बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 294, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्विचत्वारिंशोऽध्यायः २७५
गौश्च प्रतिग्रहीता च दाता चैव सखं यदा । इहैव विलयं यांति कुतस्तेषां समागमः ॥१२॥
विहगैरुपभुक्तस्य शैलाग्रात्पतितस्य च । अग्निना चोपयुक्तस्य कुतः संजीवनं पुनः ॥१३॥
छिन्नस्य यदि वृक्षस्य न मूलं प्रतिरोहति । जीवन्त्यस्य प्रवर्तेत मृतः क्व पुनरेष्यति ॥१४॥
जीवमात्रं पुरा सृष्टं यदेतत्परिवर्तते । मृता मृताः प्रणश्यंति बीजाद्बीजं प्रणश्यति ॥१५॥
इति मे संशयो ब्रह्मन्हृदये परिधावति । ते निवर्तय सर्वज्ञ यतस्त्वामाश्रितो ह्यहम् ॥१६॥
सनंदन उवाच
एवं पृष्टस्तदानेन स भृगुर्ब्रह्मणः सुतः । पुनराह मुनिश्रेष्ठ तत्संदेहनिवृत्तये ॥१७॥
भृगुरुवाच
न प्राणाः सन्ति जीवस्य दत्तस्य च कृतस्य च । याति देहान्तरं प्राणी शरीरं तु विशीर्यते ॥१८॥
न शरीराश्रितो जीवस्तस्मिन्नष्टे प्रणश्यति । समिधामग्निदग्धानां यथाग्निर्दृश्यते तथा ॥१९॥
भरद्वाज उवाच
अग्नेर्यथा तस्य नाशात्तद्विनाशो न विद्यते । इन्धनस्योपयोगान्ते स चाग्निर्नोपलभ्यते ॥२०॥
नश्यतीत्येव जानामि शांतमग्निमनिन्धनम् । गतिर्यस्य प्रमाणं वा संस्थानं वा न विद्यते ॥२१॥
भृगुरुवाच
समिधामुपयोगान्ते स चाग्निर्नोपलभ्यते । नश्यतीत्येव जानामि शांतमग्निमनिन्धनम् ॥२२॥
मर जाते हैं तब उनका फिर संयोग कैसे होता है ? ॥१२॥ चिड़ियों से खाये जाने पर, पहाड़ की चोटी से गिर
कर मरने पर और अग्नि में जल जाने पर जीव को पुनः जीवन कैसे प्राप्त होता है ? ॥१३॥ यदि कटे हुए वृक्ष
से जड़ें नहीं निकलतीं या उसकी जड़ पुनः नहीं पनपती है तो प्राणी मरने पर पुनः कैसे जीवन धारण करेगा
॥१४॥ पूर्व काल में जिनकी सृष्टि की गई ऐसे जीव मात्र मर-मर कर नष्ट होते हैं और बीज से बीज उत्पन्न
होकर नष्ट होता है। इस प्रकार के सन्देह मेरे हृदय में उठ रहे हैं सर्वज्ञ ! उनको आप दूर कीजिए क्योंकि में
इसीलिए आपकी शरण में आया हूँ ॥१५-१६॥
सनन्दन ने कहा- मुनिश्रेष्ठ ! इस प्रकार भरद्वाज के पूछने पर ब्रह्मपुत्र भृगुजी ने उनकी शंकाओं को
दूर करने के लिए कहा ॥१७॥—
भृगु बोले- ईश्वर निर्मित या दत्त जीव के प्राण नहीं होते जीव मृत्यु के पश्चात् दूसरे शरीर को पा
जाता है केवल शरीर नष्ट हो जाता है ॥१८॥ जिस प्रकार काष्ठ के अग्नि में जल जाने पर भी अग्नि उस
(दग्ध काष्ठ) में दिखाई पड़ता है उसी तरह शरीराश्रित जीव शरीर के नष्ट हो जाने पर भी नष्ट नहीं
होता ॥१९॥
भरद्वाज बोले- जिस प्रकार काष्ठ के नष्ट हो जाने पर अग्नि नष्ट नहीं होता परन्तु इन्धन के
अभाव में अग्नि नहीं पाया जाता, काष्ठ के बिना शान्त अग्नि को नष्ट ही समझते हैं क्योंकि (इन्धन के अभाव में)
उस (अग्नि) की गति, प्रमाण एवं अवस्थान का पता नहीं चलता है ॥२०-२१॥
भृगु बोले-समिधा न रहने पर अग्नि नहीं जलता, न तो उसकी स्थिति ही संभव है और उसको नष्ट