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सर्वकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 85, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 85

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६६ नारदीयपुराणम्
अमात्यकोद्वयप्रसरावमात्यौ कुम्भाण्डनामाथ च कूपकर्णः ।
पित्रा समं शौर्यपराक्रमाभ्यां बाणो बलेः पुत्रशताग्रजोऽभूत् ॥१०॥
बलिः सुराञ्जेतुमनोः प्रवृत्तः सैन्येन युक्तो महता प्रतस्थे ।
ध्वजातपत्रैगगनाम्बुराशेस्तरङ्गविद्युत्स्मरणं प्रकुर्वन् ॥११॥
अवाप्यवृत्रारिपुरं सुरारी रुरोध दैत्यैर्मृगराजगाढैः ।
सुराश्च युद्धाय पुरात्तथैव विनिर्ययुर्वज्रकरादयश्च ॥१२॥
ततः प्रवृत्ते युद्धं घोरं गीर्वाणदैत्ययोः । कल्पांतमेघनिर्घोषं डिंडिमध्वानसंभ्रमम् ॥१३॥
मुमुचुः शरजालानि दैत्याः सुमनसां बले । देवांश्च दैत्यसेनासु संग्रामेऽत्यन्तदारुणे ॥१४॥
जहि दारय भिंधीति छिंधि मारय ताडय । इत्येवं सुमहाग्घोषो वदतां सेनयोरभूत् ॥१५॥
शरदुन्दुभिनिध्वाणैः सिंहनादैः सुरद्विषाम् । भाङ्कारैः स्यन्दनानां च बाणक्रङ्कारनिःस्वनैः ॥१६॥
अश्वानां हेषितैश्चैव गजानां बृंहितैस्तथा । टङ्कारैर्धनुषां चैव लोकः शब्दमयोऽभवत् ॥१७॥
सुरासुरविनिर्मुक्तबाणनिष्पेषजानले । अकालप्रलयं मेने निरीक्ष्य सकलं जगत् ॥१८॥
बभौ देवद्विषां सेना स्फुरच्छस्त्रौधधारिणी । चलविद्युन्निभा रात्रिश्च्छादिता जलदैरिव ॥१९॥
तस्मिन्युद्धे महागौरैर्गीरीन् क्षिप्तान् सुरारिभिः । नाराचैश्चूर्णयामासुर्देवास्ते लघुविक्रमाः ॥२०॥
केचित्संताडयामासुर्गजैर्गजांस्तथारथैः । अश्वैरश्वांश्च केचित्तु गदादण्डैरथाऽर्दयन् ॥२१॥
परिघैस्ताडिताः केचित्पेतूः शोणितकर्द्दमे । समुत्क्रांतासवः केचिद्विमानानि समाश्रिताः ॥२२॥
ये दैत्या निहता देवैः प्रसह्य सङ्गरे तदा । ते देवभावमापन्ना दैत्यान्त्समुपादवन् ॥२३॥

कुंभाण्ड और दूसरे का नाम कूपकर्ण था । शूरता और पराक्रम में पिता के ही समान बलि का सौ भाइयों में
ज्येष्ठ बाण नामक पुत्र भी था ॥८-१०॥ जब बलि के मन में देवों को जीतने की इच्छा हुई तब वह अपनी महा
सैन्य शक्ति के साथ रणाभियान के लिए स्वर्ग की ओर प्रस्थित हुआ । उसकी सेना की असंख्य ध्वजाओं और छत्रों
की चमक ऐसी प्रतीत होती थी मानों आकाशवर्ती मेघों के बीच चमचमाती हुई विद्युत् की रेखा हो । इन्द्र पुर के
पास जाकर उस असुर ने अपने सिंह सदृश पराक्रमी राक्षस सैनिकों से घेरा डाल दिया । यह देख कर देवता भी,
वज्र आदि अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित होकर नगर से निकल गये । क्षण भर में देवों और दैत्यों में तुमुल युद्ध
छिड़ गया, प्रलय कालीन मेघ के समान भयङ्कर घोष करने वाले युद्ध-वाद्य बजने लगे ॥११-१३॥
दैत्यों ने देवताओं की सेना पर भयङ्कर शस्त्र-समूहों की वर्षा की । देवता भी असुर सैनिकों को अपने अस्त्र
प्रहार से भूनने लगे । परस्पर लड़न वाले सैनिकों के मारो, फाड़ डालो, तोड़ दो, टूक-टूक कर दो, मारो, पटको,
आदि कोलाहल से तुमुल घोष होने लगा । धनुष और दुन्दुभियों की ध्वनि से, राक्षसों की गर्जना से, रथों की
भनभनाहट से, बाणों की कड़कड़ाहट से, घोड़ों की हिनहिनाहट से, हाथियों के चिग्घाड़ से और धनुष की टंकारों
से आकाश-पाताल गूंज उठा ॥१४-१७॥ देव-दानवों के छोड़े गए वाणों के संघर्ष से भयङ्कर अग्नि-ज्वाला निकलने
लगी जिसको देखकर सारा संसार अकाल प्रलय की कल्पना करने लगा । चमचमाते अस्त्र-शस्त्रों को धारण करते
वाली राक्षसों की सेना ऐसी जान पड़ती थी मानों बादलों से घिरी रात्रि चंचल बिजली की चमक से सुशोभित
है । उस घोर संग्राम में दुर्दम राक्षसों से फेंके हुए पर्वतों को वे फुर्तीले देव अपने नाराचों से चूर-चूर कर देते
थे ॥१८-२०॥ कुछ देवों ने अपने हाथियों द्वारा हाथियों को, रथों से रथों को और अश्वों से शत्रु के अश्वों की
क्षति पहुँचाई । दूसरों ने अपनी गदाओं की मार से शत्रुओं को आहत किया । कुछ असुर परिघों की मार से रक्त
के कीचड़ में गिर पड़ते थे और कुछ मर कर शीघ्र देव रूप धारण कर विमानों पर विहार करने लगते थे । उस