बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
५२ नारदीयपुराणम्
इत्युक्त्वा कपिलः क्रुद्धो नेत्राभ्यां ससृजेऽनलम् । स वह्निः सागरान्सर्वान्भस्मसादकरोत्क्षणात् ॥११०॥
यन्नेत्रजानलं दृष्ट्वा पातालतलवासिनः । अकालप्रलयं मत्वा चुक्रुशुः शोकलालसाः ॥१११॥
तदग्नितापिता सर्वे दन्दशूकाश्च राक्षसाः । सागरं विविशुः शीघ्रं सतां कोपो हि दुःसहः ॥११२॥
अथ तस्य महीपस्य समागम्याध्वरं तदा । देवदूत उवाचेदं सर्वं वृत्तं हि यत्क्षते ॥११३॥
एतत्समाकर्ण्य वचः सगरः सर्ववित्प्रभुः । दैवेन शिक्षिता दुष्टा इत्युवाचाति हर्षितः ॥११४॥
माता वा जनको वापि भ्राता वा तनयोऽपि वा । अधर्मं कुरुते यस्तु स एव रिपुरिष्यते ॥११५॥
यस्त्वधर्मेषु निरतः सर्वलोकविरोधकृत् । तं रिपुं परमं विद्याच्छास्त्राणामेष निर्णयः ॥११६॥
सगरः पुत्रनाशेऽपि न शुशोच मुनीश्वर ! । दुर्दान्तनिधनं यस्मात्सतामुत्साहकारणम् ॥११७॥
यज्ञेष्वनधिकारत्वादपुत्राणामिति स्मृतेः । पौत्रं तमंशुमन्तं हि पुत्रत्वे कृतवान्प्रभुः ॥११८॥
असमञ्जस्सुतं तं तु सुधियं वाग्विदांवरम् । युयोज सारविद्भूयो ह्यश्वानयनकर्मणि ॥११९॥
स गतस्तद्विलद्वारे दृष्ट्वा तं मुनिपुङ्गवम् । कपिलं तेजसां राशिं साष्टाङ्गं प्रणनाम ह ॥१२०॥
कृताञ्जलिपुटो भूत्वा विनयेनाग्रतः स्थितः । उवाच शान्तमनसं देवदेवं सनातनम् ॥१२१॥
अंशुमानुवाच
दौःशील्यं यत्कृतं ब्रह्मन्मत्पितृव्यैः क्षमस्व तत् । परोपकारनिरताः क्षमासारा हि साधवः ॥१२२॥
दुर्जनेष्वपि सत्त्वेषु दयां कुर्वन्ति साधवः । नहि संहरते ज्योत्स्नां चन्द्रश्चाण्डालवेश्मनः ॥१२३॥
बाध्यमानोऽपि सुजनः सर्वेषां सुखकृद्भवेत् । ददाति परमां तुष्टिं भक्ष्यमाणोऽमरैः शशी ॥१२४॥
वह देखता है ॥६६-१०६॥ यह कहकर कपिल मुनि ने क्रुद्ध होकर अपने नेत्रों से महानल उत्पन्न
किया जिसने तत्काल उन सगर पुत्रों को जला कर भस्म कर दिया । उस ऋषि के नेत्रों से उत्पन्न उस अग्नि को
देखकर सभी पातालवासी प्राणी अकाल प्रलय समझ कर शोकमग्न होकर हाहाकार करने लगे । उस अग्नि की
ज्वाला से दग्ध होकर सभी नाग और राक्षस शीघ्र ही समुद्र में घुस गए क्योंकि सज्जनों का कोप सबके लिए
दुःसह होता है ॥११०-११२॥
तदनन्तर देवदूत ने उस राजा सगर के यज्ञ में आकर उन सारी घटनाओं को कह सुनाया । इन बातों
को सुनकर सर्वज्ञ भूमिपति सगर यह कहकर कि स्वयं दैव ने ही उन दुष्टों को अच्छी शिक्षा दी; अति प्रसन्न
हुए । माता-पिता-भाई या पुत्र चाहे कोई हो यदि वह अधर्म करता है तो वह शत्रु ही समझा जाता है ।
सब लोकों का विरोधी जो व्यक्ति सर्वदा पापकर्म में निरत रहता है उसको बहुत बड़ा शत्रु समझना चाहिए,
ऐसा शास्त्रों का निर्णय है ॥११३-११६॥ मुनीश्वर ! सगर पुत्रनाश को देखकर भी शोकातुर नहीं हुए, क्योंकि
दुराचारियों की मृत्यु सज्जनों के उत्साह का ही कारण है । 'यज्ञों में पुत्ररहित का अधिकार नहीं है' इस स्मृति-
वचन का स्मरण कर राजा ने अंशुमान् को ही अपना पुत्र बनाया । उस तत्त्वविद् सगर ने असमंजस् के उस परम
विनीत और विद्वान् पुत्र को पुनः अश्व लाने के कार्य में नियुक्त किया । वह उस बिल द्वार से पाताल पहुँचा
और तेजोनिधान उस मुनि श्रेष्ठ को देखकर साष्टाङ्ग प्रणाम किया । वह हाथ जोड़कर विनीत भाव से उस मुनि
के सम्मुख उपस्थित हुआ और शान्त सनातन देव-देव की स्तुति करने लगा ॥११७-१२१॥
अंशुमान् बोला- ब्रह्मन् ! मेरे पितृव्यों ने जो कुछ अविनय दिखाया है उसको आप क्षमा कर दें,
क्योंकि सर्वदा परोपकार में रत रहने वाले साधुजन क्षमा की मूर्ति होते हैं । साधुजन दुष्टप्राणियों पर भी
दया दिखाते हैं। चन्द्र चाण्डालों के घर पर से अपनी किरणें नहीं हटाते हैं। सज्जन दूसरों से कष्ट
पाने पर भी सबको सुखी ही बनाते हैं; क्योंकि देवताओं का भक्ष्य बनकर भी चन्द्रमा उनको सुखी ही
बनाता है। चन्दन स्वयं भग्न होकर और कटकर भी अपनी सुगन्ध से दूसरों को सुगन्धित ही करता है।
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अष्टमोऽध्यायः ५३
दारितश्छिन्न एवापि ह्यामोदेनैव चन्दनः । सौरभं कुरुते सर्वं तथैव सृजनो जनः ॥१२५॥
क्षान्त्या च तपसाचारैस्तद्गुणज्ञा मुनीश्वराः । संजातं शासितुं लोकांस्त्वां विदुः पुरुषोत्तम ॥१२६॥
नमो ब्रह्मन्मुने तुभ्यं नमस्ते ब्रह्ममूर्त्तये । नमो ब्रह्मण्यशीलाय ब्रह्मध्यानपराय च ॥१२७॥
इति स्तुतो मुनिस्तेन प्रसन्नवदनस्तदा । वरं वरय चेत्याह प्रसन्नोऽस्मि तवानघ ॥१२८॥
एवमुक्ते तु मुनिना ह्यंशुमान्प्रणिपत्य तम् । प्रापयासम्पितॄन्ब्राह्मं लोकमित्यभ्यभाषत ॥१२९॥
ततस्तस्यातिसंतुष्टो मुनिः प्रोवाच सादरम् । गङ्गामानीय पौत्रस्ते नयिष्यति पितॄन्दिवम् ॥१३०॥
त्वत्पौत्रेण समानीता गङ्गा पुण्यजला नदी । कृत्वैतान्धूतपापांन्वैनयिष्यति परं पदम् ॥१३१॥
प्रापयेनं हयं वत्स यतः स्यात्पूर्णमध्वरम् । पितामहान्तिकं प्राप्य साश्वं वृत्तं न्यवेदयत् ॥१३२॥
सगरस्तेन पशुना तं यज्ञं ब्राह्मणैः सह । विधाय तपसा विष्णुमाराध्याय पदं हरेः ॥१३३॥
जज्ञे ह्यंशुमतः पुत्रो दिलोप इति विश्रुतः । तस्माद्भागीरथो जातो यो गङ्गामानयद्दिवः ॥१३४॥
भगीरथस्य तपसा तुष्टो ब्रह्मा ददौ मुने । गङ्गां भागीरथ्यायाः चिंतयामास धारणे ॥१३५॥
ततश्च शिवमाराध्य तद्द्वारा स्वर्णदीं भुवम् । आनीय तज्जलंः स्पृष्ट्वा पुतान्निन्ये दिवं पितॄन् ॥१३६॥
भगीरथान्वये जातः सुदासो नाम भूपतिः । तस्य पुत्रो मित्रसहः सर्वलोकेषु विश्रुतः ॥१३७॥
वसिष्ठशापात्प्राप्तः स सौदासो राक्षसों तनुम् । गङ्गाबिन्दुनिषेवेण पुनर्मुक्तो नृपोऽभवत् ॥१३८॥
इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे प्रथमपादे गङ्गामाहात्म्यं नाम अष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥
ऐसा ही सज्जनों का भी स्वभाव होता है ॥१२२-१२५॥ आपके गुणों के जानने वाले मुनिवर आपको पुरुषोत्तम
समझते हैं—जो कि अपनी शान्ति, तपस्या और सदाचार से लोक को शिक्षा देने के लिए यहां आए हुए हैं।
ब्रह्मन् ! मुने ! ब्रह्ममूर्ति आपको नमस्कार है। ब्राह्मणों के रक्षक ब्रह्मध्यानपरायण आपको नमस्कार करता हूँ।
अंशुमान् की इस प्रकार की स्तुति सुनकर मुनि प्रसन्न हो गए और कहा कि अनघ ! वर मांगो।
मैं तुमसे प्रसन्न हूँ! मुनि की ऐसी बातें सुनकर अंशुमान् उनके चरणों पर गिर पड़ा और कहा कि किसी
प्रकार मेरे पितरों को ब्रह्मलोक पहुंचाइये । अंशुमान् की प्रार्थना सुनकर मुनि प्रसन्न हो गए और आदर पूर्वक
बोले—तुम्हारा पौत्र गंगा को पृथ्वो पर लाकर तुम्हारे पितरों को स्वर्ग पहुँचा देगा ॥१२६-१३०॥ तुम्हारे
पौत्र से लाई हुई पुण्यसलिला गंगा इन मृत पितरों को निष्पाप बनाकर परम पद पर पहुँचा देगी। वत्स !
इस अश्व को तुम अपने यहाँ ले जाओ जिससे कि यज्ञ पूर्ण हो जाय । अंशुमान् ने अपने पितामह के निकट
जाकर अश्व और पितरोद्धार की सारी कथा कह दी। सगर ने ब्राह्मणों की सहायता से उस पशु के द्वारा
यज्ञ समाप्त किया और विष्णु की आराधना कर विष्णुलोक को प्राप्त किया अंशुमान् से दिलोप नामक पुत्र
उत्पन्न हुआ, दिलोप से भगीरथ हुआ, जिसने गंगा को स्वर्ग से पृथ्वी पर उतारा। मुने ! भगीरथ की तपस्या से
प्रसन्न होकर ब्रह्मा ने गंगा को तो दे दिया परन्तु 'गंगा को कौन धारण करेगा ?' इसको चिन्ता करने लगे ।
तब भगीरथ ने शिव की आराधना की उनकी सहायता से देवनदी गंगा को पृथ्वी पर लाकर उसके जल से अपने
पितरों को पवित्र किया और उनको स्वर्ग पहुँचाया । उस भगीरथ के कुल में सुदास नामक भूपति उत्पन्न हुआ।
उसका पुत्र मित्रसह विश्व में विख्यात हुआ । वसिष्ठ के शाप से मित्रसह को राक्षस-शरीर प्राप्त हो गया था,
परन्तु गंगाजल के स्पर्श से वह भूपति-श्रेष्ठ पुनः शुद्ध हो गया ॥१३१-१३७॥
श्रीनारदीयपुराण में गंगामाहात्म्य-वर्णन नामक आठवाँ अध्याय समाप्त ॥८॥
नवमोऽध्यायः
नारद उवाच
शप्तः कथं वसिष्ठेन सौदासो नृपसत्तमः । गङ्गाबिन्दुभिषेकेण पुनः शुद्धोऽभवत्कथम् ॥१॥
सर्वमेतदशेषेण भ्रातर्मे वक्तुमर्हसि । शृण्वतां वदतां चैव गङ्गाख्यानं शुभावहम् ॥२॥
सनक उवाच
सौदासः सर्वधर्मज्ञः सर्वज्ञो गुणवाञ्छुचिः । बुभुजे पृथिवीं सर्वां पितृवद्रञ्जयन्प्रजाः ॥३॥
सगरेण यथा पूर्वं महीयं सप्तसागरा । रक्षिता तद्वदमुना सर्वधर्माविरोधिना ॥४॥
त्रिंशदब्दसहस्राणि बुभुजे पृथिवीं युवा
॥५॥
सौदासस्त्वेकदा राजा मृगयाभिरतिर्वनम् । विवेश सबलः सम्यक् शोधितं ह्याप्तमन्त्रिभिः ॥६॥
निषादैः सहितस्तत्र विनिघ्नन्मृगसंचयम् । आसाद नदीं रेवां धर्मज्ञः स पिपासितः ॥७॥
सुदासतनयस्तत्र स्नात्वा कृत्वान्हिकं मुने । भुक्त्वा च मन्त्रिभिः सार्द्धं तां निशां तत्र चावसत् ॥८॥
ततः प्रातः समुत्थाय कृत्वा पौर्वाह्निकीं क्रियाम् । बभ्राम मन्त्रिसहितो नर्मदातीरजे वने ॥६॥
अध्याय ६
गंगाजल के सम्पर्क से राजा सौदास का शापोद्धार
नारद बोले—वसिष्ठ ने सौदास को क्यों शाप दिया और पुनः गंगाजल के अभिषेक से वह कैसे शुद्ध
हो गया ? भाई ! इस आख्यान को पूर्णरूप से आप कहिए, गंगा की कथा सुनने वाले और कहने वाले दोनों के
लिए मङ्गलदायक होता है ॥१-२॥
सनक बोले—सौदास सब धर्मों का ज्ञाता, सर्वज्ञ, गुणी और सदाचारी था । उसने अपने पिता के समान
प्रजा का पालन कर सम्पूर्ण पृथ्वी का उपभोग किया । जिस प्रकार प्राचीनकाल में इस सप्त-समुद्रा पृथ्वी की
रक्षा सगर ने की थी उसी प्रकार इसने न्याय और धर्म पूर्वक पृथ्वी की रक्षा की । उस युवक ने अपने पुत्र-
पौत्रों के साथ सब प्रकार के वैभवों का उपभोग करते हुए तीस हजार वर्षों तक पृथ्वो का शासन किया
॥३-५॥ एक दिन मृगया-प्रेमी राजा सौदास अपने सैनिकों के साथ वन में गया जिस वन की पहले से ही
विश्वस्त मन्त्रियों ने भली भाँति परीक्षा कर ली थी । वह धर्मज्ञ राजा निषादों को साथ लेकर अनेकों जंगली
पशुओं का शिकार करता हुआ प्यास से व्याकुल होकर गोदावरी नदी के तट पर गया ॥६-७॥ मुने ! सुदास-
पुत्र ने नर्मदा में स्नान कर सन्ध्या-वन्दनादि नित्य क्रिया की और मंत्रियों के सहित भोजन कर उस रात को
वहीं रह गया । तदनन्तर प्रातः काल उठकर प्रातःकालीन क्रियाओं को समाप्त कर मन्त्रियों के साथ नर्मदा
नवमोऽध्यायः ५५
वनाद्वनान्तरं गच्छन्नेक एव महीपतिः । आकर्णाकृष्टबाणः सन् कृष्णसारं समन्वगात् ॥१०॥
दूरसैन्योऽश्वमारूढः स राजानुव्रजन्म्गम् । व्याघ्रद्वयं गुहासंस्थमपश्यत्सुरते रतम् ॥११॥
मृगपृष्ठं परित्यज्य व्याघ्रयोः संमुखं ययौ । धनुःसंहितबाणेन तेनासौ शरशास्त्रवित् ॥१२॥
तां व्याघ्रीं पातयामास तीक्ष्णाग्रनतपर्वणा । पतमाना तु सा व्याघ्री षट्त्रिंशद्योजनायता ॥१३॥
तडित्वद्घोरनिर्घोषा राक्षसी विकृताभवत् । पतितां स्वप्रियां वीक्ष्य द्विषन्स व्याघ्रराक्षसः ॥१४॥
प्रतिक्रियाम् करिष्यामीत्युक्त्वा चांतर्दधे तदा । राजा तु भयसंविग्नो वने सैन्यं समेत्य च ॥१५॥
तद्वृत्तं कथयन्सर्वान्स्वां पुरीं स न्यवर्तत् । शङ्कमानस्तु तद्रक्षःकृत्याद्राजा सुदासजः ॥१६॥
परित्यत्याज मृगयां ततः प्रभृति नारद । गते बहुतिथे काले हयमेधमखं नृपः ॥१७॥
समारभे प्रसन्नात्मा वशिष्ठाद्यैर्मुनीश्वरैः । तत्र ब्रह्मादिदेवेभ्यो हविर्दत्त्वा यथाविधि ॥१८॥
समाप्य यज्ञनिष्क्रांतो वशिष्ठः स्नातकोऽपि च । अत्रान्तरे राक्षसोऽसौ नृपहिंसितभार्यकः ॥
कर्तुं प्रतिक्रिया राज्ञे समायातो रुषान्वितः ॥१९॥
स राक्षसस्तस्य गुरौ प्रयाते वशिष्ठवेषं तु तदैव धृत्वा । ॥२०॥
राजामभ्येत्य जगाद भोक्ष्ये मांसं समिच्छाम्यहमित्युवाच
भूयः समास्थाय स सूपवेषं पक्वमामिषं मानुषमस्य चादात् । ॥२१॥
स्थितश्च राजापि हिरण्यपात्रे धृत्वागुरोरागमनं प्रतीक्षन्
तन्मांसं हेमपात्रस्थं सौदासो विनयान्वितः । समागताय गुरवे ददौ तस्मै स सादरम् ॥२२॥
तं दृष्ट्वा चिन्तयामास गुरुः किमिति विस्मितः ॥२३॥
तटवर्ती वनमें घूमने लगा । धनुष की डोरी कान तक खींचे हुए तथा अकेले ही एक वन से दूसरे वन में जाते
हुए राजा को मृग मिला । घोड़े पर सवार होकर उस मृग के पीछे दौड़ता हुआ अपने सैनिकों से बहुत दूर
निकल गया । उसी समय उसने किसी गुफा में रति क्रीड़ा करते हुए व्याघ्र-युग्म को देखा । वह शीघ्र मृग का
पीछा छोड़कर उन बाघों के सामने गया । धनुर्विद्या में प्रवीण उस राजा ने धनुष पर चढ़े हुए उस बाण से जो
अत्यन्त तीक्ष्ण और जिसका फल आगे की ओर कुछ झुका हुआ था—मादा बाघ को मार गिराया । गिरते
समय वह व्याघ्री छत्तीस योजन विस्तृत शरीर वाली एक भयङ्कर राक्षसी हो गई जिसने बादल के समान
भयङ्कर चीत्कार किया ।।८-१३।। अपनी प्रिय स्त्री को इस प्रकार मरते देखकर वह व्याघ्र आकार वाला
राक्षस क्रुद्ध हो गया और द्वेषपूर्वक यह कहता हुआ कि इसका बदला लूँगा, उस समय अन्तर्हित हो गया ।
यह घटना देखकर राजा भय से व्याकुल हो गया अपनी सेना के पास आकर सारी घटना कह दी और अपनी
राजधानी को लौट आया । नारद ! उस राक्षस की प्रतिक्रिया के भय से उस दिन से राजा ने आखेट करना
बन्द कर दिया । बहुत दिन बीत जाने पर प्रसन्न होकर राजा ने वसिष्ठ आदि मुनियों के साथ अश्वमेध यज्ञ
प्रारम्भ किया । उस यज्ञ में विधिपूर्वक देवों को हवि प्रदान किया गया ।।१४-१८।। यज्ञ समाप्त होने पर
वसिष्ठ जी स्नातकों के साथ चले गये । इसी बीच अवसर पाकर वह राक्षस—जिसकी भार्या को राजा ने मार
डाला था—अपनी प्रतिज्ञा को पूरा करने के लिए क्रुद्ध होकर आया । वह राक्षस राजगुरु वसिष्ठ के चले जाने
पर गुरु का ही वेष धारण कर राजा के पास आया और बोला—'मैं मांस भोजन करना चाहता हूँ' । पुनः शीघ्र
ही वह पाचक (रसोइयाँ) का वेष धारण कर मनुष्य का मांस पकाकर राजा को दे दिया । राजा भी उस पक्व
मांस को सोने के बर्तन में परस कर गुरु के आने की प्रतीक्षा करने लगा । राजा सुदास ने आगत गुरु को बड़े
आदर के साथ उस सोने के पात्र में परसे हुए मांस को दे दिया ।।१६-२२।। उस को देखकर गुरु वसिष्ठ विस्मित
हो गए सोचने लगे कि यह क्या है । अपनी ज्ञानदृष्टि द्वारा उन्होंने उस मांस को देख लिया । 'अहो ! राजा
५६ नारदीयपुराणम्
अपश्यन्मानुषं मांसं परमेण समाधिना । अहोऽस्य राज्ञो दौःशील्यमभक्ष्यं दत्तवान्मम ॥२४॥
इति विस्मयमापन्नः प्रमन्युर्भवन्मुनिः । अभोज्यं मद्विघाताय दत्तं हि पृथिवीपते ॥२५॥
तस्मात्तवापि भवतु ह्ये तदेव हि भोजनम् । नृमांसं रक्षसामेव भोज्यं दत्तं मम त्वया ॥२६॥
तद्याहि राक्षसत्वं त्वं तदाहारोचितं नृप । इति शापं ददत्यस्मिन्सौदासो भयविह्वलः ॥२७॥
आज्ञप्तो भवतेवेति सकंपोऽस्य व्यजिज्ञपत् । भूयश्च चिन्तयामास वशिष्ठस्तेन नोदितः ॥२८॥
रक्षसा वंचितं भूपं ज्ञातवान् दिव्यचक्षुषा । राजापि जलमादाय वशिष्ठं शप्तुमुद्यतः ॥२६॥
समुद्यतं गुरुं शप्तं दृष्ट्वा भूयो रुषान्वितम् । मदयंती प्रिया तस्य प्रत्युवाचाथ सुव्रता ॥३०॥
मदयंत्युवाच
भो क्षत्रियदायाद कोपं संहर्तुमर्हसि । त्वया यत्कर्म भोक्तव्यं तत्प्राप्तं नात्र संशयः ॥३१॥
गुरुं तुंकृत्य हुंकृत्य यो वदेन्मूढधीर्नरः । अरण्ये निर्जले देशे स भवेद्ब्रह्मराक्षसः ॥३२॥
जितेन्द्रिया जितक्रोधा गुरुशुश्रूषण रताः । प्रयान्ति ब्रह्मसदनमिति शास्त्रेषु निश्चयः ॥३३॥
तयोक्तो भूपतिः कोपं त्यक्त्वा भार्यां ननन्द च । जलं कुत्र क्षिपामीति चिन्तयामास चात्मना ॥३४॥
तज्जलं यत्र संसिक्तं तद्भवेद्भस्म निश्चितम् । इति मत्वा जलं तत्तु पादयोर्न्यक्षिपत्स्वयम् ॥३५॥
तज्जलस्पर्शमात्रेण पादौ कल्माषतां गतौ । कल्माषपाद इत्येवं ततः प्रभृति विस्तृतः ॥३६॥
कल्माषपादो मतिमान् प्रिययाश्वासितस्तदा । मनसा सोऽतिभीतस्तु ववन्दे चरणं गुरोः ॥३७॥
उवाच च प्रपन्नस्तं प्राञ्जलिनंयकोविदः । क्षमस्व भगवन्सर्वं नापराधः कृतो मया ॥३८॥
की यह नीचता कि इसने अभक्ष्य मांस मुझे भोजन के लिए दे दिया ! यह सोचकर आश्चर्य-चकित मुनि को
अत्यन्त क्रोध हुआ । 'पृथ्वोपति ! तुमने मेरे सर्वनाश के लिए अभक्ष्य मांस दिया है, अतः तुम्हारा भी यही भोजन
होगा मनुष्य का मांस राक्षसों का ही भोजन है, वही आज तुमने मुझे दिया इसलिये राजन् ! तुम उसी आहार
के योग्य 'राक्षस' बनो, गुरु को इस प्रकार शाप देते देखकर राजा सौदास भय से विह्वल हो गया ॥२३-२७॥
कांपते हुए उसने कहा 'आपने ही तो ऐसी आज्ञा दी है । उसके ऐसा कहने पर वसिष्ठ जी पुनः सोचने लगे ।
अपनी दिव्य दृष्टि से उन्होंने जान लिया कि राक्षस ने राजा को ठग लिया । राजा भी हाथ में जल लेकर
गुरु को शाप देने के लिए तैयार हो गया । क्रोधान्ध पति को गुरु को शाप देने के लिए उद्यत देखकर उसकी
प्रिय व्रतशील भार्या मदयन्ती ने कहा ॥२८-३०॥
मदयंती बोली-क्षत्रिय-दायाद ! तुम्हें क्रोध नहीं करना चाहिए, जो कुछ भोगना है वही इस समय
प्राप्त हुआ है, इसमें कुछ भी सन्देह नहीं । जो मूर्ख मनुष्य गुरु से 'तुम कह कर, या हुँ कह कर' कुछ कहता है
वह वनमें जलशून्य स्थान में ब्रह्मराक्षस होता है। इन्द्रियनिग्रही, परमशान्त और गुरु की शुश्रूषा में लीन
रहने वाले मनुष्य ब्रह्मलोक में स्थान पाते हैं, ऐसा शास्त्रों का निर्णय है। पत्नी के इस प्रकार समझाने पर
भूपति ने क्रोध छोड़ दिया और भार्या पर प्रसन्न हो गया। अपने मनमें सोचने लगा कि इस शाप जल को कहाँ
फेंकूं, जहाँ यह जल फेंका जायगा वह तो अवश्य जल कर भस्म हो जायगा यह निश्चित है। यह सोचकर उस
जल को अपने पैरों पर छोड़ दिया ॥३१-३५॥ उस जल के गिरते ही दोनों पैर काले हो गए। तभी से उसका नाम
कल्माषपाद ही प्रसिद्ध हो गया । मतिमान् कल्माषपाद ने प्रिया के इस प्रकार समझाने पर कुछ आश्वस्त
हुआ और मन में अत्यन्त भय से त्रस्त होकर गुरु के चरणों पर गिर पड़ा । नीति-विशारद राजा ने हाथ जोड़
कर विनीत भाव से कहा। भगवन् ! क्षमा कीजिए मैंने जान बूझकर अपराध नहीं किया है। मुनि ने राजा की
५७
नवमोऽध्यायः
तच्छ्रुत्वोवाच भूपालं मुनिर्निश्वस्य दुःखितः । आत्मानं गर्हयामास ह्यविवेकपरायणम् ॥३६॥
अविवेको हि सर्वेषामापदां परमं पदम् । विवेकरहितो लोके पशुरेव न संशयः ॥४०॥
राज्ञा त्वजानता नूनमेतत्कर्मोचितं कृतम् । विवेकरहितोऽज्ञोऽहं यतः पापं समाचरेत् ॥४१॥
विवेकनियतो याति यो वा को वापि निवृतिम् । विवेकहीनमाप्नोति को वा यो वाप्यनियतिम् ॥४२॥
इत्युक्त्वा चात्मनात्मानं प्रत्युवाच मुनिर्नृपम् । नात्यन्तिकं भवेदेतद्द्वादशाब्दं भविष्यति ॥४३॥
गङ्गाबिन्दुभिरिक्तस्तु त्यक्त्वा वै राक्षसीं तनुम् । पूर्वरूपं त्वमापन्नो भोक्ष्यसे मेदिनीमिमाम् ॥४४॥
तद्विन्दुसेकसंभूतज्ञानेन गतकल्मषः । हरिसेवापरो भूत्वा परां शान्तिं गमिष्यसि ॥४५॥
इत्युक्तवाथर्वविद्व्रूपं वशिष्ठः स्वाश्रमं ययौ । राजापि दुःखसंपन्नो राक्षसीं तनुमाश्रितः ॥४६॥
क्षुत्पिपासाविशेषात्तो नित्यं क्रोधपरायणः । कृष्णपक्षायुतिर्भीमो बभ्राम विजने वने ॥४७॥
मृगांश्च विविधांस्तत्र मानुषांश्च सरीसृपान् । विहङ्गमान्प्लवङ्गांश्च प्रशस्तांस्तानभक्षयत् ॥४८॥
अस्थिभिर्बहुभिर्भूयः पीतरक्तकलेवरैः । रक्तान्तप्रेतकेशैश्च चितासीद्भूर्भयंकरी ॥४६॥
ऋतुत्रये स पृथिवीं शतयोजनविस्तृताम् । कृत्वातिदुःखितां पश्चाद्वनान्तरमुपागमत् ॥५०॥
तत्रापि कृतवान्नित्यं नरमांसाशनं सदा । जगाम नर्मदातीरं मुनिसिद्धनिषेवितम् ॥५१॥
विचरन्नर्मदातीरे सर्वलोकभयंकरः । अपश्यत्कंचन मुनिं रमन्तं प्रियया सह ॥५२॥
क्षुधानलेन संतप्तस्तं मुनिं समुपाद्रवत् । जग्राह चातिवेगेन व्याधो मृगशिशुं यथा ॥५३॥
बातें सुनकर लंबी सांस ली और दुःखी होकर अपनी विवेकहीनता को कोसते हुए राजा से बोले--
'अविवेक सब आपत्तियों का एकमात्र स्थान है, इस लोक में विवेकशून्य प्राणी पशु के तुल्य है; इसमें
कुछ भी सन्देह नहीं ॥३६-४०॥ राजा ने तो अज्ञान वश ऐसा कर्म किया है जो कि सबसे हो सकता है, किन्तु
मैं तो विवेक शून्य, अज्ञ हूँ कि सब कुछ जानता हुआ भी ऐसा पाप कर्म कर डाला । विवेक से युक्त कोई भी
मनुष्य मोक्ष को प्राप्त करता है और विवेकहीन को सांसारिक बंधन प्राप्त होता है ॥४१-४२॥
इस प्रकार स्वयं अपने प्रति पश्चात्ताप सूचक बातें कहकर मुनि ने राजा से कहा 'यह शाप अधिक दिनों
तक नहीं केवल बारह वर्ष तक ही रहेगा'। पुनः गंगाजल के अभिषेक से अपने राक्षस शरीर को छोड़कर पूर्व
शरीर प्राप्त कर लोगे और तब इस साम्राज्य का उपभोग करोगे । उस गंगाजल के अभिषेक से ज्ञान प्राप्त
होगा और तब निष्पाप होकर हरिसेवा में रुचि होगी जिसके फलस्वरूप परम शान्ति पा जाओगे ॥४३-४५॥
राजा से यह कहकर अथर्व-ज्ञाता वसिष्ठ जी अपने आश्रम को चले गए । राजा भी राक्षस शरीर पाकर दुःखी
हो गया । भूख-प्यास से व्याकुल होकर नित्य प्रति क्रोध में ही जलता रहता था, उसका शरीर अमावस्या
की रात्रि के समान कृष्ण वर्ण और भयंकर हो गया । इस प्रकार वह राक्षस बन कर विजन वन में इधर-उधर
भटकने लगा । वन में विविध पशुओं मनुष्यों और रेंगकर चलने वाले जीवों, पक्षियों, वन्दरों एवं अन्य जीवों
को खाता फिरता था। वन की सारी भूमि मरे हुए जीवों की अनगिनत हड्डियों, पीले और लाल रंग के कटे हुए
अंगों, मृतकों के रक्त से सने बालों से अद्भुत और भयंकर बन गई ॥४६-४६॥ तीनों ऋतुओं में वह सौ योजन विस्तृत
भू भाग को अपने अत्याचार से प्राणि-हीन बना दूसरे वनमें चला गया । वहाँ भी वह नित्य मनुष्यों की हत्या
कर सर्वदा नर मांस खाता फिरता था। एक दिन सारे संसार को भयभीत करने वाला वह राक्षस नर्मदा तट
पर घूमता हुआ सिद्धों और मुनियों के प्रदेश में पहुँचा । वहाँ उसने किसी मुनि को प्रिया के साथ विहार
करते हुए देखा । क्षुधा-ज्वाला से जला वह उस मुनि की ओर बड़े वेग से झपटा और जिस
८--नार०
५८ नारदीयपुराणम्
ब्राह्मणी स्वपतिं वीक्ष्य निशाचरकरस्थितम् । शिरस्यञ्जलिमाधाय प्रोवाच भयविह्वला ॥५४॥
ब्राह्मप्युवाच
भो भो नृपतिशार्दूल त्राहि मां भयविह्वलाम् । प्रियप्राणप्रदानेन कुरु पूर्णमनोरथाम् ॥५५॥
नाम्ना मित्रसहस्त्वं हि सूर्यवंशसमुद्भवः । न राक्षसस्ततोऽनाथां पाहि मां विजने वने ॥५६॥
या नारी भर्तृरहिता जीवत्यपि मृतोपमा । तथापि बालवैधव्यं किं वक्ष्याम्यरिमर्दन ॥५७॥
न मातापितरौ जाने नापि बंधुं च कंचन । पतिरेव परो बंधुः परमं जीवनं मम ॥५८॥
भवान्वेत्यखिलान्धर्मान्योषितां वर्त्तनं यथा । त्रायस्व बन्धुरहितां बालापत्यां जनेश्वर ॥५९॥
कथं जीवामि पत्यास्मिन्हीना हि विजने वने । दुहिताहं भगवतस्त्राहि मां पतिदानतः ॥६०॥
प्राणदानानात्परं दानं न भूतं न भविष्यति । वदन्तीति महाप्राज्ञाः प्राणदानं कुरुष्व मे ॥६१॥
इत्युक्त्वा सा पापातस्य राक्षसस्य पदाग्रतः । एवं संप्राथ्यमानोऽपि ब्राह्मण्या राक्षसो द्विजम्
अभक्षयत्कृष्णसारशिशुं व्याघ्रो यथा बलात् । ॥६२॥
ततो विलप्य बहुधा तस्य पत्नी पतिव्रता । पूर्वशापहतं भूपमशपत्क्रोधित पुनः ॥६३॥
पतिं मे सुरतासक्तं यस्माद्धिसितवान्बलात् । तस्मात्स्त्रीसङ्गमं प्राप्तस्त्वमपि प्राप्स्यसे मृतिम् ॥६४॥
शप्त्वैवं ब्राह्मणी क्रुद्धा पुनः शापान्तरं ददौ । राक्षसत्वं ध्रुवं तेऽस्तु मत्पतिर्भक्षितो यतः ॥६५॥
सोऽपि शापद्वयं श्रुत्वा तया दत्तं निशाचरः । प्रमन्युः प्राह विसृजन्कोपादङ्गारसंचयम् ॥६६॥
दुष्टे कस्मात्प्रदत्तं मे वृथा शापद्वयं त्वया । एकस्यैवापराधस्य शापस्त्वेको ममोचितः ॥ ६७॥
प्रकार व्याघ्र मृगशावक को पकड़ लेता है उसी प्रकार मुनि को उसने पकड़ लिया । ब्राह्मणी अपने पति को राक्षस
के पंजे में फंसा देखकर भयविह्वल हो गई और हाथ जोड़कर राक्षस से बोली ॥५०-५४॥
ब्राह्मणी बोली—'हे भूपश्रेष्ठ ! भय से व्याकुल मेरी रक्षा करो, मेरे पति के प्राणों को देकर
मुझे कृतकृत्य करो । तुम सूर्य वंश के मित्रसह नामक नरपाल हो, राक्षस नहीं हो अप: भूपाल होने के नाते
इस निर्जन वन में मेरी रक्षा करो । जो नारी पतिहीन है वह जीते हुए भी मरे के समान है, तिस पर बालवैधव्य
तो और ही कष्टकर है । अरिसूदन ! इस विषय में और क्या कहूँ । इस समय न तो मेरे माता-पिता अथवा कोई
बन्धु ही हैं, केवल पति ही मेरे सर्वस्व और एक मात्र आधार हैं। आप सब धर्म तत्त्वों को जानते हैं और यह
भी जानते हैं कि नारी जीवन का आधार क्या है, नरपाल ! असहाय शिशु सन्तान वाली, मेरी रक्षा करो, इस निर्जन
वन में पति के अवलम्ब के बिना कैसे जी सकूँगी ? मैं आपकी पुत्री हूँ मुझे पतिदान देकर रक्षा कीजिए ॥५५-६०॥
प्राणदान से बढ़कर कोई दूसरा दान न तो है न होगा, ऐसा महाबुद्धिमान् व्यक्ति कहते हैं । यह कहकर वह
राक्षस के चरणों के समीप गिर पड़ी। ब्राह्मणो के इस प्रकार प्रार्थना करने पर भी उस राक्षस ने कुछ ध्यान
नहीं दिया और उस ब्राह्मण को इस प्रकार खा गया जिस प्रकार बाघ काले मृग छौने को हठात् खा जाता है
॥६१-६२॥ इसके बाद उसकी पतिव्रता ब्राह्मणो बहुत विलाप करने लगी और क्रुद्ध होकर पहले से ही शाप
प्राप्त उस राजा को शाप दे दिया कि जिस लिए तुमने रति आसक्त मेरे पति को क्रूरता पूर्वक मार डाला
है इसलिए तुम भी कभी स्त्री प्रसङ्ग करोगे तभी मर जाओगे । तुमने मेरे पति को खा लिया है इसलिए तुम्हारा
यह राक्षस भाव सर्वदा के लिए स्थिर रहेगा । वह निशाचर भी ब्राह्मणी के दिये हुए दो शापों को सुनकर क्रोधान्ध
हो गया और क्रोध से अग्नि की ज्वाला बरसाता हुआ सा बोला-
दुष्टे ! तुमने व्यर्थ मुझे दो शाप क्यों दे दिये । एक अपराध के लिए एक ही शाप उचित था परन्तु
नवमोऽध्यायः ५६
यस्मात्क्षिपसि दुष्टाग्रे मयि शापान्तरं ततः । पिशाचयोनिमद्यैव याहि पुत्रसमन्विता ॥६८॥
तेनैवं ब्राह्मणी शप्ता पिशाचत्वं तदा गता । क्षुधार्ता सुस्वरं भीमा रुरोदापत्यसंयुता ॥६९॥
राक्षसश्च पिशाची च क्रोशन्तौ निर्जने वने । जग्मतुर्नर्मदातीरे वनं राक्षससेवितम् ॥७०॥
औदासीन्यं गुरौ कृत्वा राक्षसों तनुमाश्रितः । तत्रास्ते दुःखसंतप्तः कश्चिल्लोकविरोधकृत् ॥७१॥
राक्षसं च पिशाचीं दृष्ट्वा स्ववटमागतौ । उवाच क्रोधबहुलो वटस्थो ब्रह्मराक्षसः ॥७२॥
किमर्थमागतौ भीमौ युवां मत्स्थानमीप्सितम् । ईदृशो केन पापेन जातौ मे ब्रूवतां ध्रुवम् ॥७३॥
सौदासस्तद्वचः श्रुत्वा तया यच्चात्मना कृतम् । सर्वं निवेदयित्वास्मै पश्चादेतदुवाच ह ॥७४॥
सौदास उवाच
कस्त्वं वद महाभाग त्वया वै किं कृतं पुरा । सख्यम॑र्मातिस्नेहेन तत्सर्वं वक्तुमर्हसि ॥७५॥
करोति वञ्चनं मित्रे यो वा को वापि दुष्टधीः । स हि पापफलं भुंक्ते यातनास्तु युगायुतम् ॥७६॥
जन्तूनां सर्वदुःखानि क्षीयन्ते मित्रदर्शनात् । तस्मान्मित्रेषु मतिमान्न कुर्याद्वञ्चनं कदा ॥७७॥
कल्मषापादेनेत्युक्तो वटस्थो ब्रह्मराक्षसः । उवाच प्रीतिमापन्नो धर्मवाक्यानि नारद ॥७८॥
ब्रह्मराक्षस उवाच
अहमासं पुरा विप्रो मागधो वेदपारगः । सोमदत्त इति ख्यातो नाम्ना धर्मपरायणः ॥७९॥
प्रमत्तोऽहं महाभाग विद्यया वयसा धनैः । औदासीन्यं गुरोः कृत्वा प्राप्तवानीदृशीं गतिम् ॥८०॥
न लभेऽहं सुखं किंचिन्नराहारोऽतिदुःखितः । मया तु भक्षिता विप्राः शतशोऽथ सहस्रशः ॥८१॥
तुमने मुझ दुष्ट के ऊपर दूसरा शाप भी रख दिया इसलिए तुम अभी अपने पुत्र के सहित पिशाच योनि को
प्राप्त हो जाओ ॥६३-६८॥ उस राक्षस से इस प्रकार शाप पाकर वह ब्राह्मणी तत्काल राक्षसी हो गई । पुत्र
सहित वह भयङ्कर आकार वाली राक्षसी भूख प्यास से व्याकुल होकर जोर-जोर से चिल्लाने लगी । रोते
चिल्लाते हुए वे दोनों राक्षस और पिशाची उस निर्जन वनमें घूमने लगे । घूमते हुए वे दोनों नर्मदा-तटवर्ती
उस वनमें गए जहाँ गुरु की अवज्ञा के कारण राक्षस बन कर एक दूसरा दुःखो लोकविरोधी राक्षस रहता था ।
उस राक्षस और पिशाची को अपने वट की ओर आते देख कर उस वट पर रहने वाले ब्रह्म राक्षस ने क्रोध
पूर्वक कहा ॥६६-७२॥
भयङ्कर आकार वाले तुम दोनों क्यों मेरे इस प्रिय निवास स्थान पर आए ? ऐसा कौन सा पाप किया
जिससे तुम दोनों राक्षस हो गए, सारी बातें मुझसे पूर्ण रूप से कहो । सौदास ने स्वयं और उस पिशाची ने जो
कुछ किया था कह दिया और उसके बाद उस ब्रह्मराक्षस से पूछा ॥७३-७४॥
सौदास बोला- महाभाग ! तुम कौन हो, तुमने इसके पूर्व कौन सा पाप किया, कहो । तुम मेरे सखा
हो, इसलिए प्रेमपूर्वक सारी बातें तुम अवश्य कहो । जो कोई दुष्टबुद्धि अपने मित्र के प्रति वंचना करता है वह दस
हजार युगों तक उस पाप का फल भोगता है । प्राणियों के सभी दुःख मित्रदर्शन से नष्ट हो जाते हैं । इसलिये
बुद्धिमान् व्यक्ति मित्रों के प्रति कभी भी कपट व्यवहार नहीं करते हैं । कल्माषपाद के ऐसा कहने पर वट-
निवासी ब्रह्मराक्षस ने प्रसन्न होकर धर्म युक्त बातें कहीं ॥७५-७८॥
ब्रह्मराक्षस बोला- मैं पहले सोमदत्त नामक परम धार्मिक वेदज्ञ और मगध देश का रहने वाला
ब्राह्मण था । महाभाग ! विद्या, युवावस्था और धन के मद से मतवाला होकर गुरु का अपमान कर दिया जिससे
इस गति को प्राप्त हुआ हूँ । मित्र ! इस अवस्था में कहीं भी किसी प्रकार का सुख नहीं पा रहा हूँ, केवल निराहार
६० नारदीयपुराणम्
क्षुत्पिपासापरो नित्यमन्तस्तापेन पीडितः । जगत्त्रासकरो नित्यं मांसाशनपरायणः ॥८२॥
गुर्ववज्ञा मनुष्याणां राक्षसत्वप्रदायिनी । मयानुभूतमेतद्धि ततः श्रीमान्न चाचरेत् ॥८३॥
कल्माषपाद उवाच
गुरुस्तु कीदृशः प्रोक्तः कस्त्वया श्लाघितः पुरा । तद्वदस्व सखे सर्वं परं कौतूहलं हि मे ॥८४॥
ब्रह्मराक्षस उवाच
गुरवः सन्ति बहवः पूज्या वन्द्याश्च सादरम् । तानहं कथयिष्यामि शृणुष्वैकमनाः सखे ॥८५॥
अध्यापकश्च वेदानां वेदार्थद्युतिबोधकः । शास्त्रवक्ता धर्मवक्ता नीतिशास्त्रोपदेशकः ॥८६॥
मन्त्रोपदेशव्याख्याकृद् देसंदेहहृत्तथा । व्रतोपदेशकश्चैव भयत्रातान्नदो हि च ॥८७॥
श्वशुरो मातुलश्चैव ज्येष्ठभ्राता पिता तथा । उपनेता निवेक्ता च संस्कर्ता द्विजसत्तम ॥८८॥
एते हि गुरवः प्रोक्ता पूज्या वन्द्याश्च सादरम् ॥८६॥
कल्माषपाद उवाच
गुरवो बहवः प्रोक्ता एतेषां कतमो वरः । तुल्याः सर्वेऽप्युत सखे तद्यथावद्धि ब्रूहि मे ॥६०॥
ब्रह्मराक्षस उवाच
साधु साधु महाप्राज्ञ यत्पृष्टं तद्ददामि ते । गुरुमाहात्म्यकथनं श्रवणं चानुमोदनम् ॥६१॥
सर्वेषां श्रेय आधत्ते तस्माद्वक्ष्यामि सांप्रतम् । एते समानपूजार्हाः सर्वदा नात्र संशयः ॥६२॥
रहकर दुःखमय जीवन बिता रहा हूँ। मैंने सैकड़ों हजारों दीन ब्राह्मणों को अपना आहार बना डाला । अतः
नित्य प्रति भूखा प्यासा रह कर भूख की ज्वाला से जलता रहता हूँ। नित्य प्रति मांस-भक्षण में ही लगा रहता
और संसार को त्रस्त करता रहता हूँ। गुरु का अपमान मनुष्य को राक्षस बना देता है, इसका पूर्ण रूप से
अनुभव मुझे हो गया है । इसलिए बुद्धिमान् व्यक्ति कभी भी गुरु का अपमान न करें । ॥७६-८३॥
कल्माषपाद बोला-गुरु किसे कहते हैं ? कौन तुम्हारे गुरु थे, जिसके प्रति पहले पूज्य भावना थी ?
मित्र ! सारी बातें मुझसे कहो; मुझे महान् कौतूहल हो रहा है।
ब्रह्मराक्षस बोला-सखे ! गुरु बहुत प्रकार के होते हैं जो आदर पूर्वक पूजने और वन्दना करने के
योग्य हैं, उनके विषय में मैं कह रहा हूँ सावधान होकर सुनो। वेदों को पढ़ाने वाले, वेदार्थ की अर्थ संगति बताने
वाले, शास्त्रोपदेशक, नीतिशास्त्र का उपदेश देने वाले, मन्त्रोपदेशक, भाष्यकार, सन्देह निवारण करने वाले,
व्रतोपदेशक, भय से रक्षा करने वाले, अन्नदाता, पत्नी के पिता, मामा, बड़े भाई, पिता (पालक), उपनयन करने
वाला, उत्पादक (जन्मदाता), और संस्कार करने वाला इतने गुरु कहे गये हैं जो सर्वथा वन्दनीय और पूजनोय
हैं ॥८४-८६॥
कल्माषपाद बोला-गुरु तो बहुत से कहे गए हैं; इनमें कौन श्रेष्ठ हैं ? अथवा सभी समान हैं ? इसको
अपनी बुद्धि के अनुसार मुझसे कहो ।
ब्रह्मराक्षस बोला-महाप्राज्ञ ! तुम धन्य हो ! धन्य हो ! तुमने जो पूछा है उसको अवश्य कहूँगा।
गुरु की महिमा का वर्णन करना और उसकी सुनना सब को कल्याण प्रदान करते हैं। इसलिए इस समय गुरु-
नवमोऽध्यायः ६१
तथापि शृणु वक्ष्यामि शास्त्राणां सारनिश्चयम् । अध्यापकश्च वेदानां मन्त्रव्याख्याकृतस्तथा ॥६३॥
पिता च धर्मवक्ता च विशेषगुरवः स्मृताः । एतेषामपि भूपाल शृणुष्व प्रवरं गुरुम् ॥६४॥
सर्वशास्त्रार्थतत्त्वज्ञैर्भाषितं प्रवदामि ते । यः पुराणानि वदति धर्मयुक्तानि पण्डितः ॥६५॥
संसारपाशविच्छेदकरणानि स उत्तमः । देवपूजार्हकर्माणि देवतापूजने फलम् ॥६६॥
जायते च पुराणेभ्यस्तस्मात्तानीह देवताः । सर्ववेदार्थसाराणि पुराणानीति भूपते ॥६७॥
वदन्ति मुनयश्चैव तद्वक्ता परमो गुरुः । यः संसारार्णवं तर्तुमुद्योगं कुरुते नरः ॥६८॥
शृणुयात्स पुराणानि इति शास्त्रविभागकृत् । प्रोक्तान्सर्वधर्मांश्च पुराणेषु महीपते ॥६९॥
तर्कस्तु वादहेतुः स्यान्नीतिस्त्वैहिकसाधनम् । पुराणानि महाबुद्धे इहामुत्र सुखाय हि ॥१००॥
यः शृणोति पुराणानि सततं भक्तिसंयुतः । तस्य स्यान्निर्मला बुद्धर्भूयो धर्मपरायणः ॥१०१॥
पुराणश्रवणाद्भक्तिर्जायते श्रीपतौ शुभा । विष्णुभक्तनृणां भूप धर्मबुद्धिः प्रवर्तते ॥१०२॥
धर्मात्पापानि नश्यन्ति ज्ञानं शुद्धं च जायते । धर्मार्थकाममोक्षाणां ये फलान्यभिलिप्सवः ॥१०३॥
शृणुयुस्ते पुराणानि प्राहुरित्थं पुराविदः । अहं तु गौतममुनेः सर्वज्ञब्रह्मवादिनः ॥१०४॥
श्रुतवान्सर्वधर्मार्थं गङ्गातीरे मनोरमे । कदाचित्परमेशस्य पूजां कर्तुमहं गतः ॥१०५॥
उपस्थितायापि तस्मै प्रणामं न ह्यकारिषम् । स तु शान्तो महाबुद्धिर्गौतमस्तेजसां निधिः ॥१०६॥
मन्त्रोदितानि कर्माणि करोतीति मुदं ययौ । यस्त्वर्चितो मया देवः शिवः सर्वजगद्गुरुः ॥१०७॥
गुर्ववज्ञा कृता येन राक्षसत्वे नियुक्तवान् । ज्ञानतोऽज्ञानतो वापि योऽवज्ञां कुरुते गुरोः ॥१०८॥
महिमा कह रहा हूँ । ये सभी गुरु समान भाव से पूज्य हैं, इसमें कुछ भी सन्देह नहीं । फिर भी शास्त्रों में जो कुछ
तत्त्व-निर्णय किया गया है उसको कह रहा हूँ, सुनो । वेद पढ़ाने वाले, मन्त्र की व्याख्या करने वाले, पिता और
धर्मोपदेशक विशेष (उत्तम) गुरु कहे गये हैं । इनमें भी जो परमोत्तम गुरु है उनको सुनो ॥६०-६४॥ सब शास्त्रों
के तत्त्वों के ज्ञाता पण्डितों ने इस विषय में जो कुछ कहा है उसको तुमसे बता रहा हूँ । पुराणों से संसार के बन्धनों
से मुक्ति दिलाने वाली विधियाँ, देव-पूजन प्रकार, उनके फल आदि जाने जाते हैं अतः वे पुराण देवता हैं और
इन धार्मिक पुराणों के प्रवक्ता पण्डित ही उत्तम गुरु हैं । भूपते ! पुराण सब वेदों के सारभूत हैं और उनके वक्ता
परम गुरु हैं ऐसा मुनिगण कहते हैं । जो इस संसार सागर से पार पाने का उद्योग करते हैं वे पुराणों को अवश्य
सुनें; ऐसा शास्त्रों के विभाग करने वाले पण्डितों ने कहा है । राजन् ! पुराणों में सब प्रकार के धर्म कहे गए हैं ।
तर्क शास्त्र केवल विवाद में सहायक होता है, नीतिशास्त्र केवल सांसारिक सुख प्रदान करता है; परन्तु हे महाबुद्धि
मान् ! पुराण लौकिक और पारलौकिक दोनों प्रकार के कल्याण देने वाले हैं ॥६५-१००॥ जो सर्वदा भक्ति पूर्वक
पुराणों का श्रवण करता है उसकी बुद्धि निर्मल होती है और वह परम धार्मिक हो जाता है । पुराणों के सुनने से
श्रीपति विष्णु में अचल भक्ति होती है । भूप ! विष्णुभक्तों की धर्माचरण में रुचि बढ़ती है । धर्म से पाप नष्ट
हो जाते हैं और शुद्ध ज्ञान प्राप्त हो जाता है । धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का फल जो प्राप्त करना चाहते हैं
उनको अवश्य पुराण श्रवण करना चाहिए, ऐसा पुराणविद् कहते हैं । गंगा के मनोरम तट पर मैंने सर्वज्ञ, ब्रह्म-
वादी गौतम मुनि से सब धर्मों का सार सुना था । एक दिन मैं परम प्रभु (शिव) की पूजा करने के लिए गया ।
॥१०१-१०५॥ उपस्थित होते हुए भी गौतम मुनि को मैंने प्रणाम नहीं किया; परन्तु वे परम तेजस्वी शान्त
मुनि यह सोचकर कि यह मन्त्रानुकूल कर्म को कर रहा है, प्रसन्न होकर चले गए । परन्तु मैं जिन देवेश जगद्
गुरु शंकर की पूजा कर रहा था उन्होंने गुरु-अपमान के कारण मुझको इस राक्षस-योनि में भेज दिया । जान-
बूझ कर या अनजान रूप से भी जो गुरु का तिरस्कार करता है उसकी बुद्धि, विद्या, धन, पुत्र तथा सारी क्रियायें
६२ नारदीयपुराणम्
तस्यैवाशु प्रणश्यन्ति धीविद्यार्थात्मजैक्रियाः । शुश्रूषां कुरुते यस्तु गुरूणां सादरं नरः ॥१०८॥
तस्य संपद्भवेद्भूष इति प्राहुर्विपश्चितः । तेन शापेन दग्धोऽहमन्तश्चैव क्षुधाग्निना ॥११०॥
मोक्षं कदा प्रयस्यामि न जाने नृपसत्तम । एवं वदति विप्रेन्द्र वटस्थेऽस्मिन्निशाचरे ॥१११॥
धर्मशास्त्रप्रसंगेन तयोः पापं क्षयं गतम् । एतस्मिन्नन्तरे प्राप्तः कश्चिद्विप Generic्रोऽतिधार्मिकः ॥११२॥
कलिङ्गदेशसंसूतो नाम्ना गर्ग इति स्मृतः । वहन्गङ्गाजलं स्कंधे स्तुवन् विश्वेश्वरं प्रभुम् ॥११३॥
गायन्नामानि तस्यैव मुदा हृष्टतनूरुहः । तमागतं मुनिं दृष्ट्वा पिशाचीराक्षसौ च तौ ॥११४॥
प्राप्ता नः पारणेत्युक्त्वा प्राद्रवन्नूर्ध्वबाहवः । तेन कीर्तितनामानि श्रुत्वा दूरे व्यवस्थिताः ।
अशक्तास्तं धर्षयितुमिदमूचुश्च राक्षसाः ॥११५॥
अहो विप्र महाभाग नमस्तुभ्यं महात्मने । नामकीर्तनमाहात्म्याद्राक्षसा दूरगा वयम् ॥११६॥
अस्माभिर्भक्षिताः पूर्वं विप्राः कोटिसहस्रशः । नामप्रावरणं विप्र रक्षति त्वां महाभयात् ॥११७॥
नामश्रवणमात्रेण राक्षसा अपि भो वयम् । परां शान्ति समापन्ना महिम्ना ह्यच्युतस्य वै ॥११८॥
सर्वथा त्वं महाभाग रागादिरहितो ह्यसि । गंगाजिलाभिषेकेन पाह्मास्मान्महापातकोच्चयात् ॥११९॥
हरिसेवापरो भूत्वा यश्चात्मानं तु तारयेत् । स तारयेज्जगत्सर्वमिति शंसन्ति सूरयः ॥१२०॥
अपहाय हरेर्नाम घोरसंसारभेषजम् । केनोपायेन लभ्येत मुक्तिः सर्वत्र दुर्लभा ॥१२१॥
लोहोडुपेन प्रतरन्निमज्जत्युदके यथा । तथैवाकृतपुण्यास्तु तारयन्ति कथं परान् ॥१२२॥
अहो चरित्रं महतां सर्वलोकसुखावहम् । यथा हि सर्वलोकानामानन्दाय कलानिधिः ॥१२३॥
नष्ट हो जाती हैं। जो मनुष्य आदर पूर्वक गुरु की शुश्रूषा करता है, भूपाल ! उसको अवश्य सम्पत्ति मिलती है
और वह सुखी रहता है, ऐसा विद्वान् कहते हैं। उस शाप से ही मैं नष्ट हो गया और इस प्रकार भूख की ज्वाला
से सदा जलता रहता हूँ ॥१०६-११०॥
नृपसत्तम ! कब इस योनि से छुटकारा मिलेगा, मैं नहीं जानता। विप्रेन्द्र ! इस प्रकार वट पर रहने
वाले निशाचर से वार्तालाप करने पर धर्मशास्त्र की चर्चा के प्रभाव से उन दोनों के पाप क्षीण हो गए। इसी
बीच कलिङ्ग देश का रहने वाला गर्ग नामक अति धार्मिक ब्राह्मण वहाँ आया जो कन्धे पर गंगाजल लिए हुए
था और विश्वेश्वर प्रभु की स्तुति कर रहा था । भगवान् के नामों का उच्चारण करता हुआ वह भक्त आनन्दा-
तिरेक से पुलकित हो जाता था । उस मुनि को अपनी ओर आते देखकर वे दोनों पिशाची और राक्षस 'आज
हम लोगों को भोजन मिल गया, यह कह कर हाथ ऊपर उठाए हुए उस मुनि की ओर दौड़े परन्तु उसके नामो-
च्चारण को सुनकर दूर ही ठिठक गए। उस मुनि पर आक्रमण करने में अपने को असमर्थ पाकर उन दोनों राक्षसों
ने कहा ॥१११-११५॥ हे महाभाग विप्र ! आप महात्मा को नमस्कार है, आपके नाम संकीर्तन के प्रभाव से
हम दोनों राक्षस दूरस्थ ही हैं। पहले हम लोगों ने हजारों करोड़ों ब्राह्मणों को अपना आहार बना डाला परन्तु
आज तुमको भगवन्नामोच्चारण रूपी कवच महाभय (मृत्यु) से बचा रहा है। नाम श्रवण मात्र से राक्षस होते हुए
भी हम दोनों भगवान् अच्युत की महिमा से परम शान्ति का अनुभव कर रहे हैं ॥११६-११८॥ महाभाग ! तुम
तो सर्वथा रागादि दोषों से शून्य हो, अतः गंगाजल के अभिषेक से हमें इस महापाप से बचाओ। जो हरिसेवा
में निरत रह कर आत्मोद्धार करता है वह सारे संसार का उद्धार कर सकता है, ऐसा मनीषीजन कहते हैं।
हरिनाम को छोड़ कर इस कराल माया से मुक्ति दिलाने वाली कोई दूसरी ओषधि नहीं है। इसको छोड़ कर
किसी दूसरे उपाय से नहीं प्राप्त की जा सकती है। वह तो सर्वथा और सर्वदा परम दुर्लभ है। जिस प्रकार लोहे की
बनी नौका के सहारे तैरने का साहस करने वाला बीच में डूब जाता है। उसी प्रकार अकृतपुण्य (पापी) कैसे
६३
नवमोऽध्यायः
पृथिव्यां यानि तीर्थानि पवित्राणि द्विजोत्तम । तानि सर्वाणि गङ्गायाः कणस्यापि समानि न ॥१२४॥
तुलसीदलसंमिश्रमपि सर्षपमात्रकम् । गङ्गाजलं पुनात्येव कुलानामेकविंशतिम् ॥१२५॥
तस्माद्विप्र महाभाग सर्वशास्त्रार्थकोविद । गङ्गाजलप्रदानेन पाह्मास्मान्पापकर्मिणः ॥१२६॥
इत्याख्यातं राक्षसैस्तैर्गङ्गामाहात्म्यमुत्तमम् । निशम्य विस्मयाविष्टो बभूव द्विजसत्तमः ॥१२७॥
एषामपीदृशी भक्तिर्गङ्गायां लोकमातरि । किमु ज्ञानप्रभावाणां महतां पुण्यशालिनाम् ॥१२८॥
अथासौ मनसा धर्मं विनिश्चित्य द्विजोत्तमः । सर्वभूतहितो भक्तः प्राप्नोतीति परं पदम् ॥१२९॥
ततो विप्रः कृपाविष्टो गङ्गाजलमनुत्तमम् । तुलसीदलसंमिश्रं तेषु रक्षःस्वसेचयत् ॥१३०॥
राक्षसास्तेन सिक्तास्तु सर्षपोपमर्बिदुना । विसृज्य राक्षसं भावमभवन्देवतोपमाः ॥१३१॥
ब्राह्मणी पुत्रसंयुक्ता सोमदत्तस्तथैव च । कोटिसूर्यप्रतीकाशा बभूवुर्विबुधर्षभाः ॥१३२॥
शंखचक्रगदाचिह्ना हरिसारूप्यमागताः । स्तुवन्तो ब्राह्मणं सम्यक्ते जग्मुर्हरिमन्दिरम् ॥१३३॥
राजा कल्मषपादस्तु निजरूपं समास्थितः । जगाम महतीं चिन्तां दृष्ट्वा तान्मुक्तिगानधान् ॥१३४॥
तस्मिन् राज्ञि सुदुःखार्त गूढरूपा सरस्वती । धर्ममूलं महावाक्यं बभाषेऽगाधया गिरा ॥१३५॥
भो भो राजन्महाभाग न दुःखं गन्तुमर्हसि । राजंस्तवापि भोगान्ते महच्छ्रेयो भविष्यति ॥१३६॥
सत्कर्मधूतपापा ये हरिभक्तिपरायणाः । प्रयान्ति नात्र सन्देहस्तद्विष्णोः परमं पदम् ॥१३७॥
सर्वभूतदयायुक्ता धर्ममार्गप्रवर्तिनः । प्रयान्ति परमं स्थानं गुरुपूजापरायणाः ॥१३८॥
दूसरों का उद्धार कर सकते हैं ? अहो ! महान् व्यक्तियों का चरित्र उसी प्रकार सब लोगों के लिए सुख दायक
होता है जिस प्रकार चन्द्रमा का उदय सब प्राणियों के लिए आनन्ददायक होता है। द्विजवर्य ! इस भूतल के
जितने पवित्र तीर्थ हैं वे सभी गंगाजल के क्षुद्र अंश की भी समानता नहीं कर सकते ॥११६-१२४॥ तुलसी दल
से मिला गंगाजल का एक सरसों के बराबर बिन्दु भी इक्कीस कुल परम्परा का उद्धार करता है । इसलिए हे
सब शास्त्रों के तत्त्वज्ञ ! महाभाग विप्र ! गंगाजल को देकर हम पापियों का उद्धार करो । इस प्रकार उन राक्षसों
ने गंगा का उत्तम माहात्म्य कह कर सुनाया ॥१२५-१२७॥
इस बातों को सुनकर वह द्विज आश्चर्य चकित हो गया कि जब इन पाप परायण जनों की भी लोक-माता
गंगा में यह श्रद्धा है तब तो ज्ञानी महात्माओं के विषय में क्या कहा जाय ? द्विजोत्तम ! इसके अनन्तर उस
भद्र पुरुष ने विचार पूर्वक अपना कर्त्तव्य निश्चित किया कि सब प्राणियों की हित कामना में रत रहने वाला भक्त
अवश्यमेव परम पद को प्राप्त करता है । तदन्तर उस विप्र ने कृपा करके तुलसीदल मिश्रित गंगा जल उन राक्षसों
पर छिड़का । केवल सरसों के बराबर गंगाजल-विन्दु के अभिषेक मात्र से वे सब राक्षस शरीर को छोड़कर देवता
के समान हो गए । ।१२८-१३१॥ पुत्र के सहित वह ब्राह्मणी और सोमदत्त कोटि सूर्य के समान तेजोमय शरीर वाले
देवता हो गए ओर शंख, चक्र, गदा धारी हरि के समान रूप पा गए। वे उस ब्राह्मण की भलीभांति स्तुति करने के बाद
भगवान् के मन्दिर में गए। राजा कल्माषपाद अभी अपने को राक्षस रूप में ही पाकर और उन पापी सहयोगियों को
मुक्त देखकर घोर चिन्ता करने लगा । राजा को इस प्रकार चिन्तातुरदे खकर सरस्वती ने अप्रत्यक्ष रूप से गम्भीर स्वर
में धर्म-सम्मत बातें कहीं । हे राजन् ! महाभाग ! दुःखी होने की आवश्यकता नहीं, राजन् तुम भी कर्म-भोग के अनन्तर
महान् श्रेय प्राप्त करोगे ॥१३२-१३६॥ जिन्होंने सत्कर्मों के द्वारा अपने पापों को विनष्ट कर दिया है और हरि पूजा
में जो सर्वथा लीन हैं वे अवश्यमेव परम पद को प्राप्त करते हैं । निखिल प्राणिसमूह पर दया करने वाले धर्म
की प्रतिष्ठा करने वाले और गुरुपूजा में निरत रहने वाले परम स्थान को प्राप्त करते हैं । सरस्वती की इन
६४ नारदीयपुराणम्
इतीरितं समाकर्ण्य भारत्या नृपसत्तमः । मनसा निर्वृतिं प्राप्य सस्मार च गुरोर्वचः ॥१३९॥
स्तुवन्गुरुं च तं विप्रं हरिं चैवातिहर्षितः । पूर्ववृत्तं च विप्राय सर्वं तस्मै न्यवेदयत् ॥१४०॥
ततो नृपस्तु कालिङ्गं प्रणम्य विधिवन्मुने । नामानि व्याहरन्विष्णोः सद्यो वाराणसीं ययौ ॥१४१॥
षण्मासं तत्र गङ्गायां स्नात्वा दृष्ट्वा सदाशिवम् । ब्राह्मणीदत्तशापात्तु मुक्तो मित्रसहोऽभवत् ॥१४२॥
ततस्तु स्वपुरीं प्राप्तो वसिष्ठेन महात्मना । अभिषिक्तो मुनिश्रेष्ठ स्वकं राज्यमपालयत् ॥१४३॥
पालयित्वा महीं कृत्स्नां भुक्त्वा भोगान्स्त्रियं विना । वसिष्ठात्प्राप्य सन्तानं गतो मोक्षं नृपोत्तमः ॥१४४॥
नैतच्चित्रं द्विजश्रेष्ठ विष्णोर्वाराणसीगुणान् । गृणञ्छृण्वन्स्मरन्गङ्गां पीत्वा मुक्तो भवेन्नरः ॥१४५॥
तस्मान्महिम्नो विप्रेन्द्र गङ्गायाः शक्यते नहि । पारं गन्तुं सुराधीशैर्ब्रह्मविष्णुशिवैरपि ॥१४६॥
यन्नामस्मरणादेव महापातककोटिभिः । विमुक्तो ब्रह्मसदनं नरो याति न संशयः ॥१४७॥
गङ्गा गङ्गेति यन्नाम सकृदप्युच्यते यदा । तदैव पापान्मुक्तो ब्रह्मलोके महीयते ॥१४८॥
इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे प्रथमपादे गङ्गामाहात्म्ये नवमोऽध्यायः ॥ ६ ॥
बातों को सुनकर नृप को कुछ मन में संतोष हुआ और गुरु के कथन का स्मरण किया । बड़ी प्रसन्नता से अपने
गुरु की, उस ब्राह्मण की और भगवान् की स्तुति करने लगा और उस विप्र से अपने जीवन की पूर्वकालीन सारी
घटना कह सुनाई ॥१३७-१४०॥ मुनिश्रेष्ठ ! स्तुति के बाद राजा ने विधि पूर्वक उस कलिङ्ग देश वासी ब्राह्मण को
प्रणाम किया और हरिनाम का उच्चारण करता हुआ शीघ्र वाराणसी चला गया । वहाँ छह महीने तक गंगा स्नान
और सदाशिव का दर्शन कर वह मित्रसह राजा ब्राह्मणी के शाप से मुक्त हुआ । इस प्रकार पाप-मुक्त होकर वह
अपनी राजधानी में गया और महात्मा वशिष्ठ से पुनः अभिषिक्त होकर अपने राज्य का पालन करने लगा ।
॥१४१-१४३॥ उस नृपवर्य ने सम्पूर्ण पृथ्वी का पालन और भोगों का भोग किया परन्तु शाप-भय से स्त्री-भोग
से अपने को बचाये रहा । वसिष्ठ द्वारा क्षेत्रज पुत्रों को उत्पन्न करा कर अन्त में वह मोक्ष का भी अधिकारी हुआ ।
द्विजश्रेष्ठ ! इसमें आश्चर्य करने की आवश्यकता नहीं, मनुष्य भगवान् विष्णु और गंगा की महिमा का वर्णन
और श्रवणकर एवं गंगाजल का पान कर अवश्य मुक्त हो जाता है । विप्रेन्द्र ! इसलिए गंगा की महिमा के वर्णन
करने में देवेन्द्र ब्रह्मा, विष्णु और शंकर भी सफल नहीं हो सकते हैं। गंगा के नाम स्मरण मात्र से मनुष्य अपने
करोड़ों पापों से मुक्त होकर ब्रह्मलोक को चला जाता है, इसमें कुछ भी सन्देह नहीं । जो एक बार भी 'गंगा, गंगा,
ऐसा उच्चारण करता है वह तत्काल पाप मुक्त होकर ब्रह्मलोक में पूजित होता है ॥१४४-१४८॥
श्री नारदीय पुराण में गंगा-महात्म्य-वर्णन नामक
नवां अध्याय समाप्त ॥६॥
दशमोऽध्यायः
नारद उवाच
विष्णुपादाग्रसंभूता या गङ्गेत्यभिधीयते । तदुत्पत्तिं वद भ्रातरनुग्राह्योऽस्मि ते यदि ॥१॥
सनक उवाच
शृणु नारद वक्ष्यामि गङ्गोत्पत्तिं तवानघ । वदतां शृण्वतां चैव पुण्यदां पापनाशनीम् ॥२॥
आसीदिन्द्रादिदेवानां जनकः कश्यपो मुनिः । दक्षात्मजे तस्य भार्ये दितिश्चादितिरेव च ॥३॥
अदितिर्देवमातास्ति दैत्यानां जननी दितिः । ते तयोरात्मजा विप्र परस्परजयैषिणः ॥४॥
सदा सपूर्वदेवास्तु यतो दैत्याः प्रकीर्तिताः । आदिदैत्यो दितेः पुत्रो हिरण्यकशिपुर्बली ॥५॥
प्रह्लादस्तस्य पुत्रोऽभूत्सुमहान्दैत्यसत्तमः । विरोचनस्तस्य सुतो बभूव द्विजभक्तिमान् ॥६॥
तस्य पुत्रोऽतितेजस्वी बलिरासीत्प्रतापवान् । स एव वाहिनीपालो दैत्यानामभवन्मुनेः ॥७॥
बलेन महता युक्तो बुभुजे मेदिनीमिमाम् । विजित्य वसुधां सर्वां स्वर्गं जेतुं मनो दधे ॥८॥
गजाश्च यस्यायुतकोटिलाक्षास्तावन्त एवाश्वरथा मुनीन्द्र ।
गजे गजे पंचशती पदातेः किं वर्ण्यते तस्य चमूर्वरिष्ठा ॥९॥
अध्याय १०
राजा बलि से देवताओं की पराजय
नारद बोले—भाई ! यदि आप का मेरे ऊपर अनुग्रह है तो कृपा कर विष्णु के चरणों के निकली हुई
गंगा नदी की उत्पत्ति कथा कहिए ॥१॥
सनक बोले—निष्पाप ! सुनो । आज तुमसे श्रोता और वक्ता दोनों के पापों को नष्ट करने वाली गंगा
की उत्पत्ति कथा कह रहा हूँ । इन्द्र आदि देवताओं को उत्पन्न करने वाले कश्यप नामक एक मुनि थे, उनकी
दक्षपुत्री दिति और अदिति नाम की दो भार्याएँ थीं । अदिति देवों की माता और दिति दैत्यों की जननी थी ।
विप्र ! उनके ये पुत्र परस्पर सर्वदा एक दूसरे को जीतना चाहते थे क्योंकि दैत्य सर्वदा से देवों के अग्रज कहे गए
हैं । दिति पुत्र बली हिरण्यकशिपु आदि दैत्य था । उसका दैत्य-प्रवर महातेजस्वी प्रह्लाद नामक पुत्र हुआ ।
प्रह्लाद का विरोचन नामक परम ब्राह्मण-भक्त पुत्र हुआ । उसका भी महाबलवान्, तेजस्वी बलि नामक पुत्र हुआ,
जो स्वयं दैत्य-वाहिनी का एक मात्र पालक और रक्षक था ॥२-७॥ उसने अपने सैन्य बल से इस मेदिनी को
वश में किया और पृथ्वी को जीत लेने के बाद स्वर्ग-विजय की भी कामना करने लगा । मुनीन्द्र ! जिसकी सेना में
दश सहस्र करोड़ लड़ाकू हाथी उतने ही अश्व और रथ, एवं प्रत्येक हाथी के पीछे पचास पैदल सिपाही थें तब
उसकी विशाल वाहिनी का क्या वर्णन किया जाय । उसके मंत्रि-समूह में अग्रगण्य दो मंत्री थे, जिनमें एक का नाम
६—नार०
यहाँ दिए गए पृष्ठ का सटीक पाठ्यान्तरण (transcription) प्रस्तुत है:
६६ नारदीयपुराणम्
अमात्यकोद्वयप्रसरावमात्यौ कुम्भाण्डनामाथ च कूपकर्णः ।
पित्रा समं शौर्यपराक्रमाभ्यां बाणो बलेः पुत्रशताग्रजोऽभूत् ॥१०॥
बलिः सुराञ्जेतुमनोः प्रवृत्तः सैन्येन युक्तो महता प्रतस्थे ।
ध्वजातपत्रैगगनाम्बुराशेस्तरङ्गविद्युत्स्मरणं प्रकुर्वन् ॥११॥
अवाप्यवृत्रारिपुरं सुरारी रुरोध दैत्यैर्मृगराजगाढैः ।
सुराश्च युद्धाय पुरात्तथैव विनिर्ययुर्वज्रकरादयश्च ॥१२॥
ततः प्रवृत्ते युद्धं घोरं गीर्वाणदैत्ययोः । कल्पांतमेघनिर्घोषं डिंडिमध्वानसंभ्रमम् ॥१३॥
मुमुचुः शरजालानि दैत्याः सुमनसां बले । देवांश्च दैत्यसेनासु संग्रामेऽत्यन्तदारुणे ॥१४॥
जहि दारय भिंधीति छिंधि मारय ताडय । इत्येवं सुमहाग्घोषो वदतां सेनयोरभूत् ॥१५॥
शरदुन्दुभिनिध्वाणैः सिंहनादैः सुरद्विषाम् । भाङ्कारैः स्यन्दनानां च बाणक्रङ्कारनिःस्वनैः ॥१६॥
अश्वानां हेषितैश्चैव गजानां बृंहितैस्तथा । टङ्कारैर्धनुषां चैव लोकः शब्दमयोऽभवत् ॥१७॥
सुरासुरविनिर्मुक्तबाणनिष्पेषजानले । अकालप्रलयं मेने निरीक्ष्य सकलं जगत् ॥१८॥
बभौ देवद्विषां सेना स्फुरच्छस्त्रौधधारिणी । चलविद्युन्निभा रात्रिश्च्छादिता जलदैरिव ॥१९॥
तस्मिन्युद्धे महागौरैर्गीरीन् क्षिप्तान् सुरारिभिः । नाराचैश्चूर्णयामासुर्देवास्ते लघुविक्रमाः ॥२०॥
केचित्संताडयामासुर्गजैर्गजांस्तथारथैः । अश्वैरश्वांश्च केचित्तु गदादण्डैरथाऽर्दयन् ॥२१॥
परिघैस्ताडिताः केचित्पेतूः शोणितकर्द्दमे । समुत्क्रांतासवः केचिद्विमानानि समाश्रिताः ॥२२॥
ये दैत्या निहता देवैः प्रसह्य सङ्गरे तदा । ते देवभावमापन्ना दैत्यान्त्समुपादवन् ॥२३॥
कुंभाण्ड और दूसरे का नाम कूपकर्ण था । शूरता और पराक्रम में पिता के ही समान बलि का सौ भाइयों में
ज्येष्ठ बाण नामक पुत्र भी था ॥८-१०॥ जब बलि के मन में देवों को जीतने की इच्छा हुई तब वह अपनी महा
सैन्य शक्ति के साथ रणाभियान के लिए स्वर्ग की ओर प्रस्थित हुआ । उसकी सेना की असंख्य ध्वजाओं और छत्रों
की चमक ऐसी प्रतीत होती थी मानों आकाशवर्ती मेघों के बीच चमचमाती हुई विद्युत् की रेखा हो । इन्द्र पुर के
पास जाकर उस असुर ने अपने सिंह सदृश पराक्रमी राक्षस सैनिकों से घेरा डाल दिया । यह देख कर देवता भी,
वज्र आदि अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित होकर नगर से निकल गये । क्षण भर में देवों और दैत्यों में तुमुल युद्ध
छिड़ गया, प्रलय कालीन मेघ के समान भयङ्कर घोष करने वाले युद्ध-वाद्य बजने लगे ॥११-१३॥
दैत्यों ने देवताओं की सेना पर भयङ्कर शस्त्र-समूहों की वर्षा की । देवता भी असुर सैनिकों को अपने अस्त्र
प्रहार से भूनने लगे । परस्पर लड़न वाले सैनिकों के मारो, फाड़ डालो, तोड़ दो, टूक-टूक कर दो, मारो, पटको,
आदि कोलाहल से तुमुल घोष होने लगा । धनुष और दुन्दुभियों की ध्वनि से, राक्षसों की गर्जना से, रथों की
भनभनाहट से, बाणों की कड़कड़ाहट से, घोड़ों की हिनहिनाहट से, हाथियों के चिग्घाड़ से और धनुष की टंकारों
से आकाश-पाताल गूंज उठा ॥१४-१७॥ देव-दानवों के छोड़े गए वाणों के संघर्ष से भयङ्कर अग्नि-ज्वाला निकलने
लगी जिसको देखकर सारा संसार अकाल प्रलय की कल्पना करने लगा । चमचमाते अस्त्र-शस्त्रों को धारण करते
वाली राक्षसों की सेना ऐसी जान पड़ती थी मानों बादलों से घिरी रात्रि चंचल बिजली की चमक से सुशोभित
है । उस घोर संग्राम में दुर्दम राक्षसों से फेंके हुए पर्वतों को वे फुर्तीले देव अपने नाराचों से चूर-चूर कर देते
थे ॥१८-२०॥ कुछ देवों ने अपने हाथियों द्वारा हाथियों को, रथों से रथों को और अश्वों से शत्रु के अश्वों की
क्षति पहुँचाई । दूसरों ने अपनी गदाओं की मार से शत्रुओं को आहत किया । कुछ असुर परिघों की मार से रक्त
के कीचड़ में गिर पड़ते थे और कुछ मर कर शीघ्र देव रूप धारण कर विमानों पर विहार करने लगते थे । उस
६७
दशमोऽध्यायः
॥२४॥
अथ दैत्याणाः क्रुद्धास्ताड्यमानाः सरैर्भृशम् । शस्त्रैर्बहुविधैर्दैवान्निजघ्नुरतिदारुणाः ॥२४॥
दृषद्भिर्भिन्दिपालैश्च खड्गैः परशुतोमरैः । परिघैश्छुरिकाभिश्च कुन्तैश्चक्रैश्च शङ्कुभिः ॥२५॥
मुसलैरङ्कुशैश्चैव लाङ्गलैः पट्टिशैस्तथा । शक्त्योपलैः शतघ्नीभिः पाशैश्च तलमुष्टिभिः ॥२६॥
शूलैर्नालीकनाराचैः क्षेपणीयैस्समुद्गरैः । रथाश्वनागपद्गैः सङ्कुलो ववृधे रणः ॥२७॥
देवाश्च विविधास्त्राणि दैतेयेभ्यः समाक्षिपन् । एवमब्दसहस्राणि युद्धमासीत्सुदारुणम् ॥२८॥
अथ दैत्यबले वृद्धे पराभूता दिवौकसः । सुरलोकं परित्यज्य सर्वे भीताः प्रदुद्रुवुः ॥२९॥
नररूपपरिच्छन्ना विचेरुरवनीतले । वैरोचनिस्तुभुवनं नारायणपरायणः ॥३०॥
बुभुजेऽव्याहतैश्वर्यप्रवृद्धश्रीर्महाबलः । इयाज चाश्वमेधैः स विष्णुप्रीणनतत्परः ॥३१॥
इन्द्रत्वं चाकरोत्स्वर्गे दिक्पालत्वं तथैव च । देवानां प्रीणनार्थाय यैः क्रियन्ते द्विजैर्मखाः ॥३२॥
तेषु यज्ञेषु सर्वेषु हविर्भुङ्क्ते स दैत्यराट् । अदितिः स्वात्मजान्वीक्ष्य देवमातातिदुःखिता ॥३३॥
वृथात्र निवसामीति मत्वागाद्धिमवद्गिरिम् । शक्रस्यैश्वर्यमिच्छन्ती दैत्यानां च पराजयम् ॥३४॥
हरिध्यानपरा भूत्वा तपस्तेपेऽतिदुष्करम् । किंचित्कालं समासीना तिष्ठंती च ततः परम् ॥३५॥
पादेनैकेन सुचिरं ततः पादाग्रमात्रतः । कंचित्कालं फलाहारा ततः शीर्णदलाशना ॥३६॥
ततो जलाशना वायुभोजनाहारवर्जिता । सच्चिदानन्दसन्दोहं ध्यायत्यात्मानमात्मना ॥३७॥
दिव्याब्दानां सहस्रं सा तपोऽतप्यत नारद । दुरन्तं तत्तपः श्रुत्वा दैतेया मथिनोऽदितिम् ॥३८॥
समय युद्ध में देवताओं से जो राक्षस मारे जाते थे वे स्वयं देवता बनकर राक्षसों पर आक्रमण करते थे । जब
असुर गण इस प्रकार देवों से बुरी तरह आहत होने लगे तब क्रुद्ध हो गए और बड़ी निष्ठुरता से विभिन्न शस्त्रों
से देवों पर प्रहार करने लगे ।२१-२४॥ वह देवासुर-संग्राम पत्थरों की वर्षा से, भिन्दिपाल, खड्ग, परशु, तोमर,
परिध, छुरिका, भालों, चक्र, शंकु, मुशल, अंकुश, लांगूल, पट्टिश, वेग से पत्थरों की वर्षा करने वाले यन्त्रों,
शतघ्नी (तोप) पाश, तलमुष्टि, (?), शूल, नाराच, और फेंके जाने वाले मुद्गरों के प्रहार से रथ, अश्व, हाथी और
पैदल सैनिकों की घोर, भयङ्कर मार-काट से अत्यन्त भयानक हो गया । देवों ने भी विविध अस्त्रों के प्रहार से
राक्षसों को व्याकुल कर दिया । इस प्रकार वह महाभयङ्कर संग्राम एक हजार वर्षों तक चलता रहा ॥२५-२८॥
अन्त में दैत्यों की सेना प्रबल हो गई, देवगण पराजित हो गए, सभी देवता देवलोक छोड़कर इधर-उधर
डर कर भाग निकले, मनुष्यों का रूप धारण कर पृथ्वी पर भटकने लगे । नारायण भक्त वैरोचन बलि अपने
अमित ऐश्वर्य और सतत श्री वृद्धि का उपयोग करने लगा । विष्णु की उपासना में सर्वदा सचेष्ट रहने वाले उस
असुर ने अनेक अश्वमेध यज्ञ किए । उसने स्वर्ग में इन्द्र का अधिकार इसी प्रकार दिक्पालों का भी अधिकार
भी प्राप्त कर लिया । ब्राह्मण गण देवों की प्रीति के लिए जिन-जिन यज्ञों को करते थे उनमें वह स्वयं जाकर
हवि ग्रहण करता था । देव माता अदिति अपने पुत्रों को अति दीन-दशा देख कर अति दुःखी हो गई ॥२९-३३॥
मैं व्यर्थ ही यहाँ दिन बिता रही हूँ, यह सोचकर वह हिमालय पर्वत की ओर चली गई । वहाँ जाकर अपने पुत्र
इन्द्र की विभव कामना और दैत्यों के पराजय की इच्छा से भगवान् की सेवा में तल्लीन हो कठोर तप करने
लगी । कुछ समय तक बैठकर पुनः खड़ी होकर, कुछ समय तक एक पैर पर स्थित होकर और कुछ समय
पैर की अंगुलियों के सहारे खड़ी होकर तपस्या की । इसी प्रकार कुछ समय तक फलाहार कर तत्पश्चात् गिरी
हुई सूखी पत्तियों पुनः जल और केवल वायु का ही आहार कर अपनी तपस्या को और कठिन कर दिया । नारद !
आनन्दमय सच्चिदानन्द का अपने अन्तःकरण में ध्यान करती हुई उस देव-जननी ने एक सहस्र दिव्य वर्ष बिता
दिये । अदिति के उस घोर तप का पता पाकर मायावी दैत्यों ने देवता का रूप बनाकर बलि के कहे हुए शब्दों
६८ नारदीयपुराणम्
देवतारूपमास्थाय संप्रोचुर्बलिनोदिताः । किमर्थं तप्यते मातः शरीरपरिशोषणम् ॥३८॥
यदि जानन्ति दैतेया महद्दुःखं ततो भवेत् । त्यजेदं दुःखबहुलं कायशोषणकारणम् ॥३९॥
प्रयाससाध्यं सुकृतं न प्रशंसन्ति पण्डिताः । शरीरं यत्नतो रक्ष्यं धर्मसाधनतत्परैः ॥४०॥
ये शरीरमुपेक्षन्ते ते स्युरात्मविघातिनः । सुखं त्वं तिष्ठ सुभगे पुत्रानस्मान्न खेदय ॥४१॥
मात्रा हीना जना मातर्मृतप्राया न संशयः । गावो वा पशवो वापि यत्र गावो महीरुहाः ॥४२॥
न लभन्ते सुखं किंचिन्मात्रा हीना मृतोपमाः । दरिद्रो वापि रोगी वा देशान्तरगतोऽपि वा ॥४३॥
मातृदर्शनमात्रेण लभते परमां मुदम् । अन्ने वा सलिले वापि धनादौ वा प्रियासु च ॥४४॥
कदाचिद्विमुखो याति जनो मातरि कोऽपि न । यस्य माता गृहे नास्ति यत्न धर्मपरायणा
साध्वी च स्त्री पतिप्राणा गन्तव्यं तेन वै वनम् ॥४६॥
धर्मश्च नारायणभक्तिहीनो धनं च सद्भोगविवर्जितं हि ।
गृहं च भार्यातनयैर्विहीनं यथा तथा मातर्विहीनमर्त्यः ॥४७॥
तस्माद्देवि परित्राहि दुःखार्तानात्मजांस्तव । इत्युक्ताप्यदितिर्दैत्यैर्न चचाल समाधितः ॥४८॥
एवमुक्तवासुराः सर्वे हरिध्यानपरायणाम् । निरीक्ष्य क्रोधसंयुक्ता हन्तुं चक्रुर्मनोरथम् ॥४९॥
कल्पान्तमेघनिर्घोषाः क्रोधसंरक्तलोचनाः । दंष्ट्राग्रैरसृजन्वह्निं सोऽदहत्काननं क्षणात् ॥५०॥
शतयोजनविस्तीर्णं नानाजीवसमाकुलम् । तेनैव दग्धा दैतेया ये प्रधर्षयितुं गताः ॥५१॥
में कहा--हे माता ! शरीर को सुखा देने वाले इस तप को क्यों कर रही हो ॥३४-३६॥ यदि दैत्य इस रहस्य
को जान जायेंगे तब तो और अधिक कष्ट होगा। इस कष्टसाध्य और काय को क्लेश पहुँचाने वाले दुःखकर
तप को छोड़ दो। पण्डित जन कष्टसाध्य पुण्य कर्म की प्रशंसा नहीं करते । धर्म साधना में तत्पर रहने वाले
मनुष्यों को इस शरीर को बड़े यत्न से रक्षा करनी चाहिए ॥४०-४१॥ जो अपने शरीर को इस प्रकार कष्ट देते
हैं वे आत्मघाती कहे जाते हैं। सुशीले ! तुम सुख पूर्वक रहो अपने पुत्रों को इस घोर तपस्या से खिन्न मत करो ।
माता ! मातृ हीन मनुष्य मरे हुए के समान है इसमें कुछ भी सन्देह नहीं । गायें हों या पशु हों वे पशुओं तथा
घास से युक्त स्थान में रह कर भी मातृ हीन होने पर मृतक तुल्य हैं तथा कुछ भी सुख नहीं पाते हैं । दरिद्र,
रोगी अथवा विदेश गया हुआ पुत्र केवल अपनी माता का दर्शन पाकर ही परम आनन्द प्राप्त करता है । कदाचित्
कोई मनुष्य अन्न, जल, धन आदि अथवा स्त्री की ओर से भी विमुख हो जाता है ॥४२-४५॥
परन्तु माता से विमुख होने वाला सम्भवतः कोई भी नहीं देखा जाता । जिसके घर में धर्म परायण माता
और पतिव्रता साध्वी स्त्री न हो उसको घर छोड़कर वन चला जाना चाहिए । नारायण की भक्ति के बिना धर्म,
सत्कार्य में न व्यय किये गये धन और स्त्री पुत्र से रहित घर की जो मर्यादा है वही मातृहीन व्यक्ति की है ।
देवि ! इसलिए अपने शोक और दुःख से व्याकुल पुत्रों की रक्षा करो, दैत्यों के इस कूट वचन को सुनकर भी अदिति
अपनी समाधि से विचलित नहीं हुई ॥४६-४८॥ अपने को विफल देखकर वे राक्षस क्रुद्ध हो गए, और विष्णु के
ध्यान में मग्न अदिति को मारने के लिए उद्यत हो गए । उनके लोचन क्रोध से रक्त हो गए और प्रलय कालीन
मेघ के समान वे भयङ्कर चीत्कार करने लगे, उनके भयङ्कर दांतों से अग्नि की ज्वाला निकल पड़ी जिससे वह
सारा शत-योजन विस्तीर्ण और अनेक जीवों से व्याप्त कानन क्षणभर में जलकर भस्म हो गया । उसी अग्नि से
वे दैत्य भी, जो कि अदिति को हानि पहुँचाने आये हुए थे, जलकर भस्म हो गए । सौ देव वर्षों से अच्युत के ध्यान
वर्णनन्नाम दशमोऽध्यायः ॥१०॥
एकादशोऽध्यायः ६१
सैवावशिष्टा जननी सुराणामन्वाच्छतादच्युतसक्तचित्ता ।
संरक्षिता विष्णुसुदर्शनेन दैत्यान्तकेन स्वजनानुकम्पिना ॥५२॥
इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे प्रथमपादे गङ्गोत्पत्तौ बलिकृतदेवपराजय-
वर्णनन्नाम दशमोऽध्यायः ॥१०॥
एकादशोऽध्यायः
नारद उवाच
अहो ह्यत्यद्भुतं प्रोक्तं त्वया भ्रातरिहं मम । स वह्निरदितिं मुक्त्वा कथं तानदहत्क्षणात् ॥१॥
वदादितेर्महासत्त्वं विशेषाश्चर्यकारणम् । परोपदेशनिरताः सज्जना हि मुनीश्वराः ॥२॥
सनक उवाच
शृणु नारद माहात्म्यं हरिभक्तिरतात्मनाम् । हरिध्यानपरान्साधूनकः समर्थः प्रबाधितुम् ॥३॥
हरिभक्तिपरो यत्र तत्र ब्रह्मा हरिः शिवः । देवाः सिद्धा मुनेशाश्च नित्यं तिष्ठन्ति सत्तमाः ॥४॥
हरिरास्ते महाभाग हृदये शान्तचेतसाम् । हरिनाम्पराणां च किमु ध्यानरतात्मनाम् ॥५॥
शिवपूजारतो वाऽपि विष्णुपूजापरोऽपि वा । यत्र तिष्ठति तत्रैव लक्ष्मीः सर्वाश्च देवताः ॥६॥
में लगी रहने वाली केवल जननी अदिति ही केवल, अपने भक्तों पर कृपा दृष्टि रखने वाले, दैत्य संहारक विष्णु
के सुदर्शन की कृपा से रक्षित होने के कारण बच गई ॥४६-५२॥
श्रीनारदीयपुराण के पूर्वभाग- प्रथम पाद में गंगोत्पत्ति के प्रसंग में बलि-कृत देव-पराजय
वर्णन नामक दसवाँ अध्याय समाप्त ॥१०॥
अध्याय ११
गङ्गोत्पत्ति-वर्णन
नारद बोले- भाई ! तुमने तो अत्यन्त आश्चर्यजनक यह आख्यान सुनाया। उस अग्नि ने कैसे अदिति
को छोड़कर सब को क्षण भर में जला दिया ? अदिति के आश्चर्य चकित कर देने वाले उस महा तेज और प्रभाव
का वर्णन करो, क्योंकि मुनीश्वर सर्वदा दूसरों को उपदेश देने में ही निरत होते हैं ॥१॥
सनक बोले- नारद ! हरि-भक्ति में सर्वदा लीन रहने वाले भक्तों की महिमा सुनो। हरि के ध्यान
में मग्न रहने वाले साधुओं को कौन कष्ट देने का साहस कर सकता है ? जहाँ हरिभक्त रहते हैं वहाँ ब्रह्मा, विष्णु,
शिव, देवगण, सिद्ध मुनीश्वर, श्रेष्ठ जीव सर्वदा विराजमान रहते हैं। महाभाग ! परमशान्त, हरिनास-परायण
भक्तों के हृदय में भगवान् सर्वदा विराजमान रहते हैं, तो पुनः हरि ध्यान में निमग्न रहने वाले योगो भक्तों के
विषय में तो कुछ कहना ही नहीं। शिवपूजन में रत रहने वाले विष्णु की पूजा में लीन रहने वाले भक्त जहाँ
निवास करते हैं वहाँ साक्षात् लक्ष्मी और सब देवता सर्वदा निवास करते हैं ॥२-६॥ जहाँ विष्णु पूजा में तल्लीन
७० नारदीयपुराणम्
यत्र पूजापरो विष्णोर्वह्निस्तत्र न बाधते । राजा वा तस्करो वापि व्याधयश्च न सन्ति हि ॥७॥
प्रेताः पिशाचाः कूष्माण्डग्रहा बालग्रहास्तथा । डाकिन्यो राक्षसाश्चैव न बाधन्तेऽच्युतार्चकम् ॥८॥
परपीडारता ये तु भूतवेतालकादयः । नश्यन्ति यत्र सद्भक्तो हरिलक्ष्म्यर्चने रतः ॥६॥
जितेन्द्रियः सर्वहितो धर्मकर्मपरायणः । यत्र तिष्ठति तत्रैव सर्वतीर्थानि देवताः ॥१०॥
निमिषं निमिषार्द्धं वा यत्र तिष्ठन्ति योगिनः । तत्रैव सर्वश्रेयांसि तत्तीर्थं तत्तपोवनम् ॥११॥
यन्नामोच्चारणादेव सर्वे नश्यन्त्युपद्रवाः । स्तोत्रैर्वाप्यर्हणाभिर्वा किमु ध्यानेन कथ्यते ॥१२॥
एवं तेनाग्निना विप्र दग्धं सासुरकाननम् । सादितिर्नैव दग्धाभूद्विष्णुचक्राभिरक्षिता ॥१३॥
ततः प्रसन्नवदनः पद्मपत्रायतेक्षणः । प्रादुरासीत्समीपेऽस्याः शङ्खचक्रगदाधरः ॥१४॥
ईषद्धास्यस्फुरद्दन्तप्रभाभासितदिङ्मुखः । स्पृशन्करेण पुण्येन प्राह कश्यपवल्लभाम् ॥१५॥
श्रीभगवानुवाच
देवमातः प्रसन्नोऽस्मि तपसाराधितस्त्वया । चिरं श्रान्तासि भद्रं ते भविष्यति न संशयः ॥१६॥
वरं वरय दास्यामि यत्ते मनसि रोचते । मा भैर्भद्रे महाभागे ध्रुवं श्रेयो भविष्यति ॥१७॥
इत्युक्ता देवमाता सा देवदेवेन चक्रिणा । तुष्टाव प्रणिपत्यैनं सर्वलोकसुखावहम् ॥१८॥
अदितिरुवाच
नमस्ते देवदेवेश सर्वव्यापिञ्जनार्दन । सत्त्वादिगुणभेदेन लोकव्यापारकारण ॥१९॥
रहने वाले भक्त रहते हैं वहाँ अग्नि किसी प्रकार की बाधा नहीं पहुँचा सकते । राजा, चोर अथवा व्याधियाँ
उसका बाल भी बाँका नहीं कर सकते; प्रेत, पिशाच, डाकिनी, कूष्माण्डग्रह (दुष्टग्रह) बाल ग्रह और राक्षस
आदि उस विष्णु भक्त की छाया का भी स्पर्श नहीं कर सकते । पर पीड़ा में आसक्त रहने वाले भूत, वेताल
आदि वहाँ जाकर स्वयं भस्म हो जाते हैं जहाँ विष्णु भक्ति में तत्पर रहने वाले भक्त विद्यमान रहते हैं । जितेन्द्रिय
सबका मङ्गल करने वाले और धर्म, सत्कर्म आदि में लीन रहने वाले महात्मा जहाँ रहते हैं वहाँ सब देवता और
तीर्थ स्वयं आकर निवास करते हैं ॥३-११॥ एक पल अथवा उसके आधे समय तक जहाँ योगीजन निवास करते
हैं वहीं सभी तीर्थ और अखिल कल्याण आ जाते हैं एवं वही पुनीत तपोवन हो जाता है । जिसके मात्र नामोच्चारण
स्तोत्र पाठ अथवा पूजादिसे सभी उपद्रव नष्ट हो जाते हैं, उसके ध्यान की महिमा का क्या वर्णन किया जाय ?
इस कारण उस अग्नि से असुरों के सहित सारा कानन भस्महो गया, परन्तु वह अदिति पूर्णतया सुरक्षित रही ।
क्योंकि विष्णु का सुदर्शन उसकी रक्षा के लिए उद्यत था ॥१२-१३॥ उसकी घोर तपस्या को देखकर पद्मलोचन
शङ्ख-चक्र-गदाधारी भगवान् प्रसन्नता पूर्वक वहाँ उस जननी अदिति के सम्मुख प्रत्यक्ष हुए । उनके मन्द हास्य से
खुली दन्तपंक्ति की प्रभा से सारा दिङ्मण्डल प्रकाशित हो गया, अपने पुनीत करों से देवमाता कश्यपपत्नी का
स्पर्श करते हुए बोले ॥१४-१५॥
श्री भगवान् बोले-देवमाता ! मैं तुम्हारी तपस्या से प्रसन्न हूँ, तुम बहुत श्रान्त हो गई हो, निःसन्देह
तुम्हारा कल्याण होगा । तुम्हारी जो इच्छा हो, माँगो । भद्रे ! डरो मत, महाभागे ! निश्चित रूप से तुम्हारा
कल्याण होगा । देवाधिदेव, चक्री विष्णु की इतनी सान्त्वना पाकर अदिति अखिल लोक को सुखो करने वाले
भगवान् के चरणों में गिर पड़ी और स्तुति करने लगी ॥१४-१८॥
अदिति बोली-देवदेवेश ! सर्वव्यापी ! जनार्दन ! आपको नमस्कार है, सत्त्व आदि त्रिगुण भेद से लोक
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एकादशोऽध्यायः
नमस्ते बहुरूपायारूपाय च महात्मने । सर्वैकरूपरूपाय निर्गुणाय गुणात्मने ॥२०॥
नमस्ते लोकनाथाय परमज्ञानरूपिणे । सद्भक्तजनवात्सल्यशालिने मङ्गलात्मने ॥२१॥
यस्यावताररूपाणि ह्यर्चयन्ति मुनीश्वराः । तमादिपुरुषं देवं नमामि ह्यर्थसिद्धये ॥२२॥
श्रुतयो यं न जानन्ति न जानन्ति च सुरयः । ते नमामि जगद्धेतुं समायं चाप्यमायिनम् ॥२३॥
यस्यावलोकनं चित्रं मायोपद्रवकारणम् । जगद्रूपं जगद्धेतुं तं वन्दे सर्ववन्दितम् ॥२४॥
यत्पादाम्बुजकिञ्जल्कसेवारक्षितमस्तकाः । अवापुः परमां सिद्धिं तं वन्दे कमलाधवम् ॥२५॥
यस्य ब्रह्मादयो देवा महिमानं न वै विदुः । अत्यासन्नं च भक्तानां तं वन्दे भक्तसंगिनम् ॥२६॥
यो देवस्त्यक्तसङ्गानां शान्तानां करुणार्णवः । करोति ह्यात्मनः सङ्गं तं देवं सङ्गवर्जितम् ॥२७॥
यज्ञेश्वरं यज्ञकर्म यज्ञकर्मसुनिष्ठितम् । नमामि यज्ञफलदं यज्ञकर्मप्रबोधकम् ॥२८॥
अजामिलोऽपि पापात्मा यन्नामोच्चारणादनु । प्राप्तवान्परमं धाम तं वन्दे लोकसाक्षिणम् ॥२९॥
हरिरूपी महादेवः शिवरूपी जनार्दनः । इति लोकस्य नेता यस्तं नमामि जगद्गुरुम् ॥३०॥
ब्रह्माद्या अपि देवेशा यन्मायापाशयन्त्रिताः । न जानन्ति परं भावं तं वन्दे सर्वनायकम् ॥३१॥
हृत्पद्मस्थोऽपि योग्यानां दूरस्थ इव भासते । प्रमाणातीतसद्भावस्तं वन्दे ज्ञानसाक्षिणम् ॥३२॥
यन्मुखाद्ब्राह्मणो जातो बाहुभ्यां क्षत्रियोऽजनि । ऊर्वोर्वैश्यः समुत्पन्नः पद्भ्यां शूद्रोऽभ्यजायत ॥३३॥
मनसश्चन्द्रमा जातो जातः सूर्यश्च चक्षुषः । मुखादग्निश्चेन्द्रश्च प्राणाद्वायुरजायत ॥३४॥
सृष्टि के आदि कारण ! नमस्कार है । बहुरूप, अरूप और महात्मा को नमस्कार करती हूँ सबमें एक रूप से रहने
वाले, निर्गुण और सगुण भगवान् को नमस्कार है । लोकस्वामी, परमज्ञानरूपी, सद्भक्तों पर वात्सल्य भाव
रखने वाले, मंगलग्रूप को नमस्कार है । जिनके अवतार रूपों की मुनीश्वर अर्चना करते हैं उस आदि पुरुष देव
को अपनी मनोरथ सिद्धि के लिए नमस्कार करती हूँ । जिसको, श्रुतियां और विद्वान् मनुष्य नहीं जान पाते हैं,
उस जगत् के आदि कारण, माया युक्त और पुनरपि माया रहित देव को नमस्कार है । जिसका अवलोकन माया
के उपद्रव को शान्त करने का कारण है, उस सर्वज्ञ, और सर्वज्ञेय, जगद्रूप और जगदादिकारण को नमस्कार करती
हूँ ।।१६-२४।। जिसके चरण कमल के पराग की सेवा में सर्वदा शिर-झुकाये रहने वाले अतएव रक्षित भक्तजनों
ने परम सिद्धि को प्राप्त किया उस कमलापति को नमस्कार है । जिसकी महिमा को ब्रह्मा आदि देवगण भी न
जान सके उसी भक्तरक्षक और भक्तों के अति निकट रहने वाले भक्त वत्सल को नमस्कार है । जो करुणासागर
देवता शान्त और संसार से सर्वथा दूर रहने वाले जनों से अपना संपर्क स्थापित करता है उस अनासक्त देव को
नमस्कार है ।।२६-२७।। उस यज्ञेश्वर, यज्ञकर्म और यज्ञकार्य में अपनी निष्ठा रखने वाले, यज्ञफल दाता और
यज्ञकर्मों को प्रेरणा प्रदान करने वाले देव को नमस्कार करती हूँ । पापात्मा अजामिल भी जिसके नामोच्चारण
मात्र से तत्काल परम पद को प्राप्त हो गया, उस लोक-साक्षी की वन्दना करती हूँ, जो हरि रूपी महादेव और
शिवरूपी जनार्दन अपने अद्वैत भाव से लोक के अग्रणी हैं उन जगद्गुरु को नमस्कार करती हूँ । ब्रह्मा आदि देव
प्रभु भी जिस माया पति के माया-पाश में बँध कर उसके परम रूप को नहीं जान पाते हैं उस अखिल-जीव-नायक
की वन्दना करती हूँ, जो हृदय कमल में रहता हुआ भी योगिजनों की दृष्टि में दूरस्थ की भांति दीख पड़ता है
जिसकी स्थिति या सद्भाव को प्रमाणों द्वारा भी सिद्ध नहीं किया जा सकता है । तथा उस ज्ञान साक्षी की वन्दना
करती हूँ, जिसके मुख से ब्राह्मण और बाहुओं से क्षत्रिय उत्पन्न हुए, ऊरु से वैश्य और चरणों से शूद्रों की उत्पत्ति
हुई ।।२८-३३।। मन से चन्द्रमा और चक्षु से सूर्य, मुख से अग्नि तथा इन्द्र और प्राण से वायु की उत्पत्ति हुई,