीयकम् ।।२५।।
मारकेश के आश्रित राशि की दशा-अंतर्दशा काल में उपरोक्त सभी
बातों का विचार करना चाहिए। कारक से अथवा लग्न से सप्तम से
दूसरे।।२५।।
षष्ठाष्टरिःफनाथान्तमपहाराष्टके · मृतिः।
तेषामन्तर्दशाधीशास्तेषां मध्ये बलाढ्यकः।।२६।।
तदीयान्तर्दशाकाले निधनं भवति ध्रुवम्।
अपरा पापकाले तु रोगदुःखार्त्तिवान्द्विज।।२७।।
छठे, आठवें, बारहवें इन आठों के स्वामियों की दशादि में मृत्यु
कहना चाहिए। इनमें भी बलवान् अंतर्दशेश के समय में मृत्यु होती
है और अन्य लोगों की अंतर्दशा आदि में रोग-दुःख आदि होता है।।२७।।
· इति मारकभेदाध्यायः। ·
अथाष्टकवर्गाध्यायः
ज्ञात्वादौ करणस्थानं विन्दुरेखे च वर्गणाम्।
क्रमादष्टकवर्गस्य पृथक्कृत्य फलं वदेत्।।१।।
पहले भाव और ग्रहों के करण (शून्य) स्थान (रेखा) अर्थात् बिन्दु और
रेखाओं का भलीभाँति ज्ञान करके तब अष्टकवर्ग के फल को-
३१८ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
कहना चाहिए। (इसका विस्तृत विवरण उत्तरार्ध में देखना चाहिए)।।१।।
अथ रवेरष्टकवर्गः-
स्वारार्किभ्यो दिनेशः स्वसुखमृतितपःखास्तलाभाद्ययातः
शुक्रादस्तारिरिष्फे अरितनयतपोलाभवर्त्तीसुरेज्यात्।
चन्द्राल्लाभारिकर्मत्रिषु शशितनयात्सान्त्यधर्मात्मजेषु
प्रोक्तो लग्नाद्व्ययाम्बूपचयगृहगतः सुप्रशस्तोऽष्टवर्गात्।।२।।
अपने स्थान से तथा भौम और शनि से १,२,४,८,९,१०,७ और ११ इन
स्थानों में सूर्य शुभफलदायक होता है। शुक्र से ७,६,१२ स्थानों में, गुरु
से ६,५,९,११ स्थानों में, चन्द्रमा से ११,६,१०,३, स्थानों में, बुध से पूर्वोक्त
स्थानों (११।६।३।१०) के साथ ११,९ स्थानों में और जन्मलग्न से
१२,४,३,६,१०,११ स्थानों में शुभफल देता है अर्थात् रेखाप्रद होता
है।।२।।
रवेरष्टकवर्गाङ्काः
| सू. | चं. | मं. | बु. | बृ. | शु. | श. | ल. |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| १ | ३ | १ | ३ | ५ | ६ | १ | ३ |
| २ | ६ | २ | ५ | ६ | ७ | २ | ४ |
| ४ | १० | ४ | ६ | ९ | १२ | ४ | ६ |
| ७ | ११ | ७ | ९ | ११ | ७ | १० | |
| ८ | ८ | १० | ८ | ११ | |||
| ९ | ९ | ११ | ९ | १२ | |||
| १० | १० | १२ | १० | ||||
| ११ | ११ | ११ | |||||
| अथ चन्द्राष्टकवर्गः- | |||||||
| इन्दुल्लग्नात्षडायत्रिदशषु कुसुतात्सस्वधर्मात्मजेषु | |||||||
| स्वात्सास्ताद्येषु सूर्यात्समदनमृतिषु त्र्यायधीषट्सुमन्दात्। | |||||||
| ज्ञात्केन्द्रात्मजाष्टत्रिषु विबुधगुरोः केन्द्ररन्ध्रान्त्यलाभे | |||||||
| शुक्राद्धीधर्मबन्धुस्मरसहजनभो लाभगश्च प्रशस्तः।।३।। | |||||||
| जन्मलग्न से ६,११,३,१० स्थानों में चन्द्रमा शुभफल देता है। | |||||||
| भौम से २,३,५,६,९,१०,११ स्थानों में, अपने स्थान से १,३,६,७,१०,११ | |||||||
| स्थानों में, सूर्य से ३,६,७,८,१०,११ स्थानों में; शनि से ३,११,५,६ स्थानों |
अथाष्टवर्गाध्यायः ३२१
अथ गुर्वष्टकवर्गचक्रम्-
| बृ. | शु. | श. | सू. | चं. | मं. | बु. | ल. |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| १ | २ | ३ | १ | २ | १ | १ | १ |
| २ | ५ | ५ | २ | ५ | २ | २ | २ |
| ३ | ६ | ६ | ४ | ७ | ४ | ४ | ४ |
| ४ | ९ | १२ | ५ | ९ | ७ | ५ | ५ |
| ७ | १० | ७ | ११ | ८ | ६ | ६ | |
| ८ | ११ | ८ | १० | ९ | ७ | ||
| १० | ९ | १२ | १० | ९ | |||
| ११ | १० | ११ | १० | ||||
| ११ | ११ |
अथ शुक्राष्टकवर्गः-
चन्द्रो व्यस्तारिखेषु व्यरिमदननभोऽन्त्येषु लग्नात्प्रशस्तो।
व्यन्तास्तारातिषु स्वाद्व्ययनिधनभवेष्वर्कतो दैत्यमन्त्री ।।
धीधर्माष्टाप्तिबन्धुत्रिदशसु रविजाद्धीतपःस्वाष्टलाभे।
जीवात् ज्ञाद्धीत्रिलाभक्षतनवसुकुजाद्धीभवापोक्लिनेषु ।।७।।
शुक्र चन्द्रमा से ७,६,१० स्थानों को छोड़कर शेष
१,२,३,४,५,८,९,१०,११,१२ स्थानों में शुभफल देता है। लग्न से
६,७,१०,१२ को छोड़कर शेष स्थानों में, अपने स्थान से १२,६,७, को
छोड़कर शेष स्थानों में, सूर्य से १२,८,११ स्थानों में, शनि से
५,९,८,११,४,३,१० स्थानों में, गुरु से ५,९,२,८,११, स्थानों में, बुध
से ५,३ ,११,६,९ स्थानों में और भौम से ५,११,३,६,९,१२ स्थानों में शुभफल
देता है।।७।।
अथ शुक्राष्टकवर्गचक्रम्-
| शु. | श. | सू. | चं. | मं. | बु. | बृ. | ल. |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| १ | ३ | ८ | १ | ३ | ३ | ५ | १ |
| २ | ४ | ११ | २ | ५ | ५ | ८ | २ |
| ३ | ५ | १२ | ३ | ६ | ६ | ९ | ३ |
| ४ | ८ | ४ | ९ | ९ | १० | ४ | |
| ५ | ९ | ५ | ११ | ११ | ११ | ५ | |
| ८ | १० | ८ | १२ | ८ | |||
| ९ | ११ | ९ | ९ | ||||
| १० | ११ | ११ | |||||
| ११ | १२ |
३२० बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
अथ बुधाष्टकवर्गः—
ज्ञः शुक्रात्स्वाद्यलाभाष्टमनवमसुखेसत्रिपुत्रेकुजार्क्याः।
साङ्गादारेऽथ जीवाद्द्वयरिपुनिधनायेषुशस्तो दिनेशात्।।
धीधर्मान्त्यारिलाभे त्रितनुदशयुते स्वात्सषडाप्तिरन्ध्रे।
व्योमाम्बुधिरिन्दुतोऽरिस्वमृतितनुव्योम लाभाब्धिलग्नात् ।।५।।
बुध शुक्र से २,१,११,८,९,४,३,५ स्थानों में शुभफल देता है। शनि
से १,२,३,४,५,६,७,८,९,१०,११ स्थानों में, गुरु से १२,६,८,११ स्थानों
में, सूर्य से ५,९,१२,६,११ स्थानों में, अपने स्थान से ५,९,१२,६,३,१,१०
स्थानों में, चन्द्रमा से २,४,६,८,१०,११ और लग्न से ६,२,८,१,१०,११,४
स्थानों में शुभफल देता है।।५।।
अथ बुधाष्टकवर्गचक्रम्-
| बु. | बृ. | शु. | श. | सू. | चं. | मं. | ल. |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| १ | ६ | १ | १ | ५ | २ | १ | १ |
| ३ | ८ | २ | २ | ६ | ४ | २ | २ |
| ५ | ११ | ३ | ४ | ९ | ६ | ४ | ४ |
| ६ | १२ | ४ | ७ | ११ | ८ | ७ | ६ |
| ९ | ५ | ८ | १२ | १० | ८ | ८ | |
| १० | ८ | ९ | ११ | ९ | १० | ||
| ११ | ९ | १० | १० | ११ | |||
| १२ | ११ | ११ | ११ | ||||
| अथ गुर्वष्टकवर्गः— | |||||||
| जीवो भौमात्स्वकेन्द्रागममृतिषु रखेः सधीधर्मेष्वथ स्वात्। | |||||||
| स्वत्रिष्विन्दुजात्षट्स्वसुखसुततनुव्योमधर्मार्गमेषु ।। | |||||||
| लग्नात्सास्तेषु चन्द्रात्स्मरगुरुधनधीप्राप्तिभेष्वर्कपुत्रात्। | |||||||
| धीषट्त्र्यन्तेषु शुक्रात्स्वसुतशुभमतोलाभविद्वेषिभेषु ।।६।। | |||||||
| गुरु भौम से २,१,४,७,१०,११,८ स्थानों में शुभफल देता है, सूर्य से | |||||||
| १,२,४,५,८,९,१०,११ स्थानों में, बुध से ६,२,४,५,१,१०,९,११ स्थानों | |||||||
| में, लग्न से १,२,३,४,५,६,७,९,१०,११ स्थानों में, चन्द्रमा से ७,९,२,५,११ | |||||||
| स्थानों में, शनि से ५,६,३,१२ स्थानों में, शुक्र से २,५,९,११,६ स्थानों | |||||||
| में शुभफल देता है।।६।। |
अथाष्टवर्गाध्यायः ३२१
अथ गुर्वष्टकवर्गचक्रम्—
| बृ. | शु. | श. | सू. | चं. | मं. | बु. | ल. |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| १ | २ | ३ | १ | २ | १ | १ | १ |
| २ | ५ | ५ | २ | ५ | २ | २ | २ |
| ३ | ६ | ६ | ४ | ७ | ४ | ४ | ४ |
| ४ | ९ | १२ | ५ | ९ | ७ | ५ | ५ |
| ७ | १० | ७ | ११ | ८ | ६ | ६ | |
| ८ | ११ | ८ | १० | ९ | ७ | ||
| १० | ९ | १२ | १० | ९ | |||
| ११ | १० | ११ | १० | ||||
| ११ | ११ | ||||||
| अथ शुक्राष्टकवर्गः— | |||||||
| चन्द्रो व्यस्तारिखेषु व्यरिमदननभोऽन्त्येषु लग्नात्प्रशस्तो। | |||||||
| व्यन्तास्तारातिषु स्वाद्व्ययनिधनभवेष्वर्कतो दैत्यमन्त्री।। | |||||||
| धीधर्माष्टाप्तिबन्धुत्रिदशसु रविजाद्धीतपःस्वाष्टलाभे। | |||||||
| जीवात् ज्ञाद्धीत्रिलाभक्षतनवसुकुजाद्धीभवापोक्लिनेषु।।७।। | |||||||
| शुक्र चंद्रमा से ७,६,१० स्थानों को छोड़कर शेष | |||||||
| १,२,३,४,५,८,९,१०,११,१२ स्थानों में शुभफल देता है। लग्न से | |||||||
| ६,७,१०,१२ को छोड़कर शेष स्थानों में, अपने स्थान से १२,६,७, को | |||||||
| छोड़कर शेष स्थानों में, सूर्य से १२,८,११ स्थानों में, शनि से | |||||||
| ५,९,८,११,४,३,१० स्थानों में, गुरु से ५,९,२,८,११, स्थानों में, बुध | |||||||
| से ५,३,११,६,१ स्थानों में और भौम से ५,११,३,६,९,१२ स्थानों में शुभफल | |||||||
| देता है।।७।। | |||||||
| अथ शुक्राष्टकवर्गचक्रम्— | |||||||
| शु. | श. | सू. | चं. | मं. | बु. | बृ. | ल. |
| --- | --- | --- | --- | --- | --- | --- | --- |
| १ | ३ | ८ | १ | ३ | ३ | ५ | १ |
| २ | ४ | ११ | २ | ५ | ५ | ८ | २ |
| ३ | ५ | १२ | ३ | ६ | ६ | ९ | ३ |
| ४ | ८ | ४ | ९ | ९ | १० | ४ | |
| ५ | ९ | ५ | ११ | ११ | ११ | ५ | |
| ८ | १० | ८ | १२ | ८ | |||
| ९ | ११ | ९ | ९ | ||||
| १० | ११ | ११ | |||||
| ११ | १२ |
३२२ . बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
अथ शनेरष्टकवर्गः
स्वात्सौरिस्त्र्यायपुत्रारिषु धरणीसुतात्सव्ययाज्ञेषु।
सूर्यात्केन्द्रेस्वाष्टाष्टसु ज्ञाद्वायमृतिस्वभवारातधर्मेषु।
चन्द्रात्षट्त्र्यायस्थोविलग्नादुपचयहिबुकाद्येषु षट्त्र्याप्ति-
रिष्केषुशुक्राद्वाचस्पतेश्चव्ययतनयभवारातिषु सुप्रशस्तः ॥८॥
शनि अपने स्थान से ३,११,५,६, स्थानों में शुभफल देता है। भौम से
३,५,६,१२,१० स्थानों में, सूर्य से १,४,७,१०,२,११,८ स्थानों में, बुध
से १२,८,२,११,८ स्थानों में, चन्द्रमा से ६,३,११ स्थानों में, लग्न से
३,६,१०,११,१ स्थानों में, शुक्र से ६,३, ११,१२ स्थानों में, गुरु से
१२,५,११,६ स्थानों में शुभफल देता है॥८॥
अथ शनेरष्टकवर्गचक्रम्-
| श. | सू. | चं. | मं. | बु. | बृ. | शु. | ल. |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ३ | १ | ३ | ३ | ६ | ५ | ६ | १ |
| ५ | २ | ६ | ५ | ८ | ६ | ११ | ३ |
| ६ | ४ | ११ | ६ | ९ | ११ | १२ | ४ |
| ११ | ७ | १० | ० | १२ | ३ | ९ | |
| ८ | ११ | ११ | १० | ||||
| १० | १२ | १२ | ११ | ||||
| ११ | |||||||
| अष्टकवर्गसाधन- | |||||||
| सूर्याष्टकवर्ग में सूर्य अपने स्थान से (जन्म के समय जिस राशि में | |||||||
| है) १।२।४।७।८।९।१०।११ स्थान में शुभ फल देता है; अन्यत्र स्थानों में | |||||||
| अशुभ फल देता है। जैसे निम्नलिखित जन्मांगचक्र में सूर्य कर्क राशि | |||||||
| में है, अतः ४।५।७।१०।११।१२।१।२ राशियों में शुभ फलसूचक रेखा | |||||||
| देगा, अन्य राशियों में बिन्दु रूप अशुभसूचक रेखा को देगा। इसी प्रकार | |||||||
| सभी ग्रह अपने-अपने स्थान से शुभ और अशुभ सूचक रेखा और बिन्दु | |||||||
| को देते हैं। जैसा कि नीचे चक्र में दिया है- | |||||||
| जन्माङ्गम् \qquad सूर्याष्टकवर्गः | |||||||
| [जन्माङ्ग चक्र (कुण्डली):] | |||||||
| लग्न (प्रथम भाव): १० | |||||||
| द्वितीय भाव: मं. ११ | |||||||
| तृतीय भाव: १२ | |||||||
| चतुर्थ भाव: १ | |||||||
| पञ्चम भाव: २, के. | |||||||
| षष्ठ भाव: चं. ३, शु. | |||||||
| सप्तम भाव: सू. ४ | |||||||
| अष्टम भाव: बु. ५, बृ. | |||||||
| नवम भाव: ६ | |||||||
| दशम भाव: ७ | |||||||
| एकादश भाव: ८, रा., श. | |||||||
| द्वादश भाव: ९ | |||||||
| [सूर्याष्टकवर्ग चक्र (कुण्डली - रेखा एवं बिन्दु सहित):] | |||||||
| १० राशि (मकर): ।।। (३ रेखाएँ), .... (४ बिन्दु) | |||||||
| ११ राशि (कुम्भ): मं. ।।। (३ रेखाएँ), ...... (६ बिन्दु) | |||||||
| १२ राशि (मीन): ।।।। (४ रेखाएँ), ... (३ बिन्दु) | |||||||
| १ राशि (मेष): ।।।।। (५ रेखाएँ) | |||||||
| २ राशि (वृष): के. ।।।।। (५ रेखाएँ), ... (३ बिन्दु) | |||||||
| ३ राशि (मिथुन): शु. चं. ।।।। (४ रेखाएँ), .... (४ बिन्दु) | |||||||
| ४ राशि (कर्क): सू. (केन्द्र) - ...... (६ बिन्दु) | |||||||
| ५ राशि (सिंह): बु. बृ. ।।।। (४ रेखाएँ), .... (४ बिन्दु) | |||||||
| ६ राशि (कन्या): ..... (५ बिन्दु) | |||||||
| ७ राशि (तुला): ।।।। (४ रेखाएँ) | |||||||
| ८ राशि (वृश्चिक): रा. श. ।।।।। (५ रेखाएँ), .... (४ बिन्दु) | |||||||
| ९ राशि (धनु): ।।।।।। (६ रेखाएँ), .. (२ बिन्दु) |
अथाष्टवर्गाध्यायः ३२३
सूर्याष्टकवर्गः ४८ चन्द्राष्टकवर्गः ४९
| ग्रह | सू. | चं. | मं. | बु. | बृ. | शु. | श. | ल. | योग | ग्रह | चं. | मं. | बु. | बृ. | शु. | श. | सू. | ल. | योग |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| रा. | ४ | ३ | ११ | ५ | ५ | ३ | ८ | १० | रा. | ३ | ११ | ५ | ५ | ३ | ८ | ४ | १० | ||
| ४ | । | । | । | ३ | ३ | । | । | । | । | । | ५ | ||||||||
| ५ | । | । | । | । | ४ | ४ | । | । | २ | ||||||||||
| ६ | । | । | २ | ५ | । | । | । | । | । | ४ | |||||||||
| ७ | । | । | । | । | ४ | ६ | । | । | । | ३ | |||||||||
| ८ | । | । | । | । | । | ५ | ७ | । | । | । | । | ४ | |||||||
| ९ | । | । | । | । | । | । | ६ | ८ | । | । | । | । | । | ५ | |||||
| १० | । | । | । | ३ | ९ | । | । | । | । | । | ५ | ||||||||
| ११ | । | । | । | ३ | १० | २ | । | । | २ | ||||||||||
| १२ | । | । | । | । | ४ | ११ | । | । | । | । | ४ | ||||||||
| १ | । | । | । | । | । | ५ | १२ | । | । | । | । | । | । | । | ७ | ||||
| २ | । | । | । | । | । | ५ | १ | । | । | । | । | । | ५ | ||||||
| ३ | । | । | । | । | ४ | २ | । | । | । | ||||||||||
| भौमाष्टकवर्गः बुधाष्टकवर्गः | |||||||||||||||||||
| ग्र. | मं. | बु. | बृ. | शु. | श. | सू. | चं. | ल. | योग | ग्र. | बु. | बृ. | शु. | श. | सू. | चं. | मं. | ल. | योग |
| :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: |
| रा. | ११ | ५ | ५ | ३ | ८ | ४ | ३ | १० | रा. | ५ | ५ | ३ | ८ | ४ | ३ | ११ | १० | ||
| ११ | । | २ | ५ | । | । | । | । | । | ५ | ||||||||||
| १२ | । | । | २ | ६ | । | । | । | । | ४ | ||||||||||
| १ | । | । | । | ३ | ७ | । | । | । | । | ४ | |||||||||
| २ | । | । | । | । | । | ५ | ८ | । | । | । | । | ५ | |||||||
| ३ | । | । | । | । | ४ | ९ | । | । | । | । | ४ | ||||||||
| ४ | । | । | २ | १० | । | । | । | । | । | ५ | |||||||||
| ५ | । | । | । | ३ | ११ | । | । | । | । | ४ | |||||||||
| ६ | । | । | । | ३ | १२ | । | । | । | । | ४ | |||||||||
| ७ | । | । | २ | १ | । | । | । | । | ४ | ||||||||||
| ८ | । | । | । | । | । | । | ६ | २ | । | । | । | । | ४ | ||||||
| ९ | । | । | । | ३ | ३ | । | । | । | । | । | । | ६ | |||||||
| १० | । | । | । | । | ४ | ४ | । | । | । | । | । | । | ५ |
३२४ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
गुर्वष्टकवर्गः शुक्राष्टकवर्गः
| ग्र. | बृ. | शु. | श. | सू. | चं. | मं. | बु. | ल. | ग्र. | शु. | श. | सू. | चं. | मं. | बु. | बृ. | ल. | ||
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| रा. | ५ | ३ | ८ | ४ | ३ | ११ | ५ | १० | रा. | ३ | ८ | ४ | ३ | ११ | ५ | ५ | १० | ||
| ५ | । | । | । | । | ४ | ३ | । | । | । | । | । | । | । | ७ | |||||
| ६ | । | । | । | । | ४ | ४ | । | । | । | । | ४ | ||||||||
| ७ | । | । | । | । | । | । | ६ | ५ | । | । | । | । | ४ | ||||||
| ८ | । | । | । | । | । | । | ६ | ६ | । | । | । | । | ४ | ||||||
| ९ | । | । | । | ३ | ७ | । | । | । | । | ४ | |||||||||
| १० | । | । | । | । | ४ | ३ | । | १ | |||||||||||
| ११ | । | । | । | । | । | । | ६ | ९ | । | । | । | ८ | |||||||
| १२ | । | । | । | । | । | ५ | १० | । | । | । | । | । | । | ६ | |||||
| १ | । | । | । | । | । | । | ६ | ११ | । | । | । | । | । | ५ | |||||
| २ | । | । | । | । | । | ५ | १२ | । | । | । | । | ४ | |||||||
| ३ | । | । | । | ३ | १ | । | । | । | । | । | । | ६ | |||||||
| ४ | । | । | । | । | ४ | २ | । | । | । | । | ४ | ||||||||
| शन्यष्टकवर्गः लग्नाष्टकवर्गः | |||||||||||||||||||
| ग्र. | श. | सू. | चं. | मं. | बु. | बृ. | शु. | ल. | ग्र. | ल. | सू. | चं. | मं. | बु. | बृ. | शु. | श. | ||
| --- | --- | --- | --- | --- | --- | --- | --- | --- | --- | --- | --- | --- | --- | --- | --- | --- | --- | --- | --- |
| रा. | ८ | ४ | ३ | ११ | ५ | ५ | ३ | १० | रा. | १० | ४ | ३ | ११ | ५ | ५ | ३ | ८ | ||
| ८ | । | । | । | ४ | १० | । | । | । | । | ४ | |||||||||
| ९ | । | १ | ११ | । | । | । | । | ४ | |||||||||||
| १० | । | । | । | । | । | । | ६ | १२ | । | । | । | ३ | |||||||
| ११ | । | १ | १ | । | । | । | । | । | । | ६ | |||||||||
| १२ | । | । | ३ | २ | । | । | । | ३ | |||||||||||
| १ | । | । | । | । | । | । | । | । | ८ | ३ | । | । | । | । | । | ५ | |||
| २ | । | । | । | ३ | ४ | । | । | २ | |||||||||||
| ३ | । | । | । | । | ४ | ५ | । | । | । | । | । | ५ | |||||||
| ४ | । | । | । | । | ४ | ६ | । | । | । | । | । | ५ | |||||||
| ५ | । | । | २ | ७ | । | । | । | ३ | |||||||||||
| ६ | । | १ | ८ | । | । | । | । | । | । | ६ | |||||||||
| ७ | । | । | २ | ९ | । | । | । | ३ |
अथाष्टवर्गाध्यायः ३२५
त्रिकोणशोधनम्—
त्रिकोणं तु चतुःप्रोक्तं मेषसिंहधनुस्तथा।
वृषकन्यामृगाख्येषु तुलाकुम्भयुगेषु च॥१९॥
सम्पूर्ण राशिचक्र (१२ राशि) में चार (४) त्रिकोण हैं। त्रिकोण का
अर्थ है— प्रथम, पंचम और नवम राशि। प्रत्येक त्रिकोण की प्रथम राशि
क्रम से मेष, वृष, मिथुन और कर्क हैं। इसके अनुसार मेष, सिंह,
धन प्रथम त्रिकोण; वृष, कन्या, मकर दूसरा; मिथुन, तुला, कुम्भ तीसरा
और कर्क, वृश्चिक, मीन चौथा त्रिकोण है॥१९॥
कर्कवृश्चिकमीनास्ते त्रिकोणाः स्युः परस्परम्।
त्रिकोणेषु च यन्न्यूनं तत्तुल्यं त्रिषु शोधयेत्॥२०॥
प्रत्येक त्रिकोण की तीनों राशियों में जिस राशि की रेखा संख्या कम
हो उसे त्रिकोण की अन्य दो राशि के रेखा की संख्या में घटावे।
शेष उसी राशि के नीचे रख दे॥२०॥
एकस्मिन्भवने शून्यं तत्त्रिकोणं न शोधयेत्।
३२६. बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
सिंह की ४ रेखाओं में से ४ घटाने से सिंह राशि में ० शून्य रहेगा
एवं धनराशि की ६ रेखाओं में से ४ घटाने से धन राशि में २ रहेगा।
अर्थात् त्रिकोण-शोधन के बाद मेष में १, सिंह में शून्य एवं धन में २ फल
आया। इसी प्रकार उपर्युक्त नियम के अनुसार सूर्यादि सात ग्रहों
और लग्न के अष्टक वर्ग का त्रिकोण-शोधन करना चाहिए। कहीं २
निम्नलिखित प्रकार से भी अष्टक वर्ग लिखने की प्रथा है—
सूर्याष्टकवर्गः ४८ चन्द्राष्टकवर्गः ४९
[सूर्याष्टकवर्गः]
मेष (१): रेखाएं ५ (।।।।।)
वृष (२): रेखाएं ४ (।।।।)
मिथुन (३): रेखाएं ४ (।।।।), चं., शु.
कर्क (४): रेखाएं ३ (।।।), सू.
सिंह (५): रेखाएं ५ (।।।।।), बु.
कन्या (६): रेखाएं ५ (।।।।।), बृ.
तुला (७): रेखाएं ४ (।।।।)
वृश्चिक (८): रेखाएं ५ (।।।।।), श.
धनु (९): रेखाएं ६ (।।।।।।)
मकर (१०): रेखाएं ३ (।।।)
कुम्भ (११): रेखाएं ३ (।।।), मं.
मीन (१२): रेखाएं ४ (।।।।)
[चन्द्राष्टकवर्गः]
मेष (१): रेखाएं ५ (।।।।।)
वृष (२): रेखाएं ३ (।।।)
मिथुन (३): रेखाएं ५ (।।।।।), चं., शु.
कर्क (४): रेखाएं २ (।।), सू.
सिंह (५): रेखाएं ४ (।।।।), बु., बृ.
कन्या (६): रेखाएं ३ (।।।)
तुला (७): रेखाएं ५ (।।।।।), श.
वृश्चिक (८): रेखाएं ४ (।।।।)
धनु (९): रेखाएं ५ (।।।।।)
मकर (१०): रेखाएं २ (।।)
कुम्भ (११): रेखाएं ३ (।।।), मं.
मीन (१२): रेखाएं ६ (।।।।।।)
भौमाष्टकवर्गः ३९ बुधाष्टकवर्गः ५४
[भौमाष्टकवर्गः]
मेष (१): रेखाएं ३ (।।।)
वृष (२): रेखाएं ४ (।।।।)
मिथुन (३): रेखाएं ४ (।।।।), शु., चं.
कर्क (४): रेखाएं २ (।।), सू.
सिंह (५): रेखाएं ३ (।।।), बु., बृ.
कन्या (६): रेखाएं ३ (।।।)
तुला (७): रेखाएं २ (।।)
वृश्चिक (८): रेखाएं ६ (।।।।।।), श.
धनु (९): रेखाएं ३ (।।।)
मकर (१०): रेखाएं ४ (।।।।)
कुम्भ (११): रेखाएं २ (।।), मं.
मीन (१२): रेखाएं ३ (।।।)
[बुधाष्टकवर्गः]
मेष (१): रेखाएं ४ (।।।।)
वृष (२): रेखाएं ४ (।।।।)
मिथुन (३): रेखाएं ५ (।।।।।)
कर्क (४): रेखाएं ५ (।।।।।), सू.
सिंह (५): रेखाएं ५ (।।।।।), बु., बृ.
कन्या (६): रेखाएं ५ (।।।।।)
तुला (७): रेखाएं ४ (।।।।)
वृश्चिक (८): रेखाएं ५ (।।।।।), श.
धनु (९): रेखाएं ४ (।।।।)
मकर (१०): रेखाएं ५ (।।।।।)
कुम्भ (११): रेखाएं ४ (।।।।), मं.
मीन (१२): रेखाएं ४ (।।।।)
गुर्वष्टकवर्गः ५६ शुक्राष्टकवर्गः ५२
[गुर्वष्टकवर्गः]
मेष (१): रेखाएं ५ (।।।।।)
वृष (२): रेखाएं ५ (।।।।।)
मिथुन (३): रेखाएं ३ (।।।), शु., चं.
कर्क (४): रेखाएं ४ (।।।।), सू.
सिंह (५): रेखाएं ५ (।।।।।), बु., बृ.
कन्या (६): रेखाएं ४ (।।।।)
तुला (७): रेखाएं ६ (।।।।।।)
वृश्चिक (८): रेखाएं ५ (।।।।।), श.
धनु (९): रेखाएं ४ (।।।।)
मकर (१०): रेखाएं ५ (।।।।।)
कुम्भ (११): रेखाएं ६ (।।।।।।), मं.
मीन (१२): रेखाएं ४ (।।।।)
[शुक्राष्टकवर्गः]
मेष (१): रेखाएं ५ (।।।।।)
वृष (२): रेखाएं ४ (।।।।)
मिथुन (३): रेखाएं ६ (।।।।।।), चं., शु.
कर्क (४): रेखाएं ५ (।।।।।), सू.
सिंह (५): रेखाएं ५ (।।।।।), बु., बृ.
कन्या (६): रेखाएं ४ (।।।।)
तुला (७): रेखाएं ४ (।।।।)
वृश्चिक (८): रेखाएं १ (।) श.
धनु (९): रेखाएं ३ (।।।)
मकर (१०): रेखाएं ६ (।।।।।।)
कुम्भ (११): रेखाएं ५ (।।।।।), मं.
मीन (१२): रेखाएं ४ (।।।।)
अथाष्टवर्गाध्यायः ३२७
शन्यष्टकवर्गः ३९ लग्नाष्टकवर्गः ४९
[शन्यष्टकवर्गः ३९]
८ (।।।। श.) | ९ (।।) | १० (।।।।।।) | ११ (। मं.) | १२ (।।।) | १ (।।।।।।।) | २ (।।।) | ३ (।।।। चं. श.) | ४ (।।।। सू.) | ५ (।। बृ. बु.) | ६ (।) | ७ (।।)
[लग्नाष्टकवर्गः ४९]
११ (।।।।। मं.) | १२ (।।।) | १ (।।।।।।) | २ (।।। बृ.) | ३ (स ४ । १४) | ४ (। सू.) | ५ (।।।।।। बु.) | ६ (।।।।।) | ७ (।।।) | ८ (।।।।। श.) | ९ (।।।) | १० (।।।।।।)
अथैकाधिपत्यशोधनम्—
एवं त्रिकोणं संशोध्य पश्चादेकाधिपत्यता।
क्षेत्रद्वये फलानि स्युस्तदा संशोषयेद्बुधः ।।१२।।
इस प्रकार त्रिकोण शोधन के बाद एकाधिपत्य शोधन करे। एक ग्रह की
दो राशियों में त्रिकोण-शोधन के फलों से एकाधिपत्य शोधन होता है ।।१२।।
क्षीणेन सह चान्यस्मिञ्छोधयेद्ग्रहवर्जिते।
ग्रहयुक्ते फले हीने ग्रहाभावे फलाधिके ।।१३।।
अनेन सह चान्यस्मिञ्छोधयेद्ग्रहवर्जिते।
फलाधिके ग्रहैर्युक्ते चान्यस्मिन् सर्वमुत्सृजेत् ।।१४।।
उभयोर्ग्रहसंयुक्ते न संशोध्यः कदाचन।
उभयोर्ग्रहहीनाभ्यां समत्वे सकलं त्यजेत् ।।१५।।
सग्रहा ग्रहतुल्यत्वात्सर्वं संशोध्यमग्रहात्।
एकत्र नास्ति चेत् सर्वहानिरन्यत्र कीर्त्तिता।
कुलीरसिंहयो राश्योः पृथक् क्षेत्रं पृथक् फलम् ।।१६।।
यदि एक ग्रह की दोनों राशियों में कोई ग्रह न हो तो अल्प संख्या को
अधिक संख्या में घटाकर शेष को अधिक संख्या के नीचे रख दे और
अल्पसंख्या को ज्यों का त्यों रख दे (१)। यदि एक राशि में ग्रह हो और
दूसरी राशि में ग्रह न हो और जिस राशि में ग्रह हो उसकी संख्या
ग्रहहीन राशि की संख्या से अल्प हो तो ग्रहहीन राशि की संख्या में अल्प
संख्या को घटाकर शेष ग्रहहीन के नीचे रख दे और अल्प संख्या यथावत्
३२८ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
रख दे (२)। यदि ग्रहयुक्त राशि की संख्या अधिक हो और ग्रहहीन राशि
में अल्प संख्या हो तो ग्रहहीन राशि में शून्य और ग्रहयुक्त राशि की संख्या
यथावत् रखनी चाहिए (३)। यदि दोनों राशियाँ ग्रहयुक्त हों तो संशोधन
नहीं करना चाहिए, यानि दोनों जगह यथावत् अंक रहने दे (४)। यदि एक
ग्रहयुक्त हो और दूसरी राशि ग्रहहीन तथा दोनों की संख्या बराबर हो तो
ग्रहहीन राशि के नीचे शून्य और ग्रहयुक्त राशि के नीचे वही संख्या
रहेगी (५)। यदि दोनों ग्रहयुक्त वा ग्रहहीन हों अथवा दोनों में एक ग्रहयुक्त
और एक ग्रहहीन हो किन्तु त्रिकोण-शोधन में किसी एक में शून्य हो तो
दोनों में शून्य ही होगा (६)। कर्क और सिंह राशि के फल ज्यों के त्यों रहते
हैं, इनमें एकाधिपत्य शोधन नहीं किया जाता है ।। १२-१६ ।।
इति एकाधिपत्यशोधनम्।
अथ पिण्डोत्पत्त्याध्यायः
शोध्यावशेषं संस्थाप्य राशिमानेन वर्धयेत्।
ग्रहयुक्तेऽपि तद्राशौ ग्रहमानेन वर्धयेत् ।।१।।
एकाधिपत्य शोधन के उपरान्त जिस राशि के नीचे जो संख्या हो उसे
उस राशि के नीचे रखकर उस राशि के गुणक से गुणा करे। यदि
राशि में ग्रह हो तब भी उस संख्या को उस ग्रह के गुणक से गुणा कर फल
को उसके नीचे रख दे।।१।।
अथ राशि-ग्रहगुणकध्रुवाङ्कानाह-
गोसिंहौ दशगुणितौ दशभिर्मिथुनालिनौ।
वणिग्मेषौ तु मुनिभिः कन्यकामकरौ शरैः।।२।।
वृष-सिंह राशि को १० से, मिथुन-वृश्चिक को १० से, तुला और मेष
को ७ से, कन्या-मकर को ५ से।।२।।
शेषाः स्वमानतो गण्या ग्रहगुणकमथोच्यते।
जीवारशुक्रसौम्यानां दशाष्टमुनिसायकाः ।।३।।
और शेष राशियों को उनकी संख्या से ( एकाधिपत्य शोधन के
उपरान्त जो अंक जिस राशि के नीचे है उसे गुणाकर गुणन फल को
राशि के नीचे रखना चाहिए। इसी प्रकार जिस राशि में जो ग्रह हो उस ग्रह
के गुणक से राशि के नीचे वाले की संख्या (एकाधिपत्य शोधनोपरान्त
अथ पिंडोत्पत्याध्यायः ३२९
शेष अंक को) गुणाकर गणन फल को उस राशि के नीचे रख दे। यदि
एक राशि में दो-तीन ग्रह हों तो उनके गुणकों से अलग-अलग उस संख्या
को गुणाकर सभी का योगकर उस राशि के नीचे रखना चाहिए। गुरु,
भौम, शुक्र और बुध का क्रम से १०, ८, ७, ५, गुणक है।।३।।
बुधस्य संख्या शेषाणां ग्रहगुणैर्गुणयेत्क्रमात्।
सर्वेषां फलयोगोऽपि पिण्डमानं प्रकथ्यते ।।४।।
इस प्रकार गुरु का १०; भौम का ८, शुक्र का ७, बुध का ५ और शेष
ग्रहों का ५ गुणक है। सभी फलों के योग को पिण्ड कहते हैं।।४।।
| राशि | मे. | वृ. | मि. | क. | सिं. | क. | तु. | वृ. | ध. | मं. | कुं. | मी. |
| :--- | :--- | :--- | :--- | :--- | :--- | :--- | :--- | :--- | :--- | :--- | :--- |
| गुणक | ७ | १० | ८ | ४ | १० | ५ | ७ | ८ | ९ | ५ | ११ | १२ |
| ग्रह | सू. | चं. | मं. | बु. | बृ. | शु. | श. |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| गुणक | ५ | ५ | ८ | ५ | १० | ७ | ५ |
| सूर्याष्टकवर्गशोधनम् | |||||||
| जन्मकालीन ग्रहाः | चं. शु. | सू. | बु. बृ. | ||||
| :--- | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: |
| राशयः | १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ |
| रेखा | ५ | ५ | ४ | ३ | ४ | २ | ४ |
| त्रिकोण शोधन | १ | ३ | १ | ० | ० | ० | १ |
| एकाधिपत्य शोधन | १ | २ | ० | ० | ० | ० | १ |
| राशिगुणन फल | ७ | २० | ० | ० | ० | ० | ७ |
| ग्रहगुणन फल | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० |
: ३३० · बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम् ·
चन्द्राष्टवर्गशोधनम्
| जन्मकालीन ग्रहाः | चं. शु. | सू. | बु. बृ. | श. | मं. | योग | ||||||||
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| राशयः | १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | ||
| रेखाः | ५ | ३ | ५ | २ | ४ | ३ | ४ | ५ | ५ | २ | ४ | ७ | ४९ | |
| त्रिकोण शोधनं | १० | १ | १ | ० | ० | १ | ० | ३ | १ | ० | ० | ५ | १३ | |
| एकाधिपत्य शोधन | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ३ | ० | ० | ० | ४ | ७ | |
| राशिगुणन फल | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ४२ | ० | ० | ० | ४८ | ७२ | राशिपिंड योग पिंड |
| ग्रहगुणन फल | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | १५ | ० | ० | ० | ० | १५ | ग्रहपिंड ८७ |
भौमाष्टकवर्गशोधनम्
| जन्मकालीन ग्रहाः | चं. शु. | सू. | बु. बृ. | श. | मं. | योग | |||||||
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| राशयः | १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | |
| रेखाः | ३ | ५ | ४ | २ | ३ | ३ | २ | ६ | ३ | ४ | २ | २ | ३९ |
| त्रिकोण-शोधन | ० | २ | २ | ० | ० | ० | ० | ४ | ० | १ | ० | ० | ९ |
| एकाधिपत्य शोधन | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० |
| राशिगुणन फल | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० |
| ग्रहगुणन फल | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० |
अथ पिंडोत्पत्याध्यायः ३३१
बुधाष्टकवर्गशोधनम्
| जन्मकालीन ग्रहाः | चं. शु. | सू. | बु. बृ. | श. | मं. | योग | ||||||||
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| राशयः | १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | ||
| रेखाः | ४ | ४ | ६ | ५ | ५ | ४ | ४ | ५ | ४ | ५ | ४ | ४ | ५४ | |
| त्रिकोण-शोधन | ० | ० | २ | १ | १ | ० | ० | १ | ० | १ | ० | ० | ६ | |
| एकाधिपत्य फल | ० | ० | ० | १ | १ | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | २ | |
| राशिगुणन शोधन | ० | ० | ० | ४ | १० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | १४ | राशिपिंड |
| ग्रहगुणन फल | ० | ० | ० | ५ | १५ | ० | ० | ० | ० | ० | ० | ० | २० | ग्रहपिंड |
| गुर्वष्टकवर्गशोधनम् | ||||||||||||||
| जन्मकालीन ग्रहाः | चं. शु. | सू. | बु. बृ. | श. | मं. | योग | ||||||||
| :--- | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: |
| राशयः | १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | ||
| रेखाः | ६ | ५ | ३ | ३ | ५ | ४ | ६ | ५ | ४ | ४ | ६ | ५ | ५६ | |
| त्रिकोण-शोधन | २ | १ | ० | ० | १ | ० | ३ | २ | ० | ० | ३ | २ | १४ | |
| एकाधिपत्य शोधन | ० | १ | ० | ० | १ | ० | २ | २ | ० | ० | ० | ० | ६ | |
| राशिगुणन फल | ० | १० | ० | ० | १० | ० | १४ | १६ | ० | ० | ० | ० | ५० | राशिपिंड |
| ग्रहगुणन फल | ० | ० | १५ | ० | ० | १० | ० | ० | ० | ० | २५ | ग्रहपिंड |
३३२ बृहत्पाराशरहोराशास्त्रम्
शुक्राष्टकवर्गशोधनम्
| जन्मकालीन ग्रहाः | १ | २ | चं. शु. | सू. | बु. बृ. | | | श. | | | मं. | | योग | |
| :--- | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: |
| राशयः | १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | | |
| रेखाः | ६ | ४ | ७ | ४ | ४ | ४ | ४ | १ | ३ | ६ | ५ | ४ | ५२ | |
| त्रिकोण-शोधन | ३ | ० | ३ | ३ | १ | ० | ० | ० | ० | २ | १ | ३ | १६ | |
| एकाधिपत्य शोधन | ० | ० | ० | ३ | १ | ० | ० | ० | ० | १ | १ | ० | ६ | |
| राशिगुणन फल | ० | ० | ० | १२ | १० | ० | ० | ० | ० | ५ | ११ | ० | ३८ | राशिपिंडयोग | पिंड |
| ग्रहगुणन फल | ० | ० | ० | १५ | १५ | ० | ० | ० | ० | ० | ८ | ० | ३५ | ग्रहपिंड | ७३ |
शन्यष्टकवर्गशोधनम्
| जन्मकालीन ग्रहाः | | | चं. शु. | सू. | बु. बृ. | | | श. | | | मं. | | योग. | |
| :--- | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: | :---: |
| राशयः | १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | | |
| रेखाः | ७ | ३ | ४ | ४ | २ | १ | २ | ४ | ५ | ६ | १ | ३ | ४२ | |
| त्रिकोण-शोधन | ५ | २ | ३ | १ | ० | ० | १ | १ | ० | ५ | ० | ० | १८ | |
| एकाधिपत्य शोधन | ४ | १ | ० | १ | ० | ० | १ | १ | ० | ० | ० | ० | ८ | |
| राशिगुणन फल | २८ | १० | ० | ४ | ० | ० | ७ | ८ | ० | ० | ० | ० | ५७ | राशिपिंडयोग | पिंड |
| ग्रहगुणन फल | | | ० | ५ | ० | ० | ० | ५ | ० | ० | ० | ० | १० | ग्रहपिंड | ६७ |
अथ पिंडोत्पत्त्याध्यायः ३३३
लग्नाष्टकवर्गशोधम्
| जन्मकालीन ग्रहाः | चं. शु. | सू. | बु. बृ. | श. | मं. | योग | |||||||
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| राशयः | १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | - |
| रेखाः | ६ | ३ | ५ | २ | ५ | ५ | ३ | ६ | ३ | ४ | ४ | ३ | ४९ |
| त्रिकोण-शोधन | ३ | ० | २ | ० | २ | २ | ० | ४ | ० | १ | १ | १ | १६ |
| एकाधिपत्य शोधन | ० | ० | ० | ० | २ | ८ | ० | ४ | ० | ० | १ | १ | ८ |
| राशिगुणन फल | ० | ० | ० | ० | २० | ० | ० | ३२ | ० | ० | ११ | १२ | राशिपिंड ७५ |
| ग्रहगुणन फल | ० | १० | २० | ८ | ग्रहपिंड ३८ |
प्रत्येक अष्टकवर्गों में मेषादि राशियों में कितनी-कितनी रेखायें प्राप्त
हुई हैं और उनका योग क्या हुआ इत्यादि बातों को जानने के लिए सर्वाष्टक-
वर्ग चक्र दिया जाता है—
सर्वाष्टकवर्गचक्रम्
| राशयः | १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | योग |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| सूर्याष्टकवर्ग | ५ | ५ | ४ | ३ | ४ | २ | ४ | ५ | ६ | ३ | ३ | ४ | ४८ |
| चन्द्राष्टकवर्ग | ५ | ३ | ५ | २ | ४ | ३ | ४ | ५ | ५ | २ | ४ | ७ | ४९ |
| भौमाष्टकवर्ग | ३ | ५ | ४ | २ | ३ | ३ | २ | ६ | ३ | ४ | २ | २ | ३९ |
| बुधाष्टकवर्ग | ४ | ४ | ६ | ५ | ५ | ४ | ४ | ५ | ४ | ५ | ४ | ४ | ५४ |
| गुर्वष्टकवर्ग | ६ | ५ | ३ | ३ | ५ | ४ | ६ | ५ | ४ | ४ | ६ | ५ | ५६ |
| शुक्राष्टकवर्ग | ६ | ४ | ७ | ४ | ४ | ४ | ४ | १ | ३ | ६ | ५ | ४ | ५२ |
| शन्यष्टकवर्ग | ७ | ३ | ४ | ४ | २ | १ | २ | ४ | ५ | ६ | १ | ३ | ३९ |
| लग्नाष्टकवर्ग | ६ | ३ | ५ | २ | ५ | ५ | ३ | ६ | ३ | ४ | ४ | ३ | ४९ |
| ग्रह | चं. शु. | सू. | बु. बृ. | श. | मं. | ||||||||
| योग | ४२ | ३२ | ३८ | २५ | ३२ | २६ | २९ | ३७ | ३३ | ३४ | २९ | ३२ | ३८९ |