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सर्वकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 299, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 299

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२८० नारदीयपुराणम्
॥७३॥
विद्यां मानापमानाभ्यामात्मानं तु प्रमादतः
यस्य सर्वे समारंभा निराशीर्बन्धना द्विज । त्यागे यस्य हुतं सर्वं स त्यागी स च बुद्धिमान् ॥७४॥
अहिंस्रः सर्वभूतानां मैत्रायणगतश्चरेत् । परिग्रहात्परित्यज्य भवेद्बुद्ध्या जितेन्द्रियः ॥७५॥
अशोकस्थानमातिष्ठेदिह चामुत्र चाभयम् । तपोनित्येन दांतेन मुनिना संयतात्मना ॥७६॥
अजितं जेतुकामेन व्यासंगेषु ह्यसंगिना । इन्द्रियैर्गृह्यते यद्यत्तत्तद्व्यक्तमिति स्थितिः ॥७७॥
अव्यक्तमिति विज्ञेयं लिङ्गग्राह्यमतीन्द्रियम् । अविश्रंभेण मंतव्यं विश्रंभे धारयेन्मनः ॥७८॥
मनः प्राज्ञेन गृह्णीयात्प्राणं ब्रह्मणि धारयेत् । निर्वेदादेव निर्वाणं न च किंचिद्विचिंतयेत् ॥७९॥
सुखं वै ब्राह्मणो ब्रह्मान्निर्वेदेनाधिगच्छति । शौचे तु सततं युक्तः सदाचारसमन्वितः ॥८०॥
स्वनुक्रोशश्च भूतेषु तद्विज्जातिषु लक्षणम् । सत्यं व्रतं तपः शौचं सत्यं विसृजते प्रजा ॥८१॥
सत्येन धार्यते लोकः स्वः सत्येनैव गच्छति । अनृतं तमसो रूपं तमसा नीयते ह्यधः ॥८२॥
तमोग्रस्तानि पश्यंति प्रकाशं तमसावृताः । सुदुष्प्रकाश इत्याहुर्नरकं तम एव च ॥८३॥
सत्यानृतं तदुभयं प्राप्यते जगतीचरैः । तत्राप्येवंविधा लोके वृत्तिः सत्यानृते भवेत् ॥८४॥
धर्माधर्मौ प्रकाशश्च तमो दुःखसुखं तथा । शरीरैर्मानसैर्दुःखैः [सुखैश्चाप्यसुखोदर्यैः ॥८५॥]
लोकसृष्टं प्रपश्यन्तो न मुह्यंति विचक्षणाः । तत्र दुःखविमोक्षार्थं प्रयतेत विचक्षणः ॥८६॥
सुखं ह्यनित्यं भूतानामिह लोके परत्र च । राहुग्रस्तस्य सोमस्य यथा ज्योत्स्ना न भासते ॥८७॥
तथा तमोभिभूतानां भूतानां नश्यते सुखम् ॥८८॥
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से विद्या की और प्रमाद से अपनी रक्षा करनी चाहिए ॥७३॥ द्विज ! जो आशा और फलेच्छा को छोड़कर सब कार्य
करता है और जिसने त्याग के अग्नि में अपने सब स्वार्थों की आहुति दे दी वही त्यागी और बुद्धिमान् है ॥७४॥
जो सब प्राणियों के प्रति हिंसा की भावना नहीं रखता, सबके प्रति मैत्री का व्यवहार करता है, जो धन इकट्ठा
करने के फेर में न पड़कर विवेकपूर्वक जितेन्द्रिय बनता है वही बुद्धिमान् है ॥७५॥ लोक और परलोक शोक-
रहित और अभय स्थान को अपनाना चाहिए । नित्य तपस्या करने वाले मन को वश में रखने वाले, संयमी मुनि
अजित को जीतने की इच्छा से, आसक्ति को विराग से जीतने की कामना से इन्द्रियों से जिस-जिस वस्तु को ग्रहण
करते हैं उन सब को व्यक्त कहते हैं ॥७६-७७॥ अव्यक्त उसको कहते हैं जो अतीन्द्रिय और लिंग-ग्राह्य अर्थात्
अभास मात्र से जानने योग्य हो । सब से पहले मन को अविश्वास से हटाकर विश्वास में लगावे । मन को प्राण
से वश में करे और प्राण को ब्रह्म में स्थिर करे । निर्वेद (संसार को असार समझने) से ही निर्वाण प्राप्त होता है।
इसके अतिरिक्त दूसरी वस्तु का चिन्तन नहीं करना चाहिए ॥७८-७९॥ ब्रह्मन् ! ब्राह्मण निर्वेद से ही सुख पाता
है । वह सर्वदा पवित्र और सदाचार पालन में लीन रहे ॥८०॥ प्राणियों पर दया-भाव रखना ही द्विजाति का
लक्षण है । सत्य, व्रत, तप और पवित्रता से ही प्रजा की सृष्टि हुई है ॥८१॥ सत्य से ही यह लोक टिका हुआ
है । सत्य से ही स्वर्गलोक भी प्राप्त होता है । अनृत (असत्य) अन्धकार-स्वरूप है । अन्धकार से ही मनुष्य निम्न
स्थान की ओर जाता है ॥८२॥ अन्धकार से घिरा और इसमें डूबा मनुष्य प्रकाश का पता नहीं पाता है । प्रकाश
को स्वर्ग और अन्धकार को ही नरक कहा जाता है ॥८३॥ सांसारिक प्राणियों को सत्य और असत्य दोनों प्राप्त
होते हैं । साथ ही संसार में सत्य और असत्य में लोक-व्यवहार चलता है । धर्म-अधर्म, प्रकाश-अन्धकार, सुख-दुःख
से यह लोक व्याप्त है । शारीरिक और मानसिक दुःखों एवं परिणामतः कष्टदायक सुखों से व्याप्त इस लोक-सृष्टि
को देखते हुए सुधीजन मोह में नहीं पड़ते, प्रत्युत दुःखों से मुक्ति पाने के लिए यत्न करते हैं ॥८४-८६॥ इस
लोक और परलोक में सुख अनित्य है । राहु से ग्रस्त चन्द्रमा की प्रभा शोभा नहीं पाती । उसी प्रकार तम से आच्छाद्य