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सर्वकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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४५२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

शिल्पी ने चार परमोच्च मन्दिर बनाये थे। एक-एक के घर का विस्तार पाँच योजन का था ।८३। पाँच योजनों का उनका आयाम था और समावरण से उनकी स्थिति थी। इसी रीति से अन्य विदिशाओं में सभी जगह प्रियक के द्रुम वहाँ पर थे। यह श्यामादेवी की परम प्रिय निवास की नगरी थी ।८४।

सेनार्थं नगरी त्वन्या महापद्माटवीस्थले ।
यदत्रं व गृहं तस्या बहुयोजनदूरतः ॥८५
श्रीदेव्या नित्यसेवा तु मन्त्रिण्या न घटिष्यते ।
अतश्चिन्तामणिगृहोपांतेऽपि भवनं कृतम् ।
तस्याः श्रीमन्त्रनाथायाः सुरत्वष्ट्रा मयेन च ॥८६
श्रीपुरे मन्त्रिणीदेव्या मन्दिरस्य गुणान्बहून् ।
वर्णयिष्यति को नाम यो द्विजिव्हासहस्रवान् ॥८७
कादम्बरीमदाताम्रनयनाः कलवीणया ।
गायन्त्यस्तत्र खेलंति मान्यमातंगकन्यकाः ॥८८

अगस्त्य उवाच—

मातङ्गो नाम कः प्रोक्तस्तस्य कन्याः कथं च ताः ।
सेवंते मन्त्रिणीनाथां सदा मधुमदालसाः ॥८९

हयग्रीव उवाच—

मतंगो नाम तपसामेकराशिस्तपोधनः ।
महाप्रभावसंपन्नो जगत्सर्जनलंपटः ॥६०
तपः शक्त्याऽत्तधिया च सर्वत्राज्ञाप्रवर्त्तकः ।
तस्य पुत्रस्तु मातंगो मुद्रिणीं मन्त्रिनायिकाम् ॥६१

सेना के निवास करने की अन्य नगरी भी थी जो महा पद्माटवी के स्थल में थी और वहाँ पर ही इसका गृह था जो बहुत योजनों तक दूर था ।८५। श्री देवी की नित्य सेवा मन्त्रिणी के द्वारा नहीं होगी। इसीलिए चिन्तामणि गृह के ही समीप में भी उसका भवन बनाया था। उस मन्त्रिणीनाथा का विश्वकर्मा और मय ने ही भवन का निर्माण कराया था ।८६। श्री पुर