बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 296, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ेंत्रिचत्वारिंशोऽध्यायः २७७
हृष्यति क्रुद्ध्यते कोऽत्र शोचत्युद्विजते च कः । इच्छति ध्यायति द्वेष्टि वाक्यं वाचयते च कः ॥३७॥
भृगुरुवाच
तं पंचसाधारणमत्र किविच्छरीरमेको वहतेऽन्तरात्मा ।
स वेत्ति गंधांश्च रसाञ्छु तीश्च स्पर्शं च रूपं च गुणांश्च येऽन्ये ॥३८॥
पंचात्मके पंचगुणप्रदर्शी स सर्वगात्रानुगतोऽन्तरात्मा ।
सदेति दुःखानि सुखानि चात्र तद्विप्रयोगात्तु न वेत्ति देहम् ॥३६॥
यदान रूपं न स्पर्शो नोष्मभावश्च पावके । तदा शांते शरीराग्नौ देहत्यागेन नश्यति ॥४०॥
आपोमयमिदं सर्वमापोमूर्तिः शरीरिणाम् । तत्रात्मा मानसो ब्रह्मा सर्वभूतेषु लोककृत् ॥४१॥
आत्मानं तं विजानीहि सर्वलोकहितात्मकम् । तस्मिन्यः संश्रितो देहे ह्यन्बिंदुरिव पुष्करे ॥४२॥
क्षेत्रज्ञं तं विजानीहि नित्यं लोकहितात्मकम् । तमोरजश्च सत्त्वं च विद्धि जीवगुणानिमान् ॥४३॥
अचेतनं जीवगुणं वदंति स चेष्टते चेष्टयते च सर्वम् ।
अतः परं क्षेत्रविदो वदंति प्रावर्तयद्यो भुवनानि सप्त ॥४४॥
न जीवनाशोऽस्ति हि देहभेदे मिथ्यैतदाहुर्मुन इत्यबुद्धाः ।
जीवस्तु देहांतरितः प्रयाति दशार्द्धतस्तस्य शरीरभेदः ॥४५॥
एवं भूतेषु सर्वेषु गूढश्चरति सर्वदा । दृश्यते त्वग्र्ययाबुद्ध्या सूक्ष्मया तत्त्वदर्शिभिः ॥४६॥
तं पूर्वापररात्रेषु युंजानः सततं बुधः । लब्धाहारो विशुद्धात्मा पश्यत्यात्मानमात्मनि ॥४७॥
उसको स्पर्श का ही ज्ञान रहता है। इस शरीर में कौन क्रोध करता है ? हर्ष, शोक और उद्वेग का अनुभव कौन
करता है ? इच्छा, ध्यान और द्वेष कौन करता है ? वाक्योच्चारण किसका कार्य है ? ।।३४-३७।।
भृगु ने कहा--इस पांचभौतिक शरीर में एक अन्तरात्मा है जो इस शरीर का वहन करता है। वह
गंध, रस को जानता है। सुनता वही है। स्पर्श, रूप और अन्य गुणों का अनुभव करने वाला वही है ।।३८।। सब
अंगों में व्याप्त रहने वाला वह अन्तरात्मा इस पंचात्मक शरीर में पांच गुणों (रूप, रस, गन्ध, स्पर्श, शब्द) का
दर्शन करता है। उसी के कारण शरीर सदा सुख-दुःख का अनुभव करता है और जिसके वियोग के कारण
शरीर की किसी वस्तु का अनुभव नहीं होता ।।३६।। जब रूप, स्पर्श नहीं रहता, अग्नि में उष्ण स्पर्श नहीं रह
जाता, उस समय देहाग्नि के शान्त हो जाने पर आत्मा शरीर को छोड़ देता है तथा शरीर नष्ट हो जाता है
।।४०।। सब कुछ जलमय है। शरीर भी जलमय है। सब प्राणियों के इस जलमय शरीर में लोकस्रष्टा मानस
ब्रह्मा निवास करता है ।।४१।। उसको सब लोकों का हित करने वाला आत्मा समझो। वह इस शरीर में कमल-
पत्र पर पड़े जल बिन्दु के समान निर्लिप्त रहता है ।।४२।। नित्य लोकहित करने वाले उसको क्षेत्रज्ञ समझो।
सत्त्व, रज, तम ये जीव के गुण हैं, जीव का गुण अचेतन है। वह आत्मा जब इच्छा करता है तभी सारे पदार्थों
में कम्पन होता है। इसके अनन्तर जो सातों लोकों का अधिष्ठाता है उसके विषय में केवल क्षेत्रज्ञ ही जानता
है ।।४३-४४।। देह-नाश होने पर जीव का नाश नहीं होता, इसको मिथ्या कहने वाले अज्ञानी हैं। जीव दूसरे शरीर
में जाता है परन्तु उस जीव और इस पांचभौतिक शरीर में सर्वथा अन्तर है ।।४५।। इस प्रकार जीव सब
प्राणियों में गुप्त रूप से गमनागमन करता है जिसको केवल तत्त्वदर्शी अपनी सूक्ष्म कुशल बुद्धि से ही देख सकते
हैं ।।४६।। उसको पूर्व अपर रात्रि में अर्थात् सर्वदा योग युक्त होकर अनायास प्राप्त आहार पर ही संतोष कर
जीवन यापन करने वाले विशुद्धात्मा बुध जन ही अपने अन्तःकरण में देखते हैं ।।४७।। अपने चित्त की प्रसन्नता से