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सर्वकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 297, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 297

२७८ नारदीयपुराणम्
चित्तस्य हि प्रसादेन हित्वा कर्म शुभाशुभम् । प्रसन्नात्मात्मनि स्थित्वा सुखमानंत्यमश्नुते ॥४८॥
मानसोऽग्निः शरीरेषु जीव इत्यभिधीयते । सृष्टिः प्रजापतेरेषा भूताध्यात्मविनिश्चये ॥४९॥
असृजद्ब्राह्मणान्नेव पूर्वं ब्रह्मा प्रजापतिः । आत्मतेजोऽभिनिर्वृत्तान्भास्कराग्निसमप्रभान् ॥५०॥
ततः सत्यं च धर्मं च तथा ब्रह्म च शाश्वतम् । आचारं चैव शौचं च स्वर्गाय विदधे प्रभुः ॥५१॥
देवदानवगंधर्वा दैत्यासुरमहोरगाः । यक्षराक्षसनागाश्च पिशाचा मनुजास्तथा ॥५२॥
ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्राणामसितस्तथा ।
भरद्वाज उवाच
॥५३॥
चातुर्वर्ण्यस्य वर्णेन यदि वर्णो विभिद्यते
स्वेदमूत्रपुरीषाणि श्लेष्मा पित्तं सशोणितम् । त्वन्तः क्षरति सर्वेषां कस्माद्वर्णो विभज्यते ॥५४॥
जंगमानामसंख्येयाः स्थावराणां च जातयः । तेषां विविधवर्णानां कुतो वर्णविनिश्चयः ॥५५॥
भृगुरुवाच
न विशेषोऽस्ति वर्णानां सर्वं ब्रह्ममयं जगत् । ब्रह्मणा पूर्वसृष्टं हि कर्मणा वर्णतां गतम् ॥५६॥
कामभोगाः प्रियास्तीक्ष्णाः क्रोधनाप्रियसाहसाः । त्यक्तस्वधर्मरक्तांगास्ते द्विजाः क्षत्रतां गताः ॥५७॥
गोभ्यो वृत्तिं समास्थाय पीताः कृष्युपजीविनः । स्वधर्मान्नानुतिष्ठं ते ते द्विजा वैश्यतां गताः ॥५८॥
हिंसानृतपरा लुब्धाः सर्वकर्मोपजीविनः । कृष्णाः शौचपरिभ्रष्टास्ते द्विजाः शूद्रतां गताः ॥५९॥
इत्येतैः कर्मभिर्व्याप्ता द्विजा वर्णान्तरं गताः । ब्राह्मणा धर्मतन्त्रस्थास्तपस्तेषां न नश्यति ॥६०॥
जीवन के शुभ-अशुभ कर्मों को छोड़कर प्रसन्नात्मा अपने में ही ध्यानस्थ होकर अनन्त सुख का अनुभव करता
है ॥४८॥ शरीर में मानस अग्नि को ही जीव कहते हैं, प्रजापति ने भूत (दृश्यमान पदार्थ) और अध्यात्म (परोक्ष-
तत्त्व) के निश्चय के लिये इसकी सृष्टि की है ॥४९॥ पहले प्रजापति ब्रह्मा ने अपने तेज से प्रदीप्त एवं सूर्य, अग्नि
के समान तेजस्वी ब्राह्मणों को उत्पन्न किया ॥५०॥ तदनन्तर प्रभु ने सत्य, धर्म, शाश्वत ब्रह्म (वेद), आचार
और शौच को स्वर्ग प्राप्ति के लिए बनाया ॥५१॥ देव, दानव, गन्धर्व, दैत्य, असुर, महासर्प, यक्ष, राक्षस, नाग,
पिशाच, मनुष्य और उनमें ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र और चाण्डालों को बनाया ॥५२½॥
भरद्वाज बोले--चारों वर्णों का विभाग यदि वर्ण-भेद के कारण होता है तो यह उचित नहीं; क्योंकि
सब वर्णों के लोग एक ही प्रकार से पसीना छोड़ते, मूत्र, मल, कफ आदि का त्याग करते और पित्त, शोणित
में भी समानता है तब क्यों वर्ण-भेद की सृष्टि की गई। असंख्य स्थावर और जंगमों की अनगिनत जातियाँ हैं।
उनके विविध वर्णों को देखते हुए वर्ण का निश्चय तो असम्भव जान पड़ता है ॥५३-५५॥
भृगु बोले--वर्णों में कोई विशेषता नहीं, सारा संसार ब्रह्ममय है। ब्रह्मा के पूर्व सृष्ट अपने कर्मों की
भिन्नता से भिन्नवर्ण का हो गया। जो द्विज इच्छानुसार भोग करने वाले, उग्र प्रकृति के क्रोधी, साहसी और
अपने कर्मों को छोड़ने वाले हुए वे रक्तवर्ण के मनुष्य क्षत्रियत्व को प्राप्त हुए ॥५६-५७॥ जो द्विज अपने द्विजत्व
को छोड़कर गौओं का पालन कर जीविका चलाते थे, कृषि-व्यापार जिनको प्रिय थे और जिनकी स्वधर्मानुष्ठान
में रुचि नहीं थी वे वैश्यत्व को प्राप्त हुए ॥५८॥ जो द्विज हिंसक, असत्यवादी, वधिक, प्रत्येक पाप कर्म से अपनी
जीविका चलाने वाले थे, वे शौच और आचार भ्रष्ट, कृष्णवर्ण के द्विज शूद्रत्व को प्राप्त हुए ॥५९॥ इस प्रकार
उपर्युक्त कर्मों के कारण ही द्विज भिन्न वर्णों को प्राप्त हुए। ब्राह्मण धर्मप्रिय और तपस्वी होते हैं। उनकी तपस्या