बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजीवनचरित्र। ( १२ )
महानुभावता साधारण बात नहीं है परन्तु इनके उज्ज्वल
माहात्म्यके गौरवमें विश्वासघातका कुछ कुछ कलंक झिल-
मिलाने लगा था, महाराज जयसिंहकेही यत्नसे कपटखान
औरंगजेबके समस्त कूटचक्र विफल हुए थे महाराज जयसिं-
हके यहां बाईस सहस्र राजपूत घुड़सवार और २२ ही प्रधा-
न सेनापति थे अन्य ग्रन्थोंमे लिखाहै कि, महाराज अपने
कई सरदारोंको साथ लेकर दरबारमें बैठा करते थे,दरबारमें
बैठनेके समय हाथमें दो दर्पण लेलेते थे एक दर्पणको दिल्ली
और दूसरेको सितारा बताकर भूमिमें डालदेते, दिल्लीवाले द-
र्पणको हाथमें रखकर कहाकरते थे कि,सितारा तो पातालको
चला और दिल्लीके भाग्यका डोराभी मेरे बायें हाथमें है।
मैं इच्छा करूं तो इसकोभी इसी प्रकार स्वच्छन्दतासे वशी
भूत करसकता हूं, धीरे धीरे यह बात औरंगजेबके कानतक
पहुँचगई, सम्राट् इनके प्राणोंका ग्राहक हुआ, परन्तु जय-
सिंह कोई साधारण राजा नहीं थे, जो औरंगजेब इनको
इच्छाकरतेही मारडालता औरंगजेबने एक घृणित उपायको
अवलम्बन किया, महाराज जयसिंहके कीरतसिंह नामक
एक छोटा पुत्र था, इसको राज्यका लोभ दिलाकर महारा-
जके विरुद्ध उकसाया, जब देखा कि, यह सबप्रकारसे मेरी
सहायता करनेको तैयार है, तब कीरतसिंहसे कहा तुम
जयसिंहको मारडालो में तुमको अम्बरकी गद्दी देदूंगा, कैसी
भयानक बात है कि, राजकुलमें जन्म लेकर राज्यके लिये