बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचतुश्चत्वारिंशोऽध्यायः २८६
फललाभश्च तस्य स्यात्सर्वभूतहितं च तत्। पृथिवी वायुमाकाशमापो ज्योतिश्च पंचमम् ॥२४॥
महाभूतानि भूतानां सर्वेषां प्रभवाप्ययौ। यतः सृष्टानि तत्रैव तानि यान्ति लयं पुनः ॥२५॥
महाभूतानि भूतेभ्यः सागरस्योर्मयो यथा। प्रसार्य च यथांगानि कूर्मः संहरते पुनः ॥२६॥
तद्वद् भूतानि भूतात्मा सृष्टानि हरते पुनः। महाभूतानि पंचैव सर्वभूतेषु भूतकृत् ॥२७॥
अकरोत्तेषु वै सम्यक् तं तु जीवो न पश्यति। शब्दः श्रोत्रं तथा खानि त्रयमाकाशयोनिजम् ॥२८॥
वायोः स्पर्शस्तथा चेष्टा त्वक्चैव त्रितयं स्मृतम्। रूपं चक्षुस्तथा पाकस्त्रिविधं तेज उच्यते ॥२९॥
रसाः क्लेदश्च जिह्वा च त्रयो जलगुणाः स्मृता। घ्रेयं घ्राणं शरीरं च एते भूमिगुणास्त्रयः ॥३०॥
महाभूतानि पंचैव षष्ठं च मन उच्यते। इन्द्रियाणि मनश्चैव विज्ञातान्यस्य भारत ॥३१॥
सप्तमी बुद्धिरित्याहुः क्षेत्रज्ञः पुनरष्टमः। श्रोत्रं वै श्रवणार्थाय स्पर्शनाय च त्वक् स्मृताः ॥३२॥
रसादानाय रसना गन्धानादाय नासिका। चक्षुरालोकनायैव संशयं कुरुते मनः ॥३३॥
बुद्धिरध्यवसानाय क्षेत्रज्ञः साक्षिवत्स्थितः। ऊर्ध्वं पादतलाभ्यां यदवाक्चोदक्च पश्यति ॥३४॥
एतेन सर्वमेवेदं विभुना व्याप्तमन्तरम्। पुरुषैरिन्द्रियाणीह वेदितव्यानि कृत्स्नशः ॥३५॥
तमो रजश्च सत्त्वं च तेऽपि भावास्तदाश्रिताः। एतां बुद्धिं नरो भूतानामगतिं गतिम् ॥३६॥
समवेक्ष्य शनैश्चैवं लभते शममुत्तमम्। गुणैर्विनश्यते बुद्धिर्बुद्धेरेवेन्द्रियाण्यपि ॥३७॥
कर मनुष्य इस लोक में सुखी और प्रसन्न होता है ॥२३॥ वह ज्ञान सब प्राणियों का हित करने वाला और फल-
दायक है। पृथ्वी, वायु, आकाश, जल और पाँचवां तेज ये पंच महाभूत हैं जिनसे सब भूतों (पदार्थ या प्राणियों)
की सृष्टि और नाश होता है। इनकी जिससे सृष्टि होती है उसी में ये लीन भी होते हैं ॥२४॥ जिस प्रकार
सागर से लहरें उत्पन्न होकर पुनः उसी में विलीन होती हैं उसी प्रकार ये महाभूत भूतों से ही उत्पन्न
होते हैं और उनमें ही विलीन होते हैं। जिस प्रकार कछुवा अपने अंगों को फैलाकर पुनः सिकोड़ लेता है उसी प्रकार
भूतात्मा भूतों को प्रसारित करता और समेट लेता है उसी प्रकार भूतात्मा उत्पन्न किये गये उन भूतों को अपने
में लीन कर लेता है ॥२५-२६॥ सब भूतों का निर्माण करने वाले ये ही पाँच महाभूत हैं जो उन्हीं भूतों (पदार्थ)
में व्याप्त रहते हैं। परमात्मा उनमें ही प्राणियों की रचना करता है, परन्तु जीव उसको देख नहीं पाता ॥२७॥
शब्द, श्रोत्रेन्द्रिय और आकाश तीनों आकाश से उत्पन्न होते हैं, वायु से स्पर्श, चेष्टा और त्वक् उत्पन्न हुए हैं,
रूप, चक्षु, और पाक (जठराग्नि) ये तेज के तीन रूप हैं ॥२८-२९॥ रस, क्लेद और जीभ ये जल के गुण हैं।
गन्ध, नासिका और शरीर ये तीनों भूमि के गुण हैं ॥३०॥ इन्द्रियरूप में पाँच महाभूत होते हैं, छठा मन है।
भारत ! इन्द्रियों और मन का ज्ञान कराया गया, सातवीं बुद्धि है और क्षेत्रज्ञ आठवां है। श्रोत्र (कान) सुनने के
लिये है, त्वक् से स्पर्श का ज्ञान होता है। रस का ग्रहण रसनेन्द्रिय से और नासिका से गन्ध का ग्रहण होता है।
नेत्र देखने के लिए और मन संशय (ऊहा, तर्क) करता है ॥३१-३३॥ बुद्धि निर्णय के लिए और क्षेत्रज्ञ (आत्मा)
साक्षी रूप में स्थित है जो पादल से ऊपर उत्तर-दक्षिण चारों ओर देखता है ॥३४॥ इस व्यापक आत्मा से
सारा शरीर व्याप्त है। इस लोक में मनुष्य को सब इन्द्रियों का भली भाँति ज्ञान होना चाहिए ॥३५॥ रज,
सत्त्व और तम ये तीनों भाव आत्मा से ही संबद्ध हैं। ज्ञानी मनुष्य अपनी बुद्धि से भूतों की गति और अगति
को जान कर क्रमशः शान्ति पाता है ॥३६॥ इन गुणों के चक्कर में पड़कर बुद्धि नष्ट हो जाती है, बुद्धि के
नष्ट हो जाने पर इन्द्रियाँ और मन के सहित पंचभूत भी नष्ट हो जाते हैं। बुद्धि के न रहने पर गुण कैसे रह
३७ नारदीयपुराण