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सर्वकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 41, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 41

२२ नारदीयपुराणम्
दुर्लभाः पुरुषा लोके भगवद्भक्तिलालसाः । तेषां सङ्गो भवेद्यस्य तस्य शान्तिर्हि शाश्वती ॥३८॥
नारद उवाच
किंलक्षणा भागवतास्ते च किं कर्म्म कुर्व्वते । तेषां लोको भवेत्कीदृक्तत्सर्वं ब्रूहि तत्त्वतः ॥३६॥
त्वं हि भक्तो रमेशस्य देवदेवस्य चक्रिणः । एतन्निगदितुं शक्तस्त्वत्तो नास्त्यधिकोऽपरः ॥४०॥
सनक उवाच
शृणु ब्रह्मन्परं गुह्यं मार्कण्डेयस्य धीमतः । यमुवाच जगन्नाथो योगनिद्राविमोहितः ॥४१॥
योऽसौ विष्णुः परं ज्योतिर्देवदेवः सनातनः । जगद्रूपी जगत्कर्त्ता शिवब्रह्म स्वरूपवान् ॥४२॥
युगान्ते रौद्ररूपेण ब्रह्माण्डग्रासबृंहितः । जगत्येकार्णवीभूते नष्टे स्थावरजङ्गमे ॥४३॥
भगवान्नेव शेषात्मा शेते वटदले हरिः । असंख्यताब्जजन्माद्यैराभूषिततनूरुहः ॥४४॥
पादाङ्गुष्ठाग्रनिर्गतगङ्गाशीताम्बुपावनः । सूक्ष्मात्सूक्ष्मतरो देवो ब्रह्माण्डग्रासबृंहितः ॥४५॥
वटच्छदे शयानोऽसौसर्वशक्तिसमन्वितः । तस्मिन्स्थाने महाभागो नारायणपरायणः ।
मार्कण्डेयः स्थितस्तस्य लीलाः पश्यन्महेशितुः ॥४६॥
ऋषय ऊचुः
तस्मिन्काले महाघोरे नष्टे स्थावरजङ्गमे । हरिरेकः स्थित इति श्रुते पूर्वं हि शुश्रुम ॥४७॥
जगत्येकार्णवीभूते नष्टे स्थावरजंगमे । सर्वग्रस्तेन हरिणा किमर्थं सोऽवशेषितः ॥४८॥
लालसा रखने वाले पुरुष दुर्लभ हैं, ऐसे भगवद्भक्तों की सङ्गति जिसको प्राप्त हो जाती है, उसको शाश्वत शान्ति
मिल जाती है ॥३८॥
नारद बोले—भगवद् भक्तों के लक्षण क्या हैं ? वे कैसे कर्म करते हैं ? उन लोगों को कौन से
लोक प्राप्त होते हैं ? इन बातों को आप यथार्थ रूप से कहिए । आप महाप्रभु, देव-देव, चक्रधर विष्णु के भक्त
हैं। आपसे बढ़ कर कोई ऐसा व्यक्ति नहीं, जो इन विषयों पर साधिकार कुछ कह सके ॥३६-४०॥
सनत्कुमार बोले—ब्रह्मन् ! (इस विषय में) योगनिद्रा का त्याग कर विष्णु ने मार्कण्डेय से जो गुप्त बात
कही थी, वह सुनिए। जो विष्णु पर, ज्योतिः स्वरूप, सनातन, देव-देव, जगत्स्वरूप, जगत् के कर्त्ता, शिव और
ब्रह्मा रूप धारण करने वाले हैं, वे ही युगान्त में रुद्ररूप धारण कर सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को ग्रस लेते हैं। जब सारा
ब्रह्माण्ड एकार्णव रूप में हो जाता है और स्थावर, जंगम सब नष्ट हो जाते हैं तब केवल भगवान् हरि ही शेष रह
जाते हैं और अक्षयवट के पत्ते पर सोते हैं। उस समय उनके प्रत्येक रोम अगणित ब्रह्मा आदि से सुशोभित रहते हैं।
(अपने) पैर के अंगूठे के अगले भाग से निकली गंगा के शीतल जल को पवित्र करने वाले तथा सूक्ष्म से सूक्ष्म रूप
धारण करते हुए भी वे ब्रह्माण्ड को अपने में छिपाकर महान् से महान् बने रहते हैं। इस प्रकार सर्वशक्ति-सम्पन्न
हरि उस वट पत्र पर सोये हुए थे। उसी स्थान पर नारायणभक्तमहाभाग्यशाली मार्कण्डेय उस महाप्रभु
की लीला को देखकर आश्चर्य-चकित-से स्थित थे ॥४१-४६॥
ऋषिगण बोले—उस महाभयंकर काल में स्थावर-जंगम आदि नष्ट हो गए थे, केवल भगवान् हरि
ही बचे थे, ऐसा हम लोगों ने अभी सुना है। पुनः उस प्रलयकाल में जबकि सारा जगत् एकार्णवाकार था, स्थावर,
जंगम आदि सब पदार्थ नष्ट हो गए थे तब सर्वसंहारी विष्णु ने मार्कण्डेय मुनि को कैसे छोड़ दिया ?