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सर्वकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

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DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 963, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 963

६४४ नारदीयपुराणम्

दूर्वां कौसुम्भसूत्रं च युगं श्रीफलमेव वा । भक्ष्याणि च नवे शूर्पे प्रतिद्रव्यं तु षोडश ॥६६॥
समाच्छाद्यान्यशूर्पेण व्रती दद्यात्समन्त्रकम् । क्षीरोदार्णवसंभूता लक्ष्मीश्चन्द्रसहोदरा ॥७०॥
व्रतेनानेन संतुष्टा भवताद्विष्णुवल्लभा । चतस्रः प्रतिमास्तास्तु श्रोत्रियेभ्यः समर्पयेत् ॥७१॥
ततस्तु चतुरो विप्रान् षोडशापि सुवासिनीः । मिष्टान्नेनाशयित्वा तु विसृजेत्ताः सदक्षिणाः ॥७२॥
समाप्तिनियमः पश्चाद्भुञ्जीतेष्टैः समन्वितः । एतद्व्रतं महालक्ष्म्याः कृत्वा विप्र विधानतः ॥७३॥
मुक्त्वैष्टानेहिकान् कामाँल्लक्ष्मीलोके वसेच्चिरम् । एषाऽशोकाष्टमी चोक्ता यस्यां पूर्णं रमाव्रतम् ॥७४॥
अत्राशोकस्य पूजा स्यादेकभक्तं तथा स्मृतम् । कृत्वाऽशोकव्रतं नारी ह्यशोका शोकजन्मनि ॥७५॥
यत्र कुत्रापि संजाता नाव कार्या विचारणा । आश्विने शुक्लपक्षे तु प्रोक्ता विप्र महाष्टमी ॥७६॥
तत्र दुर्गाचनं प्रोक्तं सर्वैरप्युपचारकैः । उपवासं चैकभक्तं महाष्टम्यां विधाय तु ॥७७॥
सर्वतो विभवं प्राप्य मोदते देववच्चिरम् । ऊर्जे कृष्णादिकेऽष्टम्यां करकाख्यं व्रतं स्मृतम् ॥७८॥
तत्रोमासहितः शंभुः पूजनीयः प्रयत्नतः । चंद्रोदयेऽर्घ्यदानं च विधेयं व्रतिभिः सदा ॥७६॥
पुत्रं सर्वगुणोपेतमिच्छद्भिर्विविधं सुखम् । गोपाष्टमीति संप्रोक्ता कार्तिके धवले दले ॥८०॥
तत्र कुर्याद्गवां पूजां गोत्रासं गोप्रदक्षिणाम् । गवानुगमनं दानं वाञ्छन्सर्वाश्च संपदः ॥८१॥
कृष्णाष्टम्यां मार्गशीर्षे मिथुनं दर्भनिर्मितम् । अनघां चानघं तत्र बहुपुत्रसमन्वितम् ॥८२॥
स्थापयित्वा शुभे देशे गोमयेनोपलेपिते । पूजयेद्गन्धपुष्पाद्यैरुपचारैः पृथग्विधैः ॥८३॥
संभोज्य द्विजदांपत्यं विसृजेल्लब्धदक्षिणम् । व्रतमेतन्नरः कृत्वा नारी वा विधिपूर्वकम् ॥८४॥
पुत्रं सल्लक्षणोपेतं लभते नात्र संशयः ॥८५॥


रख उन्हें दूसरे सूप से ढककर "क्षीरोदार्णवसंभूता............" इस मंत्र को पढ़ते हुए दान कर दे । वे चारों
मूर्तियां श्रोत्रिय ब्राह्मणों को समर्पित करे ॥६७-७१॥ तदुपारन्त चार विप्रों और सोलह सधवाओं को मिष्टान्न
भोजन करा कर दक्षिणापूर्वक विदा करे । व्रत-समाप्ति के बाद इष्ट-मित्रों के साथ भोजन करे । विप्र ! महालक्ष्मी
के इस व्रत को विधिपूर्वक करने से मनुष्य ऐहलोकिक भोगों को भोग कर चिरकाल तक लक्ष्मीलोक में वास करता
है । इसका नाम अशोकाष्टमी भी है, जिसमें रमा व्रत संपन्न किया जाता है । इस दिन अशोक की पूजा कर
एकभुक्त करना चाहिये । जो नारी अशोक व्रत करती है, उसे जन्मान्तर में कभी शोक नहीं होता, यह निःसंदेह
है ॥७२-७५३॥ विप्र ! आश्विन-शुक्ल-पक्ष में महाष्टमीव्रत कहा गया है । उस दिन अखिल उपचारों से दुर्गा
की आराधना करनी चाहिए । महाष्टमी में उपवास तथा (उसके पूर्व दिन) एकभुक्त ही करे । जो ऐसा करता
है, वह सकल विभवों को प्राप्त कर चिरकाल तक देवताओं के समान आनन्द करता है ॥७६-७७३॥
कार्तिक-कृष्ण-अष्टमी में करकव्रत किया जाता है । उस दिन उमा सहित शंकर की विधिपूर्वक अर्चना
करनी चाहिए । विविध सुख तथा सर्वगुण संपन्न पुत्र का इच्छुक व्रती चंद्रोदय होने पर अर्घ्य दान दे । कार्तिक
शुक्ल-अष्टमी का नाम गोपाष्टमी है । उस दिन गो-पूजन विहित है । गोओं को ग्रास देकर उनकी प्रदक्षिणा
तथा अनुगमन करे और दान दे । ऐसा करने से सकल संपत्तियों का लाभ होता है ॥७८-८१॥ अगहन-कृष्ण
अष्टमी में कुशों की अनेक मूर्तियों को जिनमें दो दम्पति की और अन्य पुत्रों की हों, गोबर से लीपकर पवित्र
स्थान में स्थापित करके गंध, पुष्प आदि उपचारों से उनकी पूजा करे । पश्चात् द्विजदंपती को खिलाकर
दक्षिणा देकर उन्हें विदा करे । विधिपूर्वक इस व्रत को करने वाला नर या नारी सर्वलक्षणयुक्त पुत्र की