बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 956, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ेंषोडशाधिकशततमोऽध्यायः ८३७
एवं तु सप्त वर्षाणि कृत्वोपास्य यथाविधि । सायुज्यं लभते विप्र महावेवस्य तद्व्रती ॥३९॥
आश्विने शुक्लपक्षे तु विजया शुभसप्तमी । तस्यां कृतस्नानपूजो वाचयित्वा द्विजोत्तमान् ॥४०॥
आरभ्य कापिलां गां च संपूज्य प्रार्थयेत्ततः । त्वामहं दद्मि कल्याणि प्रीयतामर्यमा स्वयम् ॥४१॥
पालय त्वं जगत्कृत्स्नं यतोऽसि धर्मसम्भवा । इत्युक्त्वो वेदविदुषे दत्त्वा कृत्वा च दक्षिणाम् ॥४२॥
नमस्कृत्य स्वयं विप्र विसृजेत्प्राशयेत्स्वयम् । पंचगव्यं व्रतं चेत्थं विधाय श्वो द्विजोत्तमान् ॥४३॥
भोजयित्वा स्वयं चाद्यात्तदन्नं द्विजशेषितम् । कृतं ह्येतद्व्रतं विप्र सुभाष्यं श्रद्धयान्वितः ॥४४॥
देवदेवप्रसादेन भुक्तिमुक्तिमवाप्नुयात् । अथ कार्तिकशुक्लायां शाकाख्यं सप्तमीव्रतम् ॥४५॥
तस्यां तु सप्तशाका निस्स्रवर्णकमलानि च । प्रदद्यात्सप्तविप्रेभ्यः शाकाहारस्ततः स्वयम् ॥४६॥
द्वितीयेऽह्नि द्विजान्भोज्य दत्त्वा तेभ्योऽन्नदक्षिणाम् । विसृज्य बंधुभिः सार्द्धं स्वयं भुञ्जीत वाग्यतः ॥४७॥
मार्गस्य सितसप्तम्यां मित्रव्रतमुदाहृतम् । यद्विष्णोर्दक्षिणं नेत्रं तदेव कृतवानिह ॥४८॥
अवित्यां कश्यपाज्जज्ञे मित्रो नामा दिवाकरः । अतोऽस्यां पूजनं तस्य यथोक्तविधिना द्विज ॥४९॥
कृत्वा द्विजान्भोजयित्वा सप्तैव मधुरादिना । सुवर्णदक्षिणां दत्त्वा विसृज्याश्नीत च स्वयम् ॥५०॥
कुर्व्वैतद्विधिना लोकं सुर्य्यस्य व्रजति ध्रुवम् । द्विजो ब्राह्म तथा शूद्रः सत्कुले जन्म चाप्नुयात् ॥५१॥
पौषस्य शुक्लसप्तम्यां व्रतं चाभयसंज्ञितम् । उपोष्य भानु त्रिःसंख्यं समभ्यर्च्य धरास्थितः ॥५२॥
क्षीरसिक्तान्नसंबद्धं मोदकं प्रस्थसंमितम् । द्विजाय दत्त्वा भोज्यान्सप्ताष्टमभ्यर्च्य दक्षिणाम् ॥५३॥
विप्र ! इस प्रकार सात वर्षों तक विधिवत् इस व्रत की आराधना करने से व्रती को शिव-सायुज्य-मोक्ष की प्राप्ति
होती है ॥३७-३९॥
आश्विन-शुक्लपक्ष की सप्तमी बहुत उत्तम है। उसमें स्नान-पूजा कर उत्तम द्विजों को आमंत्रित करे।
फिर कपिला गौ की पूजा कर उससे यह प्रार्थना करे-“कल्याणि ! मैं तुम्हें दे रहा हूँ, स्वयम् अर्यमा देव प्रसन्न
हों। तुम जगत् का पालन करो; क्योंकि तुम धर्म से उत्पन्न हुई हो।" इतना कहकर वेदवेत्ता को दक्षिणापूर्वक
उसे समर्पित कर नमस्कार करके विदा करे। पश्चात् स्वयं भोजन करे। दूसरे दिन उसी तरह पंचगव्यव्रत
करना चाहिये ॥४०-४३॥ ब्राह्मणों को बिना कर उनसे बचे अन्न को स्वयं भोजन करे। विप्र ! जो श्रद्धापूर्वक
इस व्रत को करता है, वह देवदेव की कृपा से मुक्ति-मुक्ति को प्राप्त करता है। कार्तिक-शुक्ल में शाक नामक
सप्तमीव्रत किया जाता है। उस दिन स्वर्णकमल सहित सात प्रकार के साग सात विप्रों को देकर व्रती स्वयं शाका-
हारी हो। दूसरे दिन ब्राह्मणों को भोजन कराकर उन्हें अन्न-दक्षिणा दे, पश्चात् भाई-बंधुओं के साथ मौन होकर
स्वयं भोजन करे ॥४४-४७॥
अगहन-शुक्ल-सप्तमी में मित्रव्रत कहा गया है। विष्णु का जो दाहिना नेत्र है, वही साकार होकर
कश्यप के तेज और अदिति के गर्भ से मित्र नामक दिवाकर के रूप में उत्पन्न हुआ है। द्विज ! इसलिये उस
तिथि में विधिपूर्वक भास्कर की पूजा करनी चाहिये। पश्चात् सात ब्राह्मणों को मधुर आदि भोजन कराकर
गुरु को दक्षिणापूर्वक विदा करके स्वयं भी भोजन करे। विधिवत् इस व्रत को करने से मनुष्य निःसंदेह सूर्य-
लोक को प्राप्त करता है और द्विज ब्राह्मणकुल में तथा शूद्र सत्कुल में जन्म लेता है ॥४८-५१॥
पौष-शुक्ल-सप्तमी में अभयव्रत करना चाहिये। उस दिन उपवास करते हुए तीनों संध्या सूर्य की अर्चना
करे। पश्चात् सात-आठ ब्राह्मणों को दूध और भात के योग से बने हुए मधुर सेर भर भिक्षा कर गौ या सुवर्ण
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