वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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सूत्र विषय पृष्ठ
१८ अधिदैव आदिमें ‘अन्तर्यामीरूप’ से ब्रह्मकी स्थिति......... ६२
१९-२० जडप्रकृति और जीवात्माकी अन्तर्यामिताका निराकरण....... ६३-६४
२१-२२ श्रुतिमें जिसे अदृश्यत्व आदि धर्मोंसे युक्त बताया है, वह
ब्रह्म है, प्रकृति या जीवात्मा नहीं; इसका प्रतिपादन........ ६४-६६
२३ विराट्रूपके वर्णनसे ब्रह्मकारणवादका समर्थन............ ६६-६७
२४-२८ श्रुतिमें ‘वैश्वानर’ नाम ब्रह्मके लिये ही आया है, इसका
युक्तियुक्त विवेचन................................................... ६७-७२
२९-३२ सर्वव्यापी परमात्माको देशविशेषसे सम्बद्ध बतानेका
रहस्य.................................................................... ७२-७५
तीसरा पाद
१-७ द्युलोक और पृथिवी आदिका आधार ब्रह्म ही है, जीवात्मा
अथवा प्रकृति नहीं, इसका प्रतिपादन........................... ७६-८०
८-९ ब्रह्म ही भूमा है—इसका उपपादन.............................. ८०-८३
१०-१२ श्रुतिमें ब्रह्मको ‘अक्षर’ कहा गया है इसका युक्तियुक्त समर्थन... ८३-८५
१३ ‘ॐ’ इस अक्षरके द्वारा ध्येय तत्त्व भी ब्रह्म ही है,
इसका निरूपण........................................................ ८५-८६
१४-२३ दहराकाशकी ब्रह्मरूपताका प्रतिपादन.......................... ८६-९३
२४-२५ अंगुष्ठमात्र पुरुषकी परब्रह्मरूपता और उसे हृदयमें स्थित
बतानेका रहस्य........................................................ ९३-९४
२६-३० ब्रह्मविद्यामें मनुष्योंके सिवा देवताओंके भी अधिकारका
प्रतिपादन और इसमें सम्भावित विरोधका परिहार......... ९४-९९
३१-३३ यज्ञादि कर्म तथा ब्रह्मविद्यामें देवताओंके अधिकारका
जैमिनिद्वारा विरोध और बादरायणद्वारा उसका परिहार...... ९९-१०१
३४-३८ वेदविद्यामें शूद्रके अनधिकारका कथन......................... १०१-१०६
३९ अंगुष्ठमात्र पुरुषके ब्रह्मरूप होनेमें दूसरी युक्ति............ १०६-१०७
४०-४३ ‘ज्योति’ तथा ‘आकाश’ भी ब्रह्मके ही वाचक हैं,
इसका समर्थन........................................................ १०७-११०