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सर्वकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished893 पृष्ठ

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पृष्ठ 711

दुर्मद कुरंड वध वर्णन ] [ ३०१

अवाकिरच्छरासारैः कुरण्ड तुरगानना ॥६६
तुरगारूढयोत्क्षिप्ताः समाक्रामन्दिगंतरान् ।
दिशो दश व्यानशिरे रुक्मपुङ्खाः शिलीमुखाः ॥६७
दुर्मदस्याग्रजः क्रुद्धः कुरण्डश्चण्डविक्रमः ।
विशिखैः शार्ङ्गनिष्ठ्यूतै रश्वारूढामवाकिरत् ॥६८

और नाम ले लेकर प्रोत्साहन देने में—कर पादाग्र योनियों से—
चतुर और अश्वों के हृदयों के ज्ञान रखने वाली उस युद्ध में विद्यमान थीं
।६२। अश्व पर स्थित अम्बिका की सैन्य शक्तियों के साथ दानव करण्ड के
द्वारा प्रोत्साहित दुर्मद दानव युद्ध कर रहे थे ।६३। इस प्रकार से शक्तियों
का और सुरद्विषों का युद्ध प्रवृत्त होने पर अपराजित नाम वाले तथा अत्य-
धिक वेग य युक्त अश्व पर समारूढ़ होकर उस दुष्ट आचार वाले कुरण्ड के
ऊपर अश्वारूढ़ा ने आक्रमण किया था ।६४। उसकी चोटी हिलने से परम
सुभगा थी तथा शरत्काल के चन्द्रमा को कला के समान ही अत्यन्त उज्ज्वल
थी । सन्ध्या के समय में अनुरक्त चन्द्र के मंडल के समान सुन्दर मुख वाली
थी ।६५। वह समर में भी स्मित से समन्वित थी तथा उसने मणियों से
विनिर्मित धनुष को ग्रहण कर रक्खा था । उस तुरगानना ने उस कुरण्ड के
ऊपर बाणों की धाराओं से उसे अवकीर्ण कर दिया था ।६६। तुरगारूढा के
द्वारा प्रक्षिप्त बाणों ने दिशाओं के अन्तरों को भी समाक्रान्त कर दिया था ।
जिनमें सुवर्ण के पुङ्ख थे ऐसे शर दशों दिशाओं में फैल गये थे ।६७। परम
प्रचण्ड विक्रम वाला वह कुरण्ड अपने छोटे भाई दुर्मद का जो अग्रज था
उसने भी अपने शार्ङ्ग से फेंके हुए बाणों से उस अश्वारूढ़ा की ढक
दिया था ।६८।

चण्डैः खुरपुटैः सैन्यं खण्डयन्नतिवेगतः ।
अश्वारूढा तुरङ्गोऽपि मर्दयामास दानवान् ॥६९
तस्य हेषारवाद्दूरमुत्पातांबुधिनिः स्वनः ।
अमूर्च्छयन्ननेकानि तस्यानीतानि वैरिणः ॥१००
इतस्ततः प्रचलतिदैत्यचक्रे ह्यासना ।
निजं पाशायुधं दिव्यं मुमोच ज्वलिताकृति ॥१०१
तस्मात्पाशात्कोटिशोऽन्ये पाशा भुजगभीषणाः ।