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सर्वकोश
बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

Bihari Satsai with Hindi Commentary

महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा

DevanagariHindipublished290 पृष्ठ

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पृष्ठ 7

( ६ ) बिहारीलालजीका-
संवत ग्रहशशिजलधिक्षिति, छठतिथि वासर चंद
चैतमास पखकृष्णमें, पूरण आनंदकंद ॥ ३ ॥
संवत् १७१९ चैत्रकृष्ण छठ चन्द्रवारके दिन सतस-
ईको पूर्ण किया, इस वचनसे तो इनका समय जाननेमें अब
किसी प्रकार सन्देह नहीं रहा, परंतु इस बातमें विवाद
पड़ता है कि, उक्त कविका कुल गोत्र क्या था नीचे लिखे दोहेके
आश्रित हो कोई उनको राय कोई सनाढ्यमिश्र कोई रामचं-
द्रिकाप्रणेता केशवदासका पुत्र कोई कान्यकुब्ज, कोई मा-
थुर ब्राह्मण कहकर उनके परिचय देते हैं वह दोहा यह है ।
जन्म लियो द्विजराजकुल, प्रगट बसे ब्रज आय।
मेरे हरो कलेश सब, केशव केशवराय ॥ ४ ॥
ब्राह्मण श्रेष्ठ कुलमें जन्म लिया ब्रजमें आकर प्रगट बसे के-
शव ( कृष्ण ) केशवराय पिता ( पिता ) मेरे सम्पूर्ण क्लेश
हरो ॥ ४ ॥
इस दोहेमें केशवराय पर अवलम्बन करके जो कविव-
रको राय कथन करते हैं, यह युक्ति संगत नहीं, क्योंकि
इसके साथही वह द्विजराज कुलका जन्म कहते हैं कि, केश-
वरायने ब्राह्मणकुलके उच्चवंशमें जन्म लिया, और ब्रजमें
आकर बसे केशवराय नाम था कुछ उसके अन्तमें कुलोपा-
धिका कथन नहीं है, इसकारण यह सिद्ध होता है कि, के-