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सर्वकोश
वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

पृष्ठ 24, कुल 486 में से

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पृष्ठ 24

( २१ )
सूत्र विषय पृष्ठ
१९-२० रात्रि और दक्षिणायनकालमें भी सूर्यरश्मियोंसे उसका
बाधारहित सम्बन्ध .............................................. ४३७-४३८
२१ योगीके लिये गीतोक्त कालविशेषका नियम ................ ४३८-४३९
तीसरा पाद
१ ब्रह्मलोकमें जानेके लिये 'अर्चिरादि' एक ही मार्गका
कथन .............................................................. ४४०-४४१
२ संवत्सरसे ऊपर और सूर्यलोकके नीचे वायुलोककी स्थिति.. ४४१-४४२
३ 'विद्युत्' से ऊपर वरुणलोककी स्थिति ......................... ४४२
४ 'अर्चिः', 'अहः', 'पक्ष', 'मास', 'अयन' आदि आतिवाहिक
पुरुष हैं, इसका प्रतिपादन .................................... ४४३
५ अर्चि आदिको अचेतन माननेमें आपत्ति ..................... ४४३-४४४
६ विद्युल्लोकसे ऊपर ब्रह्मलोकतक अमानव पुरुषके साथ
जीवात्माका गमन ................................................ ४४४
७-११ 'ब्रह्मलोकमें कार्यब्रह्मकी प्राप्ति होती है', इस बादरिके
मतका वर्णन ..................................................... ४४५-४४७
१२-१४ 'ब्रह्मलोकमें परब्रह्मकी प्राप्ति होती है' इस जैमिनिमतका
उपपादन ............................................................ ४४७-४४९
१५-१६ प्रतीकोपासना करनेवालोंके सिवा अन्य सभी उपासक
ब्रह्मलोकमें जाकर संकल्पानुसार कार्यब्रह्म अथवा
परब्रह्मको प्राप्त होते हैं, यह बादरायणका सिद्धान्त .... ४४९-४५१
चौथा पाद
१-३ परब्रह्मपरायण जीवके लिये परमधाममें पहुँचकर अपने
वास्तविक स्वरूपसे सम्पन्न होने एवं सब प्रकारके
बन्धनोंसे मुक्त हो विशुद्ध आत्मरूपसे स्थित होनेका कथन ४५२-४५४
४-६ ब्रह्मलोकमें पहुँचनेवाले उपासकोंकी तीन गति—
(१) अभिन्नरूपसे ब्रह्ममें मिल जानेका, (२) पृथक्
रहकर परमात्माके सदृश दिव्यस्वरूपसे सम्पन्न होनेका