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बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

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DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

इस ग्रन्थ के बारे में

बृहन्नारदीय पुराण, जिसे नारदपुराण भी कहा जाता है, परम्परा में महर्षि व्यास से जोड़ा जाता है। इसका पूर्वभाग सनक आदि कुमारों द्वारा नारद को दिए गए उपदेशों के रूप में है, जिनमें धर्म, भक्ति, व्रत, तीर्थ, मन्त्र-साधना और वेदाङ्गों (शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, ज्योतिष और छन्द) का विस्तृत वर्णन आता है। इसकी एक विशेषता अठारह पुराणों की विषय-सूची है, जिसमें प्रत्येक पुराण की श्लोक-संख्या और विषय बताए गए हैं; स्कैन में 'पञ्चविंशतिसाहस्रं...' और 'प्रभासस्य च माहात्म्यं...' जैसे श्लोक इसी अंश के हैं।

यह संस्करण हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग की पुराण-प्रकाशन योजना के अन्तर्गत छपा 'बृहन्नारदीयपुराणम् (पूर्वभागः)' है, जिसमें संस्कृत मूल के साथ व्याकरण-वेदान्ताचार्य तारिणीश झा का हिन्दी अनुवाद है। प्रथम संस्करण शक 1910, अर्थात् 1989 ई. में प्रकाशित हुआ; प्रकाशक सम्मेलन के प्रधान मन्त्री डॉ. प्रभात मिश्र शास्त्री थे।

प्रकाशकीय वक्तव्य इस पुराण के ही एक श्लोक से आरम्भ होता है, जिसमें कहा गया है कि जैसे नदियों में गंगा और सरोवरों में पुष्कर श्रेष्ठ है, वैसे ही पुराणों में नारदीय। पुस्तक 1008 पृष्ठों की है।

६२६ नारदीयपुराणम्
सर्वासु च चतुर्थीषु शुक्लास्त्वथसितासु च । विघ्नेश एव देवेशः संपूज्यो भक्तितत्परैः ॥९१॥
इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने चतुर्थपादे द्वादशमासचतुर्थीव्रत
निरूपणं नाम त्रयोदशाधिकशततमोऽध्यायः ॥११३॥
चतुर्दशाधिकशततमोऽध्यायः
सनातन उवाच
शृणु विप्र प्रवक्ष्यामि पंचम्यास्ते व्रतान्यहम् । यानि भक्त्या समास्थाय सर्वान्कामानवाप्नुयात् ॥१॥
प्रोक्ता मत्स्यजयंती तु पंचमी मधुशुक्लगा । अस्यां मत्स्यावतारार्चा भक्तैः कार्यों महोत्सवः ॥२॥
श्रीपंचमीति चैवोक्ता तत्र कार्यं श्रियोऽर्चनम् । गंधाद्यैरुपचारैस्तु नैवेद्यैः पायसादिभिः ॥३॥
यो लक्ष्मीं पूजयेच्चात्र तं वै लक्ष्मीर्न मुञ्चति । पृथ्वीव्रतं तथा चांद्रं हयग्रीवव्रतं तथा ॥४॥
कार्यं तत्तद्विधानेन तत्सिद्धिमभीप्सुभिः । अथ वैशाखपंचम्यां शेषं चाभ्यर्च्य मानवः ॥५॥
सर्वैर्नागगणैर्युक्तमभीष्टं लभते फलम् । तथा ज्येष्ठस्य पंचम्यां पितॄनभ्यर्चयेत्सुधीः ॥६॥
_____________________________________________________________________:
पक्ष की हो या कृष्ण पक्ष की, भक्तिपरायण मनुष्य विघ्नेश की ही अर्चना करे ॥८६-९१॥
श्री नारदीयपुराण के पूर्वार्ध में बृहदुपाख्यानयुक्त चतुर्थपाद में बारह मासों की चतुर्थी तिथि का व्रत
निरूपण नामक एक सौ तेरहवाँ अध्याय समाप्त ॥११३॥
अध्याय ११४
बारह मासों का पंचमी-व्रत ।
सनातन बोले--विप्र ! सुनो, अब मैं पञ्चमी तिथि के व्रतों को बताता हूँ, जिनकी भक्तिपूर्वक आराधना
करने से सकल कामनाओं की प्राप्ति होती है । चैत्र-शुक्ल-पञ्चमी में मत्स्यजयन्तीव्रत करना चाहिए । उस
तिथि को भक्त लोग भगवान् के मत्स्यावतार का पूजन एवं महोत्सव करें ॥१-२॥ उस तिथि का नाम
श्रीपंचमी है । उसमें गंध आदि उपचार तथा पायस आदि के नैवेद्य से श्री की अर्चना करनी चाहिए । (उस दिन)
जो लक्ष्मी की अर्चना करता है, उसे लक्ष्मी कभी भी नहीं छोड़ती । सिद्धि के इच्छुक व्यक्ति उस तिथि में पृथ्वीव्रत,
चांद्व्रत हयग्रीवव्रत को विधिपूर्वक संपन्न करे । वैशाख की पञ्चमी में समस्त नागगणों से युक्त अनन्तशेष की
अर्चना करने से मानव को अभीष्ट-सिद्धि होती है । ज्येष्ठ की पञ्चमी में जो विद्वान् पितरों का पूजन करके
ब्राह्मण भोजन कराता है उसकी समस्त अभिलाषायें पूर्ण होती हैं ॥३-६½॥ मुने ! आषाढ़ की पञ्चमी में

सर्वकामफलावाप्तिर्भवेद्वै विप्रभोजनैः । अथवाषाढस्य पंचम्यां वायुं सर्वगतं नुने ॥७॥
ग्रामाद्बहिर्विनिर्गत्य धरोवस्थे समास्थितः । ध्वजं च पंचवर्णं तु वंशदंडाप्रसंस्थितम् ॥८॥
समुच्छ्रितं निदध्यात् कल्पिताब्जे तु मध्यतः । ततस्तन्मूलदेशे तु दिक्षु सर्वासु नारद ॥६॥
लोकपालान्समभ्यर्च्य कुर्याद्वायुपरीक्षणम् । प्रथमादिषु यामेषु यो यो वायुःप्रवर्तते ॥१०॥
तस्मै तस्मै दिगीशाय पूजां सम्यक् प्रकल्पयेत् । एवं स्थित्वा निराहारस्तत्र यामचतुष्टयम् ॥११॥
सायमागत्य गेहं स्वं भुक्त्वा स्वल्पं समाहितः । लोकपालान्नमस्कार्य स्वप्याद्भूतले शुचौ ॥१२॥
यः स्वप्नो जायते तस्यां रात्रौ यामे चतुर्थके । स एव भविता नूनं स्वप्न इत्याह वै शिवः ॥१३॥
अशुभे तु समुत्पन्ने शिवपूजापरायणः । सोपवासो नयेदष्टयामं तद्दिनमेव वा ॥१४॥
भोजयित्वा द्विजानष्टौ ततः शुभफलं लभेत् । व्रतमेतत्समुदितं शुभाशुभनिदर्शनम् ॥१५॥
नृणां सौभाग्यजनकमिह लोके परत्र च । श्रावणे कृष्णपंचम्यां व्रतं ह्यन्नसमृद्धिवम् ॥१६॥
चतुर्थ्यां दिनशेषे तु सर्वाण्यन्नानि नारद । पृथक् पात्रेषु संस्थाप्य जलैराप्लावयेत्सुधीः ॥१७॥
ततो पात्रांतरे तत्तु निष्कास्यांबु निधापयेत् । प्रातर्भानौ समुदिते पितृश्चैव तथा ऋषीन् ॥१८॥
देवांश्चाभ्यर्च्य सुस्नातं कृत्वा नैवेद्यमग्रतः । तदन्नं याचकेभ्यस्तु प्रयच्छेत्प्रीतमानसः ॥१९॥
सर्वं दिनं क्षिपेदेवं प्रदोषे तु शिवालय । गत्वा संपूजयेद्देवं लिंगरूपिनमीश्वरम् ॥२०॥
गंधपुष्पादिभिः सम्यक्पूजयित्वा महेश्वरम् । जपेत्पञ्चाक्षरी विद्यां शतं चापि सहस्त्रकम् ॥२१॥
जपं निवेद्य देवाय भवाय भवरूपिणे । स्तुत्वा सर्वैवैदिकैश्च पौराणिकैश्चाप्यनाकुलः ॥२२॥

सर्वगामी वायु का पूजन करना चाहिए । उस दिन गांव से बाहर पवित्र जगह में ध्वजारोपण करे । वंशदंड के
अग्रभाग में पाँच रंगों वाली पताका बाँधकर वंश को भूमि में गाड़ दे । तदनन्तर उसके मूल में समस्त दिशाओं
के लोकपालों की पूजा कर वायु की परीक्षा करे । प्रथम आदि प्रहरों में जिस जिस दिशा का पवन बहे, उस-उस
दिशा के स्वामी की अच्छी तरह पूजा कर चारों पहर निराहार ही रहना चाहिए ॥७-११॥ संध्याकाल होने
पर अपने घर में आकर अल्प भोजन करे । फिर समाहित चित्त से लोकपालों का स्मरण कर भूमि पर शयन करे ।
उस रात्रि के चौथे पहर में जो स्वप्न दिखाई देता है वह होकर रहता है ऐसा शिव ने कहा है। यदि अशुभ वस्तु
दीख पड़े तो शिव पूजा-परायण होकर उपवास करते हुए आगे आठो पहर या मात्र उस दिन को बिताये । पश्चात्
आठ विप्रों को भोजन कराये । ऐसा करने से शुभ फल मिलता है ॥१२-१४½॥ यह व्रत शुभ अशुभ बतलाने वाला
तथा मनुष्यों को इस लोक में एवम् परलोक में सौभाग्य देने वाला है । श्रावण-कृष्ण-पञ्चमी में अन्नसमृद्धिदायक
व्रत करना चाहिए । नारद ! चतुर्थी तिथि के दिनावसान में समस्त अन्नों को पृथक्-पृथक् पात्रों में रखकर जल
से धो डाले ।१५-१७।
दूसरे पहर में अन्नों को निकालकर पुनः जल में ही रखे । प्रातः काल अच्छी तरह स्नान कर सूर्योदय होने
पर देव, पितर तथा ऋषियों की पूजा करके नैवेद्य चढ़ाये । वह अन्न याचकों को प्रसन्न मन से दे दे । सम्पूर्ण
दिन को इस तरह बिता कर प्रदोष काल में शिवालय जाकर शिवलिंग का पूजन करना चाहिए । गंध, पुष्प आदि से
सम्यक्तया महेश्वर की अर्चना कर पंचाक्षर मंत्र का एक लाख जप करे । भव रूपी शंकर देव को जल अर्पित
करके पौराणिक एवम् वैदिक मंत्रों से वाग्गद्गद होकर उनकी स्तुति करे ॥१८-२२॥ सदा सब प्रकार के अन्नों

३२८ नारदीयपुराणम्
प्रार्थयेद्देवमीशानं शाश्वतान्नप्रसिद्धये । शारदीयानि चान्नानि तथा वासन्तिकान्यपि ॥२३॥
यानि स्युस्तैः समृद्धोऽहं भूयां जन्मनि जन्मनि । एवं संप्रार्थ्य देवेशं गृहायातं वि स्वकम् ॥२४॥
दत्त्वान्नं ब्राह्मणादिभ्यः पश्चाद्भुञ्जीत वाग्यतः । एतदन्नव्रतं विप्र विधिनाऽऽचरितं नृभिः ॥२५॥
सर्वान्नसंपदज्जनकं परलोके गतिप्रदम् । श्रावणे शुक्लपञ्चम्यां नृभिरास्तिक्यतत्परैः ॥२६॥
द्वारस्योभयतो लेख्या गोमयेन विषोल्वणाः । गन्धैः पूजयेत्नांश्च तथैन्द्राणीमनन्तरम् ॥२७॥
संपूज्य स्वर्णरूप्याविदध्यक्षतकुशांबुभिः । गन्धैः पुष्पैस्तथा धूपैर्दीपनैवेद्य संचयैः ॥२८॥
ततः प्रदक्षिणीकृत्य तद्द्द्रव्यं सम्प्रणम्य च । संप्रार्थ्य भक्तिभावेन विप्राग्रयेषु समर्पयेत् ॥२६॥
यदिदं स्वर्णरौप्यादि द्रव्यं वै विप्रसात्कृतम् । तदनंतफलं ज्ञेयमन्नम जन्मनि जन्मनि ॥३०॥
इत्येवं ददतो द्रव्यं भक्तिभावेन नारद । प्रसन्नः स्याद्धनाध्यक्षः स्वर्णादिकसमृद्धिदः ॥३१॥
एतद्व्रतं नरः कृत्वा विप्रान्संभोज्य भक्तितः । पश्चात्स्वयं च भुञ्जीत दारापत्यसुहृद्वृतः ॥३२॥
भाद्रे तु कृष्णपंचम्यां नागान् क्षीरेण तर्पयेत् । ॥३३॥
यस्तस्याऽऽसप्तमं यावत्कुलं सर्पात्तु निर्भयम् । भाद्रस्य शुक्लपंचम्यां पूजयेदृषिसत्तमान् ॥३४॥
प्रातर्नद्यादिके स्नात्वा कृत्वा नित्यम तंद्रितः गृहागत्य यत्नेः वेदिकां कारयेन्मृदा ॥३५॥
गोमयेनोपलिप्यथ कृत्वा पुष्पोपशोभिताम् तत्रास्तीर्य कुशान्विप्र ऋषीन्सप्त समर्चयेत् ॥३६॥
गन्धैश्च विविधैः पुष्पैर्धूपैर्दीपैः सुशोभनैः । कश्यपोऽत्रिर्भरद्वाजो विश्वामित्रोऽथ गौतमः ॥३७॥
जमदग्निर्वसिष्ठश्च सत्तैते ऋषयः स्मृताः । इत्येवाऽर्घ्यं प्रविधेयत्कल्पयित्वा प्रदाय च ॥३८॥
की प्राप्ति के लिए महादेव की इस प्रकार स्तुति करे । 'हे शिव !) शरद ऋतु, वसन्त ऋतु एवम् अन्य ऋतुओं
में जितने प्रकार के अन्न होते हैं, वे सब मुझे प्रत्येक जन्म मे मिला करें ।' देवेश की प्रार्थना करने के उपरान्त
अपने घर जाये और ब्राह्मण को अन्न देकर वाक्संयम पूर्वक स्वयं भोजन करे । विप्र ! जो मनुष्य इस अन्नव्रत
को विधिवूर्वक सम्पन्न करता है, उसे सकल अन्नों की प्राप्ति होता है तथा परलोक में उत्तम गति मिलती है
॥२३-२५३॥ श्रावण-शुक्ल-पंचमी में आस्तिक मनुष्य घर के द्वार पर गोबर के सर्प बना कर गन्ध आदि से
पूजन करे । अनन्तर सुवर्ण, चांदी, दधि, अक्षन, कुश, जल, गन्ध, पुष्प, धूप, दीप और नैवेद्य से इंद्राणी की
अर्चना, प्रदक्षिणा एवम् प्रणाम करके ब्राह्मणों को भक्तिभाव से द्रव्य दे। सुवर्ण, चांदी आदि जो द्रव्य विप्रों को
दिया जाता है, उसका अनंतफल जन्म-जन्मान्तर में मिलता रहता है। २६-३०॥ नारद ! इस प्रकार भक्तिभाव
से द्रव्य देने वाले को कुबेर प्रसन्न होकर स्वर्ण आदि संपत्त देते हैं । इस व्रत का अनुष्ठान करने वाला मनुष्य
भक्ति से ब्राह्मणों को भोजन कराकर स्त्री, पुत्र तथा लघुवर्ग के साथ स्वयं भोजन करे। भादों के कृष्ण पक्ष
को पंचमी में नागों को दूध से परितृप्त करने स मनुष्य को सात कुलों तक सर्प का भय नहीं रहता । भादों की
शुक्ल-पंचमी में ऋषि पूजन करना चाहिये ॥३१-३४॥
प्रातःकाल निरालस्यपूर्वक नदी आदि में स्नान कर घर आकर मृत्तिका की बेदी बनाये । उसे गोबर से
लीप कर पुष्पों से सुसज्जित करे । विप्र ! उस पर कुशों को बिछा कर विविध गंध, पुष्प, धूप, दीप आदि से
सप्तर्षियों की अर्चना करे । कश्यप, अत्रि, भरद्वाज, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि और वसिष्ठ-ये सप्तर्षि कह-
लाते हैं । इनको विधिवत् अर्घ्य प्रदान कर धीमान् व्यक्ति श्यामाक (सावां) का खीर उन्हें समर्पित करे ।

नैवेद्यं विपचेद्धोमान्छ्यामाकाद्यैश्च कृष्टकैः । तन्निवेद्य विसृज्येमान्स्वयं चाद्यात्तवेव हि ॥३६॥
अनेन विधिना सप्त वर्षाणि प्रतिवत्सरम् । कृत्वा व्रतान्ते वरयेदाचार्यान् सप्त वेदिकान् ॥४०॥
प्रतिमाः सप्त कुर्वीत सुवर्णत स्वशक्तितः । जटिलाः साक्षसूत्राश्च कमण्डलुसमन्विताः ॥४१॥
संस्थाप्य कलशेष्वेतांस्ताम्रोषु मृन्मयेषु वा । स्नापयेद्विधिवद्भक्त्या पृथक्पंचामृतेरपि ॥४२॥
उपचारैः षोडशभिस्ततः संपूज्य भक्तितः । अर्घ्यं दत्वा ततो होमं तिलव्रीहियवान्नैः ॥४३॥
'सहस्तोमा' इति ऋचा नाममन्त्रैस्तु वा पृथक् । पुण्यैमन्त्रैस्तथैवान्यैर्हुत्वा पूर्णाहूतिं चरेत् ॥४४॥
ततस्तु सप्त गा दद्याद्वस्त्राद्यलंकारसंयुताः । आचार्यं पूजयेत्तच्च वस्त्रालंकारभूषणैः ॥४५॥
अनुज्ञा गुरुरीः पश्चान्मूर्तीर्विप्रेषु द्यापयेत् । भोजयित्वा तु तान्भक्त्या प्रणिपत्य विसर्जयेत् ॥४६॥
ततश्चेष्टैः सहासीनः स्वयं ब्राह्मणसेवितम् । भुक्त्वा वै षड्रसोपेतं प्रमुद्यात्सह बन्धुभिः ॥४७॥
एतत्कृत्वा व्रतं सांगं भोगान्न्रुक्त्वाथ वाञ्छितान् । सप्तर्षीणां प्रसादेन विमानवरगो भवेत् ॥४८॥
आश्विने शुक्लपञ्चम्यामूपांगललिताव्रतम् । ॥४९॥
तस्याः स्वर्णमयीं मूर्ति शक्त्या निर्माय नारद । उपचारैः षोडशभिः पूजयेत्तां विधानतः ॥५०॥
पक्वान्नं फलसंयुक्तं सघृतं दक्षिणान्वितम् । द्विजवर्याय दातव्यं व्रतसंपूतिहेतये ॥५१॥
"सवाहना शक्तियुता वरदा पूजिता मया । मातर्गमानुगृह्याय गम्यतां निजमंदिरम् ॥५२॥
कार्तिके शुक्लपंचम्यां जयाव्रतमनुत्तमम् । कर्तव्यं पापनाशाय श्रद्धया द्विजसत्तम ॥५३॥
पूजयित्वा अयां विप्र यथाविधि समाहितः । उपचारैः षोडशभिस्ततः शुचिरलंकृतः ॥५४॥


पश्चात् उनका विसर्जन करके स्वयं भोजन करे । इस विधि से सात वर्षों तक प्रतिवर्ष व्रत करके अन्त में सात
वैदिक आचार्यों का वरण करे ॥३६-४०॥ अपनी शक्ति के अनुसार सात सुवर्ण की प्रतिमा बनाकर उन्हें जटा,
रुद्राक्षमाला तथा कमंडलुओं से विभूषित करे । फिर उन्हें तांबे अथवा मिट्टी के कलशों पर स्थापित कर
पंचामृत से भक्ति-पूर्वक स्नान कराये । अनन्तर भक्ति से षोडशोपचार पूजन कर अर्घ्य देकर तिल, व्रीहि, यव
आदि से हवन करे । "सहस्तोमा" इस ऋचा से वा अन्य पवित्र मन्त्रों से पृथक्-पृथक् नाम ग्रहणपूर्वक पूर्णा-
हुति दे ॥४०-४४॥
तदुपरात्त वस्त्रों एवम् अलंकारों से आभूषित सात गायों का दान करे । वस्त्र तथा आभूषणों से आचार्य
की पूजा कर गुरु की आज्ञा से प्रतिमा विप्रों को दे दे । उन द्विजों को भोजन कराकर भक्तिपूर्वक उन्हें प्रणाम कर
विदा करे । पश्चात् ब्राह्मणों के खिलाने से बचे षड्रस अन्न को इष्ट-मित्रों के साथ स्वयं प्रसन्नतापूर्वक भोजन
करे । इस व्रत को सांगोपांग करने वाला व्यक्ति वांछित भोगों को भोगकर सप्तर्षियों की कृपा से उत्तम विमान
पर बिहार करता है ॥४५-४८॥ आश्विन-शुक्ल-पंचमी में उपांगललिता व्रत करना चाहिये । नारद ! उसकी
सुवर्णमयी प्रतिमा बनाकर विधिपूर्वक षोडशोपचार पूजन करे । व्रत की पूर्णता के लिये पक्वान्न, फल, घृत, तथा
दक्षिणा उत्तम ब्राह्मण को देकर "सवाहना .............। इस मन्त्र से देवी का विसर्जन करे । जिसके बाद
कार्तिक-शुक्ल-पंचमी से पापनाश के लिये श्रद्धापूर्वक अनुत्तम जयाव्रत करना चाहिये ॥४९-५२१/२॥
विप्र ! उस दिन स्नान आदि से विशुद्ध हो सावधानी से विधिपूर्वक जया का षोडशोपचार पूजन कर
उत्तम ब्राह्मण को भोजन कराये । तदन्तर उसे दक्षिणा देकर विदा करे और स्वयं ...
*१७ मा० पु०

६३० | नारदीयपुराणम्
विप्रैकं भोजयेच्चापि तस्मै दत्त्वा च दक्षिणाम् । विसर्जयेत्ततः पश्चात्स्वयं भुञ्जीत वाग्यतः ॥५५॥
यस्तु वै भक्तिसंयुक्तः स्नानं कुर्याज्जयादिने । नश्यन्ति तस्य पापानि सिंहाक्रांता मृगा यथा ॥५६॥
यदश्वमेधावभृथे फलं स्नानेन कीर्तितम् । तत्फलं प्राप्यते विप्र स्नातेनापि जयादिने ॥५७॥
अपुत्रो लभते पुत्रं वंध्या गर्भं च विंदति । रोगी रोगात्प्रमुच्येत बद्धो मुच्येत बंधनात् ॥५८॥
मार्गशुक्ले च पञ्चम्यां नागान्निवेद्य विधानतः । निर्भयो ह्यभयं लब्ध्वा मोदते सह बांधवैः ॥५९॥
पौषेऽपि शुक्लपञ्चम्यां संपूज्य मधुसूदनम् । लभते वाञ्छितान्कामान्नात्र कार्या विचारणा ॥६०॥
पंचम्यां प्रतिमासे तु शुक्ले कृष्णे च नारद । पितॄणां पूजनं शस्तं नागानां चापि सर्वदा ॥६१॥
इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने चतुर्थपादे द्वादशमासस्थपञ्चमीव्रत-
निरूपणं नाम चतुर्दशाधिकशततमोऽध्यायः ॥११४॥

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पञ्चदशाधिकशततमोऽध्यायः
सनातन उवाच
शृणु विप्र प्रवक्ष्यामि षष्ठ्याश्चैव व्रतानि ते । यानि सम्यग्विधायात्र लभेतसर्वान्मनोरथान् ॥१॥
चैत्रमासे शुक्लषष्ठ्यां कुमारव्रतमुत्तमम् । तत्रेष्ट्वा षण्मुखं देवं नानापूजाविधानतः ॥२॥

दिन जो व्यक्ति भक्ति से स्नान करता है, उसके समस्त पाप उसी तरह नष्ट हो जाते हैं, जैसे सिंह के आक्रमण
से मृग (नष्ट होता है)। विप्र ! अश्वमेध यज्ञ में स्नान करने से जो फल होता है, वह फल उस दिन स्नान करने
से मिलता है ॥५३-५७॥
उस व्रत के प्रभाव से अपुत्र पुत्र को प्राप्त करता है, वंध्या को बालक होता है, रोगी रोग से मुक्त होता
है और बद्ध जीव बन्धन से छुटकारा पाता है। अग्रहण के शुक्ल पक्ष की पंचमी में विधिवूर्वक नागों का पूजन
करने वाला मनुष्य नागों से निर्भय होकर बांधवों के साथ आनन्द करता है। नारद ! पौष के शुक्ल तथा कृष्ण
पक्ष की पंचमियों में पितरों एवम् नागों का पूजन करना चाहिये ॥५८-६०॥
श्री नारदीय पुराण के पूर्वार्ध में बृहदुपाख्यान युक्त चतुर्थ पाद में बारह मासों के पंचमीव्रतों का निरू-
पण नामक एक सौ चौदहवां अध्याय समाप्त ॥११४॥

अध्याय ११५
बारह मासों का षष्ठी-व्रत
सनातन बोले-विप्र ! सुनो, अब षष्ठी तिथि के व्रतों को तुमसे बता देता हूँ, जिनके अनुष्ठान से सकल
मनोरथों की प्राप्ति होती है। चैत्रमास की शुक्ल-षष्ठी में उत्तम कुमारव्रत करना चाहिये। उस दिन अनेक प्रकार
से छः मुख वाले देव की पूजा करने से सर्वगुणसम्पन्न एवम् चिरजीवी पुत्र का लाभ होता है ॥१-२॥

पञ्चदशाधिकशततमोऽध्यायः ६३१

पुत्रं सर्वगुणोपेतं प्राप्नुयाच्चिरजीविनम् । वैशाखशुक्लषष्ठ्यां च पूजयित्वा च कार्तिकम् ॥३॥
लभते मातृजं सौख्यं नात्र कार्या विचारणा । ज्येष्ठमासे शुक्लषष्ठ्यां विधिनेष्ट्वा दिवाकरम् ॥४॥
लभते वाञ्छितान्कामांस्तत्प्रसादान्न संशयः । आषाढशुक्लषष्ठ्यां वै स्कंदव्रतमनुत्तमम् ॥५॥
उपोष्य पूजयित्वैनं शिवयोःप्रियमात्मजम् । लभतेऽभीप्सितान्कामान्पुत्रपौत्रादिसंततीः ॥६॥
श्रावणे शुक्लषष्ठ्यां तु शरजन्मानमर्चयेत् । उपचारैः षोडशभिर्भक्त्या परमयान्वितः ॥७॥
लभतेऽभीप्सितार्थान्षण्मुखस्य प्रसादतः । भाद्रमासे कृष्णषष्ठ्यां ललिताव्रतमुच्यते ॥८॥
प्रातः स्नात्वा विधानेन नारी शुक्लाम्बरावृता । शुक्लमाल्यधरा वापि नद्याः संगमवालुकाम् ॥६॥
गृहीत्वा वंशपात्रे तु धृत्वा पिंडाकृतिं च ताम् । पञ्चधा ललितां तत्र ध्यायेद्वनविलासिनीम् ॥१०॥
पङ्कजं करवीरं च नेपालीं मालतीं तथा । नीलोत्पलं केतकीं च संगृह्य तगरं तथा ॥११॥
एकैकाष्टशतं ग्राह्यमष्टाविंशतिरेव च । अक्षताः कलिका गृह्य ताभिर्देवीं प्रपूजयेत् ॥१२॥
प्रार्थयेदग्रतः स्थित्वा देवीं तां गिरिशप्रियाम् । गंगाद्वारे कुशावर्ते बिल्वके नीलपर्वते ॥१३॥
स्नात्वा कनखले देवि हरिं लब्धवती पतिम् । ललिते सुभगे देवि सुखसौभाग्यदायिनि ॥१४॥
अनंतं देहि सौभाग्यं मह्यं तुभ्यं नमो नमः । मंत्रेणानेन कुसुमैश्चंपकस्य सुशोभनैः ॥१५॥
अभ्यर्च्य विधिवत्तस्या नैवेद्यं पुरतो न्यसेत् । त्रपुषैरपि कूष्माण्डैर्नारिकेरैः सुदाडिमैः ॥१६॥
बीजपूरैः सुतुंडीरैः कारवेल्लैः सविंभवैः । फलैस्तत्कालसम्भूतैः कृत्वा शोभां तदग्रतः ॥१७॥
विरूढधान्यांकुरकैः सुदीपावलिभिस्तथा । सार्धैः सगणकैश्चैवः सौहालककरंजकैः ॥१८॥
गुडपुष्पैः कर्णवेष्टैर्मोदकैश्चापमोदकैः । बहुप्रकारैर्नैवेद्यैर्यथाविभवसारतः ॥१९॥
एवमभ्यर्च्य विधिवद्रात्रौ जागरणोत्सवम् । गीतवाद्यनटनृत्यैः प्रोक्षणीयैरनेकधा ॥२०॥

वैशाख-शुक्ल-षष्ठी में कार्तिकेय की अर्चना करने से मातृ-सुख की प्राप्ति होती है, इसमें विचार करने की
आवश्यकता नहीं। ज्येष्ठ-शुक्ल-षष्ठी में विधिपूर्वक दिनकर की पूजा करने से अभिलषित फलों की प्राप्ति होती
है, इसमें संशय नहीं ॥३-४३॥ आषाढ़-शुक्ल-षष्ठी में जो व्यक्ति अत्युत्तम स्कंदव्रत करता है, वह पुत्र-पौत्र
आदि वांछित कामनाओं को प्राप्त करता है। श्रावण-शुक्ल-षष्ठी में परम भक्तिपूर्वक स्कंद की षोडशोपचार
पूजा करने से उनकी कृपा से अभीप्सित फलों की प्राप्ति होती है। भादों की कृष्ण-षष्ठी में ललिताव्रत करना
चाहिये ॥५-८॥ उस दिन नारी विधिपूर्वक स्नान कर शुक्ल वस्त्र तथा शुक्ल माला धारण करके नदी के संगम
से बाँस के पात्र में पिण्डाकृति वालू लाकर उसकी मूर्ति बनावे। उस मूर्ति में वनविलासिनी ललिता देवी के पाँच
रूपों का ध्यान करे । कमल, करवीर, नेपाली, मालती, नीलकमल, केतकी और तगर—इस पुष्पों में से प्रत्येक
को एक सौ आठ या अट्ठाईस ही बिन मुरझाई कलियों को लेकर उनसे देवी की पूजा करे । फिर उनके आगे
खड़े होकर शंकर-प्रिया देवी की इस प्रकार प्रार्थना करे—देवि ! आपने हरिद्वार, कुशावर्त, बिल्वक नीलपर्वत
तथा कनखल में स्नान कर पति को प्राप्त किया ॥६-१३३॥
ललिते ! सुभगे ! देवि ! सुखसौभाग्यदायिनि ! मुझे अनंत सौभाग्य दीजिये । आपको नमस्कार है।'
इस तरह प्रार्थना कर सुन्दर चम्पा पुष्पों से विधिवत् अर्चना करके ककड़ी, कुम्हड़ा, नारियल, दाड़िम, बिजौरा,
तुंडीर, करेला और सामयिक फलों का नैवेद्य चढ़ाये। यथाशक्ति धूप, दीप तथा विविध प्रकार की मिठाइयों का
भोग लगाकर रात्रि में नर्तकों के नृत्य, गीत आदि साधनों से जागरणोत्सव करे ॥१४-२०॥

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६३२ नारदीयपुराणम्

सखीभिः सहिता साध्वी तां रात्रि प्रसमं नयेत् । न च संमीलयेन्नेत्रे नारी यामचतुष्टयम् ॥२१॥
दुर्भगा दुष्कृता वंध्या नेत्रसंमीलनाद्भवेत् । एवं जागरणं कृत्वा सप्तम्यां सरितं नयेत् ॥२२॥
गन्धपुष्पैस्तथाभ्यर्च्य गीतवाद्यपुरःसरैः । तच्च दद्याद्विजेन्द्राय नैवेद्यादि द्विजोत्तम ॥२३॥
स्नात्वा गृहं समागत्य हुत्वा वैश्वानरं ततः । देवान्पितॄन्मनुष्यांश्च पूजयित्वा सुवासिनीः ॥२४॥
कन्यकाश्चैव संभोज्य ब्राह्मणान्वश पंच च । मन्नपमोजयेद्बहुविधैर्दत्वा दानानि भूरिशः ॥२५॥
ललिता मेऽस्तु सुप्रीता इत्युक्त्वा तान्विसर्जयेत् । यः कश्चिदाचरेदेतद्व्रतं सौभाग्यदं परम् ॥२६॥
नरो वा यदि वा नारी तस्य पुण्यफलं शृणु । यद्व्रतैश्च तपोभिश्च दानैर्वा नियमैरपि ॥२७॥
तवेतेनेह लभ्येत किं बहुक्तेन नारद । मृतेरनंतरं प्राप्य शिवलोकं सनातनम् ॥२८॥
मोदते ललितादेव्या शंभो वै सखिवच्चिरम् । नभस्ये मासि या शुक्ला षष्ठी सा चंदनाह्वया ॥२९॥
तस्यां देवीं समभ्यर्च्य लभते तत्सलोकताम् । रोहिणी पातभौमैस्तु संयुता कपिला भवेत् ॥३०॥
तस्यां रवि समभ्यर्च्य व्रती नियमतत्परः । लभते वांछितान्कामान्भास्करस्य प्रसादतः ॥३१॥
अन्नदानं जपो होमं पितृदेवर्षितर्पणम् । सर्वमेवाक्षयं ज्ञेयं कृतं देवर्षिसत्तम् ॥३२॥
कपिलां धेनुमभ्यर्च्य वस्त्रमाल्यानुलेपनैः । प्रदद्याद्वेदविदुषे द्वादशात्मप्रतुष्टये ॥३३॥
अष्वेशुक्लवषष्ठ्यां तु पूज्या कात्यायनी द्विज । गंधाद्यैर्मंगलद्रव्यैर्नैवेद्यैर्विविधैस्तथा ॥३४॥
ततः क्षमाप्य देवेशीं प्रणिपत्य विसर्जयेत् । पूज्यात्र संकती मूर्तिर्यद्वा द्विजसती बुदा ॥३५॥

[Hindi Translation]
सती स्त्री सखियों के साथ मनोविनोद करती हुई रात बिताये । किन्तु चारों पहर कभी भी आँख न मूंदे
क्योंकि (उस समय) आँख मूंदने से नारी दुर्भगा, दीना तथा वन्ध्या होती है । इस प्रकार जागरण कर सप्तमी
में प्रतिमा को नदी में प्रवाहित करने के लिये ले जाय । वहाँ भी गन्ध, पुष्प, गीत, वाद्य आदि से देवी की पूजा
कर नैवेद्य आदि वस्तु उत्तम ब्राह्मण को प्रदान करे ॥२१-२३॥
स्नानोत्तर घर लौटने पर हवन तथा देव-पितरों का पूजन कर सधवा स्त्रियों, कुमारिकाओं तथा पन्द्रह
ब्राह्मणों को अच्छी तरह भोजन कराकर प्रचुर दान दे। अन्त में 'ललिता देवी मेरे ऊपर प्रसन्न हों' यह कहकर
उनको विदा करे । जो नर या नारी इस सौभाग्यदायक व्रत का अनुष्ठान करती है, उसका पुण्यफल सुनो ॥२४-
२६३॥ नारद ! बहुत क्या कहा जाय ? तप, व्रत, दान या नियम करने से जो फल मिलता है, वह इससे प्राप्त
होता है और मृत्यु के पश्चात् सनातन शिवलोक की प्राप्ति होती है । वहाँ वह व्रती मित्रभाव से ललिता देवी
के साथ या शंकर के साथ चिरकाल तक आनन्द करता है । भादों के शुक्ल पक्ष की षष्ठी का नाम चन्दना है ।
उसमें देवी की अर्चना करने से सालोक्य मोक्ष की प्राप्ति होती है ॥२७-२९३॥
उस दिन रोहिणी नक्षत्र यदि पात-भौम नामक योग से संयुक्त हो तो उस तिथि का नाम कपिल होता है।
उसमें जो नियम-निष्ठापूर्वक दिनकर की आराधना करता है, उसकी समस्त कामनायें सूर्य की कृपा से सफल
होती है । देवर्षिश्रेष्ठ ! कपिला तिथि में अन्नदान, जप, होम और देवता ऋषि तथा पितरों के तर्पण करने का
फल अक्षय माना गया है। (उस तिथि में) सूर्य की तुष्टि के लिए वस्त्र, माला, चन्दन आदि से कपिलाधेनु की
अर्चना कर वेदवेत्ता ब्राह्मण को सब वस्तुएं समर्पित करनी चाहिये ॥३०-३३॥ द्विज ! आश्विन-शुक्ल-षष्ठी को
गन्ध आदि, मांगलिक द्रव्य तथा विविध प्रकार के नैवेद्यों से कात्यायनी की पूजा कर क्षमा प्रार्थना करके प्रणामो

पञ्चदशाधिकशततमोऽध्यायः २२३
वस्त्रालंकरणैर्भक्त्यैः कात्यायिन्याः प्रतुष्टये । कन्यावरं प्राप्नुयाच्च वांछितं पुत्रमंगना ॥३६॥
कात्यायिनीप्रसादाद्वै नात्र कार्या विचारणा । कार्तिके शुक्लषष्ठ्यां तु षण्मुखेन महात्मना ॥३७॥
देवसेना महाभागा लब्धा सर्वसुरार्पिता । अतस्तस्यां सुरश्रेष्ठां देवसेनां च षण्मुखम् ॥३८॥
संपूज्य निखिलैरेव उपचारैर्मनोहरैः । प्राप्नुयादतुलां सिद्धिं मनोभीष्टां द्विजोत्तम ॥३९॥
अत्रैव वह्निपूजोक्तां तां च सम्यक्समाचरेत् । विविधद्रव्यहोमैश्च वह्निपूजापुरःसरम् ॥४०॥
मार्गशीर्षे शुक्लषष्ठ्यां निहतस्तारकासुरः । स्कंदेन सत्कृतिः प्राप्ता ब्रह्माद्यैः परिकल्पिता ॥४१॥
ततोऽस्यां पूजयेत्स्कंदं गंधपुष्पाक्षतैः फलैः । वस्त्रैराभूषणैश्चापि नैवेद्यैर्विविधैस्तथा ॥४२॥
रविंवारेण संयुक्ता तथा शतभिषान्विता । यदि चेत्सा समुद्दिष्टा चंपाहा मुनिसत्तम ॥४३॥
तस्यां विश्वेश्वरो देवो द्रष्टव्यः पापनाशनः । पूजनीयो वेदनीयः स्मर्तव्यः सौख्यमिच्छता ॥४४॥
स्नानदानादिकं चात्र सर्वमक्षयमुच्यते । पौषमासे शुक्लषष्ठ्यां देवो दिनपतिर्द्विज ॥४५॥
विष्णुरूपी जगस्त्राता प्रदुभूतः सनातनः । ॥४६॥
स तस्मात्पूजनीयोऽस्यां द्रव्यैर्गन्धपुरस्कृतैः । नैवेद्यैर्वस्त्रभूषाद्यैः सर्वसौख्यमभीप्सुभिः ॥४७॥
माघमासे सिता षष्ठी वारुणाह्वा स्मृता तु सा । तस्यां वरुणमभ्यर्च्यद्विष्णुरूपं सनातनम् ॥४८॥
रक्तैर्गंधांशुकैः पुष्पैर्नैवेद्यैर्धूपदीपकैः । एवमभ्यर्च्यं विविधद्यद्यच्चाभिमलंवेन्नरः ॥४६॥
तत्तच्च फलतो लब्ध्वा मोदते तत्प्रसादतः । फाल्गुने शुक्लषष्ठ्यां तु देवं पशुपति द्विज ॥५०॥
मृन्मयं विधिना कृत्वा पूजयेदुपचारकैः । संस्नाप्य शतरुद्रेण पृथक्पंचामृतैर्जलैः ॥५१॥
गन्धैरालिप्य सुश्वेतैरक्षतैः श्वेतपुष्पकैः । विल्वपत्रैश्च धत्तूरकुसुमैश्च फलैस्तथा ॥५२॥
संपूज्य नानानैवेद्यैर्नीराज्य विधिवत्ततः । क्षमाप्य प्रणिपत्येनं कैलासाय विसर्जयेत् ॥५३॥
पर विसर्जन करना चाहिए । कात्यायनी की तुष्टि के लिये सुन्दर वस्त्र-आभूषणों से मृत्तिका की मूर्ति या
ब्राह्मण की पतिव्रता स्त्री की पूजा करे । ऐसा करने से कन्या वर को ओर नारी पुत्र को प्राप्त करती है, इसमें
विचार करने को आवश्यकता नहीं । कार्तिक-शुक्ल-षष्ठी में महात्मा स्कंद को अमरों ने महाभाग्यवती देवसेना
अर्पित की थी । इसलिए मनोहर उपचारों से सुरश्रेष्ठ देवसेना तथा कार्तिकेय की पूजा करने से वांछित एवम्
अतुलनीय सिद्धि की प्राप्ति होती है । उस दिन विविध मांगलिक द्रव्य तथा हवन से अच्छी तरह अग्नि पूजा
भी करनी चाहिये ॥३४-४०॥
अगहन-शुक्ल-षष्ठी में स्कंद ने तारकासुर को निहत कर ब्रह्मा आदि देवों से सम्मान प्राप्त किया था । इस
लिए उस दिन गन्ध, पुष्प, अक्षत, फल, वस्त्र, आभूषण तथा विविध प्रकार के नैवेद्यों से उनकी पूजा करनी चाहिये ।
उसी तिथि में जब रविवार तथा शतभिषा नक्षत्र का योग था तब जगत्-रक्षक सनातन विष्णु अवतीर्ण हुए थे ।
इसलिये सब प्रकार के सुखों की अभिलाषा करने वाला व्यक्ति उक्त तिथि में गन्ध, मांगलिक द्रव्य नैवेद्य, वस्त्र
तथा आभूषणों से उनकी अर्चना करे ॥४१-४७॥ माघ मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि वारुणा कहलाती हैं।
उसमें रक्त वस्त्र, गन्ध, पुष्प धूप, दीप नैवेद्य से सनातन विष्णु रूपी वरुण की विधिपूर्वक अर्चना करने से मानव
को अभिलषित फल की प्राप्ति होती है ॥४८-४९३॥ द्विज ! फाल्गुन-शुक्ल-षष्ठी में पशुपति देव की मृन्मय
प्रतिमा बनाकर उपचार पूर्वक पूजन करना चाहिए। शतरुद्री का पाठ करते हुए पंचामृत से उनका स्नपन कर
चन्दन लेप करके अक्षत, श्वेत पुष्प, बिल्वपत्र, धतूरे के कुसुम, फल, विविध नैवेद्य तथा नीराजन से विधिपूर्वक

६३४ नारदीयपुराणम्
एवं कृतशिवाचंस्तु नरो नार्यथवा मुने । इह भुक्त्वा वरान्भोगानान्ते शिवगतिं लभेत् ॥५४॥
इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने चतुर्थपादे द्वादशमासस्थितषष्ठीव्रत-
निरूपणं नाम पञ्चदशाधिकशततमोऽध्यायः ॥११५॥

षोडशाधिकशततमोऽध्यायः
सनातन उवाच
शृणु नारद वक्ष्यामि सप्तम्यास्ते व्रतान्यहम् । यानि कृत्वा नरो भक्त्या सूर्यसायुज्यमाप्नुयात् ॥१॥
चैत्रे तु शुक्लसप्तम्यां बहिः स्नानं समाचरेत् । स्थंडिले गोमयालिप्ते गौरमृत्तिकयास्तृते ॥२॥
लिखित्वाष्टदलं पद्मं कणिकायां विभावसुम् । विन्यसेत्पूर्ववक्त्रे तु देवौ द्वौ कृतधातुकौ ॥३॥
आग्नेयं च न्यसेत्पत्रे गंधर्वौ कृतकारको । दक्षिणे च न्यसेत्पत्रे तथैव राक्षसद्वयम् ॥४॥
आकृती द्वौ न्यसेत्पत्रे नैर्ऋते मुनिसत्तम । काद्रवेयौ महानागौ पश्चिमे कृतचारकौ ॥५॥
वायव्ये यातुधानौ द्वौ उत्तरे च ऋषिद्वयम् । ऐशान्ये विन्यसेत्पत्रे ग्रहमेको द्विजोत्तम ॥६॥
तेषां संपूजनं कार्यं गन्धमाल्यानुलेपनैः । दीपैर्धूपैःसनैवेद्यैस्तांबूलक्रमुकादिभिः ॥७॥

अर्चना करे । अनन्तर क्षमा-प्रार्थना कर प्रणाम करके कैलाश के लिये उनका विसर्जन करे ॥५०-५३॥
मुने ! इस प्रकार शंकर की आराधना करने वाला नर अथवा नारी इह लोक में उत्तम भोगों को भोग
कर अन्त में शिवगति को प्राप्त करते हैं ॥५४-५५।
श्री नारदीयपुराण के पूर्वार्ध में बृहदुपाख्यानयुक्त चतुर्थपाद में द्वादशमासस्थितषष्ठीव्रतनिरूपण नामक
एक सौ पन्द्रहवां अध्याय समाप्त ॥११५॥

अध्याय ११६
बारह मासों का सप्तमी-व्रत
सनातन बोले-नारद ! सुनो, मैं सप्तमी तिथि के व्रतों को बता देता हूँ, जिनके आचरण से मनुष्य
सूर्यसायुज्यमोक्ष को प्राप्त करता है । चैत्र-शुक्लकी सप्तमी में बाहर (नदी आदि में) स्नान कर भूमि को गोबर,
तथा स्वच्छ मिट्टी से लीपे । उस पर अष्टदल कमल लिखकर उसकी कणिका के ऊपर सूर्य, पूर्वाभिमुख पत्र पर
दो धातुनिर्मित देवों, आग्नेयाभिमुख पत्र पर दो यजमाधक गन्धर्वों, दक्षिणाभिमुख पत्र पर दो राक्षसों, नैर्ऋता-
भिमुख पत्र पर दो आकृतियों, पश्चिमाभिमुख पत्र पर दो कद्रू-पुत्र महानागों वायव्याभिमुख पत्र पर दो यातुधानों,
उत्तराभिमुख पत्र पर दो ऋषियों और ईशानाभिमुख पत्र पर एक ग्रह को स्थापित करे । द्विजवर्य ! गन्ध, माला,
चन्दन, धूप, दीप, नैवेद्य, सुपारी पान आदि वस्तुओं से उसकी पूजा करे ॥१-७॥

षोडशाधिकशततमोऽध्यायः ६३५
एवं संपूज्य होमं तु घृतेनाष्टशतं चरेत् । सूर्यस्याष्टाष्ट चान्येषां प्रदद्यादाहुतीः क्रमात् ॥८॥
नाममंत्रेण वेद्यां वा ततः पूर्णाहुति ददेत् । दक्षिणा च ततो देया द्विजेभ्यः शक्तितो द्विज ॥९॥
एतत्कृत्वा विधानं तु सर्वसौख्यमवाप्नुयात् । देहांते मण्डलं भानोर्भित्त्वा गच्छेद्वरं पदम् ॥१०॥
वैशाखशुक्लसप्तम्यां जह्नुना जाह्नवी स्वयम् । क्रोधात्पीता पुनस्त्यक्ता कर्णरंध्रात्तु दक्षिणात् ॥११॥
तां तत्र पूजयेत्स्नात्वा प्रत्यूषे विमले जले । गंधपुष्पाक्षताद्यैश्च सर्वैरैवोपचारकैः ॥१२॥
ततो घटसहस्रं तु देयं गंगाव्रते द्विजोत्तम । श्रद्धया कृतं सप्तकुलं नयेत्स्वर्गमसंशयः ॥१३॥
कमलव्रतमथ्यत्र प्रोक्तं तद्विधिरुच्यते । तिलपात्रं तु सौवर्णं विधाय कमलं शुभम् ॥१४॥
वस्त्रयुग्मावृतं कृत्वा गंधधूपादिनाऽर्चयेत् । नमस्ते पद्महस्ताय नमस्ते विश्वधारिणे ॥१५॥
दिवाकर नमस्तुभ्यं प्रभाकर नमोऽस्तु ते । इति संप्रार्थ्य देवेशं सूर्ये चास्तमुपागते ॥१६॥
सोदकुंभं तु तत्पद्मं कपिलां च द्विजेऽर्पयेत् । तद्दिने तूपवस्तव्यं भोक्तव्यं च परेऽहनि ॥१७॥
संभोज्य ब्राह्मणान्भक्त्या व्रतसाकल्यमाप्नुयात् । निंबव्रतं च तत्रैव तद्विधानं शृणुष्व मे ॥१८॥
निंबपत्रैः स्मृता पूजा भास्करस्य द्विजोत्तम । खल्कोल्कायति मंत्रेण प्रणवाद्येन नारद ॥१९॥
निंबपत्रं ततोऽश्नीयाच्छयीत भूमौ च वाग्यतः । द्विजान्वरेऽह्नि संभोज्य स्वयं भुञ्जीत बंधुभिः ॥२०॥
निंबपत्रव्रतं चैतत्कर्तॄणां सर्वसौख्यदम् । सप्तमी शर्कराख्येद्धा प्रोक्ता तच्चापि मे शृणु ॥२१॥
अमृतं पिबतो हस्तात्सूर्यस्यामृतबिन्दवः । निष्पेतुर्भुवि चौत्पन्नाः शालिमुद्गयवेक्षवः ॥२२॥
शर्करा च ततस्तस्मादिक्षुसारामृतोपमा । इष्टा रवेरतः पुण्या शर्करा हव्यकव्ययोः ॥२३॥

पूजनोपरान्त घृत से एक सौ आठ बार हवन करे । सूर्य तथा अन्यों को भी क्रमशः आठ-आठ आहुतियां
दे । पश्चात् नाम मन्त्र से वेदी में पूर्णाहुति देकर द्विजों को शक्त्यनुसार दक्षिणा दे । विधिपूर्वक ऐसा करने से
समस्त सुखों की प्राप्ति होती है और देहान्त होने पर वह जीव सूर्यमण्डल का भेदन कर परम पद को प्राप्त
करता है ॥९-१०॥ वैशाख-शुक्ल-सप्तमी में स्वयम् जह्नु ने क्रोध के मारे जाह्नवी को पीकर पुनः अपने दाहिने
कान के छिद्र से निकाल दिया । उस दिन गंगा के विमल जल में स्नान कर गन्ध, पुष्प, अक्षत आदि उपचारों
से उनकी पूजा करनी चाहिये । अनन्तर एक हजार घटदान करना चाहिये । इस गंगाव्रत के करने से सात कुल
तक स्वर्ग की प्राप्ति होती है, इसमें संशय नहीं । उस दिन कमलव्रत किया जाता है । उसका विधान सुनो । तिल
से भरे हुए पात्र में सुवर्णमय सुन्दर कमल रखकर उसे दो वस्त्रों से ढककर गन्ध, धूप आदि से अर्चना करे ।
पश्चात् "पद्महस्त ! आपको नमस्कार है । विश्वधारिन् ! आपको नमस्कार है । दिवाकर ! आपको नमस्कार है ।
प्रभाकर ! आपको नमस्कार है ।" इस प्रकार देवेश की प्रार्थना कर सूर्यास्त होने पर जलपूर्ण घट सहित वह
कमल और कपिलधेनु द्विज को समर्पित कर दे । उस दिन उपवास कर दूसरे दिन भोजन करना चाहिये ॥११-१७॥
भक्तिपूर्वक ब्राह्मणों को भोजन कराने से व्रत की पूर्णता होती है । उस तिथि को निंबव्रत भी कर सकते
हैं । उसकी विधि सुनो, विप्रवर्य ! प्रणव आदि में जोड़कर "खल्कोल्काय" इस मन्त्र को पढ़ते हुए निंबपत्रों से
भास्कर की पूजा करे । तदनन्तर नीम के पत्ते को खाकर वाक्संयमपूर्वक भूमि पर शयन करे । दूसरे दिन विप्रों
को खिलाकर बन्धुओं के साथ स्वयं भी भोजन करे ॥१८-२०॥ यह निंबव्रत भी कर्ताओं को सर्वसौख्य प्रदान
करता है । इस सप्तमी का नाम शर्करा है । उसके बारे में भी सुन लो । अमृत-पान करते हुये सूर्य की रश्मि से
अमृत की बूंदें टपक कर भूमि पर गिर पड़ीं । उनसे चावल, मूंग, यव और ईख की उत्पत्ति हुई । ईख से अमृतो-

६३६ नारदीयपुराणम्
शर्करासप्तमी चैव वाजिमेधफलप्रदा । सर्वदुःखोपशमनी पुत्रसंततिवर्धिनी ॥२४॥
अस्यां तु शर्करादानं शर्कराभोजनं तथा । कर्तव्यं हि प्रयत्नेन व्रतमेतद्रविप्रियम् ॥२५॥
यः कुर्यात्परया भक्त्या स वै सद्गतिमाप्नुयात् । ज्येष्ठे तु शुक्लसप्तम्यां जात इंद्रो रविः स्वयम् ॥२६॥
तं संपूज्य विधानेन सोपवासो जितेंद्रियः । स्वर्गतिं लभते विप्र देवेंद्रस्य प्रसादतः ॥२७॥
आषाढशुक्लसप्तम्यां विवस्वन्नाम भास्करः । जातस्तं तत्र संप्राच्र्यं गन्धपुष्पादिभिः पृथक् ॥२८॥
लभते सूर्यसायुज्यं विप्रेंद्रोत्र न संशयः । श्रावणे शुक्लसप्तम्यामव्यंगाख्यं व्रतं शुभम् ॥२९॥
कार्पासं तु चतुर्हस्तं सार्द्धं वस्त्रं हि गोपतेः । पूजांते प्रीतये देयं व्रतमेतच्छुभावहम् ॥३०॥
यदि चेद्धस्तयुक्तेयं तदा स्यात्पापनाशिनी । अस्यां दानं जपो होमः सर्वं चाक्षयतां व्रजेत् ॥३१॥
भाद्रे तु शुक्लसप्तम्याममुक्ताभरणव्रतम् । सोमस्य तु महेशस्य पूजनं चात्र कीर्तितम् ॥३२॥
गंगादिभिः षोडशभिरुपचारैः समर्चनम् । प्रार्थ्य प्रणम्य विसृजेत्सर्वकामसमृद्धये ॥३३॥
फलसप्तमिका चेयं तद्विधानमुदीर्यते । नारिकेरं च वृंताकं नारंगं बीजपूरकम् ॥३४॥
कूष्मांडं बृहतीपूगमिति सप्त फलानि वै । महादेवस्य पुरतो विन्यस्यापरदोरकम् ॥३५॥
सप्ततन्तुकृतं सप्तग्रंथियुक्तं द्विजोत्तम । संपूज्य परया भक्त्या धारयेद्वामके करे ॥३६॥
स्त्री नरो दक्षिणे चैव यावद्वर्षं समाप्यते । संभोज्य विप्रान्सप्तैव पायसेन विसृज्य तान् ॥३७॥
स्वयं भुंजीत मतिमान् व्रतपूर्तिहेतवे । फलानि तानि देयानि सप्तस्वपि द्विजेषु च ॥३८॥
षम शक्कर उत्पन्न हुआ । इसलिये शक्कर सूर्य को पसन्द है और हव्य-कव्य के लिये यह प्रशस्त माना जाता
है॥२१-२३॥ शर्करा सप्तमी अश्वमेघ के बराबर फल को देने वाली है। इससे समस्त दुःखों का नाश और
पुत्र-संतानों की वृद्धि होती है। उस तिथि में शक्कर का दान और भोजन करना चाहिये । यह रविप्रिय व्रत
यत्नपूर्वक करना चाहिये । जो व्यक्ति परम भक्ति से इस व्रत को करता है, उसकी सद्गति होती है ॥२४-२५॥
ज्येष्ठ-शुक्ल-सप्तमी में प्रभु भास्कर स्वयम् उत्पन्न हुए थे । इसलिए उस तिथि में इन्द्रिय-संयम और
उपवास करते हुए दिनकर की अर्चना करने से उनकी कृपा से स्वर्ग की प्राप्ति होती है । आषाढ-शुक्ल-सप्तमी
में विवश्वान् नामक सूर्य उत्पन्न हुए थे । विप्रेन्द्र ! उस दिन गंध, पुष्प आदि से उनकी पूजा करने से सूर्यसायुज्य-
मोक्ष की प्राप्ति होती है । श्रावण-शुक्ल-सप्तमी में पवित्र अव्यंग-व्रत करना चाहिये ॥२६-२९॥ उस दिन सूर्य
की पूजा कर साढ़े चार हाथ का वस्त्र भानुप्रीत्यर्थं दान करे। यह व्रत शुभावदायक है। यदि वह तिथि हस्त
नक्षत्र से संयुक्त हो तो वह पापनाशिनी होती है। उसमें किये गये दान, जप, होम सब कुछ अक्षय्य हो जाते
हैं। भाद्र-शुक्ल-सप्तमी में अमुक्ताभरणव्रत किया जाता है। उसमें सोम तथा महेश की पूजा करनी
चाहिये ॥३०-३२॥ गंगाजल आदि सोलह उपचारों से पूजन कर प्रार्थना एवम् प्रणाम करके सकल कामनाओं
की सिद्धि के लिये विसर्जन करे। वह तिथि फलसप्तमिका भी कहलाती है। इसका विधान सुनो—नारियल,
बैंगन, सन्तरा, बिजौरा, नींबू, कुम्हड़ा, छोटा बैंगन और सुपारी—इन सात फलों को महादेव के आगे रख कर
सात तंतुओं एवम् सात ग्रंथियों से युक्त डोरे का पूजन करके परम भक्ति से बाँयें हाथ में बाँध ले ॥३३-३६॥
स्त्री बायें हाथ में और पुरुष दाहिने हाथ में एक वर्ष तक उस डोरे को बाँधे रहे। व्रतपूर्ति के लिये बुद्धिमान्
व्यक्ति सात ब्राह्मणों को खीर खिला कर स्वयं भोजन करे । उक्त सातों विप्रों को फल देकर बिदा करे।

षोडशाधिकशततमोऽध्यायः ८३७
एवं तु सप्त वर्षाणि कृत्वोपास्य यथाविधि । सायुज्यं लभते विप्र महावेवस्य तद्व्रती ॥३९॥
आश्विने शुक्लपक्षे तु विजया शुभसप्तमी । तस्यां कृतस्नानपूजो वाचयित्वा द्विजोत्तमान् ॥४०॥
आरभ्य कापिलां गां च संपूज्य प्रार्थयेत्ततः । त्वामहं दद्मि कल्याणि प्रीयतामर्यमा स्वयम् ॥४१॥
पालय त्वं जगत्कृत्स्नं यतोऽसि धर्मसम्भवा । इत्युक्त्वो वेदविदुषे दत्त्वा कृत्वा च दक्षिणाम् ॥४२॥
नमस्कृत्य स्वयं विप्र विसृजेत्प्राशयेत्स्वयम् । पंचगव्यं व्रतं चेत्थं विधाय श्वो द्विजोत्तमान् ॥४३॥
भोजयित्वा स्वयं चाद्यात्तदन्नं द्विजशेषितम् । कृतं ह्येतद्व्रतं विप्र सुभाष्यं श्रद्धयान्वितः ॥४४॥
देवदेवप्रसादेन भुक्तिमुक्तिमवाप्नुयात् । अथ कार्तिकशुक्लायां शाकाख्यं सप्तमीव्रतम् ॥४५॥
तस्यां तु सप्तशाका निस्स्रवर्णकमलानि च । प्रदद्यात्सप्तविप्रेभ्यः शाकाहारस्ततः स्वयम् ॥४६॥
द्वितीयेऽह्नि द्विजान्भोज्य दत्त्वा तेभ्योऽन्नदक्षिणाम् । विसृज्य बंधुभिः सार्द्धं स्वयं भुञ्जीत वाग्यतः ॥४७॥
मार्गस्य सितसप्तम्यां मित्रव्रतमुदाहृतम् । यद्विष्णोर्दक्षिणं नेत्रं तदेव कृतवानिह ॥४८॥
अवित्यां कश्यपाज्जज्ञे मित्रो नामा दिवाकरः । अतोऽस्यां पूजनं तस्य यथोक्तविधिना द्विज ॥४९॥
कृत्वा द्विजान्भोजयित्वा सप्तैव मधुरादिना । सुवर्णदक्षिणां दत्त्वा विसृज्याश्नीत च स्वयम् ॥५०॥
कुर्व्वैतद्विधिना लोकं सुर्य्यस्य व्रजति ध्रुवम् । द्विजो ब्राह्म तथा शूद्रः सत्कुले जन्म चाप्नुयात् ॥५१॥
पौषस्य शुक्लसप्तम्यां व्रतं चाभयसंज्ञितम् । उपोष्य भानु त्रिःसंख्यं समभ्यर्च्य धरास्थितः ॥५२॥
क्षीरसिक्तान्नसंबद्धं मोदकं प्रस्थसंमितम् । द्विजाय दत्त्वा भोज्यान्सप्ताष्टमभ्यर्च्य दक्षिणाम् ॥५३॥


विप्र ! इस प्रकार सात वर्षों तक विधिवत् इस व्रत की आराधना करने से व्रती को शिव-सायुज्य-मोक्ष की प्राप्ति
होती है ॥३७-३९॥
आश्विन-शुक्लपक्ष की सप्तमी बहुत उत्तम है। उसमें स्नान-पूजा कर उत्तम द्विजों को आमंत्रित करे।
फिर कपिला गौ की पूजा कर उससे यह प्रार्थना करे-“कल्याणि ! मैं तुम्हें दे रहा हूँ, स्वयम् अर्यमा देव प्रसन्न
हों। तुम जगत् का पालन करो; क्योंकि तुम धर्म से उत्पन्न हुई हो।" इतना कहकर वेदवेत्ता को दक्षिणापूर्वक
उसे समर्पित कर नमस्कार करके विदा करे। पश्चात् स्वयं भोजन करे। दूसरे दिन उसी तरह पंचगव्यव्रत
करना चाहिये ॥४०-४३॥ ब्राह्मणों को बिना कर उनसे बचे अन्न को स्वयं भोजन करे। विप्र ! जो श्रद्धापूर्वक
इस व्रत को करता है, वह देवदेव की कृपा से मुक्ति-मुक्ति को प्राप्त करता है। कार्तिक-शुक्ल में शाक नामक
सप्तमीव्रत किया जाता है। उस दिन स्वर्णकमल सहित सात प्रकार के साग सात विप्रों को देकर व्रती स्वयं शाका-
हारी हो। दूसरे दिन ब्राह्मणों को भोजन कराकर उन्हें अन्न-दक्षिणा दे, पश्चात् भाई-बंधुओं के साथ मौन होकर
स्वयं भोजन करे ॥४४-४७॥
अगहन-शुक्ल-सप्तमी में मित्रव्रत कहा गया है। विष्णु का जो दाहिना नेत्र है, वही साकार होकर
कश्यप के तेज और अदिति के गर्भ से मित्र नामक दिवाकर के रूप में उत्पन्न हुआ है। द्विज ! इसलिये उस
तिथि में विधिपूर्वक भास्कर की पूजा करनी चाहिये। पश्चात् सात ब्राह्मणों को मधुर आदि भोजन कराकर
गुरु को दक्षिणापूर्वक विदा करके स्वयं भी भोजन करे। विधिवत् इस व्रत को करने से मनुष्य निःसंदेह सूर्य-
लोक को प्राप्त करता है और द्विज ब्राह्मणकुल में तथा शूद्र सत्कुल में जन्म लेता है ॥४८-५१॥
पौष-शुक्ल-सप्तमी में अभयव्रत करना चाहिये। उस दिन उपवास करते हुए तीनों संध्या सूर्य की अर्चना
करे। पश्चात् सात-आठ ब्राह्मणों को दूध और भात के योग से बने हुए मधुर सेर भर भिक्षा कर गौ या सुवर्ण
११८ ना० पु०

६३८ नारदीयपुराणम्
पृथिवीं वा सुवर्णं वा विसृज्याश्नीत च स्वयम् । अभयाख्यं व्रतं ह्येतत्सर्वस्याभयदं स्मृतम् ॥५४॥
मार्ताण्डाख्यं व्रतं नाम कथयंति द्विजाः परे । एकमेवेति च प्रोक्तमेकदैवत्या बुधैः ॥५५॥
माघे तु कृष्णसप्तम्यां व्रतं सर्वाप्तिसंज्ञकम् । समुपोष्य दिने तस्मिन्सम्पूज्यादित्यबिम्बकम् ॥५६॥
सौवर्णं गंधपुष्पाद्यैः कृत्वा रात्रौ च जागरम् । परेऽह्नि विप्रान्सम्भोज्य पायसेन तु सप्त वै ॥५७॥
दक्षिणां नालिकेराणि तेभ्यो दत्त्वा गुरुं ततः । सौवर्णं तु रवेर्बिम्बं युक्तं दक्षिणयाल्पया ॥५८॥
समर्प्य च भृशं प्रार्थ्य विसृज्याद्यात्स्वयं ततः । एतत्सर्वाप्तिदं नाम संप्रोक्तं सार्वकामिकम् ॥५९॥
व्रतस्यास्य प्रभावेण द्वैतं सिध्येद्धि सर्वथा । माघस्य शुक्लसप्तम्यामचलाख्यं व्रतं स्मृतम् ॥६०॥
त्रिलोचनजयंतीयं सर्वपापहरा स्मृता । रथाख्या सप्तमी चेयं चक्रवर्तित्वदायिनी ॥६१॥
अस्यां समर्च्य सवितुः प्रतिमां तु हैमीं,
हैमाश्वयुक्तथगां तु ददेत्सहैमाम् ॥
यो भावभक्तिसहितः स गतो हि लोकं, ॥६२॥
शम्भोः स मोदत इहापि च भुक्तभोगः
भास्करी सप्तमी चेयं कोटिभास्वद्ग्रहोपमा । अरुणोदयवेलायामस्यां स्नानं विधीयते ॥६३॥
अर्कस्य च बदर्याश्च सप्त सप्त दलानि वै । निधाय शिरसि स्नायात्सप्तजन्माघशांतये ॥६४॥
पुत्रप्रदं व्रतं चात्र प्राहादित्यः स्वयं प्रभुः । यो माघसितसप्तम्यां पूजयेन्मां विधानतः ॥६५॥
तस्याहं पुत्रतां यास्ये स्वांशेन भृशतोषिताः । तस्माज्जितेन्द्रियो भूत्वा समुपोष्य दिवानिशम् ॥६६॥
पूजयेदपरे चाह्नि होमं कृत्वा द्विजांस्ततः । दध्योदनेन पयसा पायसेन च भोजयेत् ॥६७॥
अनेन विधिना यस्तु कुरुते पुत्रसप्तमीम् । लभते स तु सत्पुत्रं चिरायुषमनामयम् ॥६८॥
दक्षिणा देकर बिदा करे । अनन्तर स्वयं भोजन करना चाहिये । यह अभयव्रत सबको अभयदान देता है । कुछ
विद्वान् ब्राह्मणों का कहना है कि उस दिन एक मार्तण्डव्रत ही किया जाता है, जिसके एक ही देवता हैं । माघ-
कृष्ण-सप्तमी में सर्वाप्तिसंज्ञक व्रत करना चाहिये ॥५२-५५३॥ उस दिन उपवास करते हुए गंध, पुष्प आदि से
स्वर्णमयो सूर्यप्रतिमा की पूजा कर रात्रि में जागरण करे । दूसरे दिन सात ब्राह्मणों को पायस-भोजन कराकर
उन्हें नारियल-दक्षिणा दे । पश्चात् गुरु को वह सूर्यप्रतिमा तथा अन्य दक्षिणा भी देकर प्रार्थनापूर्वक बिदा
करके स्वयं भोजन करे । यह सर्वाप्तिव्रत समस्त अभिलाषाओं को पूर्ण करने वाला है । इस व्रत के प्रभाव से
सर्वथा द्वैतसिद्धि होती है ॥५६-५६३॥ माघ शुक्ल-सप्तमी में अचलव्रत करना चाहिये । यह सप्तमी त्रिलोचनजयंती
नाम से प्रसिद्ध है, जो सकल पापों का नाश करने वाली है । यह रथसप्तमी भी कहलाती है, जो चक्रवर्तित्व देने
वाली है । उस तिथि में जो व्यक्ति भक्ति-भाव से सुवर्ण के अश्व से युक्त रथ पर अवस्थित सूर्य की स्वर्णमयी
प्रतिमा का पूजन कर ब्राह्मण को समर्पित करता है, वह इस लोक में समस्त भोगों को भोग कर शिवलोक
को जाता है तथा वहीं आनन्द करता है । यह सप्तमी भास्करी सप्तमी कहलाती है, जो करोड़ों देदीप्यमान
ग्रहों के तुल्य है ॥६०-६२३॥
इस तिथि को अरुणोदयवेला में स्नान करना चाहिये । सात जन्मों के पाप के नाश के लिये आक तथा
बेर के सात-सात पत्तों को शिर पर रख कर स्नान करे । स्वयं प्रभु आदित्य ने कहा है कि यह व्रत पुत्रदायक
है । जो व्यक्ति माघ-शुक्ल-सप्तमी में विधिपूर्वक मेरा पूजन करता है, उसके ऊपर में अत्यन्त प्रसन्न होकर अपने
अंश से उसका पुत्र होता हूँ । इसलिये इंद्रिय-संयमपूर्वक अहोरात्र उपवास करके भास्कर की अर्चना करे और
दूसरे दिन हवन करके ब्राह्मणों को दही-भात तथा खीर खिलाये । इस विधि से जो पुत्रसप्तमीव्रत करता है,

सप्तदशाधिकशततमोऽध्यायः ६३६
तपस्यशुक्लसप्तम्यां व्रतमर्कपुटं चरेत् । अर्कपत्रैर्यजेदर्कमर्कपत्राणि चाश्नुयात् ॥६८॥
अर्कनाम जपेच्छश्वदित्थं चार्कपुटव्रतम् । धनदं पुत्रदं चैतत्सर्वपापप्रणाशनम् ॥७०॥
त्रिवर्गदमिति प्राहुः केचिदेतद्व्रतं द्विज । यज्ञव्रतं तथाप्यन्ये विधिवद्धोमकर्मणा ॥७१॥
सर्वासु सर्वमासेषु सप्तमीषु द्विजोत्तमः । भास्कराराधनं प्रोक्तं सार्वकामिकमित्यलम् ॥७२॥
इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने चतुर्थपादे द्वादशमासस्थितसप्तमीव्रतनिरूपणं
नाम षोडशाधिकशततमोऽध्यायः ॥११६॥
सप्तदशाधिकशततमोऽध्यायः
सनातन उवाच
शुक्लाष्टम्यां चैत्रमासे भवान्याः प्रोच्यते जनिः । प्रदक्षिणशतं कृत्वा कार्यों यात्रामहोत्सवः ॥१॥
दर्शनं जगदम्बायाः सर्वानंदप्रदं नृणाम् । अत्रैवाशोककलिकाप्राशनं समुदाहृतम् ॥२॥
अशोककलिकाश्चाष्टौ ये पिबंति पुनर्वसौ । चैत्रे मासि सिताष्टम्यां नतेशोक मवाप्नुयुः ॥३॥
महाष्टमीति च प्रोक्ता देव्याः पूजाविधानतः । वैशाखस्य सिताष्टम्यां समुपोष्यात्र वारिणा ॥४॥
उसके दीर्घायु तथा नीरोग पुत्र उत्पन्न होता है ॥६३-६८॥ फाल्गुन-शुक्ल सप्तमी में अर्कपुटव्रत करना चाहिये ।
उस दिन आक के पत्तों से सूर्य की पूजाकर आक के पत्तों को ही खाये और निरन्तर रूप से सूर्य-नाम का जप
करे । इस प्रकार किया जाने वाला अर्कपुटव्रत धन तथा पुत्र को देने वाला और पाप का नाश करने वाला
है । द्विज ! कोई तो इस व्रत को त्रिवर्गदायक कहते हैं और कोई यज्ञव्रत । द्विजश्रेष्ठ ! सब मासों की समस्त
सप्तमियों में विधिपूर्वक हवन करके भास्कर की आराधना करने से सकल कामनायें पूर्ण होती हैं ॥६९-७२॥
श्री नारदीयपुराण के पूर्वार्ध में बृहदुपाख्यानयुक्त चतुर्थपाद में द्वादश मास स्थित सप्तमीव्रत निरूपण
नामक एक सौ सोलहवां अध्याय समाप्त ॥११६॥
अध्याय ११७
बारह मासों का अष्टमी-व्रत
सनातन बोले- चैत्रमास की शुक्लाष्टमी में पार्वती का जन्म हुआ था। उस दिन सौ बार प्रदक्षिणा
करके यात्रामहोत्सव करना चाहिये ॥१॥ जो ऐसा करता है, उसे जगदम्बा की कृपा से सब प्रकार के आनन्द
प्राप्त होते हैं। उसी दिन अशोक की कलियां भी खानी चाहिये । जो व्यक्ति पुनर्वसुनक्षत्र से युक्त चैत्र-शुक्ल-
अष्टमी में अशोक की आठ कलियों को खाता है, उसे शोक कभी नहीं होता । उसको महाष्टमी भी कहते हैं,
जिसमें देवी का विधानपूर्वक पूजन किया जाता है । वैशाख-शुक्ल-अष्टमी में उपवास करते हुए शुद्ध जल से

४४० नारदीयपुराणम्
स्नात्वापराजितां देवीं मांसीबालकवारिभिः । स्नापयित्वाऽर्च्य गन्धाद्यैर्नैवेद्यं शर्करामयम् ॥५५॥
कुमारामर्भोजयेच्चापि नवम्यां पारणाप्रतः । ज्योतिर्मयविमानेन भ्राजमानो यथा रविः ॥५६॥
लोकेषु विचरेद्विप्र देव्याश्चैव प्रसादतः । कृष्णाष्टम्यां ज्येष्ठमासे पूजयित्वा त्रिलोचनम् ॥५७॥
शिवलोके वसेत्कल्पं सर्वदेवनमस्कृतः । ज्येष्ठशुक्ले तथाऽष्टम्यां यो देवीं पूजयेन्नरः ॥५८॥
स विमानेन चरति गन्धर्वाप्सरसां गणैः । शुक्लाष्टम्यां तथाऽऽषाढे स्नात्वा चैवं निशांबुना ॥६८॥
तेनैव स्नापयेद्देवीं पूजयेच्च विधानतः । ततः शुद्धजलैः स्नाप्य विलिपेत्सेन्दुचन्दनैः ॥११०॥
नैवेद्यं शर्करोपेतं दत्त्वाऽऽचमनमर्पयेत् । भोजयित्वा ततो विप्रान्वत्त्वा स्वर्णं च दक्षिणाम् ॥१११॥
विसृज्य च ततः पश्चात्स्वयं भुंजीत वाग्यतः । एतद्व्रतं नरः कृत्वा देवीलोकमवाप्नुयात् ॥११२॥
नभःशुक्ले तथाष्टम्यां देवीमिष्ट्वा विधानतः । क्षीरेण स्नापयित्वा च मिष्टान्नं विनिवेदयेत् ॥११३॥
ततो द्विजान् भोजयित्वा परेऽह्नि स्वयमप्युत । भुक्त्वा समापयेदेतद्व्रतं संततिवर्धनम् ॥११४॥
नभोमासे सिताष्टम्यां दशाफलमिति व्रतम् । उपवासं तु संकल्प्य स्नात्वा कृत्वा च नैत्यिकम् ॥११५॥
तुलस्याः कृष्णवर्णाया दलैर्दशभिरर्चयेत् । कृष्णं विष्णुं तथाऽनन्तं गोविन्दं गरुडध्वजम् ॥११६॥
दामोदरं हृषीकेशं पद्मनाभं हरिं प्रभुम् । एतैश्च नामभिर्नित्यं कृष्णदेवं समर्चयेत् ॥११७॥
नमस्कारं ततः कुर्यात्प्रदक्षिणसमन्वितम् । एवं दशदिनं कुर्याद्व्रतानामुत्तमं व्रतम् ॥११८॥
आदौ मध्ये तथा चांते होमं कुर्याद्विधानतः । कृष्णमंत्रेण जुहुयाच्चरुणाऽष्टोत्तरं शतम् ॥११९॥
स्नान कर अभिनव जटामासी के रस से अपराजिता देवी का स्नपन करके गंध आदि से पूजन करे और शक्कर
नैवेद्य चढ़ाये । नवमीं में कुमारिका को भोजन कराकर स्वयं पारणा करे ॥२-५३॥ विप्र ! ऐसा करने वाला
व्यक्ति देवी की कृपा से ज्योतिर्मय विमान पर सूर्य की तरह चमकता हुए तीनों लोक में विचरण करता है।
ज्येष्ठ मास की कृष्णाष्टमी में शंकर की पूजा करने वाला मनुष्य सर्वदेवार्च्य होकर एक कल्प तक शिवलोक
में वास करता है । ज्येष्ठ-शुक्ल-अष्टमी में जो नर देवी की अर्चना करता है, वह गंधर्वों तथा अप्सराओं के साथ
विमान से विचरण करता है ॥६-८३॥
आषाढ़-शुक्ल-अष्टमी में निशांबु (रात को ही रखे जल) से स्नान कर उसी जल से देवी का स्नपन कर
विधिपूर्वक पूजा करे । तदनन्तर शुद्ध जल से पुनः स्नपन कर कर्पूर तथा चंदन का लेप करे, शक्कर का नैवेद्य
चढ़ाकर आचमनीय दे और ब्राह्मणों को भोजन कराकर सुवर्ण दक्षिणा देकर विदा करे । पश्चात् मौन होकर
स्वयं भोजन करे । इस व्रत के करने से देवीलोक की प्राप्ति होती है ॥९-१२॥ श्रावण-शुक्ल-अष्टमी में
विधानपूर्वक अंबा देवी की अर्चना कर दूध से स्नपन करके मिष्टान्न भोग लगाये । दूसरे दिन ब्राह्मणों को खिलाकर
स्वयं भोजन करे । इस तरह व्रत संपन्न करने से संतान की वृद्धि होती है। भादों की कृष्णाष्टमी में दशाफल
नामक व्रत करना चाहिये ॥१३-१४३॥ उस दिन उपवास करने का संकल्प कर नित्य स्नान आदि करके श्याम-
तुलसी के दश पत्रों से कृष्णदेव के कृष्ण विष्णु, अनन्त, गोविन्द, गरुडध्वज, दामोदर, हृषीकेश, पद्मनाभ,
हरि तथा प्रभु-इन नामों की पूजा करे । अनन्तर प्रदक्षिणा करके नमस्कार करे । इस प्रकार दश दिनों तक
इस उत्तम व्रत को करना चाहिये । आदि, मध्य और अन्त में कृष्णमंत्र को पढ़ते हुए चरु से एक सौ आठ बार
विधिपूर्वक हवन करे । होमांत में विद्वान् व्यक्ति सम्यक् प्रकार से बाचार्य का पूजन करे ॥१५-१६३॥ सोने या

सप्तदशाधिकशततमोऽध्यायः ६४१
होमांतं विधिना सम्यगाचार्य पूजयेत्सुधीः । सौवर्णे ताम्रपात्रे वा मृन्मये वेणुपात्रके ॥२०॥
तुलसीदलं सुवर्णेन कारयित्वा सुलक्षणम् । हैमीं च प्रतिमां कृत्वा पूजयित्वा विधानतः ॥२१॥
निधाय प्रतिमां पात्रे ह्याचार्याय निवेदयेत् । दातव्या गौः सवत्सा च वस्त्रालंकारभूषिता ॥२२॥
दशाहं कृष्णदेवाय पूरिका दश चार्पयेत् । ताश्च दद्याद्विजज्ञाय स्वयं वा भक्षयेद्व्रती ॥२३॥
शयनं च प्रदातव्यं यथाशक्ति द्विजोत्तम । दशमेऽह्नि ततो मूर्ति सद्रव्यां गुरवेऽर्पयेत् ॥२४॥
व्रतांत दशविप्रेभ्यः प्रत्येकं दश पूरिकाः । दद्यादेवं दशाब्दं तु कृत्वा व्रतमनुत्तमम् ॥२५॥
उपोष्य विधिना भूयात्सर्वकामसमन्वितः । अंते कृष्णस्य सायुज्यं लभते नात्र संशयः ॥२६॥
कृष्णजन्माष्टमी चेयं स्मृता पापहरा नृणाम् । केवलेनोपवासेन तस्मिञ्जन्मदिने हरेः ॥२७॥
सप्तजन्मकृतात्पापान्मुच्यते नात्र संशयः । उपवासी तिलैः स्नातो नद्यादौ विमले जले ॥२८॥
सुदेशे मंडपे कॢप्ते मंडलं रचयेत्सुधीः । तन्मध्ये कलशं स्थाप्य ताम्रजं वापि मृन्मयम् ॥२९॥
तस्योपरि न्यसेत्पात्रं ताम्रं तस्योपरि स्थिताम् । हैमीं वस्त्रयुगाच्छन्नां कृष्णस्य प्रतिमां शुभाम् ॥३०॥
पाद्याद्यैरुपचारैस्तु पूजयेत्स्निग्धमानसः । देवकीं वसुदेवं च यशोदां नंदमेव च ॥३१॥
व्रजं गोपांस्तथा गोपींगश्च दिक्षु समर्चयेत् । तत आरातिकं कृत्वा क्षमाप्यानम्य भक्तितः ॥३२॥
तिष्ठेत्तथैवार्द्धरात्रे पुनः संस्थापयेद्धरिम् । पंचामृतैः शुद्धजलैर्गंधाद्यैः पूजयेत्पुनः ॥३३॥
धान्याकं च यवानीं च शुंठीं खंडं च नारद । साज्यं रौप्ये धृतं पात्रे नैवेद्यं विनिवेदयेत् ॥३४॥
पुनरारातिकं कृत्वा दशधा रूपधारिणम् । विचिंतयन्मृगांकाय दद्यादर्घ्यं समुद्यते ॥३५॥
ताँबे या मिट्टी या बाँस के पात्र में सुवर्ण के मनोहर तुलसीदल से सुवर्णमयी प्रतिमा को विधिवूर्वक पूजा कर
आचार्य को आमंत्रित करके वस्त्र तथा अलंकारों से विभूषित सवत्सा गौ उन्हें प्रदान करे ॥२०-२२॥
कृष्णदेव को दश पूरियाँ चढ़ाकर किसी विद्वान् को दे दे या स्वयं भक्षण करे । द्विजवर्य ! यथा-शक्ति
शय्यादान भी करना चाहिये । दशवें दिन द्रव्य सहित वह मूर्ति गुरु को अर्पित करे। व्रतांत में दश विप्रों को
दश-दश पूरियाँ समर्पित करनी चाहिये । इस प्रकार दश वर्षों तक उपवास करके विधिवूर्वक इस व्रत को संपन्न
करने से सकल कामनायें पूर्ण होती हैं। अंत में कृष्णसायुज्यमोक्ष मिलता है, इसमें संशय नहीं ॥२३-२६॥
यह कृष्णाष्टमी मनुष्यों के पाप को नष्ट करने वाली है। इस दिन केवल उपवास करने से सात जन्मों का
पाप नष्ट हो जाता है, इसमें संदेह करने की आवश्यकता नहीं। उपवासी जन तिल का तेल लगाकर नदी आदि
के विमल जल में स्नान करे। तदनन्तर सुन्दर प्रदेश में बनाये हुए मंडप में मंडल की रचना करे । उसके मध्य
में ताँबे या मिट्टी के कलश की स्थापना कर उसके ऊपर ताँबे के पात्र में कृष्ण की मनोहर स्वर्ण प्रतिमा
को स्थापित करे ॥२७-३०॥
उस मूर्ति को एक जोड़े वस्त्र से ढक कर पाद्य आदि उपचारों से श्रद्धापूर्वक पूजन करे। पश्चात् सब
दिशाओं में देवकी; वसुदेव, यशोदा, नंद, व्रज, गोप, गोपी तथा गायों की अर्चना कर आरती करे । फिर
भक्तिपूर्वक क्षमाप्रार्थना कर प्रणाम करे। अर्धरात्रि के समय ही उठकर पंचामृत तथा शुद्ध जल से हरि को स्नान
कराकर गंध आदि से पुनः पूजन करे ॥३१-३३॥ नारद ! उन्हें धान्याक, यव, सोंठ, चीनी तथा घी चाँदी के
पात्र में रखकर नैवेद्य चढ़ाये, पुनः आरती करके उनके दश स्वरूपों का ध्यान करते हुए चंद्रमा को अर्घ्य दे ।
तदनन्तर व्रती देवेश से क्षमायाचना कर पौराणिक स्तोत्रपाठ तथा गीत-वाद्यों से रात्रि के अवशेष भाग को

यहाँ पृष्ठ का पूर्ण देवनागरी पाठ (ट्रांसक्रिप्शन) दिया गया है:

९४२ नारदीयपुराणम्
ततः क्षमाप्य देवेशं रात्रिखंडं नयेद्व्रती । पौराणिकैः स्तोत्रपाठैर्गीतवाद्यैरनेकधा ॥३६॥
ततः प्रभाते विप्राग्र्यान्भोजयेन्मधुरान्नकैः । दत्त्वा च दक्षिणां तेभ्यो विसृजेत्तुष्टमानसः ॥३७॥
ततस्तां प्रतिमां विष्णोः स्वर्णधेनुधरा न्विताम् । गुरवे दक्षिणां दत्त्वा विसर्ज्याश्नीत च स्वयम् ॥३८॥
दारापत्यसुहृद्भृत्यैरेवं कृत्वा व्रतं नरः । साक्षाद्गोलोकमाप्नोति विमानवरमास्थितः ॥३९॥
नैतेन सदृशं चान्यद्व्रतमस्ति जगत्त्रये । कृतेन येन लभ्येत कोट्य कादशकं फलम् ॥४०॥
शुक्लाष्टम्यां । नभस्यस्य कुर्याद्राधाव्रतं नरः । पूर्ववद्राधिकां हैमीं कलशस्थां प्रपूजयेत् ॥४१॥
मध्याह्ने पूजयित्वेनामेकभक्तं समाचरेत् । शक्तो भवत्तश्रोपवासं परेऽह्नि विधिना ततः ॥४२॥
सुवासिनीर्भोजयित्वा गुरवे प्रतिमार्पणम् । कृत्वा स्वयं च भुंजीत व्रतमेवं समापयेत् ॥४३॥
व्रतेनानेन विप्रर्षे कृतेन विधिना व्रती । रहस्यं गोष्ठजं लब्ध्वा राधापरिकरे वसेत् ॥४४॥
दूर्वाष्टमीव्रतं चात्र कथितं तच्च मे शृणु । शुचौ देशे प्रजातायां दूर्वायां द्विजसत्तम ॥४५॥
स्थाप्य लिंगं ततो गंधैः पुष्पैर्धूपैश्च दीपकैः । नैवेद्यैरर्चयेद्भक्त्या दध्यक्षतफलादिभिः ॥४६॥
अर्घ्यं प्रदद्यात्पूजांते मंत्राभ्यां सुसमाहितः । त्वं दूर्वेऽमृतजन्माऽसि सुरासुरनमस्कृते ॥४७॥
सौभाग्यं संततिं देहि सर्वकार्यकरी भव । यथा शाखाप्रशाखाभिर्विस्तृताऽसि महीतले ॥४८॥
तथा विस्तृतसंतानं देहि मेऽप्यजरामरम् । ततः प्रदक्षिणीकृत्य विप्रान्संभोज्य तत्र वै ॥४९॥
भुक्त्वा स्वयं गृहं गच्छेदृष्ट्वा विप्रेषु दक्षिणाम् । फलानि च प्रशस्तानि मिष्टानि सुरभीणि च ॥५०॥
एवं पुण्या पापहरा नृणां दूर्वाष्टमी द्विज । चतुर्णामपि वर्णानां स्त्रीजनानां विशेषतः ॥५१॥


बिताये । प्रातःकाल उत्तम ब्राह्मणों को मिष्टान्न भोजन करा कर दक्षिणा देकर प्रसन्न मन से विदा
करे ॥३४-३७॥ तदुपरान्त सुवर्ण की धेनु-प्रतिमा सहित वह मूर्ति गुरु को दक्षिणा देकर बिदा करके स्त्री, पुत्र,
मित्र तथा भृत्यों के साथ स्वयं भोजन करे । इस प्रकार व्रत करने वाला मानव उत्तम विमान पर चढ़कर
साक्षात् गोलोक को जाता है । तीनों लोक में इस व्रत के समान दूसरा व्रत नहीं है । इसके करने से एक करोड़
एकादशी व्रत करने का फल मिलता है ॥३८-४०॥ भादों के शुक्ल पक्ष की अष्टमी में मनुष्य को राधाव्रत करना
चाहिये । पहिले की तरह राधा की स्वर्णमयी प्रतिमा को कलश पर रख कर पूजा करे । मध्याह्न में
इनकी पूजा कर एक भुक्त करे । व्रती यदि उपवास कर सके तो बहुत अच्छा । दूसरे दिन सौभाग्यवती वनिताओं
को खिलाकर प्रतिमा गुरु को समर्पित करके स्वयं भोजन करे । इस तरह व्रत की समाप्ति होती है । विप्रर्षे !
विधिपूर्वक इस व्रत के करने से मनुज व्रज के रहस्य को जान कर राधा के समीप वास करता है ॥४१-४४॥
द्विजश्रेष्ठ ! उक्त तिथि में दूर्वाष्टमीव्रत भी किया जाता है, उसका विधान मुझसे सुन लो । पवित्र स्थान
में उत्पन्न हुए दूर्वा पर शिवलिंग की स्थापना कर गंध, पुष्प, धूप, दीप तथा दही, अक्षत और फल के नैवेद्य
से उनकी पूजा करके अर्घ्य प्रदान करे । पूजांत में समाहित चित्त होकर "•••••त्वं दूर्वे !•••••भव"
"यथा••••••••अजरामरम्" इन दो मंत्रों को पढ़ते हुए प्रदक्षिणा करे ॥४५-४६॥ पश्चात् सुन्दर,
सुगंधित तथा मीठे फल खिलाकर उन्हें दक्षिणा दें और स्वयं भी भोजन करे, द्विज ! यह दूर्वाष्टमी मनुष्यों
को पुण्य देने वाली तथा पाप नाश करने वाली है । इस व्रत को चारों वर्ण के लोग कर सकते हैं । विशेष

सप्तदशाधिकशततमोऽध्यायः ६४३
या न पूजयते दूर्वा नारी मोहाद्यथाविधि । जन्मानि त्रीणि वैधव्यं लभते सा न संशयः ॥५२॥
यदा ज्येष्ठर्क्षसंयुक्ता भवेच्चैवाष्टमी द्विज । ज्येष्ठा नाम्नी तु सा ज्ञेया पूजिता पापनाशिनी ॥५३॥
अथैनां तु समारभ्य व्रतं षोडशवासरम् । महालक्ष्म्‍याः समुद्दिष्टं सर्वसंपद्विवर्धनम् ॥५४॥
करिष्येऽहं महालक्ष्मीव्रतं ते त्वत्परायणः । तवविघ्नेन मे यातु समाप्ति त्वत्प्रसादतः ॥५५॥
इत्युच्चार्य ततो बद्ध्वा डोरकं दक्षिणे करे । षोडशग्रंथिसहितं गुणैः षोडशभिर्युतम् ॥५६॥
ततोऽन्वहं महालक्ष्मीं गंधाद्यैरर्चयेद्व्रती । यावत्कृष्णाष्टमी तत्र चरेदुद्यापनं सुधीः ॥५७॥
वस्त्रमंडपिकां कृत्वा सर्वतोभद्रमंडले । कलशं सुप्रतिष्ठाप्य दीपमुद्द्योतयेत्ततः ॥५८॥
उत्तार्य डोरकं बाहोः कुंभस्याधो निवेशयेत् । चतस्रः प्रतिमाः कृत्वा सौवर्णीस्तत्स्वरूपिणीः ॥५९॥
स्नपनं कारयेत्तासां जलैः पञ्चामृतैस्तथा । उपचारैः षोडशभिः पूजयित्वा विधानतः ॥६०॥
जागरस्तत्र कर्तव्यो गीतवादित्रनिःस्वनैः । ततो निशीथे संप्राप्तेऽभ्युदितेऽमृतदीधितौ ॥६१॥
वस्त्रार्घ्यं बंधनं द्रव्यैः श्रीखंडाद्यैर्विधानतः । चन्द्रमण्डलसंस्थायै महालक्ष्म्यै प्रदापयेत् ॥६२॥
क्षीरोदार्णवसंभूतं महालक्ष्मीसहोदर । पीयूषधाम रोहिण्याः सहितोऽर्घ्यं गृहाण मे ॥६३॥
क्षीरोदार्णवसभूते कमले कमलालये । विष्णोर्वक्षःस्थलस्थे मे सर्वकामप्रदा भव ॥६४॥
एकनाथे जगन्नाथे जमदग्निप्रियेऽव्यये । रेणुके त्राहि मां देवि राममातः शिवं कुरु ॥६५॥
मंत्रैरेतैर्महालक्ष्मीं प्रार्थ्य श्रोत्रिययोषितः । सम्यक्संपूज्य ताः सम्यग्गंधयावककज्जलैः ॥६६॥
संभोज्य जुहुयादग्नौ बिल्वपद्मकपायसैः । तदलाभे घृतैर्विप्र गृहेभ्यः समिधस्तिलान् ॥६७॥
मृत्युंजयाय च परं सर्वरोगप्रशांतये । चंदनं तालपत्रं च पुष्पमालां तथाऽक्षतान् ॥६८॥
करके स्त्रियों को यह करना चाहिए । जो नारी मोह वश विधिपूर्वक इस व्रत को नहीं करती है वह तीन जन्मों
तक विधवा होती है, इसमें संशय नहीं ॥५०-५२॥ विप्र जब यह अष्टमी ज्येष्ठा नक्षत्र से संयुक्त हो तब इसका नाम
ज्येष्ठाष्टमी समझना चाहिये । यह पापनाशिनी है । इस दिन से लेकर सोलह दिनों तक सर्वसंपत्तिवर्धक
महालक्ष्मीव्रत करना चाहिये । "महालक्ष्मि ! मैं एकनिष्ठ होकर आपका व्रत करूंगा । आपकी कृपा से वह
निर्विघ्न समाप्त हो ।"--यह कहकर दाहिनी भुजा में सोलह ग्रंथियों तथा सोलह गुणों से युक्त डोरा बाँधे ।
वस्त्र का मंडप निर्माण कर सर्वतोभद्रमंडल में कलश की स्थापना करके दीपक बनाये ॥५३-५८॥ भुजा-बाँह से
डोरक निकाल कर कलश के नीचे रख दे । सुवर्ण की एक जैसी चार प्रतिमाओं को वहाँ स्थापित कर पंचामृत
से स्नपन करे । अनन्तर विधिपूर्वक षोडशोपचार पूजन कर गाना-बजाना करते हुए जागरण करे । रात्रि में
चंद्रोदय होने पर "क्षीरोदार्णवसंभूत । ...........में" इस मंत्र को पढ़ते हुए श्रीखंड आदि द्रव्यों से
विधिपूर्वक चंद्रमंडलस्थित महालक्ष्मी को अर्घ्य दे । तदनन्तर क्षीरसागर से उत्पन्न होने वाली ! कमले !
कमलासये ! विष्णु के वक्षःस्थल पर अवस्थित होने वाली ! मेरी समस्त कामनाओं को पूर्ण कीजिये । एकनाथे !
जगन्नाथे ! जमदग्निप्रिये ! रेणुके ! मेरी रक्षा कीजिये । राममातः ! मेरा कल्याण कीजिये ।"--इस तरह
महालक्ष्मी की प्रार्थना कर छत्र, अलता, अंजन आदि से श्रोत्रिय ब्राह्मण की पत्नियों का सम्मान करते हुए उन्हें
भोजन कराये । पश्चात् बेल, कमल तथा पायस से अग्नि में हवन करे ॥५९-६६॥ यदि उनका अभाव हो
तो घी, लकड़ी तथा तिल से होम करे । अखिल रोगों के नाश के लिये मृत्युंजय की आहुतियां दे । व्रती नये सूप में
चंदन, तालपत्र, पुष्पमाला, अक्षत, दुर्वा, कुसुम के रंग में रंगा सूत, दो बिल्वफल और विविध भक्ष्य पदार्थों को

६४४ नारदीयपुराणम्

दूर्वां कौसुम्भसूत्रं च युगं श्रीफलमेव वा । भक्ष्याणि च नवे शूर्पे प्रतिद्रव्यं तु षोडश ॥६६॥
समाच्छाद्यान्यशूर्पेण व्रती दद्यात्समन्त्रकम् । क्षीरोदार्णवसंभूता लक्ष्मीश्चन्द्रसहोदरा ॥७०॥
व्रतेनानेन संतुष्टा भवताद्विष्णुवल्लभा । चतस्रः प्रतिमास्तास्तु श्रोत्रियेभ्यः समर्पयेत् ॥७१॥
ततस्तु चतुरो विप्रान् षोडशापि सुवासिनीः । मिष्टान्नेनाशयित्वा तु विसृजेत्ताः सदक्षिणाः ॥७२॥
समाप्तिनियमः पश्चाद्भुञ्जीतेष्टैः समन्वितः । एतद्व्रतं महालक्ष्म्याः कृत्वा विप्र विधानतः ॥७३॥
मुक्त्वैष्टानेहिकान् कामाँल्लक्ष्मीलोके वसेच्चिरम् । एषाऽशोकाष्टमी चोक्ता यस्यां पूर्णं रमाव्रतम् ॥७४॥
अत्राशोकस्य पूजा स्यादेकभक्तं तथा स्मृतम् । कृत्वाऽशोकव्रतं नारी ह्यशोका शोकजन्मनि ॥७५॥
यत्र कुत्रापि संजाता नाव कार्या विचारणा । आश्विने शुक्लपक्षे तु प्रोक्ता विप्र महाष्टमी ॥७६॥
तत्र दुर्गाचनं प्रोक्तं सर्वैरप्युपचारकैः । उपवासं चैकभक्तं महाष्टम्यां विधाय तु ॥७७॥
सर्वतो विभवं प्राप्य मोदते देववच्चिरम् । ऊर्जे कृष्णादिकेऽष्टम्यां करकाख्यं व्रतं स्मृतम् ॥७८॥
तत्रोमासहितः शंभुः पूजनीयः प्रयत्नतः । चंद्रोदयेऽर्घ्यदानं च विधेयं व्रतिभिः सदा ॥७६॥
पुत्रं सर्वगुणोपेतमिच्छद्भिर्विविधं सुखम् । गोपाष्टमीति संप्रोक्ता कार्तिके धवले दले ॥८०॥
तत्र कुर्याद्गवां पूजां गोत्रासं गोप्रदक्षिणाम् । गवानुगमनं दानं वाञ्छन्सर्वाश्च संपदः ॥८१॥
कृष्णाष्टम्यां मार्गशीर्षे मिथुनं दर्भनिर्मितम् । अनघां चानघं तत्र बहुपुत्रसमन्वितम् ॥८२॥
स्थापयित्वा शुभे देशे गोमयेनोपलेपिते । पूजयेद्गन्धपुष्पाद्यैरुपचारैः पृथग्विधैः ॥८३॥
संभोज्य द्विजदांपत्यं विसृजेल्लब्धदक्षिणम् । व्रतमेतन्नरः कृत्वा नारी वा विधिपूर्वकम् ॥८४॥
पुत्रं सल्लक्षणोपेतं लभते नात्र संशयः ॥८५॥


रख उन्हें दूसरे सूप से ढककर "क्षीरोदार्णवसंभूता............" इस मंत्र को पढ़ते हुए दान कर दे । वे चारों
मूर्तियां श्रोत्रिय ब्राह्मणों को समर्पित करे ॥६७-७१॥ तदुपारन्त चार विप्रों और सोलह सधवाओं को मिष्टान्न
भोजन करा कर दक्षिणापूर्वक विदा करे । व्रत-समाप्ति के बाद इष्ट-मित्रों के साथ भोजन करे । विप्र ! महालक्ष्मी
के इस व्रत को विधिपूर्वक करने से मनुष्य ऐहलोकिक भोगों को भोग कर चिरकाल तक लक्ष्मीलोक में वास करता
है । इसका नाम अशोकाष्टमी भी है, जिसमें रमा व्रत संपन्न किया जाता है । इस दिन अशोक की पूजा कर
एकभुक्त करना चाहिये । जो नारी अशोक व्रत करती है, उसे जन्मान्तर में कभी शोक नहीं होता, यह निःसंदेह
है ॥७२-७५३॥ विप्र ! आश्विन-शुक्ल-पक्ष में महाष्टमीव्रत कहा गया है । उस दिन अखिल उपचारों से दुर्गा
की आराधना करनी चाहिए । महाष्टमी में उपवास तथा (उसके पूर्व दिन) एकभुक्त ही करे । जो ऐसा करता
है, वह सकल विभवों को प्राप्त कर चिरकाल तक देवताओं के समान आनन्द करता है ॥७६-७७३॥
कार्तिक-कृष्ण-अष्टमी में करकव्रत किया जाता है । उस दिन उमा सहित शंकर की विधिपूर्वक अर्चना
करनी चाहिए । विविध सुख तथा सर्वगुण संपन्न पुत्र का इच्छुक व्रती चंद्रोदय होने पर अर्घ्य दान दे । कार्तिक
शुक्ल-अष्टमी का नाम गोपाष्टमी है । उस दिन गो-पूजन विहित है । गोओं को ग्रास देकर उनकी प्रदक्षिणा
तथा अनुगमन करे और दान दे । ऐसा करने से सकल संपत्तियों का लाभ होता है ॥७८-८१॥ अगहन-कृष्ण
अष्टमी में कुशों की अनेक मूर्तियों को जिनमें दो दम्पति की और अन्य पुत्रों की हों, गोबर से लीपकर पवित्र
स्थान में स्थापित करके गंध, पुष्प आदि उपचारों से उनकी पूजा करे । पश्चात् द्विजदंपती को खिलाकर
दक्षिणा देकर उन्हें विदा करे । विधिपूर्वक इस व्रत को करने वाला नर या नारी सर्वलक्षणयुक्त पुत्र की

सप्तदशाधिकशततमोऽध्यायः ६४५
मार्गशीर्षसिताष्टम्यां कालभैरवसन्निधौ । उपोष्य जागरं कृत्वा महापापैः प्रमुच्यते ॥८६॥
यत्किंचिदशुभं कर्म कृतं मानुषजन्मनि । तत्सर्वं विलयं याति कालभैरवदर्शनात् ॥८७॥
अथ पौषसिताष्टम्यां श्राद्धमष्टकसंज्ञितम् । पितॄणां तृप्तिदं वर्षं कुलसंततिवर्धनम् ॥८८॥
शुक्लाष्टम्यां तु पौषस्य शिवं सम्पूज्य भक्तितः । भुक्तिमुक्तिमवाप्नोति भक्तिमेकां समाचरन् ॥८९॥
कृष्णाष्टम्यां तु माघस्य भद्रकालीं समर्चयेत् । भक्तितो वैरिबृन्दघ्नीं सर्वकामप्रदायिनीम् ॥९०॥
माघमासे सिताष्टम्यां भीष्मं संतर्पयेद्विज । संतति त्वव्यबच्छिन्नामिच्छंश्चाप्यपराजयाम् ॥९१॥
फाल्गुने त्वसिताष्टम्यां भीमां देवीं समर्चयेत् । तत्र व्रतपरो विप्र सर्वकामसमृद्धये ॥९२॥
शुक्लाष्टम्यां फाल्गुनस्य शिवं चापि शिवां द्विज । गंधाद्यैः सम्यगभ्यर्च्य सर्वसिद्धीश्वरो भवेत् ॥९३॥
फाल्गुनापरपक्षे तु शीतलामष्टमीदिने । पूजयेत्सर्वपक्वान्नैः सप्तम्यां विधिवत्कृतैः ॥९४॥
शीतले त्वं जगन्माता शीतले त्वं जगत्पिता । शीतले त्वं जगद्धात्री शीतलायै नमोनमः ॥९५॥
वन्देऽहं शीतलां देवीं रासभस्थां दिगम्बराम् । मार्जनीकलशोपेतां विस्फोटकविनाशिनीम् ॥९६॥
शीतले शीतले चेत्थं ये जपंति जले स्थिताः । तेषां तु शीतला देवी स्याद्विस्फोटकशांतिदा ॥९७॥
इत्येवं शीतलामन्त्रैयैः समर्चयते द्विज । तस्य वर्षं भवेच्छांतिः शीतलायाः प्रसादतः ॥९८॥
सर्वमासोभये पक्षे विधिवच्चाष्टमीदिने । शिवां वापि शिवं प्रार्च्य लभते वांछितं फलम् ॥९९॥
इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने चतुर्थपादे द्वादशमासस्थिताष्टमीव्रतकथनं
नाम सप्तदशाधिकशततमोऽध्यायः ॥११७॥

प्राप्त करती है, इसमें संशय नहीं। अगहन-शुक्ल-अष्टमी को कालभैरव के समीप उपवासपूर्वक जागरण करने
से महापातक का नाश होता है ॥८२-८६॥ मनुष्य-जन्म में जो कुछ भी कुत्सित कर्म किया जाता है, वह
कालभैरव के दर्शन से विलीन हो जाता है। पौष-कृष्ण-अष्टमी में अष्टकाश्राद्ध करने से एक वर्ष तक पितरों की
तृप्ति मिलती है तथा वंश की वृद्धि होती है। पौष-शुक्ल-अष्टमी में भक्तिपूर्वक शिव की पूजा करने से भोग
मोक्ष की प्रप्ति होती है। माघ की कृष्णाष्टमी में शत्रुसमूह का नाश करने वाली तथा समस्त कामनाओं को
पूर्ण करने वाली भद्रकाली की अर्चना करनी चाहिये ॥८७-९०॥ द्विज ! माघ-शुक्ल-अष्टमी में भीष्म तर्पण
करने से अक्षय्य वंश तथा विजय की प्राप्ति होती है। फाल्गुन-कृष्ण-अष्टमी में भीमा देवी की अर्चना करने से सकल
कामनायें पूर्ण होती हैं। द्विज ! फाल्गुन-शुक्ल-अष्टमी में गंध, पुष्प आदि से शिव तथा गौरी की अच्छी तरह
पूजा करने से मनुष्य सकल सिद्धियों का स्वामी होता है ॥९१-९३॥ फाल्गुन शुक्ल की अष्टमी में पूजा, पकवान
आदि से विधिपूर्वक शीतलादेवी की अर्चना करे। पकवान आदि सप्तमी को ही बना लेना चाहिए। जो व्यक्ति
"शीतले !......" इस मंत्र से शीतला देवी की आराधना करता है, उसका अरिष्ट शांत हो जाता है।
जो व्यक्ति जल में खड़ा होकर, गधे पर चढ़ने वाली, नंगी रहने वाली, हाथ में झाडू तथा कलश रखने वाली
और विस्फोट रोगों का नाश करने वाली शीतला देवी का ध्यान करते हुए 'शीतला, शीतला' जपता है, उसे
विस्फोट (फोड़ा) का भय नहीं होता। समस्त मासों के दोनों पक्षों की अष्टमियों में शिव या पार्वती का पूजन
करने वाला मनुज वांछित फल को प्राप्त करता है ॥९४-९९॥
श्री नारदीयपुराण के पूर्वार्ध में बृहदुपाख्यानयुक्त चतुर्थपाद में द्वादश-मास-स्थित-अष्टमी-व्रत-कथन नामक
एक सौ सत्रहवां अध्याय समाप्त ॥११७॥
११९ न० पु०