बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थोऽध्यायः २१
वेदो वा हरिभक्तिर्वा भक्तिर्वापि महेश्वरे । आचारात्पतितं मूढं न पुनाति द्विजोत्तम ॥२५॥
पुण्यक्षेत्राभिगमनं पुण्यतीर्थनिषेवणम् । यज्ञो वा विविधो ब्रह्मंस्त्यक्ताचारं न रक्षति ॥२६॥
आचारात्प्राप्यते स्वर्ग आचारात्प्राप्यते सुखम् । आचारात्प्राप्यते मोक्ष आचारात्किं न लभ्यते ॥२७॥
आचाराणां तु सर्वेषां योगानां चैव सत्तम । हरिभक्तेरपि तथा निदानं भक्तिरिष्यते ॥२८॥
भक्त्यैव पूज्यते विष्णुर्वाञ्छितार्थफलप्रदः । तस्मात्समस्तलोकानां भक्तिर्मतेति गीयते ॥२९॥
जीवन्ति जन्तवः सर्वे यथा मातरमाश्रिताः । तथा भक्तिं समाश्रित्य सर्वे जीवन्ति धार्मिकाः ॥३०॥
स्वाश्रमाचारयुक्तस्य हरिभक्तिर्यदा भवेत् । न तस्य त्रिषुलोकेषु सदृशोऽस्त्यजनन्दन ॥३१॥
भक्त्या सिध्यन्ति कर्माणि कर्मभिस्तुष्यते हरिः । तस्मिंस्तुष्टे भवेज्ज्ञानं ज्ञानान्मोक्षमवाप्यते ॥३२॥
भक्तिस्तु भगवद्भक्तसङ्गेन खलु जायते । तत्सङ्गं प्राप्यते पुम्भिः सुकृतैः पूर्वसञ्चितैः ॥३३॥
वर्णाश्रमाचाररता भगवद्भक्तिलालसाः । कामादिदोषनिर्मुक्तास्ते सन्तो लोकशिक्षकाः ॥३४॥
सत्सङ्गः परमो ब्रह्मन्न लभ्येताकृतात्मनाम् । यदि लभ्येत विज्ञेयं पुण्यं जन्मान्तरार्जितम् ॥३५॥
पूर्वार्जितानि पापानि नाशमायान्ति यस्य वै । सत्सङ्गतिर्भवेत्तस्य नान्यथा घटते हि सा ॥३६॥
रविर्हि रश्मिजालेन दिवा हन्ति बहिस्तमः । सन्तः सूक्तिमरीच्योघैश्चान्तर्ध्वान्तं हि सर्वदा ॥३७॥
निष्ठा रखता हो परन्तु यदि वह अपने आचार से भ्रष्ट है तो भी उसको पतित ही कहा जाता है ॥२१-२४॥ द्विजवर्य !
साक्षात् वेद, हरिभक्ति या शिवभक्ति कोई भी अभागे आचार-भ्रष्ट को पवित्र नहीं कर सकता । ब्रह्मन् ! पवित्र
क्षेत्रों में जाना, पुण्य तीर्थों की सेवा अथवा विविध यज्ञ ये कभी भी आचार-पतित की रक्षा करने में समर्थ नहीं हो
सकते ॥२५-२६॥ आचार से स्वर्ग प्राप्त होता है, आचार से ही सुख मिलता है और आचार से ही मोक्ष भी प्राप्त
होता है । इस प्रकार कौन ऐसी वस्तु है जो आचार से नहीं मिल सकती है ? सज्जनों में श्रेष्ठ ! सब प्रकार के
आचारों, योगों और हरि भक्ति का भी एकमात्र आदि कारण भक्ति (श्रद्धा) ही है। सब मनः कामनाओं को
पूर्ण करने वाले विष्णु भक्ति के द्वारा ही पूजे जाते हैं या प्रसन्न होते हैं। इसीलिए भक्ति सब लोकों की माता
कही जाती है। जिस प्रकार सभी जन्तु या प्राणी माता के सहारे जीते हैं उसी प्रकार सभी धार्मिक भक्ति के सहारे
जीवित रहते हैं ॥२७-३०॥ ब्रह्मनन्दन ! जब अपने आश्रम के अनुसार आचरण करने वाले व्यक्ति हरिभक्तिपरायण
हो जाते हैं तो उनके समान भाग्यशाली और पुण्यवान् व्यक्ति तीनों लोक में दूसरा नहीं रहता । भक्ति के द्वारा ही
सब कर्म सफल होते हैं और कर्मों से ही भगवान् प्रसन्न होते हैं, भगवान् की प्रसन्नता (कृपा) से ही ज्ञान की प्राप्ति
होती है और ज्ञान से ही मुक्ति प्राप्त होती है ॥३१-३२॥
भगवद्भक्तों की संगति से ही भक्ति उत्पन्न होती है और सत्सङ्गति पूर्व सञ्चित शुभकर्मों से ही मनुष्य
को प्राप्त होती है । ऐसे सन्त व्यक्ति ही लोक-शिक्षक या लोक-गुरु हैं जो कि वर्णाश्रम धर्म के पालन में लगे रहते,
जिनकी सत्सङ्गति में रुचि होती और जो कामक्रोधादि दोषों से मुक्त रहते हैं। ब्रह्मन् ! सत्सङ्ग के समान उत्तम
पदार्थ अजितेन्द्रिय व्यक्ति को कभी भी प्राप्त नहीं होता। यदि कोई ऐसा व्यक्ति पा जाय तो उसको उसके पूर्व
जन्म के सञ्चित कर्मों का फल समझना चाहिए । जिसके पूर्व जन्म के किये पाप नष्ट हो जाते हैं उसीको
सत्सङ्गति का सौभाग्य मिलता है; अन्यथा पापियों को सत्सङ्गति कथमपि प्राप्त नहीं हो सकती। सूर्य अपनी किरणों
से दिन में जगद्व्यापी अन्धकार को दूर कर देता है और सज्जन मनुष्य अपने सदुपदेश रूपी किरणों के समूह से
अज्ञानियों के अन्तःकरण के अज्ञानान्धकार को दूर करते हैं ॥३३-३७॥ इस लोक में भगवद्भक्ति में श्रद्धा एवं