वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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सूत्र विषय पृष्ठ
७—१० आसनपर बैठकर उपासना करनेका विधान ............. ४१४—४१६
११ जहाँ चित्त एकाग्र हो, वही स्थान उपासनाके लिये उत्तम .. ४१६-४१७
१२ आजीवन उपासनाकी विधि ........................................ ४१७-४१८
१३-१४ ब्रह्मसाक्षात्कारके पश्चात् ज्ञानीका भूत और भावी
शुभाशुभ कर्मोंसे असम्बन्ध ................................. ४१८—४२०
१५ शरीरके हेतुभूत प्रारब्ध कर्मका भोगके लिये नियत
समयतक रहना ..................................................... ४२०
१६-१७ ज्ञानीके लिये अग्निहोत्र आदि तथा अन्य विहित कर्मोंका
लोकसंग्रहार्थ विधान ............................................. ४२०-४२२
१८ कर्मांग उपासनाका ही कर्मके साथ समुच्चय .............. ४२२
१९ प्रारब्धका भोगसे नाश होनेपर ज्ञानीको ब्रह्मकी प्राप्ति .... ४२३
दूसरा पाद
१-४ उत्क्रमणकालमें वाणीकी अन्य इन्द्रियोंके साथ मनमें,
मनकी प्राणमें और प्राणकी जीवात्मामें स्थितिका कथन .. ४२४-४२६
५-६ जीवात्माकी सूक्ष्मभूतोंमें स्थिति ............................. ४२६-४२७
७ ब्रह्मलोकका मार्ग आरम्भ होनेसे पूर्वतक ज्ञानी और
अज्ञानीकी समान गतिका प्रतिपादन ......................... ४२७-४२८
८ अज्ञानी जीवका परब्रह्ममें स्थित रहना प्रलयकालकी
भाँति है .............................................................. ४२८-४२९
९-११ जीवात्मा उत्क्रमणके समय जिस आकाश आदि
भूतसमुदायमें स्थित होता है, वह सूक्ष्म शरीर है, इसका
प्रतिपादन .......................................................... ४२९-४३०
१२-१६ निष्काम ज्ञानी महात्माओंका ब्रह्मलोकमें गमन नहीं होता,
वे यहीं परमात्माको प्राप्त हो जाते हैं, इसका निरूपण .. ४३१-४३४
१७ सूक्ष्म शरीरमें स्थित जीव किस प्रकार ब्रह्मलोकमें जानेके
लिये सुषुम्ना नाडीद्वारा शरीरसे निकलता है, इसका वर्णन.. ४३५-४३६
१८ शरीरसे निकलकर जीवात्माका सूर्यरश्मियोंमें स्थित होना ४३६