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सर्वकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 89, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 89

७० नारदीयपुराणम्
यत्र पूजापरो विष्णोर्वह्निस्तत्र न बाधते । राजा वा तस्करो वापि व्याधयश्च न सन्ति हि ॥७॥
प्रेताः पिशाचाः कूष्माण्डग्रहा बालग्रहास्तथा । डाकिन्यो राक्षसाश्चैव न बाधन्तेऽच्युतार्चकम् ॥८॥
परपीडारता ये तु भूतवेतालकादयः । नश्यन्ति यत्र सद्‌भक्तो हरिलक्ष्म्यर्चने रतः ॥६॥
जितेन्द्रियः सर्वहितो धर्मकर्मपरायणः । यत्र तिष्ठति तत्रैव सर्वतीर्थानि देवताः ॥१०॥
निमिषं निमिषार्द्धं वा यत्र तिष्ठन्ति योगिनः । तत्रैव सर्वश्रेयांसि तत्तीर्थं तत्तपोवनम् ॥११॥
यन्नामोच्चारणादेव सर्वे नश्यन्त्युपद्रवाः । स्तोत्रैर्वाप्यर्हणाभिर्वा किमु ध्यानेन कथ्यते ॥१२॥
एवं तेनाग्निना विप्र दग्धं सासुरकाननम् । सादितिर्नैव दग्धाभूद्विष्णुचक्राभिरक्षिता ॥१३॥
ततः प्रसन्नवदनः पद्मपत्रायतेक्षणः । प्रादुरासीत्समीपेऽस्याः शङ्खचक्रगदाधरः ॥१४॥
ईषद्धास्यस्फुरद्दन्तप्रभाभासितदिङ्मुखः । स्पृशन्करेण पुण्येन प्राह कश्यपवल्लभाम् ॥१५॥
श्रीभगवानुवाच
देवमातः प्रसन्नोऽस्मि तपसाराधितस्त्वया । चिरं श्रान्तासि भद्रं ते भविष्यति न संशयः ॥१६॥
वरं वरय दास्यामि यत्ते मनसि रोचते । मा भैर्भद्रे महाभागे ध्रुवं श्रेयो भविष्यति ॥१७॥
इत्युक्ता देवमाता सा देवदेवेन चक्रिणा । तुष्टाव प्रणिपत्यैनं सर्वलोकसुखावहम् ॥१८॥
अदितिरुवाच
नमस्ते देवदेवेश सर्वव्यापिञ्जनार्दन । सत्त्वादिगुणभेदेन लोकव्यापारकारण ॥१९॥
रहने वाले भक्त रहते हैं वहाँ अग्नि किसी प्रकार की बाधा नहीं पहुँचा सकते । राजा, चोर अथवा व्याधियाँ
उसका बाल भी बाँका नहीं कर सकते; प्रेत, पिशाच, डाकिनी, कूष्माण्डग्रह (दुष्टग्रह) बाल ग्रह और राक्षस
आदि उस विष्णु भक्त की छाया का भी स्पर्श नहीं कर सकते । पर पीड़ा में आसक्त रहने वाले भूत, वेताल
आदि वहाँ जाकर स्वयं भस्म हो जाते हैं जहाँ विष्णु भक्ति में तत्पर रहने वाले भक्त विद्यमान रहते हैं । जितेन्द्रिय
सबका मङ्गल करने वाले और धर्म, सत्कर्म आदि में लीन रहने वाले महात्मा जहाँ रहते हैं वहाँ सब देवता और
तीर्थ स्वयं आकर निवास करते हैं ॥३-११॥ एक पल अथवा उसके आधे समय तक जहाँ योगीजन निवास करते
हैं वहीं सभी तीर्थ और अखिल कल्याण आ जाते हैं एवं वही पुनीत तपोवन हो जाता है । जिसके मात्र नामोच्चारण
स्तोत्र पाठ अथवा पूजादिसे सभी उपद्रव नष्ट हो जाते हैं, उसके ध्यान की महिमा का क्या वर्णन किया जाय ?
इस कारण उस अग्नि से असुरों के सहित सारा कानन भस्महो गया, परन्तु वह अदिति पूर्णतया सुरक्षित रही ।
क्योंकि विष्णु का सुदर्शन उसकी रक्षा के लिए उद्यत था ॥१२-१३॥ उसकी घोर तपस्या को देखकर पद्मलोचन
शङ्ख-चक्र-गदाधारी भगवान् प्रसन्नता पूर्वक वहाँ उस जननी अदिति के सम्मुख प्रत्यक्ष हुए । उनके मन्द हास्य से
खुली दन्तपंक्ति की प्रभा से सारा दिङ्मण्डल प्रकाशित हो गया, अपने पुनीत करों से देवमाता कश्यपपत्नी का
स्पर्श करते हुए बोले ॥१४-१५॥
श्री भगवान् बोले-देवमाता ! मैं तुम्हारी तपस्या से प्रसन्न हूँ, तुम बहुत श्रान्त हो गई हो, निःसन्देह
तुम्हारा कल्याण होगा । तुम्हारी जो इच्छा हो, माँगो । भद्रे ! डरो मत, महाभागे ! निश्चित रूप से तुम्हारा
कल्याण होगा । देवाधिदेव, चक्री विष्णु की इतनी सान्त्वना पाकर अदिति अखिल लोक को सुखो करने वाले
भगवान् के चरणों में गिर पड़ी और स्तुति करने लगी ॥१४-१८॥
अदिति बोली-देवदेवेश ! सर्वव्यापी ! जनार्दन ! आपको नमस्कार है, सत्त्व आदि त्रिगुण भेद से लोक