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सर्वकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished893 पृष्ठ

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पृष्ठ 712

३०२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

समस्तमपि तत्सैन्यं बद्धाबद्धा व्यमूर्च्छयन् ॥१०२
अथ सैनिकबन्धेन क्रुद्धः स च कुरंडकः ।
शरेणैकेन चिच्छेद तस्या मणिधनुर्गुणम् ॥१०३
छिन्नमौर्वि धनुस्त्यक्त्वा भृशं क्रुद्धा हयासना ।
अंकुशं पातयामास तस्य वक्षसि दुर्मतेः ॥१०४
तेनांकुशेन ज्वलता पीतजीवितशोणितः ।
कुरुण्डो न्यपतद्भूमौ वज्ररुग्ण इव द्रुमः ॥१०५

उस अश्वारूढ़ा का जो अश्व था उसने भी अपने प्रचंड खुरों के पुटों के द्वारा अत्यन्त वेग से शत्रु की सेना का खंडन करते हुए दानवों का बहुत अधिक मर्दन किया था ।६६। उस अश्व की हिनहिनाहट की ध्वनि बहुत दूर तक उत्पात से समुद्र की ध्वनि के ही तुल्य थी । उस घोष ने भी वैरी के द्वारा लाये हुए सैन्यों को जो बहुत अधिक थे सबको मूच्छित कर दिया था ।१००। उस हयासना ने उस दैत्यों के चक्र में जो भी इधर-उधर प्रचलित थे उन पर अपना पाशायुध जो जाज्वल्यमान आकृति वाला तथा परम दिव्यथा छोड़ दियाथा ।१०१। उस पाश से करोड़ों अन्य भुजङ्गोंके समान भीषण पाश निकले थे । जिन्होंने उस दैत्य की सम्पूर्ण सेना को बाँध-बाँध कर विशेष रूप से मूच्छित कर दिया था ।१०२। इसके अनन्तर सैनिकों के बन्धन से वह कुरण्ड बहुत ही अधिक क्रुद्ध हो गया था और उसने अपने एक वाण से उस अश्वारूढ़ा के मणियों के धनुष की मोर्वी को काट डाला था ।१०३। जिस धनुष की मोर्वी कट गयी थी उस धनुष को उसने त्याग दिया था और वह हयानना अत्यन्त ही क्रुद्ध हो गयी थी । फिर उसने उस दुष्ट मति वाले के वक्षःस्थल में अपना अंकुश डाला था ।१०४। जलते हुए उस अंकुश से जिसके जीवित रहते हुए ही रुधिर पी लिया गया था वह कुरण्ड वज्र से छिन्न द्रुम के ही समान भूमि पर गिर गया था ।१०५।

तदंकुशविनिष्ठ्यूताः पूतनाः काश्चिदुद्भटाः ।
तत्सैन्यं पाशनिष्यंदं भक्षयित्वा क्षयं गताः ॥१०६
इत्थं कुरुण्डे निहते विंशत्यक्षौहिणीपतौ ।
हतावशिष्टास्ते दैत्याः प्रपलायंत वै द्रुतम् ॥१०७