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बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः २७६
ब्रह्म धारयतां नित्यं व्रतानि नियमांस्तथा । ब्रह्म चैव पुरा सृष्टं येन जानंति तद्विदः ॥६१॥
तेषां बहुविधास्त्वन्यास्तत्र तत्र द्विजातयः । पिशाचा राक्षसाः प्रेता विविधा म्लेच्छजातयः
सा सृष्टिर्मानसी नाम धर्मतंत्रपरायणा ॥६२॥
भरद्वाज उवाच
ब्राह्मणः केन भवति क्षत्रियो वा द्विजोत्तम । वैश्यः शूद्रश्च विप्रर्षे तद्ब्रूहि वदतां वर ॥६३॥
भृगुरुवाच
जातकर्मोदिभिर्यस्तु संस्कारैः संस्कृतः शुचिः । वेदाध्ययनसंपन्नो ब्रह्मकर्मस्ववस्थितः ॥६४॥
शौचाचारस्थितः सम्यग्विद्याभ्यासी गुरुप्रियः । नित्यव्रती सत्यपरः स वै ब्राह्मण उच्यते ॥६५॥
सत्यं दानमथोद्रोह आनृशंस्यं कृपा घृणा । तपस्यां दृश्यते यत्र स ब्राह्मण इति स्मृतः ॥६६॥
क्षत्रजं सेवते कर्म वेदाध्ययनसंगतः । दानादानरतिर्यस्तु स वै क्षत्रिय उच्यते ॥६७॥
विशत्याशु पशुभ्यश्च कृष्यादानरतिः शुचिः । वेदाध्ययनसंपन्नः स वैश्य इति संज्ञितः ॥६८॥
सर्वभक्षरतिर्नित्यं सर्वकर्मकरोऽशुचिः । त्यक्तवेदस्त्वनाचारः स वै शूद्र इति स्मृतः ॥६९॥
शूद्रे चैतद्भवेल्लक्ष्म द्विजे तच्च न विद्यते । न वै शूद्रो भवेच्छूद्रो ब्राह्मणो ब्राह्मणो न च ॥७०॥
सर्वोपायैस्तु लोभस्य क्रोधस्य च विनिग्रहः । एतत्पवित्रं ज्ञानानां तथा चैवात्मसंयमः ॥७१॥
वर्ज्यौ सर्वात्मना तौ हि श्रेयोघातार्थमुद्यतौ । नित्यक्रोधाच्छ्रियं रक्षेत्तपो रक्षेत्तु मत्सरात् ॥७२॥
कभी नष्ट नहीं होती ॥६०॥ ब्रह्म (वेद ज्ञान) के धारण करने वाले उनके व्रत और नियम कभी भंग नहीं होते ।
पहले ब्रह्म की ही सृष्टि हुई, जिसका ज्ञान केवल वेदज्ञ ज्ञानियों को ही है ॥६१॥ उसी श्रेणी की अनेकों प्रकार की
द्विजातियां यत्र-तत्र हैं । पिशाच-राक्षस, प्रेत और विविध म्लेच्छ जातियां भी इसी प्रकार द्विजाति से भ्रष्ट हैं ।
वह ब्राह्मण सृष्टि धर्म का ही अनुशासन मानने वाली मानसी सृष्टि है ॥६२॥
भरद्वाज बोले--द्विजोत्तम, किस कर्म से ब्राह्मण होते हैं, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रों के कर्म क्या हैं, विप्रर्षे !
श्रेष्ठ वाग्मी ! इसको कहिए ॥६३॥
भृगु बोले-जो जाति कर्म आदि से और संस्कारों से संस्कृत और शुचि है, जो वेदाध्ययन में लगा
रहता, ब्रह्मकर्म का पालन करता, पवित्र आचारों को ही अपनाता है, सर्वदा गुरु की सेवा में लीन रहकर भली
भाँति विद्या का अभ्यास करता है, जो सत्य-परायण और नित्य प्रति व्रतों का अनुष्ठान करता है वही ब्राह्मण कहा
जाता है ॥६४-६५॥ सत्य, दान, अद्रोह, कोमलता, कृपा, अघृणा और तपस्या जिस व्यक्ति में दिखाई दे उसको
ब्राह्मण कहा जाता है ॥६६॥ जो क्षत्रियोचित कर्मों को वेदाध्ययनपूर्वक करते हैं, दान के लिए आदान
(कर लेने) में जिसकी रुचि हो उसको क्षत्रिय कहते हैं ॥६७॥ जो पशुपालन और कृषि द्वारा जीवन-निर्वाह
करता जिसकी दान में विशेष रुचि रहती और जो वेदाध्ययन किये हुए हो उसको वैश्य कहा जाता
है ॥६८॥ भक्ष्याभक्ष्य का विचार न करने वाला, सब भले-बुरे कामों को करने वाला, अशुचि, वेद मर्यादा को न
मानने वाला और आचारहीन शूद्र कहा जाता है ॥६९॥ शूद्र में ये सभी लक्षण होते हैं और द्विज में ये लक्षण
नहीं होते हैं । यदि शूद्र में उक्त शूद्र के लक्षण न हों तो वह शूद्र नहीं है और ब्राह्मण में ब्राह्मण के लक्षण न हों तो
वह ब्राह्मण नहीं है । सब उपायों से क्रोध और लोभ को वश में करना चाहिए । ज्ञानियों का यह पवित्र धर्म है,
आत्मसंयम ही ज्ञानी का मुख्य कर्त्तव्य है ॥७०-७१॥ इन कल्याण के शत्रु क्रोध और लोभ को सर्वथा दूर
रखना चाहिए । नित्य क्रोध से श्री की रक्षा और मात्सर्य से तप की रक्षा करनी चाहिए ॥७२॥ मान और अपमान

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२८० नारदीयपुराणम्
॥७३॥
विद्यां मानापमानाभ्यामात्मानं तु प्रमादतः
यस्य सर्वे समारंभा निराशीर्बन्धना द्विज । त्यागे यस्य हुतं सर्वं स त्यागी स च बुद्धिमान् ॥७४॥
अहिंस्रः सर्वभूतानां मैत्रायणगतश्चरेत् । परिग्रहात्परित्यज्य भवेद्बुद्ध्या जितेन्द्रियः ॥७५॥
अशोकस्थानमातिष्ठेदिह चामुत्र चाभयम् । तपोनित्येन दांतेन मुनिना संयतात्मना ॥७६॥
अजितं जेतुकामेन व्यासंगेषु ह्यसंगिना । इन्द्रियैर्गृह्यते यद्यत्तत्तद्व्यक्तमिति स्थितिः ॥७७॥
अव्यक्तमिति विज्ञेयं लिङ्गग्राह्यमतीन्द्रियम् । अविश्रंभेण मंतव्यं विश्रंभे धारयेन्मनः ॥७८॥
मनः प्राज्ञेन गृह्णीयात्प्राणं ब्रह्मणि धारयेत् । निर्वेदादेव निर्वाणं न च किंचिद्विचिंतयेत् ॥७९॥
सुखं वै ब्राह्मणो ब्रह्मान्निर्वेदेनाधिगच्छति । शौचे तु सततं युक्तः सदाचारसमन्वितः ॥८०॥
स्वनुक्रोशश्च भूतेषु तद्विज्जातिषु लक्षणम् । सत्यं व्रतं तपः शौचं सत्यं विसृजते प्रजा ॥८१॥
सत्येन धार्यते लोकः स्वः सत्येनैव गच्छति । अनृतं तमसो रूपं तमसा नीयते ह्यधः ॥८२॥
तमोग्रस्तानि पश्यंति प्रकाशं तमसावृताः । सुदुष्प्रकाश इत्याहुर्नरकं तम एव च ॥८३॥
सत्यानृतं तदुभयं प्राप्यते जगतीचरैः । तत्राप्येवंविधा लोके वृत्तिः सत्यानृते भवेत् ॥८४॥
धर्माधर्मौ प्रकाशश्च तमो दुःखसुखं तथा । शरीरैर्मानसैर्दुःखैः [सुखैश्चाप्यसुखोदर्यैः ॥८५॥]
लोकसृष्टं प्रपश्यन्तो न मुह्यंति विचक्षणाः । तत्र दुःखविमोक्षार्थं प्रयतेत विचक्षणः ॥८६॥
सुखं ह्यनित्यं भूतानामिह लोके परत्र च । राहुग्रस्तस्य सोमस्य यथा ज्योत्स्ना न भासते ॥८७॥
तथा तमोभिभूतानां भूतानां नश्यते सुखम् ॥८८॥
──────────────────────────────────────────────────────────
से विद्या की और प्रमाद से अपनी रक्षा करनी चाहिए ॥७३॥ द्विज ! जो आशा और फलेच्छा को छोड़कर सब कार्य
करता है और जिसने त्याग के अग्नि में अपने सब स्वार्थों की आहुति दे दी वही त्यागी और बुद्धिमान् है ॥७४॥
जो सब प्राणियों के प्रति हिंसा की भावना नहीं रखता, सबके प्रति मैत्री का व्यवहार करता है, जो धन इकट्ठा
करने के फेर में न पड़कर विवेकपूर्वक जितेन्द्रिय बनता है वही बुद्धिमान् है ॥७५॥ लोक और परलोक शोक-
रहित और अभय स्थान को अपनाना चाहिए । नित्य तपस्या करने वाले मन को वश में रखने वाले, संयमी मुनि
अजित को जीतने की इच्छा से, आसक्ति को विराग से जीतने की कामना से इन्द्रियों से जिस-जिस वस्तु को ग्रहण
करते हैं उन सब को व्यक्त कहते हैं ॥७६-७७॥ अव्यक्त उसको कहते हैं जो अतीन्द्रिय और लिंग-ग्राह्य अर्थात्
अभास मात्र से जानने योग्य हो । सब से पहले मन को अविश्वास से हटाकर विश्वास में लगावे । मन को प्राण
से वश में करे और प्राण को ब्रह्म में स्थिर करे । निर्वेद (संसार को असार समझने) से ही निर्वाण प्राप्त होता है।
इसके अतिरिक्त दूसरी वस्तु का चिन्तन नहीं करना चाहिए ॥७८-७९॥ ब्रह्मन् ! ब्राह्मण निर्वेद से ही सुख पाता
है । वह सर्वदा पवित्र और सदाचार पालन में लीन रहे ॥८०॥ प्राणियों पर दया-भाव रखना ही द्विजाति का
लक्षण है । सत्य, व्रत, तप और पवित्रता से ही प्रजा की सृष्टि हुई है ॥८१॥ सत्य से ही यह लोक टिका हुआ
है । सत्य से ही स्वर्गलोक भी प्राप्त होता है । अनृत (असत्य) अन्धकार-स्वरूप है । अन्धकार से ही मनुष्य निम्न
स्थान की ओर जाता है ॥८२॥ अन्धकार से घिरा और इसमें डूबा मनुष्य प्रकाश का पता नहीं पाता है । प्रकाश
को स्वर्ग और अन्धकार को ही नरक कहा जाता है ॥८३॥ सांसारिक प्राणियों को सत्य और असत्य दोनों प्राप्त
होते हैं । साथ ही संसार में सत्य और असत्य में लोक-व्यवहार चलता है । धर्म-अधर्म, प्रकाश-अन्धकार, सुख-दुःख
से यह लोक व्याप्त है । शारीरिक और मानसिक दुःखों एवं परिणामतः कष्टदायक सुखों से व्याप्त इस लोक-सृष्टि
को देखते हुए सुधीजन मोह में नहीं पड़ते, प्रत्युत दुःखों से मुक्ति पाने के लिए यत्न करते हैं ॥८४-८६॥ इस
लोक और परलोक में सुख अनित्य है । राहु से ग्रस्त चन्द्रमा की प्रभा शोभा नहीं पाती । उसी प्रकार तम से आच्छाद्य

त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः २८१
तत्तत्खलु द्विविधं सुखमुच्यते शारीरं मानसं च। इह खल्वमुष्मिंश्च
लोके वस्तुप्रवृत्तयः सुखार्थमभिधीयन्ते नहीतः परत्वापवर्गफलाद्धि
शिष्टतरमस्ति। स एव काम्यो गुणविशेषो धर्मार्थगुणारंभस्त
द्धेतुरस्योत्पत्तिः सुखप्रयोजनार्थमारंभाः।
भरद्वाज उवाच
वदैतद्भवताभिहितं सुखानां परमा स्थितिरिति ॥८६॥
न तदुपगृह्णीमो न ह्येषामृषीणां महति स्थितानाम् ॥८०॥
अप्राप्य एष काम्यगुणविशेषो न चैनमभिशीलयंति। तपसि श्रूयते ॥८१॥
त्रिलोककृद्ब्रह्मा प्रभुरेशको तिष्ठति ब्रह्मचारी न कामसुखेष्वात्मानमवदधाति ॥८२॥
अपि च भगवान्विश्वेश्वर उमापतिः काममभिवर्तमानमनंगतवेन सममनयत् ॥८३॥
तस्माद्भूमो न तु महात्मभिरंजयति गृहीतो न त्वेष तावद्विशिष्टो गुणविशेष इति
नैतद्भगवतः प्रत्येमि भवता तूक्तं सुखानां परमाः स्त्रिय इति ॥८४॥
लोकप्रवादो हि द्विविधः फलोदयः सुकृतात्सुखमवाप्यतेऽन्यथा दुःखमिति
भृगुरुवाच
अत्रोच्यते अनृतात्खलु तमः प्रादुर्भूतं ततस्तमोग्रस्ता अधर्ममेवा-
नुवर्तते न धर्मं क्रोधलोभमोहहिंसानृतादिमिरवच्छन्नाः खल्व-
स्मिँल्लोकेनामुत्र सुखमाप्नुवंति विविधव्याधिरुजोपतापैरवकीर्यन्ते
जीवों का सुख नष्ट हो जाता है ॥८७-८८॥ वह सुख दो प्रकार का है शारीरिक और मानसिक। इस लोक और
परलोक में सुख के लिए ही प्रत्येक वस्तुओं को ओर प्राणी का झुकाव होता है। लोक-परलोक में मुक्ति से बढ़-
कर कोई फल नहीं है। उसी विशेष फल को सभी चाहते हैं। धर्म के लिए ही अपवर्ग गुण की सृष्टि हुई है।
सारे आरम्भ सुख के लिए हैं।
भरद्वाज बोले-आपने कहा है कि सुख ही लोक में एकमात्र परम काम्य है परन्तु सुख तो मिलता ही
नहीं, न तो महत्तत्त्व में रमने वाले महर्षियों को ही प्राप्त होता है। यह काम्य (सुख) प्रायः दुष्प्राप्य है, इस गुण-
विशेष की योगी आकांक्षा भी नहीं करते। ऐसा सुना जाता है कि लोककर्ता ब्रह्मा अकेले तपस्या-मग्न रहते हैं।
वे ब्रह्मचारी ब्रह्मा काम-सुख को तुच्छ समझते हैं ॥८९-९१॥ इसके विपरीत उमापति विश्वेश्वर ने काम के पीछे
पड़कर उसको भस्म करके अनङ्ग बना दिया ॥९२॥ अतएव इस लोक में सुख की ओर महात्माओं का अनुराग
नहीं, न तो परम सुख को विशिष्ट गुण हो लोग मानते हैं ॥९३॥ अतः आपकी इस बात में भी कुछ शंका हो जाती
है। आपने कहा कि सुख का कारण स्त्रियाँ हैं, ऐसा लोक-प्रसिद्ध है। लोक में फल-प्राप्ति भी दो रूपों में देखी
जाती है। शुभ कर्मों से सुख मिलता और अशुभ कर्मों से दुःख ॥९४॥
भृगु बोले- इस विषय में कहता हूँ, सुनिये। अनृत से अन्धकार उत्पन्न हुआ। तदनन्तर अन्धकार में पड़े
हुए प्राणी अधर्म को ही अपनाते हैं, धर्म को नहीं। क्रोध, लोभ, मोह, हिंसा, असत्य आदि से विमूढ़ मानव लोक-
परलोक कहीं सुख नहीं पाते। वे तो विविध व्याधि, रोग और संताप से ग्रस्त रहते हैं। हत्या, बंधन, क्लेश, भूख,
प्यास, श्रम से उत्पन्न रोगों से संतप्त रहते हैं। वर्षा, वायु, सर्दी-गर्मी और शारीरिक दुःखों से कष्ट पाते रहते हैं,
३६ ना० पु०

२८२ नारदीयपुराणम्
वधबन्धनपरिक्लेशादिभिश्च क्षुत्पिपासाश्रमकृतैरुपरूपैस्तपप्यंते वर्षवाता-
त्युष्णातिशीतकृतैश्च प्रतिभयैः शारीरैर्दुःखैरुयतप्यंते बंधुधनविनाश-
विप्रयोगकृतैश्च मानसैः शोकैश्चाभिभूयंते जरामृत्युकृतैश्चान्यैरिति यस्त्वेतैः ॥६५॥
शारीरं मानसं नास्ति न जरा न च पातकम् । नित्यमेव सुखं स्वर्गे सुखं दुःखमिहोभयम् ॥६६॥
नरके दुःखमेवाहुः सुखं तत्परमं पदम् । पृथिवी सर्वभूतानां जनित्री तद्विधाः स्त्रियः ॥६७॥
पुमान्प्रजापतिस्तत्र शुक्लं तेजोमयं विदुः । इत्येतल्लोकनिर्माता धर्मस्य चरितस्य च ॥६८॥
तपसश्च सुतप्तस्य स्वाध्यायस्य हुतस्य च । हुतेन शाम्यते पापं स्वाध्याये शांतिरुत्तमा ॥६९॥
दानेन भोगानित्याहुस्तपसा स्वर्गमाप्नुयात् । दानं तु द्विविधं प्राहुः परत्रार्थमिहैव च ॥१००॥
सद्म्यो यद्दीयते किंचित्तत्परत्रोपतिष्ठते । असद्भ्यो दीयते यत्तु तद्दानमिह भुज्यते
यादृशं दीयते दानं तादृशं फलमश्नुतं ॥१०१॥
भरद्वाज उवाच
किं कस्य धर्माचरणं किं वा धर्मस्य लक्षणम् । धर्मः कतिविधो वापि तद्भवान्वक्तुमर्हति ॥१०२॥
भृगुरुवाच
स्वधर्माचरणे युक्ता ये भवंति मनीषिणः । तेषां स्वर्गफलावाप्तिर्योऽन्यथा स विमुह्यते ॥१०३॥
भरद्वाज उवाच
यदेतच्चातुराश्रम्यं ब्रह्मर्षिविहितं पुरा । तेषां स्वे स्वे समाचारास्तन्मे वक्तुमिहार्हसि ॥१०४॥
बन्धुओं और धन के विनाश तथा वियोग से उत्पन्न मानसिक चिन्ता से चिन्तित रहते हैं ॥६५॥ स्वर्ग में शारीरिक
अथवा मानसिक किसी प्रकार का कष्ट नहीं होता । वहाँ पाप और बुढ़ापे का भय नहीं । वहाँ सदा सुख ही सुख
है । इस भूलोक में सुख-दुःख दोनों हैं ॥६६॥ नरक में केवल दुःख ही है। अतः नित्य सुख ही परम पद है, पृथ्वी
सब प्राणियों की जननी है। उसी प्रकार स्त्रियाँ प्रजा की जननी हैं ॥६७॥ पुरुष प्रजापति है। उसका वीर्य तेजोमय
है। इस प्रकार प्रजापति ब्रह्मा ने लोक-निर्माण किया है। धर्म, चरित्र, तपस्या, स्वाध्याय और हवन की व्यवस्था
उसने ही की है। हवन से सारे पाप नष्ट होते हैं। स्वाध्याय से परम शान्ति प्राप्त होती है ॥९८-९९॥ दान
से भोग मिलता और तपस्या से स्वर्ग । दान दो प्रकार के होते हैं—एक तो परलोक में फल देता, दूसरा यहीं
फल दे देता है। सत्पात्र को दिया हुआ दान परलोक में फलदायक होता है, परन्तु असत्पात्र में दिया हुआ यहीं
फल दे देता है। जैसा दान दिया जाता है वैसा ही फल मिलता है ॥१००-१०१॥
भरद्वाज बोले-धर्म का लक्षण क्या है, किसके प्रति किस प्रकार का धर्माचरण करना चाहिए
और धर्म के कितने भेद हैं ? इसको आप कृपा पूर्वक कहिए ॥१०२॥
भृगु ने कहा-जो मनीषी अपने धर्म के पालन में लगे रहते हैं वे स्वर्ग के भागी होते हैं जो ऐसा नहीं
करते वे मूढ़ हैं ॥१०३॥
भरद्वाज बोले-ये जो चार आश्रम हैं, जिनकी प्राचीन काल में ब्रह्मर्षि ने व्यवस्था की है, उनके आचारों
को आप कृपया कहिए ॥१०४॥

त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः २८३
भृगुरुवाच
पूर्वमेव भगवता ब्रह्मणा लोकहितमनुतिष्ठता । धर्मसंरक्षणार्थमाश्रमाश्चत्वारोऽभिनिर्दिष्टाः ॥१०५॥
तत्र गुरुकुलवासमेव प्रथममाश्रममाहरंति सम्यगत्र
शौचसंस्कारनियमव्रतविनियतात्मा उभे संध्ये भास्करा-
ग्निदेवतान्युपस्थाय विहाय तदह्न्यालस्यं गुरोरभिवाद-
नवेदाभ्यासश्रवणपवित्रीकृतांतरात्मा त्रिषवणमुपस्पृश्य
ब्रह्मचर्याग्निपरिचरणगुरुशुश्रूषानित्या भिक्षाभैक्ष्यादिसर्व-
निवेदितांतरात्मा गुरुवचननिदेशानुष्ठानाप्रतिकूलो
गुरुप्रसादलब्धस्वाध्यायतत्परः स्यात् ॥१०६॥
भवति चात्र श्लोकः ।
गुरुं यस्तु समाराध्य द्विजो वेदमवाप्नुयात् ।
तस्य स्वर्गफलावाप्तिः सिद्धयते चास्य मानसम् । ॥१०७॥
इति गार्हस्थ्यं खलु द्वितीयमाश्रमं वदंति
तस्य सदाचारलक्षणं सर्वमनुव्याख्यास्यामः । समावृतानां ॥१०८॥
सदाचाराणां सहधर्मचर्यफलार्थिनां गृहाश्रमो विधीयते
धर्मार्थकामावाप्तिह्यत्र त्रिवर्गसाधनमपेक्ष्यागर्हितकर्मणा
धनान्यादाय स्वाध्यायोपलब्धप्रकर्षेण वा ब्रह्मर्षिनिर्मितेन
वा अद्भिः सागरगतेन वा द्रव्यनियममभ्यासदैवत-
प्रसादोपलब्धेन वा धनेन गृहस्थो गार्हस्थ्यं वर्तयेत् ॥१०६॥
भृगु बोले-पहले ही लोक-व्यवस्थापक ब्रह्मा ने विचारपूर्वक धर्म-रक्षा के लिए चार आश्रमों की व्यवस्था
की ॥१०५॥ उनमें गुरुकुलवास (ब्रह्मचर्य) पहला आश्रम है । उस आश्रम में रहकर बालक को शौच, संस्कार,
नियम, व्रत आदि का पालन करना पड़ता है । प्रतिदिन दोनों काल में सूर्य, अग्नि की पूजा कर निरलस भाव
से गुरु का अभिवादन करे; वेदाभ्यास और वेदशिक्षा द्वारा अन्तःकरण को पवित्र करे; त्रिषवन (तीनों संध्या) आचमन
कर ब्रह्मचर्य, अग्नि-परिचर्या तथा गुरुसेवा में तत्पर रहकर प्रतिदिन भिक्षा करे और भिक्षा में पाये हुए द्रव्य और
अपने को सर्वात्मना गुरु की सेवा में अर्पित कर दे । गुरु की आज्ञा का अक्षरशः पालन करता हुआ, गुरु-कृपा से
प्राप्त विद्या और उपदेश को हृदयङ्गम करे ॥१०६॥ इस विषय में एक श्लोक भी है-जो द्विज गुरु की सेवा कर
वेदाध्ययन करता है उसको स्वर्ग मिलता है और उसकी सारी मनःकामनायें पूरी होती हैं। इसके बाद दूसरा
गृहस्थाश्रम है ॥१०७॥ इस आश्रम के आचारों को कह रहा हूँ । ब्रह्मचर्याश्रम के नियमों का पालन करने के
उपरान्त स्त्री के साथ धर्म पालन करने के इच्छुक के लिए यह आश्रम है ॥१०८॥ इस आश्रम में धर्म, अर्थ
और काम की प्राप्ति होती है । त्रिवर्ग (धर्म, अर्थ, काम) को दृष्टि में रखकर सत्कर्म द्वारा, अपनी विद्या या
ज्ञान के उत्कर्ष द्वारा, ब्रह्मर्षि निर्मित साधन द्वारा, समुद्र यात्रा या सागरगत द्रव्यों के व्यापार द्वारा या अन्य किसी
द्रव्योपार्जन के साधन द्वारा अथवा किसी देवता की कृपा से धन प्राप्त कर गृहस्थ अपने आश्रमोचित कार्यों को

२६४ नारदीयपुराणम्
तद्धि सर्वाश्रमाणां मूलमुदाहरंति गुरुकुलनिवासिनः
परिव्राजका येऽन्ये संकल्पितव्रतविशेषधर्मानुष्ठानिन- ॥११०॥
स्तेषामप्यंतरा च भिक्षाबलिसंविभागाः प्रवर्त्तते
वानप्रस्थानां च द्रव्योपस्कार इति प्रायशः खल्वेते साधवः
साधुपथ्योदनाः स्वाध्यायप्रसंगिनस्तीर्थाभिगमनदेशदर्श- ॥१११॥
नार्थं पृथिवीं पर्यटंति
तेषां प्रत्युत्थानाभिगमनमनसूयावाग्दानसुखसत्कारासन- ॥११२॥
सुखशयनाभ्यवहारसत्क्रिया चेति
भवति चात्र श्लोकः
अतिथिर्यस्य भग्नाशो गृहात्प्रतिनिवर्तते । स दत्त्वा दुष्कृतं तस्मै पुण्यमादाय गच्छति ॥११३॥
अपि चात्र यज्ञक्रियाभिर्देवताः प्रीयंते निवापेन पितरो ॥११४॥
विद्याभ्यासश्रवणधारणेन ऋषयः अपत्योत्पादनेन प्रजापतिरिति
श्लोकौ चात्रभवतः
वात्सल्यं सर्वभूतेभ्यो वायोः श्रोत्रस्तथा गिरा । परितापोपघातश्च पारुष्यं चात्र गर्हितम् ॥११५॥
अवज्ञानमहंकारो दंभश्चैव विगर्हितः । अहिंसा सत्यमक्रोधं सर्वाश्रमगतं तपः ॥११६॥
अपि चात्र माल्याभरणवस्त्राभ्यंगानित्योपभोगनृत्यगीत-
वादित्रश्रुतिसुखनयनस्नेहरामादर्शनानां प्राप्तिर्भक्ष्यभोज्य ॥११७॥
लेह्यपेयचोष्याणामभ्यवहार्याणां विविधानामुपभोगः
करे ॥१०६॥ इस आश्रम को सब आश्रमों का मूल कहा गया है। गुरुकुल निवासी, परिव्राजक अथवा अन्य जो
संकल्पित व्रत का अनुष्ठान करने वाले हैं सभी इस आश्रम से भिक्षा और बलि भाग पा जाते हैं ॥११०॥ वान-
प्रस्थाश्रम में द्रव्योपार्जन की भावना छोड़ दी जाती है। प्रायः वानप्रस्थाश्रमी साधु सात्विक भोजन करते,
सज्जनों के अन्न एवं आतिथ्य को ग्रहण करते, स्वाध्याय और हरिचर्चा में लीन रहकर देशाभ्रमण और तीर्थयात्रा के
उद्देश्य से पृथ्वी पर इधर-उधर घूमते हैं ॥१११॥ ऐसे साधुओं का, आने पर उठकर और पास जाकर स्वागत
करना, प्रियवाक्य, दान, सुखदायक सत्कार, आसन और सुखपूर्वक सोने की व्यवस्था, मधुर भोजन आदि द्वारा
सम्मान करना चाहिए ॥११२॥ इस विषय में भी एक श्लोक है, जिसके घर से अतिथि निराश होकर लौट जाता
है वह उस घर वाले को अपना सारा पाप देकर उसके पुण्य को लेकर चला जाता है ॥११३॥ एक बात और है,
यज्ञ क्रिया द्वारा देवता प्रसन्न होते हैं; तर्पण और श्राद्ध से पितर, विद्याभ्यास और वेदोपदेश सुनने से ऋषि और
पुत्रोत्पादन से प्रजापति प्रसन्न होते हैं ॥११४॥ दो श्लोक और कहे गए हैं कि—सब प्राणियों पर दया, प्राण,
वाणी एवं अन्य किसी इन्द्रिय द्वारा किसी को कष्ट न देना प्रत्युत सबके कष्टों को दूर करना, किसी से कठोर
व्यवहार न करना यह जीवन की तपस्या है। अपमान, अहंकार और दम्भ अत्यन्त निन्दनीय हैं। अहिंसा, सत्य
और अक्रोध सब आश्रमों के लिए विहित तप है। गृहस्थ जीवन में माला, आभरण एवं वस्त्र धारण करना
चाहिए। अंगों में अंगराग या लेप लगाना, प्रतिदिन सुखोपभोग करना, नृत्य, श्रुति सुखद गीत और मधुर वाद्य
सुनना, नयनों में अंजन लगाना, मनोहर रमणियों का दर्शन, विविध स्वादु भोज्य, लेह्य, पेय और चोष्य खाद्य

त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः २८५
स्वविहारसंतोषः कामसुखावाप्तिरिति । त्रिवर्गगुणनिवृत्तिर्यस्य
नित्यं गृहाश्रमे । स सुखान्यनुभूयेह शिष्टानां गतिमाप्नुयात् ॥११८॥
उंछवृत्तिर्गृहस्थो यः स्वधर्मचरणे रतः । त्यक्तकामसुखारंभः स्वर्गस्तस्य न दुर्लभः ॥११९॥
वानप्रस्थाः खल्वपि धर्ममनुसरंतः पुण्यानि तीर्थानि
नदीप्रस्रवणानि स्वभक्तेष्वरण्येषु मृगवराहमहिषशार्दूल
वनगजाकीर्णेषु तपस्यंते अनुसंचरंति ॥१२०॥
त्यक्तग्राम्यवस्त्राभ्यवहारोपभोगा वन्यौषधिफलमूलपर्णप-
रिमितविचित्रनियताहाराः स्थानासनिनोभूपाषाणसि-
कताशर्कराबालुकाभस्मशायिनः काशकुशचर्मवल्कलसंवृ-
तांगाः केशश्मश्रुनखरोमधारीणो नियतकालोपस्पर्शानाः
शुष्कबलिहोमकालानुष्ठायिनः । समित्कुशकुसुमापहारसं-
मार्जनलब्धविश्रामाःशीतोष्णपवनविष्टंभविभिन्नसर्वत्वचो
विविधनियमयोगचर्यानुष्ठानविहीनपरिशुष्कमांसशोणित-
त्वगस्थिभूता धृतिपराः सत्त्वयोगाच्छरीराण्युद्वहंते ॥१२१॥
यस्त्वेतां नियतचर्यां ब्रह्मर्षिविहितां चरेत् । स दहेदग्निवद्दोषाञ्जयेल्लोकांश्च दुर्जयान् ॥१२२॥

पदार्थों का सेवन, स्वविहार में सन्तोष और कामसुख की प्राप्ति होती है। जिस गेही के आश्रम में धर्म, अर्थ और
काम का नित्य सम्पादन होता है, वह समस्त सांसारिक सुखों का अनुभव कर सज्जनों की गति पाता है ।।११५-११८।।
जो गृहस्थ उञ्छवृत्ति द्वारा अपने आश्रम का पालन करता है और जिसने सब सुखदायक पदार्थों और कर्मों का
त्याग कर दिया है उसके लिए स्वर्ग दुर्लभ नहीं है ॥११९॥ वानप्रस्थाश्रमी लोग धर्म का पालन करते हुए पुण्य-
तीर्थ, नदी, उद्गम स्थान आदि में तथा मृग, वाराह, महिष, व्याघ्र और जंगली हाथियों से भरे वनों में आसन
लगाकर तपस्या करें ॥१२०॥ सभी ग्रामीण वस्त्र और भोजन आदि का त्याग कर जंगली ओषधियों, फल, मूल,
पत्तियों को परिमित मात्रा में खायें। एक स्थान पर आसन लगाकर बैठें। पृथ्वी, पत्थर, बालू, कंकड़ी अथवा
धूल आदि से भरे स्थान पर सो जायें। कास, कुशा, चर्म अथवा वल्कल से अंगों को ढक लें। सिर के केश, दाढ़ी,
मूंछ और नख न कटवायें। नियत समय पर स्नान, आचमन आदि करें। हवन काल में शुष्क बलि वैश्व और
हवन करें। समिधा, कुश और फूल आदि सामग्री लाकर स्वयं आश्रम में झाडू लगायें इसमें सुख का अनुभव करें।
सर्दी, वायु, लू से उनके शरीर की त्वचाएँ फटी हों, विविध नियम, योग और विहित अनुष्ठान से मांस, रक्त
एवं चमड़ा सूखकर शरीर केवल अस्थिमात्र शेष रह जाय, इस प्रकार धीरता धरण कर सत्त्वगुण-प्रधान योग-
साधना द्वारा समय बितायें ॥१२१॥
जो इस प्रकार ब्रह्मर्षि द्वारा विहित नियत आचार का पालन करता है वह अपने सब पापों को अग्नि
की भाँति जलाकर दुर्जय लोकों को भी जीत लेता है ॥१२२॥ अब संन्यास आश्रम के नियमों को बता रहा हूँ।

२८६ नारदीयपुराणम्
परिव्राजकानां पुनराचारः तद्यथा । विमुच्याग्निं धनकल-
त्रपरिबर्हंसंगेष्वात्मानं स्नेहपाशानवधूय परिव्रजंति । ।।१२३।।
समलोष्टाश्मकांचनास्त्रिवर्गप्रवृत्तेष्वसक्तबुद्धयः
अरिमित्रोदासीनानां तुल्यदर्शनाः स्थावरजरायुजांडजस्वे-
दजानां भूतानां वाङ्मनः कर्मभिरनभिद्रोहिणोऽनिकेताः
पर्वतपुलिनवृक्षमूलदेवायतान्यनुसंचरंतो वासार्थमुपेयुर्न-
गरं ग्रामं वा न क्रोधदर्पलोभमोहकार्पण्यदंभपरिवादाभि-
माननिवृत्तिर्हिंसा इति ।।१२४।।
भवंति चात्र श्लोक :
अभयं सर्वभूतेभ्यो दत्त्वा यश्चरते मुनिः । न तस्य सर्वभूतेभ्यो भयमुत्पद्यते क्वचित् ।।१२५।।
कृत्वाग्निहोत्रं स्वशरीरसंस्थं शरीरमग्निं स्वमुखे जुहोति ।।१२६।।
विप्रस्तु भैक्षोपगतैर्हविर्भिश्शिताग्नि संव्रजते हि लोकान् ।
मोक्षाश्रमं यश्चरते यथोक्तं शुचिः स्वसंकल्पितयुक्तबुद्धिः ।।१२७।।
अनिधनं ज्योतिरिव प्रशांतं स ब्रह्मलोकं श्रयते द्विजातिः
इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे द्वितीयपादे भृगुभारद्वाजसंवादे
ब्राह्मणाचारनिरूपणं नाम त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः ।।४३।।
तीन आश्रमों का पालन करने के बाद मनुष्य अग्नि, धन, स्त्री, सब सामग्रियों और बन्धु जनों से स्नेह संबन्ध
तोड़ कर संन्यास ग्रहण कर लेते हैं । इस आश्रम में मिट्टी, पत्थर और सोने को समान समझ कर, त्रिवर्गसाधन
से सर्वथा विरक्त हो जाना चाहिए ।।१२३।। शत्रु, मित्र या तटस्थ सब के प्रति समान भाव रखना चाहिए ।
संन्यासियों को स्थावर, जरायुज, अंडज, स्वेदज अर्थात् किसी भी प्राणी के प्रति मन, वचन और कर्म से भी
द्रोहबुद्धि नहीं करनी चाहिए । अपने रहने के लिए घर न बनाकर पर्वत, नदीतट, पेड़ों की छाया अथवा देव-मन्दिर
में रहकर अथवा ग्राम-ग्राम, नगर-नगर में घूमते हुए वे (अपना) समय बितायें । उनके हृदय में क्रोध, अभिमान,
लोभ, मोह, संकीर्णता, दंभ, निन्दाभावना और हिंसा न रहे ।।१२४।। इस विषय में कहा गया है कि जो मुनि
सब प्राणियों को अभय दान देता है उसको कहीं पर किसी जीव से भय नहीं होता है ।।१२५।। जो विप्र अग्नि-
होत्र करने के बाद अपने शरीरस्थ अग्नि में मुख के द्वारा भिक्षा द्वारा प्राप्त हविष्य अन्न का हवन करता है वह
उत्तम लोकों को प्राप्त करता है ।।१२६।। जो द्विजाति पवित्र होकर दृढ़ संकल्प कर संन्यासाश्रम का पालन करता
है, वह स्वयं प्रकाशमान ज्योति की भाँति ब्रह्मलोक में निवास करता है ।।१२७।।
श्रीनारदीयमहापुराण में ब्राह्मणाचार निरूपण नामक
तैंतालीसवाँ अध्याय समाप्त ।।४३।।

अथ चतुश्चत्वारिंशोऽध्यायः
भरद्वाज उवाच
आस्मल्लोकात्परो लोकः श्रूयते नोपलभ्यते । तमहं ज्ञातुमिच्छामि तद्भवान्वक्तुमर्हति ॥१॥
भृगुरुवाच
उत्तरे हिमवत्पार्श्वे पुण्ये सर्वगुणान्विते । पुण्यः क्षेम्यश्च काम्यश्च स परो लोक उच्यते ॥२॥
तत्र ह्यपापकर्माणः शुचयोऽत्यंतनिर्मलाः । लोभमोहपरित्यक्ता मानवा निरुपद्रवाः ॥३॥
स स्वर्गसदृशो देशः तत्र ह्युक्ताः शुभा गुणाः । काले मृत्युः प्रभवति स्पृशंति व्याधयो न च ॥४॥
न लोभः परदारेषु स्वदारनिरतो जनः । नान्यो हि वध्यते तत्र द्रव्येषु च न विस्मयः ॥५॥
परो ह्यधर्मो नैवास्ति संदेहो नापि जायते । कृतस्य तु फलं तत्र प्रत्यक्षमुपलभ्यते ॥६॥
यानासनाशनोपेताः प्रसादभवनाश्रयाः । सर्वकामैर्वृताः केचिद्धेमाभरणभूषिताः ॥७॥
प्राणधारणमात्रं तु केषांचिदुपपद्यते । श्रमेण महता केचित्कुर्वन्ति प्राणधारणम् ॥८॥
इह धर्मपराः केचित्केचिन्न्नैकृतिका नरा । सुखिता दुःखिताः केचिन्निर्धना धनिनो परे ॥६॥
इह श्रमो भयं मोहः क्षुधा तीव्रा च जायते । लोभश्चार्थकृतो नृणां येन मुह्यंत्यपंडिताः ॥१०॥

अध्याय ४४
ध्यानयोग-निरूपण
भरद्वाज बोले--इस लोक से परे दूसरा लोक है ऐसा सुना जाता है परन्तु देखा नहीं जाता, इसलिए
उस लोक के विषय में मैं जानना चाहता हूँ। आप कृपाकर कहिए ॥१॥
भृगु बोले--उत्तर दिशा में सब गुणों से युक्त, पवित्र, हिमालय के पार्श्व में एक पवित्र, क्षेमकर, काम्य
लोक है उसी को परलोक कहते हैं ॥२॥ वहाँ पुण्यशील, पवित्र, अत्यन्त शुद्ध हृदय, लोभ-मोह से दूर रहने वाले
शान्त प्राणी रहते हैं ॥३॥ वह स्वर्गोपम देश है। वहाँ उपर्युक्त शुभगुण सदा रहते हैं। वहाँ समय आने पर ही
मृत्यु होती है। रोग तो किसी को होता ही नहीं ॥४॥ किसी को परस्त्रीगमन की इच्छा नहीं होती। सभी
स्वस्त्री से ही प्रेम करते हैं। कोई किसी की हत्या नहीं करता और किसी की संपत्ति देखकर दूसरे को आश्चर्य
नहीं होता ॥५॥ किसी प्रकार का अधर्म वहाँ नहीं है। न तो किसी के प्रति किसी को सन्देह ही रहता है।
किये हुए कर्मों का सबको प्रत्यक्षफल मिलता है ॥६॥ सब बड़े-बड़े महलों में रहते और सवारी, स्थान और
भोजन की सुविधा प्रत्येक व्यक्ति को है। सब लोग सभी कामनाओं से पूर्ण रहते हैं। कुछ लोग तो स्वर्णाभरणों से
आभूषित रहते हैं। इसके विपरीत इस भूलोक में कुछ तो धर्मपरायण होते और कुछ पाप कर्म को ही इष्ट कर्म ही
समझते हैं। यहाँ कोई सुखी है तो कोई दुःखी। कुछ धनी हैं तो कुछ निर्धन ॥७-९॥ यहाँ थकावट, भय, मोह
तथा भूख-प्यास लगती है। धन का लोभ मनुष्यों को अत्यधिक है, जिससे अज्ञ जन सर्वदा मोहवश धन की ओर

२८८ नारदीयपुराणम्
यस्तद्वेदोभयं प्राज्ञः पाप्मना न स लिप्यते । सोपधे निकृतिः स्तेयं परिवादोऽभ्यसूयता ॥११॥
परोपघातो हिंसा च पैशुन्यमनृतं तथा । एतान्संवते यस्तु तपस्तस्य प्रहीयते ॥१२॥
यस्त्वेतानाचरेद्विद्वान्न तपस्तस्य वर्द्धते । इह चिन्ता बहुविधा धर्माधर्मस्य कर्मणः ॥१३॥
कर्मभूमिरियं लोके इह कृत्वा शुभाशुभम् । शुभैः शुभमवाप्नोति तथाशुभमथाऽन्यथा ॥१४॥
इह प्रजापतिः पूर्वं देवाः सर्षिगणास्तथा । इष्ट्वेष्टतपसः पूता ब्रह्मलोकमूपाश्रिताः ॥१५॥
उत्तरः पृथिवीभागः सर्वपुण्यतमः शुभः । इहस्थास्तत्र जायंते ये वै पुण्यकृतो जनाः ॥१६॥
यदि सत्कारमिच्छंति तिर्यग्योनिषु चापरे । क्षीणापुधस्तथा चाज्ये नश्यन्ति पृथिवीतले ॥१७॥
अन्योन्यभक्षणासक्ता लोभमोहसमन्विताः । इहैव परिवर्तन्ते न च यान्त्युत्तरां दिशम् ॥१८॥
गुरुनुपासते ये तु नियता ब्रह्मचारिणः । पंथानं सर्वलोकानां विजानंति मनीषिणः ॥१९॥
इत्युक्तोऽयं मया धर्मः संक्षिप्तो ब्रह्मनिर्मितः । धर्माधर्मौ हि लोकस्य यो वै वेत्ति स बुद्धिमान् ॥२०॥
भरद्वाज उवाच
अध्यात्मं नाम यदिदं पुरुषस्येह चिन्त्यते । यदध्यात्मं यथा चैतत्तन्मे ब्रूहि तपोधन ॥२१॥
भृगुरुवाच
अध्यात्ममिति विप्रर्षे यदेतदनुपृच्छसि । तद्वयाख्यास्यामि ते तात श्रेयस्करतमं सुखम् ॥२२॥
सृष्टिप्रलयसंयुक्तमाचार्यैः परिदर्शितम् । यज्ज्ञात्वा पुरुषो लोके प्रीतिं सौख्यं च विंदति ॥२३॥
खिंचे रहते हैं । जिसको दोनों लोकों का ज्ञान है वह प्राज्ञ है । जो शठता, चोरी, निन्दा, ईर्ष्या, हिंसा, चुगली,
असत्य दूसरे के साथ विश्वासघात, दुष्कर्मों आदि को करता है उसकी सारी तपस्या का क्षय हो जाता है ॥१०-१२॥
जो विद्वान् इन दुष्कर्मों को नहीं करता है उसकी तपस्या में वृद्धि होती है । इस लोक में धर्म-अधर्म की अनेकों
चिन्तायें (व्यवस्थायें) हैं । इस भूलोक में भारतवर्ष कर्मभूमि है, यहाँ मनुष्य शुभ-अशुभ कर्मों के अनुसार शुभ-
अशुभ फलों को पाता है ॥१३-१४॥ इस लोक में पूर्वकाल में प्रजापति, देवता और ऋषिगणों ने इच्छानुकूल इष्ट
तप करके ब्रह्मलोक को प्राप्त किया है ॥१५॥ पृथ्वो का उत्तरीय भाग शुभ और सबसे अधिक पुण्य भूमि है ।
इस भूभाग के रहने वाले जो मनुष्य शुभ कर्म करते हैं और शुभ फल चाहते हैं, वे ही वहाँ जन्म पाते हैं ॥१६॥
जो लोग शुभ की इच्छा करते हैं परन्तु शुभ कर्म करते नहीं वे उस लोक में तिर्यग्योनि में जन्म पाते हैं । इसके
विपरीत जो अन्य व्यक्ति हैं वे यहीं अल्पायु होकर इसी पृथ्वी तल पर नष्ट हो जाते हैं ॥१७॥ एक-दूसरे की हत्या
करने वाले, लोभ और मोह के बन्धन में फँसे रहने वाले मनुष्य इसी लोक में बार-बार जन्म पाते हैं कभी उत्तर
दिशा में जन्म नहीं पाते ॥१८॥ जो नियमित रूप से ब्रह्मचारी रहकर गुरु की उपासना करते हैं वे मनीषी सब
लोकों के मार्ग जानते हैं; अर्थात् सब लोकों में जा सकते हैं ॥१९॥ इस प्रकार मैंने ब्रह्मनिर्मित धर्म का संक्षेप में
वर्णन किया है जो मनुष्य लौकिक धर्म और अधर्म को जानता है वह बुद्धिमान् है ॥२०॥
भरद्वाज बोले-तपोधन ! पुरुष के अध्यात्म की चर्चा प्रायः चलती है, उसके अध्यात्म का चिन्तन प्रायः
किया जाता है, उस अध्यात्म का जो रूप है और उसकी जो परिभाषा है, उसको आप कृपा कर कहिए ॥२१॥
भृगु बोले--विप्रर्षे ! जो तुमने अध्यात्म के विषय में पूछा है, उसकी व्याख्या कर रहा हूँ जो कि श्रेय-
स्कर सुख को देने वाला है ॥२२॥ अध्यात्म को आचार्यों ने सृष्टि-प्रलय से युक्त बतलाया है, जिसका ज्ञान प्राप्त

चतुश्चत्वारिंशोऽध्यायः २८६
फललाभश्च तस्य स्यात्सर्वभूतहितं च तत्। पृथिवी वायुमाकाशमापो ज्योतिश्च पंचमम् ॥२४॥
महाभूतानि भूतानां सर्वेषां प्रभवाप्ययौ। यतः सृष्टानि तत्रैव तानि यान्ति लयं पुनः ॥२५॥
महाभूतानि भूतेभ्यः सागरस्योर्मयो यथा। प्रसार्य च यथांगानि कूर्मः संहरते पुनः ॥२६॥
तद्वद् भूतानि भूतात्मा सृष्टानि हरते पुनः। महाभूतानि पंचैव सर्वभूतेषु भूतकृत् ॥२७॥
अकरोत्तेषु वै सम्यक् तं तु जीवो न पश्यति। शब्दः श्रोत्रं तथा खानि त्रयमाकाशयोनिजम् ॥२८॥
वायोः स्पर्शस्तथा चेष्टा त्वक्चैव त्रितयं स्मृतम्। रूपं चक्षुस्तथा पाकस्त्रिविधं तेज उच्यते ॥२९॥
रसाः क्लेदश्च जिह्वा च त्रयो जलगुणाः स्मृता। घ्रेयं घ्राणं शरीरं च एते भूमिगुणास्त्रयः ॥३०॥
महाभूतानि पंचैव षष्ठं च मन उच्यते। इन्द्रियाणि मनश्चैव विज्ञातान्यस्य भारत ॥३१॥
सप्तमी बुद्धिरित्याहुः क्षेत्रज्ञः पुनरष्टमः। श्रोत्रं वै श्रवणार्थाय स्पर्शनाय च त्वक् स्मृताः ॥३२॥
रसादानाय रसना गन्धानादाय नासिका। चक्षुरालोकनायैव संशयं कुरुते मनः ॥३३॥
बुद्धिरध्यवसानाय क्षेत्रज्ञः साक्षिवत्स्थितः। ऊर्ध्वं पादतलाभ्यां यदवाक्चोदक्च पश्यति ॥३४॥
एतेन सर्वमेवेदं विभुना व्याप्तमन्तरम्। पुरुषैरिन्द्रियाणीह वेदितव्यानि कृत्स्नशः ॥३५॥
तमो रजश्च सत्त्वं च तेऽपि भावास्तदाश्रिताः। एतां बुद्धिं नरो भूतानामगतिं गतिम् ॥३६॥
समवेक्ष्य शनैश्चैवं लभते शममुत्तमम्। गुणैर्विनश्यते बुद्धिर्बुद्धेरेवेन्द्रियाण्यपि ॥३७॥
कर मनुष्य इस लोक में सुखी और प्रसन्न होता है ॥२३॥ वह ज्ञान सब प्राणियों का हित करने वाला और फल-
दायक है। पृथ्वी, वायु, आकाश, जल और पाँचवां तेज ये पंच महाभूत हैं जिनसे सब भूतों (पदार्थ या प्राणियों)
की सृष्टि और नाश होता है। इनकी जिससे सृष्टि होती है उसी में ये लीन भी होते हैं ॥२४॥ जिस प्रकार
सागर से लहरें उत्पन्न होकर पुनः उसी में विलीन होती हैं उसी प्रकार ये महाभूत भूतों से ही उत्पन्न
होते हैं और उनमें ही विलीन होते हैं। जिस प्रकार कछुवा अपने अंगों को फैलाकर पुनः सिकोड़ लेता है उसी प्रकार
भूतात्मा भूतों को प्रसारित करता और समेट लेता है उसी प्रकार भूतात्मा उत्पन्न किये गये उन भूतों को अपने
में लीन कर लेता है ॥२५-२६॥ सब भूतों का निर्माण करने वाले ये ही पाँच महाभूत हैं जो उन्हीं भूतों (पदार्थ)
में व्याप्त रहते हैं। परमात्मा उनमें ही प्राणियों की रचना करता है, परन्तु जीव उसको देख नहीं पाता ॥२७॥
शब्द, श्रोत्रेन्द्रिय और आकाश तीनों आकाश से उत्पन्न होते हैं, वायु से स्पर्श, चेष्टा और त्वक् उत्पन्न हुए हैं,
रूप, चक्षु, और पाक (जठराग्नि) ये तेज के तीन रूप हैं ॥२८-२९॥ रस, क्लेद और जीभ ये जल के गुण हैं।
गन्ध, नासिका और शरीर ये तीनों भूमि के गुण हैं ॥३०॥ इन्द्रियरूप में पाँच महाभूत होते हैं, छठा मन है।
भारत ! इन्द्रियों और मन का ज्ञान कराया गया, सातवीं बुद्धि है और क्षेत्रज्ञ आठवां है। श्रोत्र (कान) सुनने के
लिये है, त्वक् से स्पर्श का ज्ञान होता है। रस का ग्रहण रसनेन्द्रिय से और नासिका से गन्ध का ग्रहण होता है।
नेत्र देखने के लिए और मन संशय (ऊहा, तर्क) करता है ॥३१-३३॥ बुद्धि निर्णय के लिए और क्षेत्रज्ञ (आत्मा)
साक्षी रूप में स्थित है जो पादल से ऊपर उत्तर-दक्षिण चारों ओर देखता है ॥३४॥ इस व्यापक आत्मा से
सारा शरीर व्याप्त है। इस लोक में मनुष्य को सब इन्द्रियों का भली भाँति ज्ञान होना चाहिए ॥३५॥ रज,
सत्त्व और तम ये तीनों भाव आत्मा से ही संबद्ध हैं। ज्ञानी मनुष्य अपनी बुद्धि से भूतों की गति और अगति
को जान कर क्रमशः शान्ति पाता है ॥३६॥ इन गुणों के चक्कर में पड़कर बुद्धि नष्ट हो जाती है, बुद्धि के
नष्ट हो जाने पर इन्द्रियाँ और मन के सहित पंचभूत भी नष्ट हो जाते हैं। बुद्धि के न रहने पर गुण कैसे रह
३७ नारदीयपुराण

२६० नारदीयपुराणम्
मनः षष्ठानि भूतानि बुद्धयभावे कुतो गुणाः । इति तन्मयमेवैतत्सर्वं स्थावरजंगमम् ॥३७॥
प्रलीयते चोद्भवति तस्मान्निर्दिश्यते तथा । येन पश्यति तच्चक्षुः शृणोति श्रोत्रमुच्यते ॥३८॥
जिघ्रति घ्राणमित्याहुः रसं जानाति जिह्वया । त्वचा स्पर्शयति स्पर्शं बुद्धिविक्रियते सकृत् ॥३९॥
येन प्रार्थयते किंचित्तदा भवति तन्मनः । अधिष्ठानात्तु बुद्धेर्हि पृथगर्थानि पञ्चधा ॥४०॥
इंद्रियाणीति तान्याहुस्तान्यदृष्टोऽधितिष्ठति । पुरुषे तिष्ठती बुद्धिस्त्रिषु भावेषु वर्तते ॥४१॥
कदाचिल्लभते प्रीतिं कदाचिदुपशोचति । न सुखेन न दुःखेन कदाचिदपि वर्तते ॥४२॥
एवं नराणां मनसि त्रिषु भावेषु वर्तते । सेयं भावात्मिका भावांस्त्रीनेतानतिवर्तते ॥४४॥
सरितां सागरो भर्ता वेलानामिव वारिधिः । अतिभावगता बुद्धिर्भावैर्मनसि वर्तते ॥४५॥
वर्तमानो मुनिस्त्वेवं स्वभावमनुवर्तते । इंद्रियाणि हि सर्वाणि प्रवर्तयति सा सदा ॥४६॥
प्रीतिः सत्त्वं रजः शोकस्तमः क्रोधस्तु ते त्रयः । ये ये च भावा लोकेऽस्मिन्सर्वेऽप्येतेषुवै त्रिषु ॥४७॥
इति बुद्धिगताः सर्वा व्याख्यातास्तव भावनाः । इंद्रियाणि च सर्वाणि विजेतव्यानि धीमता ॥४८॥
सत्त्वं रजस्तमश्चैव प्राणिनां संश्रिताः सदा । त्रिविधा वेदनाश्चैव सर्वसत्त्वेषु दृश्यते ॥४९॥
सात्त्विकी राजसी चैव तामसी चेति मानद । सुखस्पर्शः सत्त्वगुणो दुःखस्पर्शो रजोगुणः ॥५०॥
तमोगुणेन संयुक्तौ भवतो व्यावहारिकौ । तव यत्प्रीतिसंयुक्तं काये मनसि वा भवेत् ॥५१॥
वर्तते सात्त्विको भाव इत्याचक्षीत तत्तथा । अथ यद्दुःखसंयुक्तमप्रीतिकरमात्मनः ॥५२॥
सकते हैं ॥३७॥ ये सम्पूर्ण स्थावर-जंगम जगत् आत्ममय हैं, उसी से यह उत्पन्न होता और उसी में विलीन
होता है, इसलिए इसका उसी रूप में निर्देश किया जाता है ॥३८॥ जिससे वह (आत्मा) देखता उसको चक्षु,
जिससे सुनता उसको श्रोत्र (कान) और जिससे सूंघता उसको नासिका कहते हैं। वह जिह्वा के द्वारा रस का
स्वाद लेता और त्वचा के द्वारा स्पर्श का ज्ञान करता है। बुद्धि में बार-बार विकार होता है ॥३९-४०॥ पुरुष
जिससे कुछ इच्छा करता है, वह मन है। बुद्धि इन सबका अधिष्ठान है। अतः पाँच विषय और पाँच इन्द्रियाँ
उससे पृथक् कही गई हैं। इन सब का अधिष्ठाता चेतन क्षेत्रज्ञ इनसे नहीं देखा जाता। पुरुष में रहती हुई बुद्धि
तीन भावों में विद्यमान रहती है ॥४१-४२॥ पुरुष कभी प्रसन्न होता तो कभी शोक करता है। एकान्ततः
न तो उसको सुख ही होता है न दुःख ही ॥४३॥ इस प्रकार मनुष्यों का मन तीनों भावों में वर्त्तमान रहता
है। वह भावात्मिका बुद्धि इन तीनों भावों को उसी तरह अपने अधीन कर लेती है जैसे नदियों का स्वामी
समुद्र नदियों को आत्मसात् कर लेता है ॥४४॥ उच्च भाव को प्राप्त बुद्धि भावों द्वारा मन में वर्तमान
रहती है। वर्तमान मुनि इस प्रकार स्वभाव का अनुसरण करता है और बुद्धि सदा सकल इन्द्रियों को प्रेरित
करती रहती है। प्रीति सत्त्व का रूप है, शोक रज का और क्रोध तम का रूप है। इस लोक में जो भाव हैं
वे सब इन तीनों गुणों में ही सन्निहित हैं ॥४५-४७॥
इस प्रकार तुम्हारी बुद्धिस्थ सब भावनाओं की व्याख्या कर दी गई। धीमान् मनुष्य सब इन्द्रियों को
अपने वश में करे ॥४८॥ सत्त्व, रज और तम ये तीनों प्राणियों में सर्वदा वर्त्तमान रहते हैं। त्रिविध (सात्त्विक
रजस, तामस) वेदनायें भी प्राणियों में सदा देखी जाती हैं ॥४९॥ मानद ! सत्त्वगुण सुखद स्पर्श वाला है और
रजोगुण दुःखद ॥५०॥ जब वे दोनों तमोगुण से मिलते हैं तभी व्यवहारोपयोगी होते हैं। जब तुम्हारे मन
में या शरीर में प्रसन्नता का अनुभव हो तब यह समझना कि तुम्हारे मन या शरीर में सत्त्वगुण का प्रवेश
हुआ है। मुनि-श्रेष्ठ ! जब मन में कुछ अप्रीतिकर या दुःख की अनुभूति हो तो रजोगुण का उद्रेक हो गया

यहाँ पृष्ठ का संपूर्ण पाठ प्रस्तुत है:

चतुश्चत्वारिंशोऽध्यायः २६१
प्रवृत्तं रज इत्येव जानीहि मुनिसत्तम । अथ यन्मोहसंयुक्तमव्यक्तविषयं भवेत् ॥५३॥
अप्रतर्क्यमविज्ञेयं तमस्तदुपधारयेत् । प्रहर्षः प्रीतिरानंदः सुखं वा शान्तचित्तता ॥५४॥
कथंचिदभिवर्तन्त इत्येते सात्त्विका गुणाः । असंतुष्टिः परितापश्च शोको लोभस्तथा क्षमा ॥५५॥
लिंगानि रजसस्तानि दृश्यंते देहहेतुभिः । अपमानस्तथा मोहः प्रमादः स्वप्नतंद्रिते ॥५६॥
कथंचिदभिवर्तंते विविधास्तामसा गुणाः । दूषणं बहुधागामि प्रार्थनासंशयात्मकम् ॥५७॥
मनः स्वनियतं यस्य स सुखी प्रेत्य चेह च । सत्त्वक्षेत्रज्ञयोरेतदन्तरं यस्य सूक्ष्मयोः ॥५८॥
सृजते च गुणानैक एको न सृजते गुणान् । मशकोदुंबरी वापिः संप्रयुक्तौ यथा सदा ॥५९॥
अन्योन्यमेतौ स्यातां च संप्रयोगस्तथोभयोः । पृथग्भूतौ प्रकृत्या तौ संप्रयुक्तौ च सर्वदा ॥६०॥
यथा मत्स्यो जलं चैव संप्रयुक्तो तथैव तौ । न गुणा विदुरात्मानं स गुणान्वेत्ति सर्वशः ॥६१॥
परिद्रष्टा गुणानां तु संस्रष्टा मन्यते तथा । इन्द्रियैस्तु प्रदीपार्थं कुरुते बुद्धि सत्तमैः ॥६२॥
निर्विचेष्टैरजानद्भिः परमात्मा प्रदीपवान् । सृजते हि गुणान्सत्त्वं क्षेत्रज्ञः परिपश्यति ॥६३॥
संप्रयोगस्तयोरेव सत्त्वक्षेत्रज्ञयोर्ध्रुवम् । आश्रयो नास्ति सत्त्वस्य क्षेत्रज्ञस्य च कश्चन ॥६४॥
सत्त्वं मनः संसृजते न गुणान्ये कदाचन । रश्मींस्तेषां स मनसा यदा सम्यङ्‌नियच्छति ॥६५॥
तदा प्रकाशतेऽस्यात्मा घटे दीपो ज्वलन्निव । त्यक्त्वा यः प्राकृतं कर्म नित्यमात्मरतिर्मुनिः ॥६६॥
सर्वभूतात्मभूतस्तस्मात्स गच्छेदुत्तमां गतिम् । यथा वारिचरः पक्षी सलिलेन न लिप्यते ॥६७॥
एवमेव कृतप्रज्ञो भूतेषु परिवर्तते । एवं स्वभावमेवैतत्स्वबुद्ध्या विहरेन्नरः ॥६८॥

ऐसा जानो ॥५२॥ इसके अनन्तर जब मन मोहाकुल हो जाय और किसी विषय का प्रत्यक्षानुभव न हो,
तर्क और ज्ञान से कुछ निश्चय न हो तो समझो कि तमोगुण ने शरीर में अपना प्रभाव दिखलाया है ॥५३॥
प्रहर्ष, प्रीति, आनन्द, सुख अथवा शान्ति ये सात्त्विक गुण हैं जो कभी किसी प्रकार मनुष्य को प्राप्त होते हैं
॥५४॥ असन्तोष, परिताप-शोक, लोभ और क्रोध ये रजोगुण के चिह्न हैं। जिनका अनुभव देहधारी करते हैं
॥५५॥ अपमान, मोह, प्रमाद, निद्रा और तन्द्रा (आलस्य) ये विविध भाव तामस गुण हैं जो किसी भाँति
शरीर में व्याप्त हो जाते हैं ॥५६॥ बहुधा शरीर में दोष आ जाते हैं, जो कि अधिकतर आकांक्षा संशय
के कारण उत्पन्न होते हैं। जिसका मन अपने वश में है वही लोक और परलोक में सुख पाता है ॥५७॥
सूक्ष्म सत्त्व (जीव) और क्षेत्रज्ञ में यह अन्तर है कि एक (क्षेत्रज्ञ) गुणों की सृष्टि करता है और एक गुण की
सृष्टि नहीं करता। जिस प्रकार मशक (कीड़ा) और गूलर परस्पर मिले रहते हैं, उसी प्रकार ये दोनों मिले
रहते हैं ॥५८-५६॥ प्रकृति‌तः ये दोनों पृथक्-पृथक् हैं परन्तु सदा ये मिले ही रहते हैं। जिस प्रकार मछली
और जल सर्वदा परस्पर संबद्ध रहते हैं उसी प्रकार ये दोनों ॥६०॥ गुण आत्मा को नहीं जानते परन्तु आत्मा
गुणों को जानता है। यद्यपि पुरुष गुणों का द्रष्टा मात्र है, तथापि बुद्धि के संसर्ग से वह अपने को उनका स्रष्टा
मानता है। इस प्रकार सत्त्व और पुरुष का संसर्ग हुआ है, किन्तु इनका पार्थक्य निश्चित है। जब बुद्धि मन
के द्वारा इन्द्रियरूपी घोड़ों की रास खींचती है और भली भाँति वश में रखती है उस समय घड़े में रखे हुए
प्रज्वलित दीपक की भाँति आत्मा प्रकाशित होने लगता है ॥६१-६५॥
जो मुनि प्राकृत कर्मों का परित्याग कर नित्य आत्मा से ही प्रेम करता है वह सब प्राणियों के अन्त-
रात्मा की बातें जानता है और उत्तम गति को प्राप्त करता है। जैसे जल में रहने वाला पक्षी जल से लिप्त
नहीं होता उसी प्रकार प्रज्ञावान् व्यक्ति सब भूतों के मध्य रहकर भी उनमें आसक्त नहीं होता ॥६६-६७॥ मनुष्य
इसी प्रकार निलिप्त भाव से इच्छानुकूल विचरण करे। बिना शोक और हर्ष के, ईर्ष्या का त्याग कर समान

२६२ नारदीयपुराणम्
अशोचन्नप्रहृष्यंश्च समो विगतमत्सरः । भावयुक्त्या प्रयुक्तस्तु स नित्यं सृजते गुणान् ॥६६॥
ऊर्णनाभिर्यथा सूत्रं विज्ञेयास्तंतुवद्गुणाः । प्रध्वस्ता न निवर्तन्ते निवृत्तिर्नोपलभ्यते ॥७०॥
प्रत्यक्षेण परोक्षं तदनुमानेन सिद्ध्यति । एवमेके व्यवस्यंति निवृत्तिरिति चापरे ॥७१॥
उभयं संप्रधार्यैतद्व्यवस्येत यथामति । इतीमं हृदयग्रंथि बुद्धिरुचिन्तानयं दृढम् ॥७२॥
विमुच्य सुखमासीत न शोचेच्छिन्नसंशयः । मलिनाः प्राप्नुयुः शुद्धिं यथा पूर्णां नदीं नराः ॥७३॥
अवगाह्य सुविद्वांसो विद्धि ज्ञानमिदं तथा । महानद्यां हि पारज्ञस्तप्यते न तरन्यथा ॥७४॥
न तु तप्यति तत्त्वज्ञः कुलज्ञस्तु तरत्युत । एवं ये विदुरध्यात्मं कैवल्यं ज्ञानमुत्तमम् ॥७५॥
एवं बुद्धा नरः सर्वो भूतानामर्ति गतिम् । अवेक्ष्य च शनैर्बुद्ध्या लभते च शमं ततः ॥७६॥
त्रिवर्गो यस्य विदितः प्रेक्ष्य यश्च विमुंचति । अन्विष्य मनसा युक्तस्तत्त्वदर्शी निरुत्सुकः ॥७७॥
न चात्मा शक्यते द्रष्टुमिन्द्रियेषु विभाशः । तत्र तत्र विसक्तेषु दुर्भावेष्वकृतात्मभिः ॥७८॥
एतद् बुद्धा भवेद् बुद्धः किमन्यद् बुद्धलक्षणम् । विज्ञाय तद्धि मन्यन्ते कृतकृत्या मनीषिणः ॥७९॥
न भवति विदुषां ततो भयं यदविदुषां सुमहद्भयं भवेत् ।
नहि गतिरधिकास्ति कस्यचित्सति हि गुणे प्रवदंत्युतप्यताम् ॥८०॥
यः करोत्यनभिसंधिपूर्वकं तच्च निर्दहति यत्पुराकृतम् ।
नाप्रियं तदुभयं कुतः प्रियं तस्य तज्जनयतीह कुर्वतः ॥८१॥
भाव से रहे। प्रज्ञावान् व्यक्ति (जीव) भावयुक्त हो नित्य प्रति गुणों की सृष्टि करता है। जिस प्रकार मकड़ी
अपने मुंह से सूत्र निकालती है उसी प्रकार यह भी गुणों की सृष्टि करता है। वे गुण ध्वस्त होते रहते हैं परन्तु
यह उनकी सृष्टि करता ही रहता है, विराम नहीं करता। उस जीव का कर्तव्य प्रत्यक्ष सृष्टि द्वारा सिद्ध होता
है और उस परोक्ष की अनुमान द्वारा सिद्धि होती है। इस प्रकार कुछ लोग मानते हैं कि वह नित्य प्रति व्यव-
साय में लगा रहता है, और अन्य लोगों का मत है कि वह इस कार्य से विरत भी होता है। इन दोनों सिद्धान्तों
का विवेचन कर मनुष्य यथामति उद्योग करे। इस प्रकार हृदय की उलझन को बुद्धि और विचारपूर्वक
दृढ़ता से दूर कर सुखपूर्वक रहे और अपने संशय को दूर कर किसी प्रकार का शोक न करे। जिस प्रकार मैला-
कुचैला मनुष्य स्वच्छ जल से पूर्ण नदी में नहा कर शुद्ध हो जाता है उसी प्रकार विद्वान् व्यक्ति ज्ञान की सरिता
में नहा कर शुद्ध हो जाते हैं। जैसे तैराक महानदी को पार करते समय कष्ट का अनुभव नहीं करता वैसे ही कुल
और तत्त्व के ज्ञाता को इस संसार में कष्ट नहीं होता, वह अनायास इस संसार-सागर को पार कर जाता है।
इस प्रकार जो उत्तम कैवल्यदायक अध्यात्म ज्ञान को जानते हैं, वे ज्ञानी प्राणियों की गतिविधि को अपने ज्ञान
द्वारा जानकर शान्ति प्राप्त करते हैं। जिसको त्रिवर्ग का ज्ञान है जो संसार को देखकर भी उसमें लिप्त नहीं
होता, जो तत्त्वदर्शी मन से पदार्थों का सूक्ष्म निरीक्षण कर शान्त भाव से योग-युक्त होता है, उसे शान्ति मिलती
है। जो अज्ञानी हैं वे तत्तत् विषयों में आसक्त इन्द्रियों में आत्मा को अलग-अलग करके नहीं देख सकते। आत्मज्ञ
और ज्ञानी व्यक्ति ही बुद्ध कहा जाता है। इसके अतिरिक्त बुद्ध का दूसरा लक्षण क्या हो सकता है? मनीषी व्यक्ति इस
प्रकार ज्ञान प्राप्त कर कृतकृत्य हो जाते हैं इस प्रकार ज्ञान प्राप्त हो जाने पर विद्वान् को वहाँ पर भी भय नहीं लगता
जहाँ अज्ञानों को अत्यधिक भय लगता है। जो फल की इच्छा और आसक्ति का त्याग करके कर्म करता है, वह अपने पूर्व-
कृत कर्म-बन्धन को जला देता है। ६८-८० ३। ऐसा पुरुष यदि कर्म करता है तो उसका किया हुआ कर्म प्रिय अथवा अप्रिय

चतुश्चत्वारिंशोऽध्यायः २६३
लोकमायुरभिसुयते जनस्तस्य तज्जनयतीह कुर्वतः ।
तत्र पश्य कुशलान्न शोचते जायते यदि भयं पदं सदा ॥८२॥
भरद्वाज उवाच
ध्यानयोगं समाचक्ष्व मह्यं तत्पदसिद्धये । यज्ज्ञात्वा मुच्यते ब्रह्मन्नरस्त्रिविधतापात् ॥८३॥
भृगुरुवाच
हंत ते संप्रवक्ष्यामि ज्ञानयोगं चतुर्विधम् । यं ज्ञात्वा शाश्वतीं सिद्धिं गच्छन्तीह महर्षयः ॥८४॥
यथा स्वनुष्ठितं ध्यानं तथा कुर्वन्ति योगिनः । महर्षयो ज्ञानतृप्ता निर्वाणगतमानसाः ॥८५॥
नावर्तते पुनश्चापि मुक्ताः संसारदोषतः । जन्मदोषपरिक्षीणाः स्वभावे पर्यवस्थिताः ॥८६॥
निर्द्वन्द्वा नित्यसत्त्वस्था विमुक्ता निष्परिग्रहाः । असंगान्यविधादीनि मनः शांतिकराणि च ॥८७॥
तत्र ध्यानेन संक्लिष्टमेकाग्रं धारयेन्मनः । पिंडीकृत्येन्द्रियग्राममासीनः काष्ठवन्मुनिः ॥८८॥
शब्दं न विदेच्छ्रोत्रेण त्वचा स्पर्शं न वेद्येत् । रूपं न चक्षुषा विद्याज्जिह्वया न रसांस्तथा ॥८९॥
घ्रेयाण्यपि च सर्वाणि जहाद्द्यानेन तत्त्ववित् । पंचवर्गप्रमाथीनि नेच्छेच्चैतानि वीर्यवान् ॥९०॥
ततो मनसि संगृह्य पंचवर्गं विचक्षणः । समादध्यान्मनो भ्रांतमिंद्रियैः सह पञ्चभिः ॥९१॥
विसञ्चारि निरालम्बं पंचद्वारं बलाबलम् । पूर्वध्यानपथे धीरः समादध्यानमनस्त्वरा ॥९२॥
इन्द्रियाणि मनश्चैव यदा पिण्डीकरोत्ययम् । एष ध्यानपथः पूर्वो मया समनुवर्णितः ॥९३॥
फल नहीं उत्पन्न नहीं कर सकता। यदि मनुष्य अपनी आयु भर लोक को सताता है, तो कर्म में लगे हुए उस
पुरुष का वह अशुभ कर्म उसके लिए यहाँ फल ही उत्पन्न करता है। देखो, कुशल (पुण्य) कर्म करने से कोई भी
शोक में नहीं पड़ता, परन्तु यदि उससे पाप बनता है तो सदा के लिए भयपूर्ण स्थान प्राप्त होता है ॥८१-८२॥
भरद्वाज बोले- ब्रह्मन् ! आप ब्रह्मपद पाने के लिए उपयुक्त ध्यान योग को कहिए, जिसको जान कर
मनुष्य त्रिविध ताप से मुक्त हो जाता है ॥८३॥
भृगु बोले- बहुत अच्छा, मैं अब चार प्रकार के ज्ञान योग को कह रहा हूँ, जिसको जानकर महर्षि
शाश्वत पदवी को पा जाते हैं ॥८४॥ योग जैसे हो वैसे भली भाँति ध्यान योग को साधना करते हैं। ज्ञान से
तृप्त और मुक्ति में ही रमने वाले योगी संसार के दोष से मुक्त हो कर पुनः उस बन्धन में नहीं पड़ते ॥८५३॥
वे जन्म के दोषों के सहज पापों को नष्ट कर स्वभाव (आत्मभाव) में ही स्थिर हो जाते हैं। सुख दुःख से परे,
नित्य सात्विक वृत्ति में स्थित, विमुक्त और परिग्रह से विमुख योगी आवागमन के चक्कर में नहीं पड़ता।
अनासक्ति आदि गुण मन को शान्ति देने वाले ध्यान के द्वारा अपने पीड़ित मन को एकाग्र करे। मुनि काष्ठ
की भाँति अटल होकर बैठ जाय और सम्पूर्ण इन्द्रियों को विषयों की ओर से हटाकर, कानों से किसी
प्रकार का शब्द न सुने, जिह्वा से रस और सब प्रकार के सूँघने योग्य पदार्थों को तत्त्वज्ञ व्यक्ति ध्यान के द्वारा
छोड़ दे। इसके अनन्तर पराक्रमी योगी पाँचों इन्द्रियों को चंचल कर देने वाले विषयों की इच्छा न करे।
विद्वान् मन में पंच वर्ग को वशीभूत कर पाँचों इन्द्रियों के साथ इधर-उधर भ्रमण करने वाले मन को एकाग्र करे।
धीर व्यक्ति शीघ्र ही संचरणशील, निरालम्ब, पंच द्वार को (पाँचों इन्द्रियों को) पूर्व (कथित) ध्यान-पथ में समाधिस्थ
करे ॥८६-९२॥ पाँचों इन्द्रियों और मन एक केन्द्र में (आत्मा में) केन्द्रित हो जाते हैं तब वह साधन ध्यान-

२६४ नारदीयपुराणम्
तस्य तत्पूर्वसंरुद्ध आत्मषष्ठमनंतरम् । स्फुरिष्यति समुद्रांता विद्युदम्बुधरे यथा ॥६४॥
जलबिंदुर्यथा लोलः पर्णस्थः सर्वतश्चलः । एवमेवास्य चित्तं च भवति ध्यानवर्त्मनि ॥६५॥
समाहितं क्षणं किंचिद्ध्यानवर्त्मनि तिष्ठति । पुनर्वायुपथं भ्रांतं मनो भवति वायुवत् ॥६६॥
अनिर्वेदो गतक्लेशो गततंद्रो ह्यमत्सरी । समादध्यात्पुनश्चेतो ध्यानेन ध्यानयोगवित् ॥६७॥
विचारश्च वितर्कश्च विवेकश्चोपजायते । मुनेः समाधियुक्तस्य प्रथमं ध्यानमादितः ॥६८॥
मनसा क्लिश्यमानस्तु समाधानं च कारयेत् । न निर्वेदं मुनिर्गच्छेत्कुर्यादेवात्मनो हितम् ॥६९॥
पांशुभस्मकरीषाणां यथा वै राशयश्चिताः । सहसा वारिणा सिक्ता न यांति परिभावनाः ॥१००॥
किंचित् स्निग्धं यथा च स्याच्छुष्कं चूर्णमभावितम् । क्रमेण तु शनैर्गच्छेत्सर्वं तत्परिभावनम् ॥१०१॥
एवमेवेन्द्रियग्रामं शनैः शं परिभावयेत् । संहरेत्क्रमशश्चैव सम्यक् तत्प्रशमिष्यति ॥१०२॥
स्वयमेव मनश्चैवं पंचवर्गं मुनीश्वर । पूर्वं ध्यानपथे स्थाप्य नित्ययोगेन शाम्यति ॥१०३॥
न तत्पुरुषकारेण न च दैवेन केनचित् । सुखमेष्यति तत्तस्य यदेवं संयतात्मनः ॥१०४॥
सुखेन तेन संयुक्तो रंस्यते ध्यानकर्मणि । गच्छंति योगिनो ह्येवं निर्वाणं तु निरामयम् ॥१०५॥
सनंदन उवाच
इत्युक्तो भृगुणा ब्रह्मन्भरद्वाजः प्रतापवान् । भृगुं परमधर्मात्मा विस्मितः प्रत्यपूजयत् ॥१०६॥
एष ते प्रसवो विद्वन् जगतः संप्रकीर्तितः । निखिलेन महाप्राज्ञ किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥१०७॥
इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे द्वितीयपादे चतुश्चत्वारिंशोऽध्यायः
पथ कहा जाता है जिसका वर्णन पहले मैंने किया है । इसके अनन्तर पहले से वश में किये हुए मन
में छठी आत्म-शक्ति का स्फुरण उसी प्रकार होता है जिस प्रकार समुद्र के गर्भ में रहने वाली विद्युत्
का स्फुरण मेघों के बीच होता है । जैसे चंचल जलबिन्दु पत्ते (कमल) पर कभी स्थिर नहीं रहता, सर्वदा
इधर-उधर हिलता रहता है उसी प्रकार योगी का चित्त ध्यान मार्ग में चंचल होता है । वह कुछ क्षण
तक एकाग्र होकर ध्यान-मार्ग पर स्थिर रहता है, पुनः वायु पथ पर वायु की भाँति चंचल हो जाता
है । इस अवस्था में ध्यानयोगविद् योगी निर्वेद, आलस्य, क्लेश और मात्सर्य से मुक्त होकर ध्यान के
द्वारा पुनः मन को एकाग्र करे । समाधि युक्त मुनि को ध्यान के साथ ही विचार, वितर्क और विवेक
उत्पन्न हो जाता है । उस समय मन में उठे हुए तर्कों का किसी प्रकार समाधान करे । उस समय मुनि किसी
प्रकार के दुःख का अनुभव न करे प्रत्युत आत्म-हित की ओर ही ध्यान दे । जिस प्रकार धूलि, राख, और
करसी की राशि और चिता जल से सींची जाने पर भी एकाएक शान्त नहीं होती, प्रत्युत पहले कुछ भीगती
है, कुछ सूखी रहती है तब फिर धीरे-धीरे गोली बनती है । उसी प्रकार इन्द्रिय-समूह को धीरे-धीरे शान्त
करे । क्रमशः इनको विषयों की ओर से हटाये फिर वे भली भाँति स्वयं शान्त हो जायँगी । मुनीश्वर ! स्वयम् ही
मन और इन्द्रिय-समूह को ध्यान पथ पर आरूढ़ करे, तत्पश्चात् ये स्वयं नित्ययोग के द्वारा शान्त हो जायेंगे । वह
सुख न तो पौरुष से अथवा दैव से ही प्राप्त हो सकता है जो सुख संयमी को अपनी इस ध्यान-साधना से प्राप्त हो
सकता है । योगी उस सुख में मग्न हो कर ध्यान कर्म में रमता हुआ निरामय निर्वाण को प्राप्त करता है ॥९३-१०५
सनन्दन बोले- ब्रह्मन् ! इस प्रकार भृगु ने प्रतापी भरद्वाज से कहा । परम धर्मात्मा भरद्वाज भी भृगु
की ज्ञान-गरिमा को देखकर विस्मित हो गए और उन्होंने उनकी पूजा की । विद्वन् ! यही जगत् की उत्पत्ति
की सम्पूर्ण कथा है । महाप्राज्ञ ! अब तुम क्या सुनना चाहते हो ? ॥१०६-१०७॥
श्री नारदीयमहापुराण के पूर्वार्ध में चौवालीसवाँ अध्याय समाप्त ॥४४॥

पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः
सूत उवाच
सनंदनवचः श्रुत्वा मोक्षधर्माश्रितं द्विजाः । पुनः पप्रच्छ तत्त्वज्ञो नारदोऽध्यात्मसत्कथाम् ॥१॥
नारद उवाच
श्रुतं मया महाभाग मोक्षशास्त्रं त्वयोदितम् । न च मे जायते तृप्तिर्भूयोभूयोऽपि शृण्वतः ॥२॥
यथा संमुच्यते जंतुरविद्याबंधनान्मुने । तथा कथय सर्वज्ञ मोक्षधर्म सदाश्रितम् ॥३॥
सनंदन उवाच
अत्राप्युदाहरंतीममितिहासं पुरातनम् । यथा मोक्षमनुप्राप्तो जनको मिथिलाधिपः ॥४॥
जनको जनदेवस्तु मिथिलाया अधीश्वरः । औध्वंदेहिकधर्माणामासीद्व्यक्तो विचिंतने ॥५॥
तस्य तु शतमाचार्या वसन्ति सततं गृहे । दर्शयंतः पृथग्धर्मान्नानापाखंडवादिनः ॥६॥
स तेषां प्रेत्यभावे च प्रेत्य जातो विनिश्चये । आगमस्थः स भूयिष्ठमात्मतत्त्वेन तुष्यति ॥७॥
तत्र पंचशिखो नाम कापिलेयो महामुनिः । परिधावन्महीं कृत्स्नां जगाम मिथिलामथ ॥८॥
सर्वसंन्यासधर्माणः तत्त्वज्ञानविनिश्चये । सुपर्यवसितायंश्च निर्द्वंद्वो नष्टसंशयः ॥६॥
अध्याय ४५
पञ्चशिख का राजा जनक को उपदेश
सूत बोले—द्विजगण ! मोक्ष धर्म से युक्त सनन्दन की वाणी सुनकर तत्त्वज्ञ नारद मुनि ने पुनः अध्यात्म
की सत् चर्चा छेड़ी ॥१॥
नारद बोले—महाभाग ! आपके मुख से मोक्ष का रहस्य सुन लिया, परन्तु बार-बार सत्कथा को सुनने
पर भी मुझे तृप्ति नहीं हो रही है ॥२॥ मुने ! अविद्या के बन्धन से जीव को जिस उपाय से मुक्ति होती है
उसको कहिए । सर्वज्ञ ! आप ही मोक्ष धर्म के ज्ञाता एवं पालक हैं ॥३॥
सनन्दन ने कहा—इस विषय में जिस प्रकार मिथिलापति जनक ने मोक्ष प्राप्त किया था, सुधीजन
उस पुरातन इतिहास को उदाहरण रूप में प्रस्तुत करते हैं । राजा जनक मिथिला के अधीश्वर थे जिनको
प्रजा देवता के समान मानती थी । वे सदा एकाग्र होकर परलोक धर्म (श्राद्ध या यम-विद्या) के विषय में चिन्तन
किया करते थे ॥४-५॥ उनके यहाँ नाना प्रकार के तर्क करने वाले इस विद्या के ज्ञाता आचार्य रहा करते थे
जो इस विद्या के सम्बन्ध में नाना प्रकार के धर्म (मत) प्रस्तुत करते थे । वह राजा उनके साथ, प्रेत्य भाव और
मृत्यु के अनन्तर जाति ज्ञान के निर्णय के विषय में शास्त्रानुसार निश्चय कर उस आत्मतत्व के निर्णय से
अत्यन्त प्रसन्न होते थे ॥६-७॥ किसी समय उनकी मिथिला पुरी में महामुनि पंचशिख कापिलेय (कपिल के
पुत्र) सम्पूर्ण पृथ्वी को परिक्रमा करते हुए पहुँचे ॥८॥ वे मुनि सब प्रकार के संन्यास धर्म के तत्त्वज्ञान के
निर्णायक थे । उनको तत्त्वार्थ ज्ञान के कारण किसी प्रकार का संशय नहीं था ॥९॥ वे स्वयं द्वन्द्वातीत थे । ऋषियों

२६६ नारदीयपुराणम्
ऋषीणामाहुरेकं यं कामादवसितं नृषु । शाश्वतं सुखमत्यंतमन्विच्छन्स सुदुर्लभम् ॥१०॥
यमाहुः कपिलं सांख्याः परमर्षिप्रजापतिम् । स मन्ये तेन रूपेण विख्यापयति हि स्वयम् ॥११॥
आसुरेः प्रथमं शिष्यं यमाहुश्चिरजीविनम् । पंचस्रोतसि यः सत्रमास्ते वर्षसहस्रकम् ॥१२॥
पंचस्रोतसमागम्य कापिलं मंडलं महत् । पुरुषावस्थमव्यक्तं परमार्थं न्यवेदयत् ॥१३॥
इष्टिमंत्रेण संयुक्तो भूयश्च तपसा सुरिः । क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोर्व्यक्तिं विबुधे देहदर्शनः ॥१४॥
यत्तदेकाक्षरं ब्रह्म नानारूपं प्रदृश्यते । आसुरिमंडले तस्मिन्प्रतिपेदे तमव्ययम् ॥१५॥
तस्य पंचशिखः शिष्यो मानुष्या पयसा भृतः । ब्राह्मणी कपिली नाम काचिदासीत्कुटुम्बिनी ॥१६॥
तस्याः पुत्रत्वमागत्य स्त्रियाः स पिबति स्तनौ । ततश्च कापिलेयत्वं लेभे बुद्धिं च नैष्ठिकीम् ॥१७॥
एतन्मे भगवान्प्राह कापिलेयस्य संभवम् । तस्य तत्कापिलेयत्वं सर्ववित्त्वमनुत्तमम् ॥१८॥
सामात्यो जनको ज्ञात्वा धर्मज्ञो ज्ञातिनं मुने । उपेत्य शतमाचार्यान्मोहायास हेतुभिः ॥१९॥
जनकस्त्वभिसंरक्तः कापिलेयानुदर्शनात् । उत्सृज्य शतमाचार्यान्पृष्ठतोऽनुजगाम तम् ॥२०॥
तस्मै परमकल्याणं प्रणताय च धर्मतः । अब्रवीत्परमं मोक्षं यत्तत्सांख्यं विधीयते ॥२१॥
जातिनिर्वेदमुकत्वा स कर्मनिर्वेदमब्रवीत् । कर्मनिर्वेदमुक्त्वा च सर्वनिर्वेदमब्रवीत् ॥२२॥

में एक थे। उन्होंने मानव-जीवन में शाश्वत, सुदुर्लभ सुख की इच्छा से काम इच्छा को जीत लिया था। सांख्य
के अनुयायी परमर्षि प्रजापति को कपिल कहते हैं। वे कपिल ही स्वयं को मानो उसी (पंचशिख) रूप में विख्यापित
करते थे। उन्हें लोग आसुरि के प्रथम शिष्य और चिरंजीवी कहते हैं। उन्होंने पंचस्रोत में हजार वर्ष तक
यज्ञ किया था ॥१०-१२॥ पंचस्रोत में महान् कापिल-मण्डल (कपिल मतानुयायी मुनि मण्डलो) को उन्होंने सब में
अन्तर्यामी रूप से स्थित परमार्थस्वरूप अव्यक्त ब्रह्म के विषय में निवेदन किया था और क्षेत्र तथा क्षेत्रज्ञ की विशे-
षता को जान लिया था। जो एकाक्षर ब्रह्म नाना रूपों में देखा जाता है, आसुरि ने उस मण्डल में उस अव्यय ब्रह्म
को प्राप्त कर लिया था। उसी आसुरि का पंचशिख नामक शिष्य था जिसका पालन-पोषण मानुषी के दूध
से हुआ। कोई कपिली नामकी एक गृहस्थ ब्राह्मणी थी। उस स्त्री के गर्भ से उत्पन्न होकर वह उसके स्तन
को पीता था। इसके अनन्तर उसको कापिलेयत्व और नैष्ठिक बुद्धि प्राप्त हुई। कापिलेय की उस उत्पत्ति
कथा को भगवान् ने मुझसे कहा था ॥१३-१७३ ।

मुने ! धर्मज्ञ जनक उस मुनि का कापिलेयत्व एवं सर्वोत्तम सर्वज्ञत्व जानकर मन्त्री के सहित सौ आचार्यों को
साथ लेकर उस मुनि के समीप आये और अपने तर्क और हेतुवाद से उस मुनि को प्रसन्न कर दिया। राजा जनक
उस कापिलेय के दर्शन से इतने अधिक प्रसन्न हो गए कि अपने सौ आचार्यों को छोड़कर उनके पीछे-पीछे चल
पड़े। उन्होंने उस विनीत जनक को कल्याणमय परममोक्ष की व्याख्या सुनाई, जिसको सांख्ययोग कहते हैं। उसने
प्रारम्भ में जाति-निर्वेद' को कहा फिर कर्मनिर्वेद की व्याख्या की। कर्मनिर्वेद की व्याख्या के पश्चात् सर्वनिर्वेद'

१. जन्म के गर्भवास आदि के कारण जो कष्ट होता है, उस पर विचार करके शरीर से वैराग्य होना
'जातिनिर्वेद' है।
२. कर्मजनित क्लेश-नाना योनियों की प्राप्ति एवं नरकादि यातना का विचार करके पाप तथा
काम्य कर्मों से विरत होना 'कर्मनिर्वेद' है।
३. इस जगत् की छोटी-से छोटी वस्तुओं से लेकर ब्रह्म-लोक तक के भोगों को क्षणभंगुरता और दुःख-
रूपता का विचार करके सब ओर से विरक्त होना 'सर्वनिर्वेद' कहलाता है।

पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः २६७
यदर्थं धर्मसंसर्गः कर्मणा च फलोदयः । तमनाश्वासिकं मोहं विनाशि चलमध्रुवम् ॥२३॥
दृश्यमाने विनाशे च प्रत्यक्षे लोकसाक्षिके । अगमात्परमस्तीति ब्रुवन्नपि पराजितः ॥२४॥
अनात्मा ह्यात्मनो मृत्युः क्लेशो मृत्युर्जरामयः । आत्मानं मन्यते मोहात्तदसम्पक् परं मतम् ॥२५॥
अथ चेदेवमप्यस्ति यल्लोके नोपपद्यते । अजरोऽयममृत्युश्च राजासौ मन्यते यथा ॥२६॥
अस्ति नास्तीतिवाप्येतत्तस्मिन्नसितलक्षणे । किमधिष्ठाय तद् ब्रूयाल्लोकयात्राविनिश्चयम् ॥२७॥
प्रत्यक्षं ह्य तयोर्मूलं कृतांतो ह्यतयोरपि । प्रत्यक्षो ह्यागमो भिन्नः कृतांतो वा न किचन ॥२८॥
यत्र तत्रानुमानेऽस्मिन्कृतं भावयतेऽपि च । अन्यो जीवः शरीरस्य नास्तिकानां मते स्थितः ॥२९॥
रेतोवटकणीकायां घृतपाकाधिवासनम् । जातिस्मृतिरयस्कांतः सूर्यकांतोऽबुभक्षणम् ॥३०॥
प्रेतभूतप्रियश्चैव देवता ह्युपयाचनम् । मृतकर्मनिवृत्तिं च प्रमाणमिति निश्चयः ॥३१॥
नन्वेते हेतवः संति ये केचिन्मूर्तिसंस्थिताः । अमूर्तस्य हि मूर्तेन सामान्यं नोपलभ्यते ॥३२॥
का रहस्योद्घाटन किया । उन्होंने कहा—'जिसके लिए धर्म का आचरण किया जाता है, जो कर्मों के
फल का उदय होने पर प्राप्त होता है, वह इहलोक या परलोक का भोग नश्वर है। उस पर आस्था करना
उचित नहीं। वह मोहरूप चंचल और अस्थिर है ॥१९-२३॥
कुछ नास्तिक ऐसा कहा करते हैं कि 'देहरूपी आत्मा का विनाश प्रत्यक्ष देखा जा रहा है, सम्पूर्ण लोक
इसका साक्षी है; फिर भी यदि कोई शास्त्र-प्रमाण की ओट लेकर देह से भिन्न आत्मा की सत्ता का प्रतिपादन
करता है तो वह परास्त ही है, क्योंकि उसका कथन लोकानुभव के विरुद्ध है । आत्मा के स्वरूप का अभाव हो
जाना ही उसकी मृत्यु है । जरारोगमय क्लेश मृत्यु है । जो लोग मोहवश आत्मा को देह से भिन्न मानते हैं,
उनको वह मान्यता ठीक नहीं है ॥२४-२५॥ यदि ऐसी वस्तु का भी अस्तित्व मान लिया जाय, जो लोक में
संभव नहीं है, अर्थात् यदि शास्त्र के आधार पर यह स्वीकार किया जाय कि शरीर से भिन्न कोई अजर-अमर
आत्मा है, जो स्वर्ग आदि लोकों में दिव्य सुख भोगता है, तब बंदी लोग, जो राजा को अजर-अमर कहते हैं,
उनको वह बात भी ठीक माननी पड़ेगी । सारांश यह है कि जैसे बंदी लोग आशीर्वाद में उपचारतः राजा को
अजर-अमर कहते हैं, उसी प्रकार शास्त्र का वह वचन भी औपचारिक ही है। नीरोग शरीर को ही अजर-अमर
और यहाँ के प्रत्यक्ष सुख-भोग को ही स्वर्गीय सुख कहा गया है । यदि आत्मा है या नहीं यह संशय उपस्थित
होने पर अनुमान से उसके अस्तित्व का साधन किया जाय तो इसके लिए कोई ऐसा ज्ञापक हेतु नहीं उपलब्ध
होता, जो कहीं व्यभिचरित न होता हो; फिर किस अनुमान का आश्रय लेकर लोक-व्यवहार का निश्चय किया जा
सकता है ? अनुमान और आगम—इन दोनों प्रमाणों का मुख्य प्रत्यक्ष प्रमाण है। आगम या अनुमान यदि प्रत्यक्ष
अनुभव के विरुद्ध है तो वह कुछ भी नहीं है, उसकी प्रामाणिकता स्वीकार नहीं की जा सकती । जिस किसी भी
अनुमान में ईश्वर, अदृष्ट अथवा नित्य आत्मा की सिद्धि के लिए की हुई भावना भी व्यर्थ है; अतः नास्तिकों के मत
में शरीर से भिन्न जीव का अस्तित्व नहीं है, यह बात स्थिर हुई ॥२६-२९॥ जैसे वटवृक्ष के बीज में पत्र, पुष्प,
फल, मूल तथा त्वचा आदि अन्तर्हित होते हैं, जैसे गाय के द्वारा खायी हुई घास में घी, दूध आदि प्रकट हो जाते हैं
तथा जिस प्रकार अनेक ओषध द्रव्यों का पाक एवं अधिवासन करने से उसमें नशा पैदा करने वाली शक्ति आ
जाती है उसी प्रकार वीर्य से ही शरीर आदि के साथ चेतनता भी प्रकट होती है।
[उक्त मत का खण्डन--] मरे हुए शरीर में जो चेतनता का अतिक्रमण देखा जाता है, वही देहातिरिक्त
आत्मा के अस्तित्व में प्रमाण है। यदि चेतनता देह का ही धर्म होता तो मृतक शरीर में भी उसकी उपलब्धि
३८—मार० पु०

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२६८ नारदीयपुराणम्
अविद्या कर्म तृष्णा च केचिदाहुः पुनर्भवम् । तस्मिन्नष्टे च दग्धे च चित्ते मरणधर्मिणि ॥३३॥
अन्योऽस्माज्जायते मोहस्तमाहुः सत्त्वसंक्षयम् । यदा सरूपतश्चान्यो जातितः श्रुततोऽर्थतः ॥३४॥
कथमस्मिन्स इत्येव संबंधः स्यादसंहितः । एवं सति च का प्रीतिर्ज्ञानविद्यातपोबलैः ॥३५॥
यदस्यान्येरितं कर्म सामान्यात्प्रतिपद्यते । अपि त्वयमिवैवान्यैः प्राकृतैर्दुःखितो भवेत् ॥३६॥
सुखितो दुःखितो वापि दृश्याद्दृश्यविनिर्णयः । यथा हि मुशलैर्हन्युः शरीरं तत्पुनर्भवेत् ॥३७॥
वृथा ज्ञानं यदन्यच्च येनैतन्नोपलभ्यते । ऋतुमंवत्सरौ तिष्यः शीतोष्णोऽथ प्रियाप्रिये ॥३८॥
यथा तातानि पश्यंति तादृशः सत्त्वसंक्षयः । जरयाभिपरीतस्य मृत्युना च विनाशितम् ॥३९॥
दुर्बलं दुर्बलं पूर्वं गृहस्येव विनश्यति । इन्द्रियाणि मनो वायुः शोणितं मांसमस्थि च ॥४०॥
आनुपूर्व्या विनश्यंति स्वं धातुमुपयाति च । लोकयात्राविघातश्च दानधर्मफलागमे ॥४१॥
तदर्थं वेदशब्दाश्च व्यवहाराश्च लौकिकाः । इति सम्यङ् मनस्येते बहवः संति हेतवः ॥४२॥
एतदस्तीति नास्तीति न कश्चित्प्रतिदृश्यते । तेषां विमृशतामेव तत्सम्यगभिधावताम् ॥४३॥
क्वचिन्निवसते बुद्धिस्तत्र जीर्यति वृक्षवत् । एवमर्थै रनर्थैश्च दुःखिताः सर्वजंतवः ॥४४॥
आगमैरपकृष्यंते हस्तिपैर्हस्तिनो यथा । ॥४५॥
होती । मृत्यु के पश्चात् कुछ काल तक शरीर तो रहता है, पर उसमें चेतना नहीं रहती। अतः चेतन आत्मा
शरीर से भिन्न है--यह सिद्ध होता है । नास्तिक भी रोग आदि की निवृत्ति के लिए मन्त्र-जप तथा तान्त्रिक
पद्धति से देवता आदि की आराधना करते हैं । वह देवता क्या है ? यदि पांचभौतिक है तो घर आदि की
भांति उसका दर्शन होना चाहिए और यदि वह भौतिक पदार्थों से भिन्न है तो चेतन की सत्ता स्वतः सिद्ध हो
गया । अतः देह से भिन्न आत्मा है--यह प्रत्यक्ष अनुभव से सिद्ध हो जाता है; और देह ही आत्मा है, यह प्रत्यक्ष
अनुभव के विरुद्ध जान पड़ता है । यदि शरीर की मृत्यु के साथ आत्मा का मृत्यु मान ली जाय तब तो उसके
किए हुए कर्मों का भी नाश मानना पड़ेगा; फिर तो उसके शुभाशुभ कर्मों का फल भोगने वाला कोई
नहीं रह जायगा और देह की उत्पत्ति में अकृताभ्यागम (बिना किये हुए कर्म का ही भोग प्राप्त हुआ ऐसा)
मानने का प्रसंग उपस्थित होगा । ये सब प्रमाण यह सिद्ध करते हैं कि देहातिरिक्त चेतन आत्मा की सत्ता अवश्य
है । नास्तिकों की ओर से जो हेतुभूत दृष्टान्त दिये गये हैं, वे मूर्त पदार्थ हैं । मूर्त जड़-पदार्थ से मूर्त जड़-पदार्थ
की ही उत्पत्ति होती है यही उनके द्वारा सिद्ध होता है। जैसे काष्ठ से अग्नि का उत्पत्ति आदि ।
पञ्चभूतों से आत्मा की उत्पत्ति की भांति यदि मूर्त से अमूर्त की उत्पत्ति मानी जाय तो पृथ्वी आदि
मूर्त भूतों से अमूर्त आकाश की भी उत्पत्ति स्वीकार करनी पड़ेगी, जो असम्भव है, अतः स्थूल भूतों के संयोग
से अमूर्त चेतन आत्मा की उत्पत्ति सर्वथा असम्भव है ।
आत्मा की सत्ता न मानने पर लोकयात्रा का निर्वाह नहीं होगा । दान, धर्म के फल की प्राप्ति के लिए
कोई आस्था नहीं रहेगी, क्योंकि वैदिक शब्द तथा लौकिक व्यवहार सब आत्मा को ही सुख देने के लिए हैं ।
इस प्रकार मन में अनेक तर्क उठते हैं और उन तर्कों तथा युक्तियों से आत्मा की सत्ता या असत्ता का निर्धारण
कुछ भी होता नहीं दिखायी देता । इस प्रकार विचार करते हुए भिन्न-भिन्न मतों की ओर दौड़ने वाले लोगों की
बुद्धि कहीं एक जगह प्रवेश करती है और वहीं वृक्ष की भांति जड़ जमाये जीर्ण ही जाती है । इस प्रकार अर्थ और
अनर्थ से सभी प्राणी दुःखी रहते हैं ॥३०-४४॥ केवल शास्त्र ही उन्हें खींचकर राह पर लाते हैं, ठीक उसी तरह