बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
४ प्रथमोऽध्यायः
वद सूत मुनिश्रेष्ठ सर्वमेतदसंशयम् । कस्य नो जायते श्रद्धा श्रोतुं त्वद्वचनामृतम् ॥३४॥
सूत उवाच
शृणुध्वमृषयः सर्वे यदिष्टं वो वदामि तत् । गीतं सनकमुख्यैस्तु नारदाय महात्मने ॥३५॥
पुराणं नारदोपाख्यमेतद्वेदार्थसंमितम् । सर्वपापप्रशमनं दुष्टग्रहनिवारणम् ॥३६॥
दुःस्वप्ननाशनं धर्म्यं भुक्तिमुक्तिफलप्रदम् । नारायणकथोपेतं सर्वकल्याणकारणम् ॥३७॥
धर्मार्थकाममोक्षाणां हेतुभूतं महाफलम् । अपूर्वं पुण्यफलदं शृणुध्वं सुसमाहिताः ॥३८॥
महापातकयुक्तो वा युक्तो वाप्युपपातकैः । श्रुत्वैतदार्षं दिव्यं च पुराणं शुद्धिमाप्नुयात् ॥३९॥
यस्यैकाध्यायपठनाद्वाजिमेधफलं लभेत् । अध्यायद्वयपाठेन राजसूयफलं तथा ॥४०॥
ज्येष्ठमासे पूर्णिमायां मूलर्क्षे प्रयतो नरः । स्नात्वा च यमुनातोये मथुरायामुपोषितः ॥४१॥
अभ्यर्च्य विधिवत्कृष्णं यत्फलं लभते द्विजाः । तत्फलं समवाप्नोति अध्यायत्रयपाठतः ॥४२॥
तत्प्रवक्ष्यामि वः सम्यक् शृणुध्वं गदतो मम । जन्मायुताजितैः पापैर्मुक्तः कोटिकुलान्वितः ॥४३॥
ब्रह्मणः पदमासाद्य तत्रैव प्रतितिष्ठति । श्रुत्वास्य तु दशाध्यायान्भक्तिभावेन मानवः ॥४४॥
निर्वाणमुक्तिं लभते नात्र कार्या विचारणा । श्रेयसां परमं श्रेयः पवित्राणामनुत्तमम् ॥४५॥
दुःस्वप्ननाशनं पुण्यं श्रोतव्यं यत्नतो द्विजाः । श्रद्धया सहितो मर्त्यः श्लोकं श्लोकार्द्धमेव वा ॥४६॥
पठित्वा मुच्यते सद्यो महापातकराशिभिः । सतामेव प्रवक्तव्यं गुह्याद्गुह्यतरं यतः ॥४७॥
वाचयेत्पुरतो विष्णोः पुण्यक्षेत्रे द्विजान्तिकै । ब्रह्मद्रोहपराणां च दम्भाचारयुतात्मनाम् ॥४८॥
मोक्ष की प्राप्ति कैसे होगी ? भक्ति से मनुष्य क्या प्राप्त करता है ? भक्ति का स्वरूप क्या है ? हे मुनिश्रेष्ठ
सूत ! इन प्रश्नों का अवश्य समाधान कीजिये जिससे हम लोगों का संशय दूर हो । आपका वचनामृत पान करने
के लिए भला किसकी श्रद्धा नहीं होगी ॥२६-३४॥
सूत बोले—ऋषिवर्यवृन्द ! एवमस्तु, कृपाकर सुनिए ? इस विषय में सनकादि प्रमुख ऋषियों ने
महात्मा नारद से जिस पुराण को कहा है उसी को यहाँ कह रहा हूँ। वह वेदार्थसम्मत पुराण
नारद पुराण नाम से प्रसिद्ध है। वह पापनाशक, दुष्टग्रह-शान्ति-कारक, भुक्ति-मुक्ति-प्रदाता, पुण्यवर्धक, दुःस्व-
प्ननाशक, भगवान् श्रीनारायण की पुण्यकथाओं से सम्पन्न एवं कल्याणप्रद है। ऐसे धर्म-अर्थ, काम और मोक्ष
के हेतुभूत, महाफलदायक अपूर्व और पुण्यफलदायक पुराण आप लोग सावधान होकर सुनें ! छोटे बड़े पापों को करने
वाले व्यक्ति भी इस आर्ष एवं दिव्य पुराण को सुनकर शुद्ध हो जाते हैं। इसके एक अध्याय के पाठ करने से भी
मनुष्य अश्वमेध के बराबर फल पाते हैं । दो अध्याय के पाठ से तो वह राजसूय का फल पा जाता है। जेठ मास की
पूर्णिमा को मूल नक्षत्र में एकाग्र भाव से यमुना में स्नान करने और मथुरा पुरी में उपवास-व्रत करके कृष्ण की
विधिवत् पूजा करने से मनुष्य जो फल प्राप्त करता है, वह फल इस पुराण के तीन अध्याय के पाठ से मिल
जाता है । अतएव इस पुराण की कथा आज मैं भलीभाँति कह रहा हूँ, आप लोग सुनें । मनुष्य इस पुराण को
सुनकर दस हजार जन्मों के किये हुए पापों से मुक्त होकर अपने करोड़ों कुलों के साथ ब्रह्म-पद को प्राप्त करता
है । भक्ति पूर्वक इसके दश अध्यायों के सुनने से निर्वाण प्राप्त होता है । इसमें किसी प्रकार की शंका करने की
आवश्यकता नहीं है । द्विजगण ! इस परम पवित्र, कल्याणमय, दुःस्वप्न नाशक पुण्य पुराण को यत्न पूर्वक सुनना
चाहिए । श्रद्धा के सहित मनुष्य यदि एक श्लोक अथवा आधा श्लोक भी पढ़े तो भी असंख्य महापापों से छूट जाता
है ३५-४६३॥ यह पुराण श्रद्धालु व्यक्ति को ही सुनाना चाहिए, क्योंकि इसका रहस्य गोपनीय है । इस पुराण को
नारदीयपुराणम् ५
जनानां बकवृत्तीनां न ब्रूयादिदमुत्तमम् । त्यक्तकामादिदोषाणां विष्णुभक्तिरतात्मनाम् ॥४९॥
सदाचारपराणां च वक्तव्यं मोक्षसाधनम् । सर्वदेवमयो विष्णुःस्मरतामार्त्तिनाशनः ॥५०॥
सद्भक्तिवत्सलो विप्रा भक्त्या तुष्यति नान्यथा । अश्रद्धयापि यन्नाम्नि कीर्त्तितेऽथस्मृतेऽपि वा ॥५१॥
विमुक्तः पातकैर्मर्त्यो लभते पदमव्ययम् । संसारघोरकान्तारदावाग्निर्मधुसूदनः ॥५२॥
स्मरतां सर्वपापानि नाशयत्याशु सत्तमाः । तदर्थद्योतकमिदं पुराणं श्राव्यमुत्तमम् ॥५३॥
श्रवणात्पठनाद्वापि सर्वपापविनाशकृत् । यस्यास्य श्रवणे बुद्धिर्जायते भक्तिसंयुता ॥५४॥
स एव कृतकृत्यस्तु सर्वशास्त्रार्थकोविदः । यदजितं तपः पुण्यं तन्मन्ये सफलं द्विजाः ॥५५॥
यदस्य श्रवणे भक्तिरन्यथा नहि जायते । सत्कथासु प्रवर्त्तन्ते सज्जना ये जगद्धिताः ॥५६॥
निन्दायां कलहे वापि ह्यसन्ततः पापतत्पराः । पुराणेष्वर्थवादत्वं ये वदन्ति नराधमाः ॥५७॥
तैरर्जितानि पुण्यानि क्षयं यान्ति द्विजोत्तमाः । समस्तकर्मनिर्मूलसाधनानि नराधमः ॥५८॥
पुराणान्यर्थवादेन ब्रुवन्नरकमाश्नुते । अन्यानि साधयन्त्येव कार्याणि विधिना नराः ॥५९॥
पुराणानि द्विजश्रेष्ठाः साधयन्ति न मोहिताः । अनायासेन यः पुण्यानीच्छतीह द्विजोत्तमाः ॥६०॥
श्रोतव्यानि पुराणानि तेन वै भक्तिभावतः । पुराणश्रवणे बुद्धिर्यस्य पुंसः प्रवर्त्तते ॥६१॥
पुरार्जितानि पापानि तस्य नश्यन्त्यसंशयम् । पुराणे वर्त्तमानेऽपि पापपाशेन यन्त्रितः ॥
आदरेणान्यगाथासु सक्तबुद्धिः पतत्यधः ॥६२॥
पवित्र क्षेत्र में द्विजातियों के समीप भगवान् विष्णु के सान्निध्य में सुनाना चाहिए । ब्रह्मद्रोह करने वालों, पाखण्ड
में रत रहने वालों और बगुला भक्तों को तो कभी भी यह उत्तम पुराण नहीं सुनाना चाहिए । यह मोक्षदायी
पुराण सदाचारपरायण, कामादिदोषरहित और विष्णु-भक्ति में तल्लीन रहने वाले महापुरुषों को सुनाना
चाहिए । विप्रगण ! स्मरण करने वालों की पीड़ा दूर करने वाले, सच्ची भक्ति के स्नेही और अखिल देव स्वरूप
विष्णु भक्ति से सन्तुष्ट होते हैं, अन्य प्रकार से नहीं । मनुष्य यदि बिना श्रद्धा के भी विष्णु का नाम कीर्तन अथवा
स्मरण करे तो भी अपने पापों से मुक्त होकर शाश्वत पद को प्राप्त करता है । सज्जनो ! संसार रूपी घोर महा-
वन के लिए वनाग्नि के समान मधुसूदन भगवान् अपने स्मरण करने वालों का सब पाप शीघ्र नष्ट कर देते हैं ।
उनकी महिमा को प्रकट करने वाले इस उत्तम पुराण का तो सर्वदा श्रवण करना चाहिए । इसके सुनने और
स्वयं पाठ करने से मनुष्य के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं । द्विजो ! जिस मनुष्य की इस पुराण के श्रवण में
श्रद्धायुक्त बुद्धि हो जाती है, वही कृतकृत्य है वही सब शास्त्रों का ज्ञाता है । द्विजगण ! अर्जित किये हुए तप
और पुण्य के फलोदय होने से इस पुराण के सुनने में भक्ति होती है, अन्यथा नहीं । सत्कथाओं को सुनने की इच्छा
उन्हीं व्यक्तियों को होती है जो सज्जन और जगत् का कल्याण करने वाले हैं ।४७-५६॥
जो दुष्ट और पापी हैं वे तो सर्वदा परनिन्दा और कलह में लगे रहते हैं । जो नराधम पुराणों पर अर्थ-
वाद का दोष लगाते हैं अर्थात् पुराणों को असत्य और अत्युक्ति कहते हैं, उनके पूर्वार्जित सभी सुकृत नष्ट
हो जाते हैं । समस्त कर्मों को निर्मूल करने के साधन पुराणों को अर्थवाद से युक्त कहने वाला नराधम
नरक भोग करता है । मोहग्रस्त द्विजवर पुराणों को नहीं साधते हैं । द्विजश्रेष्ठो ! जो व्यक्ति अनायास
पुण्य प्राप्त करना चाहते हैं, उनको अवश्य भक्तिपूर्वक पुराणों का श्रवण करना चाहिए । पुराणों के श्रवण में
जिस मनुष्य की रुचि हो जाती है निःसन्देह उसके पूर्वार्जित पाप शीघ्र नष्ट हो जाते हैं । पुराणों के रहते हुए
भी पाप की रस्सी में बँधा प्राणी अन्य कथाओं की ओर मन लगाकर पाप के गड्ढे में गिरता है ॥५७-६२॥
सत्सङ्गदेवार्चनसत्कथासु हितोपदेशे निरतो मनुष्यः ।
६ नारदीयपुराणम्
सत्सङ्गदेवार्चनसत्कथासु हितोपदेशे निरतो मनुष्यः ।
प्रयाति विष्णोः परमं पदं यद्देहावसानेऽच्युततुल्यतेजाः ॥६३॥
तस्मादिदं नारदनामधेयं पुण्यं पुराणं शृणुत द्विजेन्द्राः ।
यस्मिञ्छुते जन्मजरादिहीनो नरो भवेदच्युतनिष्ठचेताः ॥६४॥
वरं वरेण्यं वरदं पुराणं निजप्रभावितसर्वलोकम् ।
संकल्पितार्थप्रदमादिदेवं स्मृत्वा व्रजेन्मुक्तिपदं मनुष्यः ॥६५॥
ब्रह्मेशविष्ण्वादिशरीरभेदैर्विश्वं सृजत्यत्ति च पाति विप्राः ।
तमादिदेवं परमं परेशमाधाय चेतस्युपयाति मुक्तिम् ॥६६॥
यो नाम जात्यादिविकल्पहीनः परः पराणां परमः परस्मात् ।
वेदान्तवेद्यः स्वजनप्रकाशः समीड्यते सर्वपुराणवेदैः ॥६७॥
तस्मात्तमीशं जगतां विमुक्तिमुपासनायालमजं मुरारिम् ।
परं रहस्यं पुरुषार्थहेतुं स्मृत्वा नरो याति भवाब्धिपारम् ॥६८॥
वक्तव्यं धार्मिकेभ्यस्तु श्रद्दधानेभ्य एव च । मुमुक्षुभ्यो यतिभ्यश्च वीतरागेभ्य एव च ॥६९॥
वक्तव्यं पुण्यदेशे च सभायां देवतागृहे । पुण्यक्षेत्रे पुण्यतीर्थे देवब्राह्मणसन्निधौ ॥७०॥
उच्छिष्टदेशे वक्तार आख्यानमिदमुत्तमम् । पच्यन्ते नरके घोरे यावदाभूतसंप्लवम् ॥७१॥
मृषा शृणोति यो मूढो दम्भी भक्तिविवर्जितः । सोऽपि तद्वन्महाघोरे नरके पच्यतेऽक्षये ॥७२॥
नरो यः सत्कथामध्ये संभावां कुरुतेऽन्यतः । स याति नरकं घोरं तदेकाग्रमना भवेत् ॥७३॥
श्रोता वक्ता च विप्रेन्द्रा एष धर्मः सनातनः । असमाहितचित्तस्तु न जानाति हि किंचन ॥७४॥
इसके विपरीत जो मनुष्य सत्संग, देवार्चन, सत्कथा श्रवण और माङ्गलिक उपदेश श्रवण में निरत रहता है वह
मृत्यु के बाद अच्युत के समान तेजस्वी बनकर विष्णु के परमपद को प्राप्त करता है ॥६३॥ द्विजोत्तमवृन्द ! इसलिए
नारद नामक इस पुण्यदायक पुराण को तुम लोग सुनो, जिसके सुनने से मनुष्य जन्म-मरण के क्लेश से
मुक्त होकर अच्युत में अचल भक्ति प्राप्त करता है । श्रेष्ठ, महनीय, वरदाता, पुराण, अपनी कान्ति से सम्पूर्ण
लोक को वशीभूत करने वाले और मनोरथों को पूर्ण करने वाले आदिदेव का स्मरण कर मनुष्य मोक्ष पदवी को
प्राप्त करता है । द्विजो ! जो ब्रह्मा, विष्णु और शिव रूपों में अपने को विभक्त कर विश्व की सृष्टि, पालन और
नाश करता है उस आदिदेव, परम पुरुष महाप्रभु का हृदय में ध्यान कर मनुष्य मुक्ति प्राप्त करता है । जो नाम,
जाति आदि विकल्पों से रहित, पर, परात्पर, परम से भी परम, वेदान्त (ज्ञान) द्वारा जानने योग्य और भक्तों
के लिए प्रकाश स्वरूप है उसी की पूजा सब पुराणों के ज्ञाता व्यक्ति करते हैं । इसलिए उस जगत् को मुक्ति
देने वाले, उपासना से प्राप्त करने योग्य, अज, पर, रहस्यमय और मोक्षदाता मुरारि का स्मरण कर मनुष्य
इस संसार-सागर को पार कर जाता है । यह पुराण मुमुक्षु, यति, वीतराग, धार्मिक और श्रद्धालु जनों को ही
सुनाना चाहिए । इस पुण्य पुराण का पाठ पुण्य क्षेत्र में, सभा में, देवमन्दिरों में, पवित्रतीर्थों में और देवता
तथा ब्राह्मणों के समीप ही होना चाहिए । जो मूढ़ अपवित्र स्थानों में इस उत्तम कथा का उपदेश करता
है वह प्रलय काल तक घोर नरक में कष्ट पाता है । इसी प्रकार जो पाखण्डी श्रोता श्रद्धाहीन होकर केवल
दिखाने के लिए इस उत्तम आख्यान को सुनता है, वह भी दम्भी वक्ता के समान ही घोर नरक में यातना
पाता है ॥६४-७२॥ जो नर पुराण-पाठ के समय व्यर्थ की बातें करता है, वह घोर नरक में जाता है। अतएव
विप्रेन्द्रो ! श्रोता और वक्ता सबको एकाग्रमन से कथा का श्रवण या पाठ करना चाहिए। यही कथा की सनातन विधि है
द्वितीयाऽध्यायः ७
तत एकमना भूत्वा पिबेद्धरिकथामृतम् । कथं संभ्रान्तचित्तस्य कथास्वादः प्रजायते ॥७५॥
किं सुखं प्राप्यते लोके पुंसा संभ्रान्तचेतसा । तस्मात्सर्वं परित्यज्य कामं दुःखस्य साधनम् ॥७६॥
समाहितमना भूत्वा कुर्यादच्युतचिन्तनम् । येन केनाप्युपायेन स्मृतो नारायणोऽव्ययः ॥७७॥
अपि पातकयुक्तस्य प्रसन्नः स्यान्न संशयः । यस्य नारायणे भक्तिर्विभो विश्वेश्वरेऽव्यये ॥
तस्य स्यात्सफलं जन्म मुक्तिश्चैव करे स्थिता ॥७८॥
धर्मार्थकाममोक्षाख्यपुरुषाथा द्विजोत्तमाः । हरिभक्तिपराणां वै संपद्यन्ते न संशयः ॥७६॥
इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे प्रथमपादे सूतर्षिसंवादो नाम प्रथमोऽध्यायः ॥१॥
द्वितीयोऽध्यायः
ऋषय ऊचुः
कथं सनत्कुमारस्तु नारदाय महात्मने । प्रोक्तवान्सकलान्धर्मान्कथं तौ मिलितावुभौ ॥१॥
कस्मिन्स्थाने स्थितौ सूत तावुभौ ब्रह्मवादिनौ । हरिगीतसमुद्गाने चक्रतुस्तद्वदस्व नः ॥२॥
और यही सनातन धर्म है। जो एकाग्रमन से कथा नहीं सुनता है, वह कथा का कुछ भी रस या रहस्य नहीं जान
पाता है। इसलिए एकाग्रचित्त होकर हरिकथा रूपी अमृत का पान करना चाहिए, इधर-उधर मन दौड़ाने वाले
को कैसे कथा का रस (आनन्द) प्राप्त हो सकता है ॥७३-७५॥
भ्रान्त चित्त वाले व्यक्ति को इस लोक में क्या सुख मिल सकता है ? इसलिए दुःखमूलक भौतिक काम-
नाओं को छोड़कर एकाग्र भाव से भगवान् अच्युत का चिन्तन करना चाहिए । चाहे अत्यन्त घोर पापी ही क्यों न
हो परन्तु यदि वह जिस किसी प्रकार से अव्यय नारायण का स्मरण करता है तो भगवान् पतितपावन अवश्य उस
पर प्रसन्न होते हैं, इसमें कुछ भी सन्देह नहीं । जिस व्यक्ति को अविनाशी, विश्व के स्वामी और व्यापक नारायण
में अनन्य भक्ति होती है, उसी का जन्म सफल है और मुक्ति उसके हाथ में रहती है । द्विजो-
त्तमवृन्द ! धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष नाम के पुरुषार्थ हरिभक्तों को अवश्य प्राप्त हो जाते हैं, इसमें कुछ भी
सन्देह नहीं ॥७६-७८॥
श्री बृहन्नारदीयपुराण के पूर्वार्ध के प्रथम भाग में सूत और ऋषियों के संवाद नामक पहला अध्याय
समाप्त ॥१॥
अध्याय २
नारद द्वारा विष्णु की स्तुति
ऋषि बोले—महात्मा नारद को सनत्कुमार ने किस प्रकार सब धर्मों का रहस्य बतलाया ? और कैसे
उन दोनों महापुरुषों का मिलन हुआ ? किस स्थान पर स्थित होकर उन दोनों ब्रह्मवादी महात्माओं ने भगवान्
के इस पुण्य आख्यान की चर्चा की ? हे सूत, इन्हें विस्तार पूर्वक हमें समझाइये ॥१-२॥
यहाँ पृष्ठ का पूर्ण देवनागरी लिप्यंतरण प्रस्तुत है:
८ नारदीयपुराणम्
सूत उवाच
सनकाद्या महात्मानो ब्रह्मणो मानसाः सुताः । निर्ममा निरहंकाराः सर्वे ते ह्यूर्ध्वरेतसः ॥३॥
तेषां नामानि वक्ष्यामि सनकश्च सनन्दनः । सनत्कुमारश्च विभुः सनातन इति स्मृतः ॥४॥
विष्णुभक्ता महात्मानो ब्रह्मध्यानपरायणाः । सहस्रसूर्यसंकाशाः सत्यसन्धा मुमुक्षवः ॥५॥
एकदा मेरुशृङ्गं ते प्रस्थिता ब्रह्मणः सभाम् । इष्टं मार्गेऽथ ददृशुः गङ्गां विष्णुपदीं द्विजाः ॥६॥
तां निरीक्ष्य समुद्युक्ताः स्नातुं सीताजलेऽभवन् । एतस्मिन्नन्तरे तत्र देवर्षिर्नारदो मुनिः ॥७॥
आजगाम द्विजश्रेष्ठा दृष्ट्वा भ्रान्तॄन्स्वकाग्रजान् । तान्दृष्ट्वा स्नातुमुद्युक्तान्नमस्कृत्य कृतांजलिः ॥८॥
गृणन्नामानि सप्रेमभक्तियुक्तो मधुद्विषः । नारायणाच्युतानन्त वासुदेव जनार्दन ॥९॥
यज्ञेश यज्ञपुरुष कृष्ण विष्णो नमोऽस्तु ते । पद्माक्ष कमलाकान्त गङ्गाजनक केशव ॥
क्षीरोदशायिन्देवेश दामोदर नमोऽस्तु ते ॥१०॥
श्रीराम विष्णो नरसिंह वामन प्रद्युम्न संकर्षण वासुदेव ।
अजानिरुद्धामलरुङ् मुरारे त्वं पाहि नः सर्वभयादजस्रम् ॥११॥
इत्युच्चरन्हरेर्नाम नत्वा तांस्वाग्रजान्मुनीन् । उपासीनश्च तैः सार्द्धं सस्नौ प्रीतिसमन्वितः ॥१२॥
तेषां चापि तु सीताया जले लोकमलापहे । स्नात्वा संतर्प्य देवर्षिपिटून्विगतकल्मषाः ॥१३॥
उत्तौर्य संध्योपास्त्यादि कृत्वाचारं स्वकं द्विजाः । कथां प्रचक्रुर्विविधा नारायणगुणाश्रिताः ॥१४॥
कृतक्रियेषु मुनिषु गङ्गातीरे मनोरमे । चकार नारदः प्रश्नं नानाख्यानकथान्तरे ॥१५॥
सूत बोले—महात्मा सनक आदि ब्रह्मा के मानस पुत्र हैं वे सभी अतिविनीत, मायारहित और ऊर्ध्व-
रेता हैं । उन लोगों का नाम कहता हूँ । वे सनक, सनन्दन, सनत्कुमार और विभु सनातन नाम से प्रसिद्ध हैं । वे
विष्णुभक्त, महात्मा ब्रह्मोपासना में निरत रहने वाले, सहस्र सूर्यों के समान कान्तिमान्, सत्यवक्ता और मुक्ति-
परायण हैं । एक समय वे ब्रह्मा की सभा में सम्मिलित होने के लिए मेरुशृङ्ग की ओर चले । द्विजो ! उन के
मार्ग में ही विष्णु-चरण से निकलने वाली विष्णुपदी गंगा दिखाई दी । उसको देखकर वे महामुनि उस सीता
(गंगा) के जल में स्नान करने के लिए प्रस्तुत हुए । उसी समय वहाँ देवर्षिनारद भी आ गये । द्विजश्रेष्ठो !
स्नान करने के लिए प्रस्तुत अपने उन अग्रज भाइयों को देखकर नमस्कार करके हाथ जोड़कर प्रेम पूर्वक भक्ति
से मधुसूदन का नाम कीर्तन करने लगे—नारायण ! अच्युत ! अनन्त ! वासुदेव ! जनार्दन ! यज्ञेश ! यज्ञपुरुष !
कृष्ण ! विष्णु ! आपको नमस्कार है । कमलोचन ! कमलापति ! गंगा के जनक ! केशव ! क्षीरशायी !
देवेश ! दामोदर ! आपको नमस्कार करता हूँ । श्रीराम ! विष्णु ! नरसिंह ! वामन ! प्रद्युम्न ! संकर्षण !
वासुदेव ! अज ! अनिरुद्ध ! विमल कान्तिमान् ! मुरारे ! आप सब प्रकार के भयों से हमारी रक्षा कीजिए । इस
प्रकार उच्च स्वर से हरिनाम का स्मरण कर अपने उन अग्रज मुनियों को नमस्कार करके उनके साथ प्रेम पूर्वक स्नान
करने के उपरान्त बैठ गए । द्विजो ! वे भी पापों को दूर करने वाले सीता के जल में विधिवत् स्नान कर देव,
ऋषि और पितर के तर्पण से निवृत्त हो शुद्ध हो गये । द्विजो ! इस प्रकार वे अपने नित्यकर्म और उपासना से निवृत्त
हो भगवान् नारायण और उनके भक्तों की चर्चा करने लगे । उस मनोहर गंगा के तट पर जब वे मुनि अपने सान्ध्य-
कर्म से निवृत्त हो गये तब अवसर पाकर नारद जी ने नाना कथाओं और आख्यानों के विषय में पूछा ॥३-१५॥
द्वितीयोऽध्यायः ६
नारद उवाच
सर्वज्ञाः स्थ मुनिश्रेष्ठाः भगवद्भक्तितत्पराः । यूयं सर्वे जगन्नाथा भगवन्तः सनातनाः ॥१६॥
लोकोद्धारपरान्युष्मन्दीनेषु कृतसौहृदान् । पृच्छे ततो वदत मे भगवल्लक्षणं बुधाः ॥१७॥
येनेदमखिलं जातं जगत्स्थावरजङ्गमम् । गङ्गापादोदकं यस्य स कथं ज्ञायते हरिः ॥१८॥
कथं च विविधं कर्म सफलं जायते नृणाम् । ज्ञानस्य लक्षणं ब्रूत तपसश्चापि मानदाः ॥१९॥
अतिथेः पूजनं वापि येन विष्णुः प्रसीदति ।
एवमादीनि गुह्यानि हरितुष्टिकराणि च ।
अनुगृह्य च मां नाथास्तत्त्वतो वक्तुमर्हथ ॥२०॥
शौनक उवाच
नमः पराय देवाय परस्मात्परमाय च । परावरनिवासाय सगुणायागुणाय च ॥२१॥
अमायायात्मसंज्ञाय मायिने विश्वरूपिणे । योगीश्वराय योगाय योगगम्याय विष्णवे ॥२२॥
ज्ञानाय ज्ञानगम्याय सर्वज्ञानैकहेतवे । ज्ञानेश्वराय ज्ञेयाय ज्ञात्रे विज्ञानसंपदे ॥२३॥
ध्यानाय ध्यानगम्याय ध्यातृपापहराय च । ध्यानेश्वराय सुधिये ध्येयध्यातृस्वरूपिणे ॥२४॥
आदित्यचन्द्राग्निविधातृदेवाः सिद्धाश्च यक्षासुरनागसङ्घाः ।
यच्छक्तियुक्तास्तमजं पुराणं सत्यं स्तुतीशं सततं नतोऽस्मि ॥२५॥
यो ब्रह्मरूपी जगतां विधाता स एव पाता द्विजविष्णुरूपी ।
कल्पान्तरुद्राख्यतनुः स देवः शेतेऽङ्घ्रिपानस्तमजं भजामि ॥२६॥
नारद बोले—मुनिश्रेष्ठ ! आप लोग सर्वज्ञ और सर्वदा भगवद् भक्तों में ही लीन रहने वाले महात्मा
हैं। आप सभी संसार के स्वामी, सनातन और भगवद्रूप हैं। आप लोकोद्धार में सर्वदा निरत रहने वाले और
दीन जनों पर कृपा करने वाले हैं। अतः हे बुधवृन्द ! आप से मैं भगवद्-विभूति के विषय में पूछ रहा हूँ कृपाकर
बतलाइये। जिन भगवान् से इस स्थावर जंगमात्मक अखिल विश्व की सृष्टि हुई है और गंगा जिनके चरणोदक
(चरणों से निकली हुई) हैं, वे किस प्रकार जाने जा सकते हैं ? ज्ञान और तपस्या के लक्षण क्या हैं ? वह बताइये ।
अतिथि-पूजन, जिससे विष्णु प्रसन्न होते हैं वह तथा इसी प्रकार के अन्य रहस्य एवं विष्णु को प्रसन्नता के उपाय
कहिए। नाथ ! आप मेरे ऊपर अनुग्रह करके इन प्रश्नों को यथार्थ रूप से समझाइये ॥१६-२०॥
शौनक बोले—श्रेष्ठ देव तथा श्रेष्ठ से भी श्रेष्ठतम देव को नमस्कार है। क्षुद्र से क्षुद्र और महान् से
महान् पदार्थों में रहने वाले, सगुण, अगुण, मायारहित, आत्मज्ञ, माया स्वरूप और विश्वरूप को नमस्कार है।
योगीश्वर, योगिरूप, योग द्वारा प्राप्त करने योग्य विष्णु को नमस्कार है। ज्ञानरूप, ज्ञान द्वारा जानने योग्य,
सब ज्ञानों के एकमात्र कारण, ज्ञानेश्वर, ज्ञेय, ज्ञाता और विज्ञान सागर को नमस्कार है। ध्यानरूप, ध्यान से प्राप्त
करने योग्य, ध्यान करने वालों के पाप को हरने वाले, ध्यानेश्वर, सुधी, ध्येय और ध्याता स्वरूप को नमस्कार
है। जिसकी शक्ति से आदित्य, चन्द्रमा, अग्नि, विधाता, सब देवता, सिद्ध, यक्ष, असुर और नाग समूह शक्तिमान्
हैं उस अज, पुराण, सत्य और सब स्तुतियों के एकमात्र ईश को सतत नमस्कार हैं। जो ब्रह्मारूप से विश्व का
निर्माण करता, द्विज विष्णु के रूप में रक्षा करता और कल्पान्त में रुद्र रूप धारणकर विश्व का संहार करता
२—ना० पु०
१० नारदीयपुराणम्
यन्नामसंकीर्त्तनतो गजेन्द्रो ग्राहोग्रबन्धन्मुमुचे स देवः ।
विराजमानः स्वपदे पराख्ये तं विष्णुमाद्यं शरणं प्रपद्ये ॥२७॥
शिवस्वरूपो शिवमक्तिभाजां यो विष्णुरूपी हरिभावितानाम् ।
संकल्पपूर्वात्मकदेहहेतुस्तमेव नित्यं शरणं प्रपद्ये ॥२८॥
यः केशहन्ता नरकान्तकश्च बालो भुजाग्रेण दधार गोत्रम् ।
देवं च भूभारविनोदशीलं तं वासुदेवं सततं नतोऽस्मि ॥२६॥
लेभेऽवतीर्याग्रनृसिंहरूपी यो दैत्यवक्षः कठिनं शिलावत् ।
विदार्य संरक्षितवान्स्वभक्तं प्रह्लादमीशं तमजं नमामि ॥३०॥
व्योमादिभिर्भूतमात्मसंज्ञं निरञ्जनं नित्यममेयतत्त्वम् ।
जगद्विधातारमकर्मकं च परं पुराणं पुरुषं नतोऽस्मि ॥३१॥
ब्रह्मेन्द्ररुद्रानिलवायुमर्त्यगन्धर्वयक्षासुरदेवसंधैः ।
स्वमूर्तिभेदैः स्थित एक ईशस्तमादिमात्मानमहं भजामि ॥३२॥
यतो भिन्नमिदं सर्वं समुद्भूतं स्थितं च वै । यस्मिन्नेष्यति पश्चाच्च तमस्मि शरणं गतः ॥३३॥
यः स्थितो विश्वरूपेण सङ्गीवात प्रतीयते । असङ्गो परिपूर्णश्च तमस्मि शरणं गतः ॥३४॥
हृदि स्थितोऽपि यो देवो मायया मोहितात्मनाम् । न ज्ञायेत परः शुद्धस्तमस्मि शरणं गतः ॥३५॥
सर्वसंगनिवृत्तानां ध्यानयोगरतात्मनाम् । सर्वत्र भाति ज्ञानात्मा तमस्मि शरणं गतः ॥३६॥
दधार मंदरं पृष्ठे निरोदेऽमृतमन्थने । देवतानां हितार्थाय तं कूर्मं शरणं गतः ॥३७॥
और अन्त में स्वयं क्षीर सागर में शयन करता है ऐसे अज का मैं भजन करता हूँ । जिसके नाम के स्मरण मात्र से
गजेन्द्र ग्राह के कठोर बन्धन से मुक्त हो गया, जो देव सर्वदा अपने परम पद पर विराजमान रहते हैं, उस आदि
विष्णु की शरण में मैं आया हूँ । जो शिव भक्तों के लिये शिव स्वरूप और वैष्णवों के लिए विष्णु स्वरूप हैं जो
पूर्व संकल्प के अनुरूप शरीर धारण करते हैं उसी देव की शरण में मैं नित्य रहता हूँ । जिसने केशो का नाश किया,
नरकासुर को यमलोक पहुँचाया, बालक होते हुए भी जिसने अंगुली पर पर्वत को उठा लिया, जिसने पृथ्वी के भार
को दूर करने का स्वभाव-सा बना लिया है उस वासुदेव को सतत नमस्कार है ॥२१-२६॥ जिसने सिंह रूप में अवतार
लेकर शिला के समान कठिन हिरण्यकशिपु के वक्षःस्थल को नखों से फाड़ डाला और अपने प्रिय भक्त प्रह्लाद की
रक्षा की उस अज ईश को नमस्कार करता हूँ। जो आकाश आदि पंच तत्त्वों से विभूषित, आत्मा नाम से प्रसिद्ध,
निर्गुण, नित्य, रहस्यमय, जगत् के स्रष्टा और कर्मशून्य है उस परमपुराण पुरुष को नमस्कार करता हूँ ॥३०-३१॥ जो
एक होते हुए भी ब्रह्मा, इन्द्र, रुद्र, वायु, मनुष्य, गन्धर्व, यक्ष, असुर और देव समूह आदि अनेक रूपों में स्थित है उस
आदि आत्मा को मैं भजता हूँ । जिससे ये सारे भिन्न लोक उत्पन्न हुए, जिसमें स्थित हैं और अन्त में जिसमें लीन भी
होंगे उस देव की शरण में मैं प्राप्त हूँ । जो विश्व रूप में स्थित होकर इसमें लिप्त-सा जान पड़ता है, उस निर्लिप्त
और परिपूर्ण देव की शरण में प्राप्त हूँ । जो पर और शुद्ध ब्रह्म सब प्राणियों के हृदय में रहता हुआ भी माया-
बद्ध जीवों से नहीं जाना जाता है उस ईश की शरण में प्राप्त हूँ । जो ज्ञानरूप परमात्मा सब प्रकार की आस-
क्तियों से विरत और ध्यान योग में रत रहने वाले महापुरुषों को सर्वत्र प्रकाशरूप में दिखायी पड़ता है उस ज्ञान
रूप भगवान् की शरण में प्राप्त हूँ । जिसने अमृत के लिये किये गये समुद्र मन्थन के समय देवों के हित के लिए मेरु
को अपनी पीठ पर धारण किया उस कूर्म की शरण में प्राप्त हूँ ॥३२-३७॥ जिस अनन्त ने अपने दाँतों के अग्र भाग से
द्वितीयोऽध्यायः ११
दंष्ट्राङ्कुरेण योऽनन्तः समुद्धृत्यार्णवाद्वराम् । तस्थाविदं जगत्कृत्स्नं वाराहं तं नतोऽस्म्यहम् ॥३८॥
प्रह्लादं गोपयन्दैत्यं शिलातिकठिनोरसम् । विदार्य हतवांस्त्यो हि तं नृसिंहं नतोऽस्म्यहम् ॥३९॥
लब्ध्वा वैरोचनेर्भूमिं द्वभ्यां पद्भ्यामतीत्य यः । आब्रह्मभुवनं प्रादात्सुरेभ्यस्तं नतोऽजितम् ॥४०॥
हैहयस्यापराधेन ह्येकविंशतिसंख्यया । क्षत्रियान्वयभेत्ता यो जामदग्न्यं नतोऽस्मि तम् ॥४१॥
आविर्भूतश्चतुर्द्धा यः कपिभिः परिवारितः । हतवान्राक्षसानीकं रामचन्द्रं नतोऽस्म्यहम् ॥४२॥
मूर्तिद्वयं समाश्रित्य भूभारमपहृत्य च । संजहार कुलं स्वं यस्तं श्रीकृष्णमहं भजे ॥४३॥
भूर्यादिलोकत्रितयं संतृप्तात्मानमात्मनि । पश्यन्ति निर्मलं शुद्धं तमीशानं भजाम्यहम् ॥४४॥
युगान्ते पापिनो शुद्धान्भित्त्वा तीक्ष्णसुधारया । स्थापयामास यो धर्मं कृतादौ तन्नमाम्यहम् ॥४५॥
एवमादीन्यनेकानि यस्य रूपाणि पाण्डवाः । न शक्यं तेन संख्यातुं कोट्यब्दैरपि तं भजे ॥४६॥
महिमानं तु यन्नाम्नः परं गंतुं मुनीश्वराः । देवासुराश्च मनवः कथं तं क्षुल्लको भजे ॥४७॥
यन्नामश्रवणेनापि महापातकिनो नराः । पवित्रतां प्रपद्यन्ते तं कथं स्तौमि चाल्पधीः ॥४८॥
यथाकथंचिद्यन्नाम्नि कीर्तिते वा श्रुतेऽपि वा । पापिनस्तु विशुद्धाः स्युः शुद्धा मोक्षमवाप्नुयुः ॥४९॥
आत्मन्यात्मानमाधाय योगिनो गतकल्मषाः । पश्यन्ति यं ज्ञानरूपं तमस्मि शरणं गतः ॥५०॥
साङ्ख्याः सर्वेषु पश्यन्ति परिपूर्णात्मकं हरिम् । तमादिदेवमजरं ज्ञानरूपं भजाम्यहम् ॥५१॥
सर्वसत्त्वमयं शान्तं सर्वं द्रष्टारमीश्वरम् । सहस्रशीर्षकं देवं वन्दे भावात्मकं हरिम् ॥५२॥
समुद्र-मग्न पृथ्वी को खींचकर उस सम्पूर्ण संसार की स्थापना की, उस भगवान् वाराह को नमस्कार करता हूँ।
जिसने प्रह्लाद की रक्षा करते हुए चट्टान से भी कठिन छाती को फाड़कर दैत्य हिरण्यकशिपु को मार डाला उस
नृसिंह को नमस्कार है। जिसने विरोचन के पुत्र बलि से भूमि का दान प्राप्त कर उसको दो ही डगों से नाप
डाला और ब्रह्मलोक पर्यन्त भुवन देवों को दे दिया उस अजित वामन को नमस्कार है। हैहय के अपराध के
कारण इक्कीस बार क्षत्रिय वंश का नाश करने वाले जो देव परशुराम हैं उनको नमस्कार करता हूँ। जिसने
चार १रूपों में प्रकट होकर बन्दरों की सहायता से राक्षसों की सेना का वध किया उस रामचन्द्र को नमस्कार करता
हूँ। जिसने दो रूपों में (बलराम-कृष्ण) अपने को व्यक्त कर भू-भार को दूर किया और स्वयं अपने कुल का भी
संहार कर डाला उस भगवान् श्रीकृष्ण को नमस्कार है। योगी लोग अपने आत्मा में भू आदि तीनों लोकस्वरूप
जिस पूर्णात्मा को देखते हैं, उस निर्मल एवं शुद्ध प्रभु का मैं भजन करता हूँ। जिस भगवान् ने युग के अन्त में
(खड्ग की) तीक्ष्ण धार से अपवित्र पापियों को नष्ट कर कृतयुग के आदि में धर्म की स्थापना की उस कल्कि
भगवान् को नमस्कार है ॥३८-४५॥ पाण्डवो ! ऐसे जिसके अनेकों रूप हैं जिसकी गणना करोड़ों वर्षों में भी नहीं की
जा सकती है, उस भगवान् को मैं नमस्कार करता हूँ। जिसके नामों की महिमा का मुनीश्वर, देव, असुर और
मनुष्य भी पार नहीं पा सकते हैं, उसको मुझ जैसा क्षुद्र व्यक्ति कैसे भजेगा ? जिसके नाम श्रवण मात्र से महापापी
मनुष्य भी पवित्र हो जाते हैं, उसकी स्तुति मेरे समान क्षुद्र बुद्धि कैसे कर सकता है ? जिस किसी प्रकार से जिसके
नाम श्रवण या कीर्तन से पापी पापमुक्त हो जाते और शुद्ध भक्त मोक्ष पा जाते हैं और अपने में ही (अन्तःकरण-
रूप परम तत्त्व में) अपना ध्यान लगाकर निष्पाप योगी जिस ज्ञानरूप ब्रह्म को देखते हैं, उस ब्रह्म की शरण में मैं
प्राप्त हूँ। ज्ञानी व्यक्ति जिस परिपूर्ण ब्रह्म को चराचर में देखते हैं उस आदि देव, अजर ज्ञान रूप ब्रह्म की आराधना
करता हूँ ॥४६-५१॥ सकल प्राणिमय, शान्त, सर्वज्ञ, सर्वद्रष्टा, ईश्वर और सहस्र शिर वाले देव एवं भावरूप हरि
१. यहाँ चारों भाइयों से तात्पर्य है।
१२ नारदीयपुराणम्
यद्भूतं यच्च वै भव्यं स्थावरं जङ्गमं जगत् । दशाङ्गुलं योऽत्यतिष्ठत्तमेशमजरं भजे ॥५३॥
अणोरणीयांसमजं महतश्च महत्तरम् । गुह्याद्गुह्यतमं देवं प्रणमामि पुनः पुनः ॥५४॥
ध्यातः स्मृतः पूजितो वा श्रुतः प्रणमितोऽपि वा । स्वपदं यो ददातीशस्तं वन्दे पुरुषोत्तमम् ॥५५॥
इति स्तुवन्तं परमं परेशं हर्षाश्रुसंरुद्धविलोचनास्ते ।
मुनीश्वरा नारदसंयुतास्तु सनन्दनाद्याः प्रमुदं प्रजग्मुः ॥५६॥
य इदं प्रातरुत्थाय पठेद् वै पौरुषं स्तवम् । सर्वपापविशुद्धात्मा विष्णुलोकं स गच्छति ॥५७॥
इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे प्रथमपादे सनत्कुमारनारदसंवादे
नारदकृतविष्णुस्तुतिर्नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥२॥
तृतीयोऽध्यायः
नारद उवाच
कथं ससर्ज ब्रह्मादीनादिदेवः पुरा विभुः । तन्ममाख्याहि सनक सर्वज्ञोऽसि यतो भवान् ॥१॥
श्रीसनक उवाच
नारायणोऽक्षरोऽनन्तः सर्वव्यापी निरञ्जनः । तेनेदमखिलं व्याप्तं जगत्स्थावरजङ्गमम् ॥२॥
आदिसर्गे महाविष्णुः स्वप्रकाशो जगन्मयः । गुणभेदमधिष्ठाय मूर्त्तित्रिकमवासृजत् ॥३॥
की वन्दना करता हूँ। जो भूत, भविष्य, स्थावर तथा जंगम रूप जगत् को दश अंगुल के परिमाण में व्याप्त करके
रहता है उस वृद्धावस्था रहित प्रभु को प्रणाम करता हूँ। अणु से भी अणु (अत्यन्त सूक्ष्म) महान् से भी महान्,
गुहा से भी गुह्यतम (अत्यन्त गूढ़) देव को पुनः प्रणाम करता हूँ। जो व्यक्ति उनका स्मरण, ध्यान, पूजा, नाम-
श्रवण और प्रणाम करता है उसको वे ईश अपना लोक दे देते हैं, ऐसे पुरुषोत्तम ईश की वन्दना करता हूँ।
मुनिगण ! इस प्रकार नारद सहित सनक, सनन्दन आदि मुनि परेश परम ब्रह्म की स्तुति करते हुए
आनन्द मग्न हो गये। उनके नेत्रों से, आनन्दाश्रु बहने लगे। जो व्यक्ति प्रातःकाल उठकर इस वैष्णव स्तोत्र का
पाठ करता है, वह सब पापों के मुक्त होकर विष्णु लोक को जाता है ॥५२-५७॥
श्रीनारदीयपुराण में सनत्कुमार और नारद के संवाद-प्रकरण में नारद कृत विष्णु स्तुति नामक दूसरा
अध्याय समाप्त ॥२॥
अध्याय ३
भूगोल-वर्णन
नारद बोले—सनक जी ! सृष्टि के आदि में विभु आदि देव ने किस प्रकार ब्रह्मा आदि को उत्पन्न
किया, यह मुझे बतलाइये; क्योंकि आप सर्वज्ञ हैं ॥१॥
श्री सनक बोले—भगवान् नारायण अव्यय, अनन्त, सर्व व्यापक और निरंजन हैं, वे इस अखिल स्थावर
जंगमात्मक जगत् में व्याप्त हैं ॥२॥ सृष्टि के आदि में जगन्मय, स्वप्रकाश, महाविष्णु ने तीनों गुणों को विभक्त किया
तृतीयोऽध्यायः १३
सृष्ट्यर्थं तु पुरा देवो दक्षिणाङ्गात्प्रजापतिम् । मध्ये रुद्राख्यमीशानं जगदन्तकरं मुने ॥४॥
पालनायास्य जगतो वामाङ्गाद्विष्णुमव्ययम् । तमादिदेवमजरं केचिदाहुः शिवाभिधम् ।
केचिद्विष्णुं सदा सत्यं ब्रह्माणं केचिदूचिरे ॥५॥
तस्य शक्तिः परा विष्णोर्जगत्कार्यप्रवर्तिनी । भावाभावस्वरूपा सा विद्याविद्येति गीयते ॥६॥
यदा विश्वं महाविष्णोर्भिन्नत्वेन प्रतीयते । तदा ह्यविद्या संसिद्धा भवेद्दुःखस्य साधनम् ॥७॥
ज्ञातृज्ञेयाद्युपाधिस्ते यदा नश्यति नारद । सर्वैकभावनाबुद्धिः सा विद्येत्यभिधीयते ॥८॥
एवं माया महाविष्णोभिन्ना संसारदायिनी । अभेदबुद्ध्या दृष्टा चेत्संसारक्षयकारिणी ॥६॥
विष्णुशक्तिसमुद्भूतमेतत्सर्वं चराचरम् । यस्माद्भिन्नमिदं सर्वं यच्चेङ्गेयच्च नेङ्गति ॥१०॥
उपाधिभिर्यथाकाशो भिन्नत्वेन प्रतीयते । अविद्योपाधियोगेन तथेदमखिलं जगत् ॥११॥
यथा हरिर्जगद्व्यापी तस्य शक्तिस्तथा मुने । दाहशक्तिर्यथांगारे स्वाश्रयं व्याप्य तिष्ठति ॥१२॥
उमेति केचिदाहुस्तां शक्तिं लक्ष्मीं तथा परे । भारतीत्यपरे चैनां गिरिजैत्यम्बिकेति च ॥१३॥
दुर्गेति भद्रकालीति चण्डी माहेश्वरीत्यपि । कौमारी वैष्णवी चेति वाराह्यैन्द्री च शाम्भवी ॥१४॥
ब्राह्मीति विद्याविद्येति मायेति च तथा परे । प्रकृतिश्च परा चेति वदन्ति परमर्षयः ॥१५॥
और उन गुणों के ही आधार पर त्रिमूर्ति की सृष्टि की । आदि देव ने सबसे पहले सृष्टिकार्य सम्पन्न करने के
लिए अपने दाहिने अंग से प्रजापति ब्रह्मा को उत्पन्न किया । मुने ! मध्य भाग से जगत् के संहार करने वाले
ईशान रुद्र को और वाम भाग से इस जगत् का पालन करने के लिए विष्णु को उत्पन्न किया । उस अजर आदि
देव को कुछ लोग शिव कहते हैं, कुछ उनको विष्णु और कुछ सदा सत्य स्वरूप ब्रह्मा कहा करते हैं। उस विष्णु
की जगत् रूप कार्यकर्त्री पराशक्ति है, जो भावाभाव स्वरूप और विद्या एवं अविद्या रूप कही जाती है। जब
विश्व महाविष्णु से भिन्न प्रतीत होता है उस समय अविद्या का अधिकार या सिद्धि समझनी चाहिये । उस समय
दुःखों के साधन (मार्ग) प्रस्तुत हो जाते हैं। नारद ! जिस समय तुम्हारी ज्ञाता, ज्ञेय आदि उपाधि (भिन्नता या
विशेषता) से सम्बद्ध बुद्धि नष्ट हो जाती है (अर्थात् त्वम् अहम् आदि की भावना दूर होकर अद्वैत भावना हो
जाती है) और सब पदार्थों में समभाव या एकभाव हो जाता है उस समय की बुद्धि (या ज्ञान) विद्या कहलाती है ।
। ३-८। इस प्रकार महाविष्णु की माया भिन्न रूप से देखी जाने पर संसार में ढकेलती है और अभेद की तरह देखी
जाने पर संसार का क्षय कर देती है । अर्थात् भेद बुद्धि से ईश्वर की उपासना करने पर संसार में आना पड़ता
है और अभेद बुद्धि से की गई उपासना मोक्ष प्रदान करती है । यह सम्पूर्ण चराचर जगत् विष्णु-शक्ति से उत्पन्न
हुआ है । जिससे यह सम्पूर्ण जगत् भिन्न है, जो यह सब है और जो तुम्हें प्रतीत हो रहा है । जैसे (घट, पट आदि)
उपाधियों के कारण (एक ही) आकाश विभिन्न रूपों में दिखाई पड़ता है उसी तरह अविद्या रूप उपाधि के सम्बन्ध
से यह सम्पूर्ण जगत् भिन्न-भिन्न प्रतीत होता है । मुनि नारद ! जिस प्रकार हरि जगत्-व्यापक हैं उसी प्रकार उनकी
शक्ति भी विश्वव्यापक है। जिस प्रकार अंगारों की दाह शक्ति (जलाने की शक्ति) अपने आश्रय (अंगार में) को व्याप्त
करके (अर्थात् अंगार के अणु-अणु में) विद्यमान रहती है उसी प्रकार हरि तथा उसकी शक्ति भी जगत् में व्याप्त रहती
है । कोई उसको उमा, कोई शक्ति, कोई लक्ष्मी, कोई भारती और कोई गिरिजा कोई अम्बिका, कोई दुर्गा, भद्रकाली,
चण्डी और महेश्वरी नाम से पुकारते हैं । कुछ लोग उसी शक्ति को कौमारी, वैष्णवी, वाराही, ऐन्द्री, शाम्भवी, ब्राह्मी,
विद्या और अविद्या भी कहते हैं और दूसरी कोटि के लोग इसको माया कहते हैं ॥६-१४॥ परम ऋषिगण इसी को
१४
नारदीयपुराणम्
शेषशक्तिः परा विष्णोर्जगत्सर्गादिकारिणी । व्यक्ताव्यक्तस्वरूपेण जगद्व्याप्य व्यवस्थिता ॥१६॥
प्रकृतिश्च पुमांश्चैव कालश्चेति विधिस्थितः । सृष्टिस्थितिविनाशानामेकः कारणतां गतः ॥१७॥
येनेदमखिलं जातं ब्रह्मरूपधरेण वै । तस्मात्परतरो देवो नित्य इत्यभिधीयते ॥१८॥
रक्षां करोति यो देवो नित्य इत्यभिधीयते ॥१९a॥
रक्षां करोति यो देवो जगतां परतः पुमान् । तस्मात्परतरं यत्तदव्ययं परमं पदम् ॥२०॥ ॥१९b॥
अक्षरो निर्गुणः शुद्धः परिपूर्णः सनातनः । यः परः कालरूपाख्यो योगिध्येयः परात्परः ॥२१॥
परमात्मा परानन्दः सर्वोपाधिविवर्जितः । ज्ञानैकवेद्यः परमः सच्चिदानन्दविग्रहः ॥२२॥
योऽसौ शुद्धोऽपि परमो ह्यहंकारेण संयुतः । देहीति प्रोच्यते मूढैरहोऽज्ञानविडम्बनम् ॥२३॥
स देवः परमः शुद्धः सत्त्वादिगुणभेदतः । मूर्तित्रयं समापन्नः सृष्टिस्थित्यन्तकारणम् ॥२४॥
योऽसो ब्रह्मा जगत्कर्ता यन्नाभिकमलोद्भवः । स एवानन्दरूपात्मा तस्मान्नास्त्यपरो मुने ॥२५॥
अन्तर्यामी जगद्व्यापी सर्वसाक्षी निरञ्जनः । भिन्नाभिन्नस्वरूपेण स्थितो वै परमेश्वरः ॥२६॥
यस्य शक्तिर्महामाया जगद्विलम्भधारिणी । विश्वोत्पत्तेर्निदानत्वात्प्रकृतिः प्रोच्यते बुधैः ॥२७॥
आदिसर्गे महाविष्णुर्लोकान्कर्त्तुं समुद्यतः । प्रकृतिः पुरुषश्चेति कालश्चेति त्रिधा भवेत् ॥२८॥
पश्यन्ति भावितात्मानो यं ब्रह्मेत्यभिसंज्ञितम् । शुद्धं यत्परमं धाम तद्विष्णोः परमं पदम् ॥२९॥
एवं शुद्धोऽक्षरोऽनन्तः कालरूपी महेश्वरः । गुणरूपी गुणाधारो जगतामादिकृद्विभुः ॥३०॥
प्रकृति और परा भी कहते हैं । विष्णु की परा शेष शक्ति जगत् की सृष्टि आदि का कारण है जो कि प्रत्यक्ष और
अप्रत्यक्ष रूप से इस सृष्टि में व्याप्त होकर रहती है । प्रकृति, पुरुष, काल और विधि स्थिति इनमें एक ही विश्व
की सृष्टि, स्थिति और विनाश का कारण माना जाता है । जिस ब्रह्मा रूपधारी आदि पुरुष से यह अखिल लोक
उत्पन्न हुआ है उससे पर देव नित्य कहे जाते हैं, जो देव रक्षा करते हैं वे भी नित्य कहे जाते हैं। जो देव जगत् की
रक्षा करते हैं वे पुरुष पर हैं और उससे भी परतर जो हैं वे परमपद अव्यय कहे जाते हैं। जो योगियों के एक-
मात्र ध्येय कालरूप नामक परात् पर पुरुष है, वह अक्षर, निर्गुण, शुद्ध, परिपूर्ण, सनातन, परमात्मा, परानन्द,
और सब उपाधियों से रहित है ॥१५-२१॥ वह ज्ञान से ही एकमात्र जानने योग्य परम और सच्चिदानन्द
स्वरूप है। जो मूढ़ शुद्ध परम देव को 'अहंकार से युक्त देही' इस नाम से पुकारते हैं उनका यह ज्ञान एकमात्र
विडम्बना है और आश्चर्य है उनके इस थोथे ज्ञान पर । वह परम शुद्ध देव सत्व, रज और तम भेद से तीन रूपों में
अपने को विभक्त कर देता है और इस प्रकार पृथक्-पृथक् एक-एक रूप से सृष्टि, स्थिति और प्रलय करता है ।
जगत् के कर्त्ता ब्रह्मा जिसके नाभि कमल से उत्पन्न हुए हैं वही आनन्द रूप परमात्मा है । मुनि ! उससे श्रेष्ठ
दूसरा कोई नहीं है ॥२२-२५॥
वह परमेश्वर अन्तर्यामी, जगद्व्यापक, सबका साक्षी, निरंजन और भिन्न-भिन्न रूपों से स्थित रहता है
उसकी शक्ति महामाया संसार को निश्चित रूप से धारण किये रहती है । बुधगण उसको संसार की उत्पत्ति का
आदि कारण होने के कारण 'प्रकृति' कहा करते हैं ।२६-२७। सृष्टि के आदि में जब महाविष्णु लोक-सृष्टि करने
को उद्यत होते हैं, तब वे प्रकृति, पुरुष और काल इन तीन रूपों में विभक्त हो जाते हैं । योगीजन जिस ब्रह्म
नाम से प्रसिद्ध शुद्ध परमधाम को देखते हैं या जानते हैं वही विष्णु का परम पद है। इस प्रकार शुद्ध, अक्षर,
अनन्त, कालरूपी महेश्वर, विभु, गुणरूपी, गुणों के आधार और लोकों के भादि कर्त्ता हैं। जब पुरुष नामक
तृतीयाऽध्यायः १५
प्रकृतिः क्षोभमापन्ना पुरुषाख्ये जगद्गुरौ । महान्प्रादुरभूद् बुद्धिस्ततोऽहं समवर्त्तत ॥३१॥
अहङ्काराच्च सूक्ष्माणि तन्मात्राणीन्द्रियाणि च । तन्मात्रेभ्यो हि जातानि भूतानि जगतः कृते ॥३२॥
आकाशवाय्वग्निजलभूमयोऽब्जभवात्मज । यथाक्रमं कारणतामेकैकस्योपयान्ति च ॥३३॥
ततो ब्रह्मा जगद्धाता तामसानसृजत्प्रभुः । तिर्यग्योनिगताञ्जन्तून्पशुपक्षिमृगादिकान् ॥३४॥
तमप्यसाधकं मत्वा देवसर्गं सनातनात् । ततो वै मानुषं सर्गं कल्पयामास पद्मजः ॥३५॥
ततो दक्षादिकान्पुत्रान्सृष्टिसाधनतत्परान् । एभिः पुत्रैरिदं व्याप्तं सदेवासुरमानुषम् ॥३६॥
भूर्भुवश्च तथा स्वश्च महश्चैव जनस्तथा । तपश्च सत्यमित्येवं लोकाः सत्योपरि स्थिताः ॥३७॥
अतलं वितलं चैव सुतलं च तलातलम् । महातलं च विप्रेन्द्र ततोऽधश्च रसातलम् ॥३८॥
पातालं चेति सप्तैव पातालानि क्रमादधः । एष सर्वेषु लोकेषु लोकनाथांश्च सृष्टवान् ॥३९॥
कुलाचलान्नदींश्चासौ तत्तल्लोकनिवासिनाम् । वर्त्तनादीनि सर्वाणि यथायोग्यमकल्पयत् ॥४०॥
भूतले मध्यगो मेरुः सर्वदेवसमाश्रयः । लोकालोकश्च भूम्यन्ते तन्मध्ये सप्त सागराः ॥४१॥
दीपाश्च सप्त विप्रेन्द्र द्वीपे द्वीपे कुलाचलाः । बाह्या नद्यश्च विख्याता जनाश्चामरसन्निभाः ॥४२॥
जम्बूप्लक्षामिधानौ च शाल्मलश्च कुशस्तथा । क्रौञ्चशाकौ पुष्करश्च ते सर्वे देवभूमयः ॥४३॥
एते द्वीपाः समुद्रैस्तु सप्तसप्तभिरावृताः । लवणेक्षुसुरासर्पिर्दधिक्षीरजलैः समम् ॥४४॥
एते द्वीपाः समुद्राश्च पूर्वस्मादुत्तरोत्तराः । ज्ञेया द्विगुणविस्तारा लोकालोकाच्च पर्वतात् ॥४५॥
जगद्गुरु के द्वारा प्रकृति क्षोभ से युक्त हो जाती है अर्थात् जब लोक-सृष्टि की इच्छा से प्रकृति (गुणों की
साम्यावस्था) में कम्पन उत्पन्न होता है तब महत्तत्त्व (बुद्धि) उत्पन्न होता है और तत्पश्चात् अहङ्कार की उत्पत्ति
होती है। अहङ्कार से पाँच तन्मात्राओं (रूप, रस, गन्ध, स्पर्श और शब्द) और एकादश इन्द्रियों की उत्पत्ति हुई ।
तन्मात्राओं से जगत् की सृष्टि के लिए पाँच महाभूत उत्पन्न हुए ।२८-३२।ब्रह्मा के पुत्र (नारद) ! आकाश, वायु, अग्नि,
जल और भूमि यथाक्रम एक दूसरे के प्रति कारण होते जाते हैं अर्थात् शब्द तन्मात्रामक आकाश से वायु, शब्द-
स्पर्शतन्मात्रामक वायु से अग्नि, अग्नि से रसतन्मात्रामक जल और जल से पृथ्वी की सृष्टि हुई । तदनन्तर
जगत्स्रष्टा प्रभु ब्रह्मा ने सबसे पहले तामस सृष्टि की और तिर्यग्योनिगत जन्तुओं, पशु, पक्षी और मृग आदि को
बनाया। उस प्रथम सृष्टि को असाधक (मन के प्रतिकूल) समझकर सनातन ब्रह्म से देव-सृष्टि की । तत्पश्चात् उस
पद्मसम्भव ब्रह्मा ने मानव सृष्टि को प्रारम्भ किया । ३३-३५। प्रारम्भ में सृष्टि कार्य में तत्पर रहने वाले दक्ष आदि
मानस पुत्रों को उत्पन्न किया। इन पुत्रों से ही देवता से लेकर असुर और मानवों को सम्पूर्ण सृष्टि हुई है। भूः,
भुवः, स्वः, महः, जनः, तपः और सत्य ये सात लोक सत्य पर अवलम्बित तथा ऊर्ध्व लोक हैं। विप्रेन्द्र ! अतल,
वितल, सुतल, तलातल, महातल उसके नीचे रसातल और सबसे नीचे पाताल है । इस प्रकार क्रमशः ये सातों
पाताल लोक भू लोक के नीचे स्थित हैं। पुनः ब्रह्मा ने सब लोकों में लोक-पालों की रचना की । प्रत्येक लोक में
कुलाचल, नदी ओर उन लोकों में रहने वाले जीवों एवं लोकोचित व्यवहार आदि को यथायोग्य बनाया । भूतल
के मध्य भाग में सब देवताओं के एकमात्र आश्रय स्थान मेरु को, भूमि के अन्त में लोकालोक पर्वत को और मध्य
में सात सागरों को स्थापित किया ॥३६-४१॥
विप्रेन्द्र ! पुनः सात द्वीप, प्रत्येक द्वीप में कुलाचल प्रवाहयुक्त अति प्रसिद्ध नदियों और देवतुल्य मनुष्यों की
रचना की । जम्बूद्वीप, प्लक्ष, शाल्मल, कुश, क्रौञ्च, शाक और पुष्कर द्वीप ये सभी देवभूमियाँ हैं। ये सातों द्वीप
सात-सात समुद्रों से घिरे हुए हैं जो कि क्रमशः लवण, इक्षु (ईख) सुरा (मदिरा) घृत, दधि, दूध और जल से भरे
रहते हैं। ये द्वीप और समुद्र लोकालोक पर्वत से पूर्व एक के बाद एक स्थित हैं जो क्रमशः विस्तार में दुगुने
१६ नारदीयपुराणम्
क्षारोदधेरुत्तरं यद्धिमाद्रेश्चैव दक्षिणम् । ज्ञेयं तद्भारतं वर्षं सर्वकर्मफलप्रदम् ॥४६॥
अत्र कर्माणि कुर्वन्ति त्रिविधानि तु नारद । तत्फलं भुज्यते चैव भोगभूमिधनक्रमात् ॥४७॥
भारते तु कृतं कर्म शुभं वाशुभमेव च । तत्फलं क्षयि विप्रेन्द्र भुज्यतेऽन्यत्र जन्तुभिः ॥४८॥
अद्यापि देवा इच्छन्ति जन्म भारतभूतले । सञ्चितं सुमहत्पुण्यमक्षय्यममलं शुभम् ॥४९॥
कदा लभामहे जन्म वर्षभारतभूमिषु । कदा पुण्येन महता यास्याम परमं पदम् ॥५०॥
दानैर्वाविविधैर्यज्ञैस्तपोभिर्वाथवा हरिम् । जगदीशं समेष्यामो नित्यानन्दमनामयम् ॥५१॥
यो भारतभुवं प्राप्य विष्णुपुजापरो भवेत् । न तस्य सदृशोऽन्योऽस्ति त्रिषु लोकेषु नारद ॥५२॥
हरिकीर्तनशीलो वा तद्भक्तानां प्रियोऽपि वा । शुश्रूषुश्चापि महतः स वेद्यो दिविजैरपि ॥५३॥
हरिपुजारतो नित्यं भक्त पूजारतोऽपि वा । भक्तोच्छिष्टान्नसेवी च याति विष्णोः परं पदम् ॥५४॥
नारायणेति कृष्णेति वासुदेवेति यो वदेत् । अहिंसादिपरः शान्तः सोऽपि वन्द्यः सुरोत्तमैः ॥५५॥
शिवेति नीलकण्ठेति शङ्करेति च यः स्मरेत् । सर्वभूतहितो नित्यं सोऽभ्यर्च्यो दिविजैः स्मृतः ॥५६॥
गुरुभक्तः शिवध्यानी स्वाश्रमाचारतत्परः । अनसूयुः शुचिर्दक्षो यः सोऽप्यर्च्यः सुरेश्वरैः ॥५७॥
ब्राह्मणानां हितकरः श्रद्धावान्वर्णधर्मयोः । वेदवादरतो नित्यं स ज्ञेयः पङ्क्तिपावनः ॥५८॥
अभेददर्शी देवेशे नारायणशिवात्मके । सर्वं यो ब्रह्मणा नित्यमस्मदादिषु का कथा ॥५९॥
गोषु शान्तो ब्रह्मचारी परनिन्दाविवर्जितः । अपरिग्रहशीलश्च देवपूज्यः स नारद ॥६०॥
परिमाण में हैं ।४२-४५। लवण समुद्र से उत्तर और हिमालय से दक्षिण जो प्रदेश है वह सब प्रकार के कर्मों का फल
देने वाला भारत वर्ष है । नारद ! इस देश में मनुष्य त्रिविध कर्मों को करते हैं और उन कर्म के फल को भोग-भूमि
और सम्पत्ति के क्रम से भोगते हैं । विप्रेन्द्र ! इस भारत में मनुष्य अपने किये हुए शुभ अशुभ कर्मों के क्षयशील
फलों का भोग अन्य लोकों (स्वर्ग, नरक आदि) में करते हैं। अब तक भी देवतागण भारत भूतल पर संचित,
महान्, अमर, अमल और शुभ पुण्य के लिए जन्म लेना चाहते हैं। वे सोचते हैं कि कब वे अपने महापुण्यों के प्रभाव
से भारत वर्ष की भूमि पर जन्म लेंगे और कब वे अपने पुण्य के प्रभाव से परम पद को प्राप्त करेंगे ॥४६-५०॥
सर्वदा उनकी यही इच्छा रहती है कि कब वे दान, विविध यज्ञों अथवा तपस्या से नित्य आनन्दमय जगदीश हरि
के समीप जायेंगे । जो भाग्यशाली मानव भारत भूमि पर जन्म लेकर विष्णु-पूजा में रत रहता है, नारद ! उसके
समान इन तीनों लोकों में कोई दूसरा नहीं है । जो हरिकीर्तन के प्रेमी, विष्णु भक्तों के प्रिय अथवा उस परम
विष्णु के सेवक हैं उनका देवता भी आदर पूर्वक गुण गान करते हैं । हरि पूजा में रत रहने वाले, नित्य उनके भक्तों
की सेवा में रहने वाले, और भक्तों के जूठे अन्न को खाने वाले व्यक्ति भी विष्णु के परम पद को प्राप्त करते हैं ।
जो अहिंसादि धर्म में रत रहने वाला व्यक्ति नारायण, कृष्ण, वासुदेव आदि नामों का कीर्तन करता है, उसकी
श्रेष्ठ देवता भी पूजा करते हैं । जो शिव, नीलकण्ठ और शङ्कर, इन नामों से शिव का स्मरण करता है और
लोक कल्याण में लगा रहता है, वह भी देवों द्वारा पूजित होता है । गुरुभक्त, शिव का ध्यान करने वाला, अपने
आश्रमानुकूल आचार का पालन करने वाला, ईर्ष्या रहित (उदार), पवित्र और कर्मकुशल व्यक्ति भी देवों से
पूजित होता है ॥५१-५७॥
ब्राह्मणों का हित करने वाला, वर्ण व्यवस्था और धर्म में श्रद्धा रखने वाला तथा नित्य ब्रह्म (ज्ञान) की
चर्चा में ही समय बिताने वाला व्यक्ति पंक्ति पावन समझा जाता है । नारद ! जो देवों के प्रभु नारायण और शिव
में अभेद भाव रखता है तथा सब में ब्रह्म का नित्य दर्शन करता है, उसके विषय में तो कुछ कहना ही नहीं । इन्द्रिय-
संयमी, ब्रह्मचारी, पर निन्दा से विमुख रहने वाला एवं दान न लेने वाला व्यक्ति देवों से पूज्य होता है ॥५८-६०॥
तृतीयोऽध्यायः
तृतीयोऽध्यायः १७
स्तेयादिदोषविमुखः कृतज्ञः सत्यवाक् शुचिः । परोपकारनिरतः पूजनीयः सुरासुरैः ॥६१॥
वेदार्थश्रवणे बुद्धिः पुराणश्रवणे तथा । सत्संगेऽपि च यस्यास्ति सोऽपि वन्द्यः सुरोत्तमैः ॥६२॥
एवमादीन्यनेकानि कर्माणि श्रद्धयान्वितः । करोति भारते वर्षे संबन्धोऽस्माभिरेव च ॥६३॥
एतेष्वन्यतमो विप्रसात्मानं नारभेत्तु यः । स एव दुष्कृतिमूढो नास्त्यन्योऽस्मादचेतनः ॥६४॥
संप्राप्य भारते जन्म सत्कर्मसु पराङ्मुखः । पीयूषकलशं मुक्त्वा विषभाण्डमुपाश्रितः ॥६५॥
श्रुतिस्मृत्युदितैर्धर्मैरात्मानं पावयेत्तु यः । स एवात्मविधाती स्यात्पापिनामग्रणीर्मुने ॥६६॥
कर्मभूमिं समासाद्य यो न धर्मं समाचरेत् । स च सर्वाधमः प्रोक्तो वेदविद्भिर्मुनीश्वर ॥६७॥
शुभं कर्म समुत्सृज्य दुष्कर्माणि करोति यः । कामधेनुं परित्यज्य अर्कक्षीरं स मार्गति ॥६८॥
एवं भारतभूभागं प्रशंसन्ति दिवौकसः । ब्रह्माद्या अपि विप्रेन्द्र स्वभोगक्षयभीरवः ॥६९॥
तस्मात्पुण्यतमं ज्ञेयं भारतं वर्षमुत्तमम् । देवानां दुर्लभं वापि सर्वकर्मफलप्रदम् ॥७०॥
अस्मिन्पुण्ये च भूभागे यस्तु सत्कर्मसूद्यतः । न तस्य सदृशं कश्चित्त्रिषु लोकेषु विद्यते ॥७१॥
अस्मिञ्जातो नरो यस्तु स्वकर्मक्षपणोद्यतः । नररूपपरिच्छन्नः स हरिनैत्र संशयः ॥७२॥
परं लोकफलं प्रेप्सुः कुर्यात्कर्माप्यतन्द्रितः । निवेद्य हरये भक्त्या तत्फलं ह्याक्षयं स्मृतम् ॥७३॥
विरागी चेत्कर्मफलेष्वपि किंचिन्न कारयेत् । अर्पयेत्सुकृतं कर्म प्रीयतामिति मे हरिः ॥७४॥
आब्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरुत्पत्तिदायकाः । फलागृध्नुः कर्मणां तत्प्राप्नोति परमं पदम् ॥७५॥
वेदोदितानि कर्माणि कुर्यादीश्वरतुष्टये । यथाश्रमं त्यक्तकामः प्राप्नोति पदमव्ययम् ॥७६॥
चोरी आदि पापों से विमुख रहने वाला, कृतज्ञ, सत्यवक्ता, पवित्र और नित्य परोपकार में निरत रहने वाला
व्यक्ति सुर एवं असुर दोनों का पूज्य होता है। जिसकी वेदों के तत्त्व सुनने में, पुराण श्रवण में और सत्संग में
श्रद्धा एवं भावना रहती है वह भी देवताओं से वन्द्य (पूज्य) होता है। जो इस भारतवर्ष में जन्म लेकर हमलोगों
के आदेशानुसार श्रद्धायुक्त होकर ऐसे अनेक शुभकर्मों को करता है वह धन्य है। जो मूढ़ इन उपर्युक्त कर्मों के
विरुद्ध आचरण करता है वह पापी है। उससे बढ़कर अज्ञानी इस संसार में कोई दूसरा नहीं है। जो भारतवर्ष में
जन्म लेकर भी अच्छे सत्कर्म से विमुख रहता है वह अमृत कलश को छोड़कर विषकुम्भ को अपनाता है। ॥५८-६५॥
मुने ! जो श्रुतिस्मृति-समस्त धर्मों के आचरण से आत्मोद्धार नहीं करता है, वही आत्मघाती और पापियों में महान्
पापी है। मुनीश्वर ! जो इस कर्मभूमि (भारतभूमि) पर जन्म लेकर धर्म का आचरण नहीं करता है, उसको वेद
के जानने वाले लोग सबसे अधम कहते हैं। जो शुभकर्मों को छोड़ कर दुष्कर्मों में प्रवृत्त होता है, वह कामधेनु को
छोड़कर मदार के दूध की इच्छा करता है। देवता भी भारत भूमि की प्रशंसा करते हैं। विप्रेन्द्र ! ब्रह्मा आदि
देवगण भी अपने (पुण्यफल) भोग के नाश से डरने वाले हैं। इसलिए भारतवर्ष को सब वर्षों से उत्तम समझना
चाहिए, यह सब कर्मों के फलों को देने वाला वर्ष देवों के लिए भी दुर्लभ है ॥६६-७०॥
इस पवित्र भूभाग पर जन्म लेकर जो सत्कर्म करने में लगे रहते हैं उसके समान इस त्रिलोक में कोई
दूसरा नहीं है। जो इस भारतवर्ष में जन्म लेकर अपने कर्मों के लिए उद्यत रहता है वह मनुष्य के रूप में प्रच्छन्न
विष्णु है, इसमें कुछ भी सन्देह नहीं। उत्तम लोक के फल को चाहने वाले व्यक्ति को भक्ति पूर्वक भगवदर्पण बुद्धि
से आलस्य रहित होकर सत्कार्य करना चाहिए ऐसे कर्मों के फल कभी भी नष्ट नहीं होते। यदि कर्म फलों की
कुछ भी इच्छा न रखने वाला व्यक्ति चाहे और कुछ भी न करे केवल 'हरि मुझ पर प्रसन्न हों (हरिः प्रीयताम्), यह
कहता हुआ अपने सुकृतकर्मों को अर्पित कर दे, तो वह पुनर्जन्म को देनेवाले स्वर्ग से लेकर भूलोक को पार कर
परम पद को प्राप्त करता है ॥७१-७५॥ केवल भगवत्प्रीति की इच्छा से, निष्काम होकर जो आश्रमानुकूल कर्म
३-ना० पु०
१८ नारदीयपुराणम्
निष्कामो वा सकामो वा कुर्यात्कर्म यथाविधि । स्वाश्रमाचारशून्यश्च पतितः प्रोच्यते बुधैः ॥७७॥
सदाचारपरो विप्रो वर्द्धते ब्रह्मतेजसा । तस्य विष्णुश्च तुष्टः स्याद्भक्तियुक्तस्य नारद ॥७८॥
भारते जन्म संप्राप्य नात्मानं तारयेत्तु यः । पच्यते निरये घोरे स त्वाचन्द्रार्कतारकम् ॥७९॥
वासुदेवपरो धर्मो वासुदेवपरं तपः । वासुदेवपरं ज्ञानं वासुदेवपरा गतिः ॥८०॥
वासुदेवात्मकं सर्वं जगत्स्थावरजङ्गमम् । आब्रह्मस्तम्बपर्यन्तं तस्मादन्यन्न विद्यते ॥८१॥
स एव धाता त्रिपुरान्तकश्च स एव देवासुरयज्ञरूपः ।
स एव ब्रह्माण्डमिदं ततोऽन्यन्न किंचिदस्ति व्यतिरिक्त रूपम् ॥८२॥
यस्मात्परं नापरमस्ति किंचिद्यस्मादणीयान्न तथा महीयान् ।
व्याप्तं हि तेनेदमिदं विचित्रं तं देवदेवं प्रणमेत्समीड्यम् ॥८३॥
इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे प्रथमपादे सृष्टिभरतखण्ड-
प्राशस्थ्यभूगोलानां वर्णनं नाम तृतीयोऽध्यायः ॥३॥
करता है वह शाश्वत पद को प्राप्त करता है। चाहे निष्काम भाव हो या सकाम, मनुष्य को विधि के अनुसार
कार्य करना चाहिए; क्योंकि बुधजन अपने आश्रम-विहित आचार से विमुख रहने वाले व्यक्ति को पतित कहते हैं।
नारद ! सदाचार-परायण ब्राह्मण अपने ब्रह्मतेज से नित्य वृद्धि पाता है और भक्तिरत विप्र पर विष्णु
सर्वदा प्रसन्न रहते हैं। जो मूढ़ भारत वर्ष में जन्म लेकर भी अपना उद्धार नहीं करता है वह जब तक चन्द्र, सूर्य
और तारामण्डल से आकाश सुशोभित रहता है तब तक घोर नरक में दुःख भोग करता है। वासुदेव ही परमधर्म,
परमतप, परमज्ञान और वासुदेव ही परम गति हैं ॥७६-८०॥ ब्रह्मा से लेकर तृण पर्यन्त सारा स्थावर जंगमात्मक
जगत् वासुदेवमय है। उससे भिन्न संसार नामक कोई अन्य पदार्थ नहीं है। वही ब्रह्मा, वही त्रिपुरारि शंकर, वही
देव, असुर और यज्ञरूप है। यह सारा ब्रह्माण्ड वही है। उसके अतिरिक्त अन्य किसी वस्तु की सत्ता नहीं है।
जिससे पर या अपर कोई दूसरा नहीं और जिससे सूक्ष्म या महान् कोई दूसरा नहीं अर्थात् जो महान् से भी
महत्तर और सूक्ष्म से सूक्ष्मतम है, उससे यह सारा विचित्र जगत् व्याप्त है। इसलिए उस पूज्य देवाधिदेव को
प्रणाम करना चाहिए ॥८१-८३॥
श्रीनारदीयपुराण में सृष्टि, भारतवर्ष, उसकी सम्पूर्ण भूभागों से श्रेष्ठता और अन्य भूभागों का वर्णन
नामक तीसरा अध्याय समाप्त ॥३॥
चतुर्थोऽध्यायः
सनक उवाच
श्रद्धापूर्वाः सर्वधर्मा मनोरथफलप्रदाः । श्रद्धया साध्यते सर्वं श्रद्धया तुष्यते हरिः ॥१॥
भक्तिर्भक्त्यैव कर्त्तव्या तथा कर्माणि भक्तितः । कर्मश्रद्धाविहीनानि न सिध्यन्ति द्विजोत्तमाः ॥२॥
यथाऽऽलोको हि जन्तूनां चेष्टाकारणतां गतः । तथैव सर्वसिद्धीनां भक्तिः परमकारणम् ॥३॥
यथा समस्तलोकानां जीवनं सलिलं स्मृतम् । तथा समस्तसिद्धीनां जीवनं भक्तिरिष्यते ॥४॥
यथा भूमिं समाश्रित्य सर्वे जीवन्ति जन्तवः । तथा भक्तिं समाश्रित्य सर्वकार्याणि साधयेत् ॥५॥
श्रद्धावाँल्लभते धर्म्मं श्रद्धावानर्थमाप्नुयात् । श्रद्धया साध्यते कामः श्रद्धावान्मोक्षमाप्नुयात् ॥६॥
न दानैर्न तपोभिर्वा यज्ञैर्वा बहुदक्षिणैः । भक्तिहीनर्मुनेश्रेष्ठ तुष्यते भगवान्हरिः ॥७॥
मेरुमात्रसुवर्णानां कोटिकोटिसहस्रशः । दत्ता चाप्यर्थनाशाय यतो भक्तिर्विवर्जिता ॥८॥
अभक्त्या यत्तपस्तप्तं केवलं कायशोषणम् । अभक्त्या यद्धुतं हव्यं भस्मनि न्यस्तहव्यवत् ॥६॥
यत्किञ्चित्कुरुते कर्म्म श्रद्धयाप्यणुमात्रकम् । तन्नाम जायते पुंसां शाश्वतं प्रीतिदायकम् ॥१०॥
अध्याय ४
मार्कण्डेय मुनि का चरित्र-वर्णन
सनक बोले-श्रद्धापूर्वक किये गये सब धर्म ही इच्छित फल देने वाले होते हैं, श्रद्धा से ही सब कुछ सिद्ध
होता है और श्रद्धा से ही भगवान् हरि प्रसन्न होते हैं। उपासना और श्रद्धा भक्तिपूर्वक होनी चाहिए। अन्य कर्म
भी भक्तिपूर्वक ही करना चाहिए। द्विजोत्तमवृन्द ! श्रद्धापूर्वक न किये गये कर्म भी पूर्ण नहीं होते हैं। जिस प्रकार
प्रकाश प्राणियों के कार्य करने का कारण माना जाता है उसी प्रकार सब प्रकार की सिद्धियों का परमकारण भक्ति
ही है अर्थात् जिस प्रकार प्रकाश के द्वारा मनुष्य या प्राणी अपने कार्यों में लग जाते हैं उसी प्रकार भक्ति के द्वारा
मनुष्य अपने कार्यों में सफल हो जाता है। जिस प्रकार समस्त प्राणियों का जल जीवन (प्राण-दाता) कहा जाता
है उसी प्रकार सब सिद्धियों का जीवन भक्ति है ॥१-४॥ जिस प्रकार सकल जीवजन्तु इस पृथ्वी के सहारे जीते हैं उसी
प्रकार भक्ति के बल से मनुष्य सब कार्यों को पूर्ण कर देता है। श्रद्धालु व्यक्ति ही धर्म प्राप्त करता है। वही अर्थ,
वही काम और वही मोक्ष भी प्राप्त करता है। मुनिश्रेष्ठ ! भक्तिहीन मनुष्य चाहे असंख्य धन का दान, तप, या
यज्ञ कर भरपूर दक्षिणा दे परन्तु उस पर भगवान् कथमपि प्रसन्न नहीं होते हैं ॥५-७॥ मनुष्य मेरु पर्वत
के तुल्य करोड़ों सुवर्ण-पर्वत दान में दे दे परन्तु वह केवल धन का अपव्यय ही कहा जायगा यदि वह दान भक्ति
पूर्वक नहीं दिया गया है। श्रद्धा-हीन किया हुआ तप केवल शरीर को कष्ट देना मात्र है। श्रद्धा के बिना अग्नि में
दी हुई आहुतियां केवल भस्म में दी हुई आहुति के समान हैं ॥८-६॥ श्रद्धापूर्वक किया हुआ सत्कर्म चाहे अति क्षुद्र ही
क्यों न हो परन्तु वह निश्चय ही नित्य सुख देने वाला होता है ॥१०॥ ब्रह्मन् ! वेद-विधि के अनुसार सहस्रों अश्वमेध
२० नारदीयपुराणम्
अश्वमेधसहस्रं वा कर्म्म वेदोदितं कृतम् । तत्सर्वं निष्फलं ब्रह्मन्यदि भक्तिविवर्जितम् ॥११॥
हरिभक्तिः परा नृणां कामधेनूपमा स्मृता । तस्यां सत्यां पिबन्त्यज्ञाः संसारगरलं ह्यहो ॥१२॥
असारभूते संसारे सारमेतदजात्मज । भगवद्भक्तसङ्गश्च हरिभक्तिस्तितिक्षुता ॥१३॥
असूयोपेतमनसां भक्तिदानादिकर्म्म यत् । अवेहि निष्फलं ब्रह्मंस्तेषां दूरतरो हरिः ॥१४॥
परश्रियाभितप्तानां दम्भाचाररतात्मनाम् । मृषा तु कुर्वतां कर्म तेषां दूरतरो हरिः ॥१५॥
पृच्छतां च महाधर्म्मान्वदतां वै मृषा च तान् । धर्मेष्वभक्तिमनसां तेषां दूरतरो हरिः ॥१६॥
वेदप्रणिहितो धर्म्मो वेदो नारायणः परः । तत्राश्रद्धापरा ये तु तेषां दूरतरो हरिः ॥१७॥
यस्य धर्म्मविहीनानि दिनान्यायान्ति यान्ति च । स लोहकारभस्त्रेव श्वसन्नपि न जीवति ॥१८॥
धर्मार्थकाममोक्षाख्याः पुरुषार्थाः सनातनाः । श्रद्धावतां हि सिध्यन्ति नान्यथा ब्रह्मनन्दन ॥१९॥
स्वाचारमनतिक्रम्य हरिभक्तिपरो हि यः । स याति विष्णुभवनं यद्वै पश्यन्ति सूरयः ॥२०॥
कुर्वन्वेदोदितान्धर्म्मान्मुनीन्द्र स्वाश्रमोचितान् । हरिध्यानपरो यस्तु स याति परमं पदम् ॥२१॥
आचारप्रभवो धर्मः धर्मस्य प्रभुरच्युतः । आश्रमाचारयुक्तेन पूजितः सर्वदा हरिः ॥२२॥
यः स्वाचारपरिभ्रष्टः साङ्गवेदान्तगोऽपि वा । स एव पतितो ज्ञेयो यतः कर्मबहिष्कृतः ॥२३॥
हरिभक्तिपरो वाऽपि हरिध्यानपरोऽपि वा । भ्रष्टो यः स्वाश्रमाचारात्पतितः सोऽभिधीयते ॥२४॥
यज्ञ कर देने पर भी कुछ भी फल नहीं मिलता है यदि वह भक्ति पूर्वक नहीं किये गए हों। मनुष्यों के लिए हरि-
भक्ति सब सिद्धियों को देने वाली श्रेष्ठ कामधेनु के समान मानी गई है। आश्चर्य है कि इसके रहते हुए भी मूढ़
जन सांसारिक विषय वासना रूपी विष का बार-बार पान करते हैं ॥११-१२॥ ब्रह्मपुत्र ! इस असार संसार में
केवल भगवद्भक्तों की संगति, हरिभक्ति और सहिष्णुता ही सारभूत पदार्थ हैं। ब्रह्मन् ! ईर्ष्यालु मनुष्यों
के किये हुए भक्ति, दान आदि प्रत्येक कर्म को निष्फल ही समझो और उनके लिए हरि दूर से भी दूरतर हैं
॥१३-१४॥
दूसरे के ऐश्वर्य को देखकर जलने वाले और पाखण्ड में लगे रहने वाले मनुष्यों के किये हुए कर्म व्यर्थ हैं
और उनसे भगवान् उतनी ही दूर रहते हैं जितना पाताल से आकाश । किसी से परम धर्म के विषय में पूछा
जाय—और यदि वह जिज्ञासु जनों को व्यर्थ के उपदेश दे तो ऐसे धर्म में श्रद्धा न रखने वाले व्यक्तियों से भगवान्
सर्वदा दूर रहते हैं। धर्म वेद प्रतिपादित हैं, अर्थात् धर्म की व्याख्या वेद ही करते हैं और वेद नारायण को ही
परम धर्म मानते हैं, ऐसे नारायण और नारायण परक वेद और धर्म में श्रद्धा न रखने वाले व्यक्ति से भगवान्
सर्वदा दूर रहते हैं ॥१५-१७॥
जिसके दिन धर्माचरण में नहीं बीतते हैं यों ही व्यर्थ आते-जाते हैं, वह व्यक्ति लुहार की भाथी (धौंकनी)
के समान श्वास लेता हुआ भी मृतक के समान है। ब्रह्मनन्दन ! धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष ये ही सनातन चार
पुरुषार्थ माने गए हैं; परन्तु ये केवल श्रद्धालुजनों को ही प्राप्त होते हैं श्रद्धाहीनों को नहीं। जो अपने कुलाचार
को न छोड़ता हुआ हरिभक्ति में तल्लीन रहता है वह उस विष्णुलोक को प्राप्त करता है, जिसको ज्ञानी लोग
अपनी ज्ञानदृष्टि से देखा करते हैं। मुनीन्द्र ! वेदोक्त एवं अपने आश्रम के योग्य धर्म का पालन करते हुए जो
व्यक्ति हरिभक्ति में रत रहते हैं ॥१८-२०॥ वे परम पद को पा जाते हैं। धर्म से ही आचार उत्पन्न होता है और
धर्म के प्रभु (स्वामी, आदि कारण) अच्युत हरि हैं। अतः आश्रमानुकूल आचार पालन से प्रभु सर्वदा प्रसन्न होते हैं।
साङ्गोपाङ्ग वेदों का अध्ययन करने वाला व्यक्ति भी यदि अपने कुलाचार से हीन है तो उसे भी पतित ही समझना
चाहिये; क्योंकि वह भगवान् के प्रिय कर्मों से च्युत है। चाहे कोई व्यक्ति हरिभक्ति और उसके ध्यान में अनन्य
चतुर्थोऽध्यायः २१
वेदो वा हरिभक्तिर्वा भक्तिर्वापि महेश्वरे । आचारात्पतितं मूढं न पुनाति द्विजोत्तम ॥२५॥
पुण्यक्षेत्राभिगमनं पुण्यतीर्थनिषेवणम् । यज्ञो वा विविधो ब्रह्मंस्त्यक्ताचारं न रक्षति ॥२६॥
आचारात्प्राप्यते स्वर्ग आचारात्प्राप्यते सुखम् । आचारात्प्राप्यते मोक्ष आचारात्किं न लभ्यते ॥२७॥
आचाराणां तु सर्वेषां योगानां चैव सत्तम । हरिभक्तेरपि तथा निदानं भक्तिरिष्यते ॥२८॥
भक्त्यैव पूज्यते विष्णुर्वाञ्छितार्थफलप्रदः । तस्मात्समस्तलोकानां भक्तिर्मतेति गीयते ॥२९॥
जीवन्ति जन्तवः सर्वे यथा मातरमाश्रिताः । तथा भक्तिं समाश्रित्य सर्वे जीवन्ति धार्मिकाः ॥३०॥
स्वाश्रमाचारयुक्तस्य हरिभक्तिर्यदा भवेत् । न तस्य त्रिषुलोकेषु सदृशोऽस्त्यजनन्दन ॥३१॥
भक्त्या सिध्यन्ति कर्माणि कर्मभिस्तुष्यते हरिः । तस्मिंस्तुष्टे भवेज्ज्ञानं ज्ञानान्मोक्षमवाप्यते ॥३२॥
भक्तिस्तु भगवद्भक्तसङ्गेन खलु जायते । तत्सङ्गं प्राप्यते पुम्भिः सुकृतैः पूर्वसञ्चितैः ॥३३॥
वर्णाश्रमाचाररता भगवद्भक्तिलालसाः । कामादिदोषनिर्मुक्तास्ते सन्तो लोकशिक्षकाः ॥३४॥
सत्सङ्गः परमो ब्रह्मन्न लभ्येताकृतात्मनाम् । यदि लभ्येत विज्ञेयं पुण्यं जन्मान्तरार्जितम् ॥३५॥
पूर्वार्जितानि पापानि नाशमायान्ति यस्य वै । सत्सङ्गतिर्भवेत्तस्य नान्यथा घटते हि सा ॥३६॥
रविर्हि रश्मिजालेन दिवा हन्ति बहिस्तमः । सन्तः सूक्तिमरीच्योघैश्चान्तर्ध्वान्तं हि सर्वदा ॥३७॥
निष्ठा रखता हो परन्तु यदि वह अपने आचार से भ्रष्ट है तो भी उसको पतित ही कहा जाता है ॥२१-२४॥ द्विजवर्य !
साक्षात् वेद, हरिभक्ति या शिवभक्ति कोई भी अभागे आचार-भ्रष्ट को पवित्र नहीं कर सकता । ब्रह्मन् ! पवित्र
क्षेत्रों में जाना, पुण्य तीर्थों की सेवा अथवा विविध यज्ञ ये कभी भी आचार-पतित की रक्षा करने में समर्थ नहीं हो
सकते ॥२५-२६॥ आचार से स्वर्ग प्राप्त होता है, आचार से ही सुख मिलता है और आचार से ही मोक्ष भी प्राप्त
होता है । इस प्रकार कौन ऐसी वस्तु है जो आचार से नहीं मिल सकती है ? सज्जनों में श्रेष्ठ ! सब प्रकार के
आचारों, योगों और हरि भक्ति का भी एकमात्र आदि कारण भक्ति (श्रद्धा) ही है। सब मनः कामनाओं को
पूर्ण करने वाले विष्णु भक्ति के द्वारा ही पूजे जाते हैं या प्रसन्न होते हैं। इसीलिए भक्ति सब लोकों की माता
कही जाती है। जिस प्रकार सभी जन्तु या प्राणी माता के सहारे जीते हैं उसी प्रकार सभी धार्मिक भक्ति के सहारे
जीवित रहते हैं ॥२७-३०॥ ब्रह्मनन्दन ! जब अपने आश्रम के अनुसार आचरण करने वाले व्यक्ति हरिभक्तिपरायण
हो जाते हैं तो उनके समान भाग्यशाली और पुण्यवान् व्यक्ति तीनों लोक में दूसरा नहीं रहता । भक्ति के द्वारा ही
सब कर्म सफल होते हैं और कर्मों से ही भगवान् प्रसन्न होते हैं, भगवान् की प्रसन्नता (कृपा) से ही ज्ञान की प्राप्ति
होती है और ज्ञान से ही मुक्ति प्राप्त होती है ॥३१-३२॥
भगवद्भक्तों की संगति से ही भक्ति उत्पन्न होती है और सत्सङ्गति पूर्व सञ्चित शुभकर्मों से ही मनुष्य
को प्राप्त होती है । ऐसे सन्त व्यक्ति ही लोक-शिक्षक या लोक-गुरु हैं जो कि वर्णाश्रम धर्म के पालन में लगे रहते,
जिनकी सत्सङ्गति में रुचि होती और जो कामक्रोधादि दोषों से मुक्त रहते हैं। ब्रह्मन् ! सत्सङ्ग के समान उत्तम
पदार्थ अजितेन्द्रिय व्यक्ति को कभी भी प्राप्त नहीं होता। यदि कोई ऐसा व्यक्ति पा जाय तो उसको उसके पूर्व
जन्म के सञ्चित कर्मों का फल समझना चाहिए । जिसके पूर्व जन्म के किये पाप नष्ट हो जाते हैं उसीको
सत्सङ्गति का सौभाग्य मिलता है; अन्यथा पापियों को सत्सङ्गति कथमपि प्राप्त नहीं हो सकती। सूर्य अपनी किरणों
से दिन में जगद्व्यापी अन्धकार को दूर कर देता है और सज्जन मनुष्य अपने सदुपदेश रूपी किरणों के समूह से
अज्ञानियों के अन्तःकरण के अज्ञानान्धकार को दूर करते हैं ॥३३-३७॥ इस लोक में भगवद्भक्ति में श्रद्धा एवं
२२ नारदीयपुराणम्
दुर्लभाः पुरुषा लोके भगवद्भक्तिलालसाः । तेषां सङ्गो भवेद्यस्य तस्य शान्तिर्हि शाश्वती ॥३८॥
नारद उवाच
किंलक्षणा भागवतास्ते च किं कर्म्म कुर्व्वते । तेषां लोको भवेत्कीदृक्तत्सर्वं ब्रूहि तत्त्वतः ॥३६॥
त्वं हि भक्तो रमेशस्य देवदेवस्य चक्रिणः । एतन्निगदितुं शक्तस्त्वत्तो नास्त्यधिकोऽपरः ॥४०॥
सनक उवाच
शृणु ब्रह्मन्परं गुह्यं मार्कण्डेयस्य धीमतः । यमुवाच जगन्नाथो योगनिद्राविमोहितः ॥४१॥
योऽसौ विष्णुः परं ज्योतिर्देवदेवः सनातनः । जगद्रूपी जगत्कर्त्ता शिवब्रह्म स्वरूपवान् ॥४२॥
युगान्ते रौद्ररूपेण ब्रह्माण्डग्रासबृंहितः । जगत्येकार्णवीभूते नष्टे स्थावरजङ्गमे ॥४३॥
भगवान्नेव शेषात्मा शेते वटदले हरिः । असंख्यताब्जजन्माद्यैराभूषिततनूरुहः ॥४४॥
पादाङ्गुष्ठाग्रनिर्गतगङ्गाशीताम्बुपावनः । सूक्ष्मात्सूक्ष्मतरो देवो ब्रह्माण्डग्रासबृंहितः ॥४५॥
वटच्छदे शयानोऽसौसर्वशक्तिसमन्वितः । तस्मिन्स्थाने महाभागो नारायणपरायणः ।
मार्कण्डेयः स्थितस्तस्य लीलाः पश्यन्महेशितुः ॥४६॥
ऋषय ऊचुः
तस्मिन्काले महाघोरे नष्टे स्थावरजङ्गमे । हरिरेकः स्थित इति श्रुते पूर्वं हि शुश्रुम ॥४७॥
जगत्येकार्णवीभूते नष्टे स्थावरजंगमे । सर्वग्रस्तेन हरिणा किमर्थं सोऽवशेषितः ॥४८॥
लालसा रखने वाले पुरुष दुर्लभ हैं, ऐसे भगवद्भक्तों की सङ्गति जिसको प्राप्त हो जाती है, उसको शाश्वत शान्ति
मिल जाती है ॥३८॥
नारद बोले—भगवद् भक्तों के लक्षण क्या हैं ? वे कैसे कर्म करते हैं ? उन लोगों को कौन से
लोक प्राप्त होते हैं ? इन बातों को आप यथार्थ रूप से कहिए । आप महाप्रभु, देव-देव, चक्रधर विष्णु के भक्त
हैं। आपसे बढ़ कर कोई ऐसा व्यक्ति नहीं, जो इन विषयों पर साधिकार कुछ कह सके ॥३६-४०॥
सनत्कुमार बोले—ब्रह्मन् ! (इस विषय में) योगनिद्रा का त्याग कर विष्णु ने मार्कण्डेय से जो गुप्त बात
कही थी, वह सुनिए। जो विष्णु पर, ज्योतिः स्वरूप, सनातन, देव-देव, जगत्स्वरूप, जगत् के कर्त्ता, शिव और
ब्रह्मा रूप धारण करने वाले हैं, वे ही युगान्त में रुद्ररूप धारण कर सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को ग्रस लेते हैं। जब सारा
ब्रह्माण्ड एकार्णव रूप में हो जाता है और स्थावर, जंगम सब नष्ट हो जाते हैं तब केवल भगवान् हरि ही शेष रह
जाते हैं और अक्षयवट के पत्ते पर सोते हैं। उस समय उनके प्रत्येक रोम अगणित ब्रह्मा आदि से सुशोभित रहते हैं।
(अपने) पैर के अंगूठे के अगले भाग से निकली गंगा के शीतल जल को पवित्र करने वाले तथा सूक्ष्म से सूक्ष्म रूप
धारण करते हुए भी वे ब्रह्माण्ड को अपने में छिपाकर महान् से महान् बने रहते हैं। इस प्रकार सर्वशक्ति-सम्पन्न
हरि उस वट पत्र पर सोये हुए थे। उसी स्थान पर नारायणभक्तमहाभाग्यशाली मार्कण्डेय उस महाप्रभु
की लीला को देखकर आश्चर्य-चकित-से स्थित थे ॥४१-४६॥
ऋषिगण बोले—उस महाभयंकर काल में स्थावर-जंगम आदि नष्ट हो गए थे, केवल भगवान् हरि
ही बचे थे, ऐसा हम लोगों ने अभी सुना है। पुनः उस प्रलयकाल में जबकि सारा जगत् एकार्णवाकार था, स्थावर,
जंगम आदि सब पदार्थ नष्ट हो गए थे तब सर्वसंहारी विष्णु ने मार्कण्डेय मुनि को कैसे छोड़ दिया ?
चतुर्थोऽध्यायः २३
परं कौतूहलं ह्यत्र वर्त्ततेऽतीव सूत नः । हरिकीर्तिसुधापाने कस्यालस्यं प्रजायते ॥४६॥
सूत उवाच
आसीन्मुनिर्महाभागो मृकण्डुरिति विश्रुतः । शालग्रामे महातीर्थे सोऽतप्यत महातपाः ॥५०॥
युगानामयुतं ब्रह्मन्गृणन्ब्रह्म सनातनम् । निराहारः क्षमायुक्तः सत्यसन्धो जितेन्द्रियः ॥५१॥
आत्मवत्सर्वभूतानि पश्यन्विषयनिःस्पृहः । सर्वभूतहितो दान्तस्तताप सुमहत्तपः ॥५२॥
तत्तपःशङ्किताः सर्वे देवा इन्द्रादयस्तदा । परेशं शरणं जग्मुर्नारायणमनामयम् ॥५३॥
क्षीराब्धेरुत्तरं तीरं संप्राप्य त्रिदिवौकसः । तुष्टुवुर्देवदेवेशं पद्मनाभं जगद्गुरुम् ॥५४॥
देवा ऊचुः
नारायणाक्षरानन्त शरणागतपालक । मृकण्डुतपसा त्रस्तान्पाहि नः शरणागतान् ॥५५॥
जय देवाधिदेवेश जय शङ्खगदाधर । जयो लोकस्वरूपाय जयो ब्रह्माण्डहेतवे ॥५६॥
नमस्ते देवदेवेश नमस्ते लोकपावन । नमस्ते लोकनाथाय नमस्ते लोकसाक्षिणे ॥५७॥
नमस्ते ध्यानगम्याय नमस्ते ध्यानहेतवे । नमस्ते ध्यानरूपाय नमस्ते ध्यानसाक्षिणे ॥५८॥
केशिहन्त्रे नमस्तुभ्यं मधुहन्त्रे परात्मने । नमो भूम्यादिरूपाय नमश्चैतन्यरूपिणे ॥५९॥
नमो ज्येष्ठाय शुद्धाय निर्गुणाय गुणात्मने । अरूपाय स्वरूपाय बहुरूपाय ते नमः ॥६०॥
नमो ब्रह्मण्यदेवाय गोब्राह्मणहिताय च । जगद्धिताय कृष्णाय गोविन्दाय नमो नमः ॥६१॥
नमो हिरण्यगर्भाय नमो ब्रह्मादिरूपिणे । नमः सूर्यादिरूपाय हव्यकव्यभुजे नमः ॥६२॥
सूत जी ! इस विषय में हमलोगों को अत्यन्त कौतूहल हो रहा है, आप कृपा कर इसको समझाइये । भगवान् के
गुणगान रूपी अमृत के पान करने-में, कौन ऐसा अभागा होगा जिसको आलस्य होगा ? ॥४७-४६॥
सूत जी बोले--मृकण्डु नाम से विख्यात एक महाभाग्यवान् मुनि थे । उस महातपस्वी ने शालग्राम
नामक महान् तीर्थ में घोर तप किया । सहस्रों युगों तक उस सत्यसंध, जितेन्द्रिय, क्षमाशील सब प्राणियों के
हित में लगे रहने वाले सबमें आत्मभावना रखने वाले उदार मुनि ने निराहार रहकर और विषय-वासनाओं से
निःस्पृह होकर महान् तप किया । उनकी तपस्या से भयभीत होकर इन्द्र आदि सब देवता परम प्रभु, निर्विकार
नारायण की शरण में गए । क्षीर सागर के उत्तर तट पर जाकर वे स्वर्गवासी देवता जगद्गुरु पद्मनाभ की
स्तुति करने लगे ॥५०-५४॥
देवगण बोले-नारायण ! अक्षर ! अनन्त ! शरणागतों का पालन करने वाले ! मृकण्डुमुनि की तपस्या
से भयभीत हम लोगों की रक्षा कीजिए । देवाधिदेवेश ! आपकी जय हो । शङ्ख-गदाधारी ! जय हो । लोक स्वरूप
की जय हो । ब्रह्माण्ड के आदि कारण की जय हो । देवदेवेश ! आपको नमस्कार है । लोक पावन ! नमस्कार है ।
लोकनाथ को नमस्कार हैं । लोकसाक्षी को नमस्कार है । ध्यान से प्राप्त करने योग्य को नमस्कार है । ध्यान के
हेतु को नमस्कार है । ध्यानरूप और ध्यान के साक्षी को नमस्कार है । केशी के हन्ता ! तुमको नमस्कार है । परात्मा
मधुसूदन को नमस्कार है । भू सृष्टि के आदि रूप को नमस्कार है । चैतन्य रूप को नमस्कार है ॥५५-५९॥ ज्येष्ठ,
शुद्ध, निर्गुण और सगुण ईश को नमस्कार है । अरूप, सरूप, और बहुरूप को नमस्कार है । विप्र वेद रक्षक देव
को, गो ब्राह्मणों के हित करने वाले, जगत् के कल्याणकर्त्ता कृष्ण गोविन्द को नमस्कार है, हिरण्यगर्भ, ब्रह्मा,
विष्णु और शिव रूप धारण करने वाले को नमस्कार है । सूर्य आदि रूप वाले, हव्य (देवाहुति) कव्य (पितृ