बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १२ ) बिहारीलालजीका-
इसको सुनकर महाराज बहुत प्रसन्न हुए और दरबार
किया तथा विहारीलालको बहुत कुछ भेंट देकर अपने स्था-
नपर रखलिया। इसही दोहेपर १०० अशरफी उक्त कविको
मिलीं परन्तु महाराजने कहा कि, इसप्रकारके दोहेपर एक
एक गाँवभी थोड़ा है, आगे औरभी दोहे बनानेकी आज्ञादी
कविवर-जयपुर अम्बरमें रहने लगे इनके काव्यमें जयपुरके
दृश्यके अनेक दोहे पायेजाते हैं ॥
यथा-(फीको परै न वर फटै रँगो लोहरँग चीर, मनहुताफता
कीन) इत्यादि अनेक वर्त्ता मूलग्रन्थमें देखनेसे मिलेंगी।
गजपूतानेमें जयसिंह मिरजानामसे प्रसिद्ध हैं, यह मान-
सिंहके योग्य वंशधर हुए औरंगजेबके राजत्वकालमें इन्हों
ने मुगलोंके बहुत उपकार किये थे इसीकारण औरंगजेबने
इनका ६००० सेनाका सेनापति बनाया, इसी कुशवह
वीरके कौशल जालसे महाराज कुलतिलक शिवाजी वन्दी
होगये थे उससमय विहारीलालने पढ़ा था ।
सामा सैन मयान सुख, सबै शाहके साथ।
बाहुबली जयशाहज्, फते तिहारे हाथ ॥
महाराज जयसिंहने शिवाजीको निरापद् रखनेकी प्रति-
ज्ञाकी थी परन्तु जब औरंगजेबके कपटसे वह टूटनेपर हुई
तब महाराज जयसिंहने शिवाजीके भगानेमें सहायता की यह