बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 295, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ें२७६ नारदीयपुराणम्
गतिर्यस्य प्रमाणं वा संस्थानं वा न विद्यते । समिधामुपयोगान्ते यथाग्निर्नोपलभ्यते ॥२३॥
आकाशानुगतत्वाद्वि दुर्ग्राह्यो हि निराश्रयः । तथा शरीरसंयागे जीवो ह्याकाशवत्स्थितः ॥२४॥
न नश्यते सुसूक्ष्मत्वाद्वयथा ज्योतिर्न संशयः । प्राणान्धारयते ह्यग्निः स जीव उपधार्यताम् ॥२५॥
वायुसंधारणो ह्यग्निर्नश्यत्युच्छ्वासनिग्रहात् । तस्मिन्नष्टे शरीराग्नौ ततो देहमचेतनम् ॥२६॥
पतितं याति भूमित्वमयनं तस्य हि क्षिति । जंगमानां हि सर्वेषां स्थावराणां तथैव च ॥२७॥
आकाशं पवनोऽन्वेति ज्योतिस्तमनुगच्छति । तेषां त्रयाणामेकत्वाद्वयं भूमौ प्रतिष्ठितम् ॥२८॥
यत्र खं तत्र पवनस्तत्राग्निर्यत मारुतः । अमूर्तयस्ते विज्ञेया मूर्तिमन्तः शरीरिणः ॥२९॥
भरद्वाज उवाच
यद्यग्निमारुतौ भूमिः खमापश्च शरीरिषु । जीवः किंलक्षणस्त्वेत्येतदाचक्ष्व मेऽनघ ॥३०॥
पञ्चात्मके पञ्चरतौ पञ्चविज्ञानसंज्ञके । शरीरे प्राणिनां जीवं वेत्तुमिच्छामि यादृशम् ॥३१॥
मांसशोणितसंघाते मेदःस्नाव्यस्थिसंचये । भिद्यमाने शरीरे तु जीवो नैवोपलभ्यते ॥३२॥
यद्यजीवशरीरं तु पञ्चभूतसमन्वितम् । शरीरे मानसे दुःखे कस्तां वेदयते रुजम् ॥३३॥
शृणोति कथितं जीवः कर्णाभ्यां न शृणोति तत् । महर्षे मनसि व्यग्रे तस्माज्जीवो निरर्थकः ॥३४॥
सर्वे पश्यंति यद्दृश्यं मनोयुक्तेन चक्षुषा । मनसि व्याकुले चक्षुः पश्यन्नपि न पश्यति ॥३५॥
न पश्यति न चाघ्राति न शृणोति न भाषते । न च स्पर्शमसौ वेत्ति निद्रावशगतः पुनः ॥३६॥
हुआ ही समझते हैं; क्योंकि इन्धन के अभाव में उसकी गति, स्थान या प्रमाण का पता नहीं चलता है। जिस
प्रकार इन्धन के उपयोग के बिना या उसकी समाप्ति के बाद अग्नि देखा नहीं जाता क्योंकि निराधार वस्तु
आकाशानुगत होने के कारण ग्रहण करने योग्य नहीं होती, उसी प्रकार जीव शरीर त्याग के अनन्तर आकाश की
भांति स्थित रहता है ॥२२-२४॥ अतएव वह अत्यन्त सूक्ष्म होने के कारण उसी तरह नष्ट नहीं होता जैसे अग्नि,
यह निःसन्देह है। अग्नि प्राणों को धारण करता है अतएव अग्नि को ही जीव समझ लो ॥२५॥ वायु के आधार
पर ही टिकने वाला अग्नि श्वास के रुक जाने पर दिखाई नहीं देता। शरीराग्नि के नष्ट हो जाने पर देह चेतना
शून्य हो जाती है ॥२६॥ शरीर नष्ट होकर भूमि में मिल जाता है क्योंकि उसका आवास स्थान भूमि ही है।
सभी जंगम और स्थावरों का भी आवास स्थान वही है ॥२७॥ वायु आकाश का अनुसरण करता है और अग्नि
पवन का। उन तीनों में एकता होने के कारण वे भूमि में प्रतिष्ठित हैं ॥२८॥ जहाँ आकाश है वहीं पवन रहता
है और जहाँ पवन है वहीं अग्नि की स्थिति होती है। वे अमूर्त हैं, परन्तु शरीरधारी प्राणी मूर्तिमान् हैं ॥२९॥
भरद्वाज बोले-यदि शरीर-धारियों में अग्नि, वायु, भूमि, आकाश और जल यही पाँच तत्त्व हैं, तो
जीव का क्या स्वरूप है? अनघ, इस रहस्य को आप मुझसे कहिए ॥३०॥ पंचात्मक, पंचरति और पंच विज्ञाना-
त्मक प्राणियों के शरीर में जीव का जो रूप है उसको जानना चाहता हूँ ॥३१॥ इस मांस, शोणित, मेद, स्नायु,
और अस्थि-पुंज शरीर के भेदन करने पर जीव का तो कहीं पता नहीं चलता ॥३२॥ यदि यह पाँचभौतिक
शरीर जीव हीन है तो शारीरिक और मानसिक दुःख के समय पीड़ा का अनुभव कौन करता है ॥३३॥ महर्षे !
कही हुई बातों को जीव सुनता है, किन्तु मन के व्याकुल रहने पर वह कानों से भी नहीं सुनता, इसलिए जीव निर-
र्थक है। मन से युक्त नेत्रों से सब दृश्य पदार्थ को देखते हैं परन्तु मन के व्याकुल रहने पर आँखें देखती हुई भी नहीं
देखतीं। एक और बात है कि निद्रा दशा में जीव न तो देखता है, न सुनता है, न सूंघता है, न बोलता है और न तो