भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
५५६
'मीन' लग्न की कुण्डली में 'पंचमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश
मीनलग्न : पंचमभाव : सूर्य
पाँचवें भाव में मित्र 'चन्द्रमा' की राशि पर
स्थित 'सूर्य' के प्रभाव से जातक को सन्तान-पक्ष से कुछ
कष्ट होता है, परन्तु कुछ कठिनाइयों के साथ विद्या-
बुद्धि एवं वाणी की शक्ति में वृद्धि होती है। मस्तिष्क
में चिन्ता एवं क्रोध का निवास भी रहता है।
सातवीं शत्रु-दृष्टि से एकादशभाव को देखने से
लाभ के मार्ग में कुछ कठिनाइयाँ आती हैं, परन्तु परि-
श्रम द्वारा सफलता भी मिलती है।
'मीन' लग्न की कुण्डली में 'षष्ठभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश
मीनलग्न : षष्ठभाव : सूर्य
छठे भाव में स्वराशि-स्थित 'सूर्य' के प्रभाव से
जातक शत्रुओं पर विजय पाता है तथा झगड़े-झंझटों से
लाभ उठाता है। उसे रोग आदि भी नहीं होते। वह
बड़ा हिम्मती, धैर्यवान् तथा परिश्रमी होता है।
सातवीं शत्रु-दृष्टि से द्वादशभाव को देखने से
खर्च की परेशानी रहती है तथा बाहरी सम्बन्धों से
भी कुछ कष्ट होता है। खर्च की अधिकता से मन
अशान्त रहता है।
'मीन' लग्न की कुण्डली में 'सप्तमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश
मीनलग्न : सप्तमभाव : सूर्य
सातवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित
'सूर्य' के प्रभाव से जातक का स्त्री-पक्ष से कुछ वैमनस्य
रहता है तथा दैनिक व्यवसाय में अधिक दौड़-धूप करने
से ही सफलता मिलती है।
सातवीं मित्र-दृष्टि से प्रथमभाव को देखने से
प्रभाव तथा सम्मान की वृद्धि होती है, परन्तु शारीरिक
परेशानियां भी रहती हैं।
५५७
'मीन' लग्न की कुण्डली में 'अष्टमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश
मीनलग्न : अष्टमभाव : सूर्य
आठवें भाव में शत्रु 'शुक्र' की राशि पर स्थित
नीच के 'सूर्य' के प्रभाव से जातक की आयु पर घोर
संकट आते हैं तथा पुरातत्त्व-शक्ति की भी हानि होती
है। शत्रु-पक्ष से भी कष्ट मिलता है। ननसाल-पक्ष
दुर्बल रहता है। पेट के निम्न भाव में विकार भी
होता है।
सातवीं मित्र तथा उच्च-दृष्टि से द्वितीयभाव
को देखने से धन तथा कौटुम्बिक सुख की वृद्धि के लिए
अधिक परिश्रम करना पड़ता है।
'मीन' जन्म की कुण्डली में 'नवमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश
मीनलग्न : नवमभाव : सूर्य
नवें भाव में मित्र 'मंगल' की राशि पर स्थित
'सूर्य' के प्रभाव से जातक के भाग्य तथा धर्म की वृद्धि
होती है। शत्रु-पक्ष पर विजय मिलती है तथा प्रभाव
बढ़ता है।
सातवीं शत्रु-दृष्टि से तृतीयभाव को देखने से
भाई-बहिनों से कुछ विरोध रहता है तथा कुछ कठि-
नाइयों के साथ पराक्रम, प्रभाव तथा पुरुषार्थ की वृद्धि
होती है।
'मीन' लग्न की कुण्डली में 'नवमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश
मीनलग्न : नवमभाव : सूर्य
दशवें भाव में मित्र 'गुरु' की राशि पर स्थित
'सूर्य' के प्रभाव से जातक का अपने पिता से कुछ
वैमनस्य रहता है राज्य के क्षेत्र में प्रभाव तथा सम्मान
की वृद्धि होती है तथा व्यवसाय के क्षेत्र में कुछ कठि-
नाइयां आती हैं। शत्रु-पक्ष पर विजय मिलती है।
सातवीं मित्र-दृष्टि से चतुर्थभाव को देखने से
कुछ कठिनाइयों के साथ माता, भूमि एवं भवन का
सुख मिलता है।
५५८
'मीन' लग्न की कुण्डली में 'एकादशभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश
मीनलग्न : एकादशभाव : सूर्य
ग्यारहवें भाव में स्वराशि-स्थित 'सूर्य' के
प्रभाव से जातक कठिन परिश्रम द्वारा अपनी
आमदनी की खूब बढ़ाता है। शत्रु-पक्ष पर भी
विजय मिलती है।
सातवीं मित्र-दृष्टि से पंचमभाव को देखने
से कुछ कठिनाइयों के साथ विधा-बुद्धि एवं संतान
के क्षेत्र में भी सफलता मिलती है।
१३२५
'मीन' लग्न की कुण्डली में 'द्वादशभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश
मीनलग्न : द्वादशभाव : सूर्य
बारहवें भाव में शत्रु 'शनि' की राशि पर
स्थित 'सूर्य' के प्रभाव से जातक को खर्च चलाने में
कुछ कठिनाइयाँ आती हैं तथा बाहरी सम्बन्धों से
भी परेशानी रहती है। शत्रु-पक्ष भी कठिनाइयाँ
उत्पन्न करता है।
सातवीं दृष्टि से स्वराशि में षष्ठभाव को
देखने से खर्च के बल पर शत्रुओं पर विजय प्राप्त
होती है। ऐसा व्यक्ति अहंकारी तथा क्रोधी भी
होता है।
१३२६
'मीन' लग्न में 'चन्द्रमा'
'मीन' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश
मीनलग्न : प्रथमभाव : चन्द्र
पहले भाव में मित्र 'गुरु' की राशि पर स्थित
'चन्द्रमा' के प्रभाव से जातक के शारीरिक सौन्दर्य,
सम्मान तथा यश की वृद्धि होती है। वह मधुरभाषी,
सर्वप्रिय तथा प्रभावशाली होता है। उसे सन्तान तथा
विद्या-बुद्धि का भी श्रेष्ठ लाभ होता है।
सातवीं मित्र-दृष्टि से सप्तमभाव को देखने से
सुन्दर स्त्री मिलती है तथा व्यवसाय के क्षेत्र में बुद्धि-
बल से अच्छा लाभ होता है।
१३२७
५५६
'मीन' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश
मीनलग्न : द्वितीयभाव : चन्द्र
दूसरे भाव में मित्र 'मंगल' की राशि पर
स्थित 'चन्द्रमा' के प्रभाव से जातक को धन तथा
कुटुम्ब की श्रेष्ठ शक्ति मिलती है। सन्तान-पक्ष से
कुछ परेशानी होती है, फिर भी सन्तान तथा विद्या-
बुद्धि का अच्छा लाभ होता है।
सातवीं सामान्य मित्र-दृष्टि से अष्टमभाव
को देखने से आयु तथा पुरातत्त्व की शक्ति में वृद्धि
होती है तथा दैनिक जीवन आनन्दमय बना रहता है।
'मीन' लग्न की कुण्डली में 'तृतीयभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश
मीनलग्न : तृतीयभाव : चन्द्र
तीसरे भाव में सामान्य मित्र 'शुक्र' की राशि
पर स्थित उच्च के 'चन्द्रमा' के प्रभाव से जातक के परा-
क्रम तथा भाई-बहिनों के सुख में वृद्धि होती है तथा
विद्या एवं सन्तान-पक्ष का भी पूर्ण सहयोग मिलता है।
सातवीं नीच-दृष्टि से नवमभाव को देखने
से भाग्य तथा धर्म की उन्नति में रुकावटें आती हैं।
ऐसा व्यक्ति असहिष्णु होता है, अतः उसे यश भी
कम मिलता है।
'मीन' लग्न की कुण्डली में 'चतुर्थभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश
मीनलग्न : चतुर्थभाव : चन्द्र
चौथे भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित
'चन्द्रमा' के प्रभाव से जातक को माता, भूमि तथा
भवन का श्रेष्ठ सुख प्राप्त होता है। विद्या तथा संतान
पक्ष में भी उन्नति होती है।
सातवीं मित्र-दृष्टि से दशमभाव को देखने से
बुद्धि-बल से व्यवसाय में उन्नति होती है तथा राज्य-
पक्ष से सम्मान तथा विद्या के सहयोग प्राप्त होता
है। उसकी अनेक प्रकार से उन्नति होती है।
५६०
'मीन' लग्न की कुण्डली में 'पंचमभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश
मीनलग्न : पंचमभाव : चन्द्र
पाँचवें भाव में स्वराशि में स्थित 'चन्द्रमा' के
प्रभाव से विद्या, बुद्धि एवं सन्तान का यथेष्ट लाभ होता
है। वह वाक्पटु तथा मीठे स्वभाव का, गंभीर, दूर-
दर्शी तथा स्थिर विचारों का व्यक्ति होता है।
सातवीं शत्रु-दृष्टि से एकादशभाव को देखने से
बुद्धि-बल द्वारा उसकी आमदनी की वृद्धि होती है,
यद्यपि उसे कुछ असन्तोष भी रहता है।
'मीन' लग्न की कुण्डली में 'षष्ठभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश
मीनलग्न : षष्ठभाव : चन्द्र
छठे भाव में मित्र 'सूर्य' की राशि पर स्थित
'चन्द्रमा' के प्रभाव से जातक को शत्रु-पक्ष से अशान्ति
रहती है, तथा बुद्धि-बल से उन पर प्रभाव स्थापित हो
पाता है। सन्तान-पक्ष से कष्ट होता है तथा विद्याध्ययन
में कठिनाइयाँ आती हैं।
सातवीं शत्रु-दृष्टि से द्वादशभाव को देखने से
खर्च अधिक रहने के कारण कष्ट होता है तथा बाहरी
स्थानों से भी असन्तोषजनक लाभ होता है।
'मीन' लग्न की कुण्डली में 'सप्तमभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश
मीनलग्न : सप्तमभाव : चन्द्र
सातवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित
'चन्द्रमा' के प्रभाव से जातक को सुन्दर तथा बुद्धिमती
स्त्री मिलती है। व्यवसाय के क्षेत्र में भी सफलता मिलती
है। सन्तान-पक्ष, घरेलू सुख तथा विद्या-बुद्धि की भी
उन्नति होती है।
सातवीं मित्र-दृष्टि से प्रथमभाव को देखने से
शारीरिक सौन्दर्य, प्रभाव, सम्मान एवं योग्यता की
वृद्धि होती है।
५६१
'मीन' लग्न की कुंडली में 'अष्टमभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश
मीनलग्न : अष्टमभाव : चन्द्र
आठवें भाव में सामान्य मित्र 'शुक्र' की राशि
पर स्थित 'चन्द्रमा' के प्रभाव से जातक की आयु में
वृद्धि होती है तथा पुरातत्त्व का लाभ होता है।
विद्या एवं सन्तान-पक्ष में कमी रहती है। धन तथा
मस्तिष्क अशान्त रहता है।
सातवीं मित्र-दृष्टि से द्वितीय भाव के देखने से
धन तथा कुटुम्ब के सुख की वृद्धि होती है। ऐसा व्यक्ति
सामान्य जीवन बिताता है।
१३३४
'मीन' लग्न की कुण्डली में 'नवमभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश
मीनलग्न : नवमभाव : चन्द्र
नवें भाव में मित्र 'मंगल' की राशि पर स्थित
नीच के 'चन्द्रमा' के प्रभाव से जातक की भाग्योन्नति
तथा धर्म पालन में रुकावटें आती हैं। सन्तान तथा
विद्या का पक्ष भी कमजोर रहता है। मन-मस्तिष्क में
परेशानियां रहती हैं।
सातवीं उच्च-दृष्टि से तृतीय भाव को देखने से
भाई-बहिनों का सुख मिलता है तथा पराक्रम में पर्याप्त
वृद्धि होती है।
१३३५
'मीन' लग्न की कुण्डली में 'दशमभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश
मीनलग्न : दशमभाव : चन्द्र
दसवें भाव में मित्र 'गुरु' की राशि पर स्थित
'चन्द्रमा' के प्रभाव से जातक की पिता, राज्य तथा
व्यवसाय के क्षेत्र में वांछित सफलताएँ प्राप्त होती हैं।
वह विद्वान्, नियमों का पालक, बुद्धिमान् तथा संतति-
वान भी होता है।
सातवीं मित्र-दृष्टि से चतुर्थ भाव को देखने से
माता, भूमि तथा भवन का श्रेष्ठ सुख मिलता है। ऐसा
व्यक्ति धनी तथा भाग्यशाली होता है।
१३३६
५६२
'मीन' लग्न की कुण्डली में 'एकादशभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश
मीनलग्न : एकादशभाव : चन्द्र
ग्यारहवें भाव में शत्रु 'शनि' की राशि पर
'चन्द्रमा' के प्रभाव से जातक अपने बुद्धि-बल द्वारा
आमदनी में पर्याप्त वृद्धि करता है।
सातवीं दृष्टि से स्वराशि में पंचमभाव को देखने
से सन्तान एवं विद्या-बुद्धि-पक्ष की उन्नति के लिए
निरन्तर प्रयत्नशील बना रहता है। वह स्वार्थी तथा
अपनी ही उन्नति की कामना करने वाला होता है।
'मीन' लग्न की कुण्डली में 'द्वादशभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश
मीनलग्न : द्वादशभाव : चन्द्र
बारहवें भाव में शत्रु 'शनि' की राशि पर
स्थित 'चन्द्रमा' के प्रभाव से जातक का खर्च अधिक
रहता है, परन्तु बाहरी स्थानों से लाभ भी मिलता
है। सन्तान-पक्ष से कष्ट तथा विद्या के क्षेत्र में कमी
का सामना करना पड़ता है। मन-मस्तिष्क में परेशानी
भी रहती है।
सातवीं मित्र-दृष्टि से षष्ठ भाव को देखने से
बुद्धि-बल से शत्रु-पक्ष पर प्रभाव स्थापित होता है।
'मीन' लग्न में मंगल
'मीन' लग्न की कुण्डली में 'प्रथमभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश
मीनलग्न : प्रथमभाव : मंगल
पहले भाव में मित्र 'गुरु' की राशि पर स्थित
'मंगल' के प्रभाव से जातक की शारीरिक शक्ति एवं
प्रभाव में वृद्धि होती है। धन, कुटुम्ब तथा भाग्य की
भी समृद्धि होती है। चौथी मित्र-दृष्टि से चतुर्थभाव
को देखने से माता, भूमि एवं भवन का पर्याप्त सुख
मिलता है।
सातवीं मित्र-दृष्टि से सप्तम भाव को देखने
से व्यवसाय तथा घरेलू सुख की वृद्धि होती है तथा
स्त्री का पक्ष उत्तम रहता है। आठवीं सामान्य मित्र-दृष्टि से अष्टम भाव को देखने
से आयु की वृद्धि होती है तथा पुरातत्त्व का लाभ होता है।
५६३
'मीन' लग्न की कुण्डली में 'द्वितीयभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश
मीनलग्न : द्वितीयभाव : मंगल
दूसरे भाव में स्वराशि-स्थित मंगल के प्रभाव
से जातक के धन तथा कुटुम्ब की वृद्धि होती है।
चौथी नीच-दृष्टि से पंचम भाव को देखने से विद्या
एवं सन्तान के क्षेत्र में कुछ कमी रहती है।
सातवीं सामान्य मित्र-दृष्टि से अष्टम भाव
को देखने से आयु तथा पुरातत्त्व की शक्ति में वृद्धि
होती है।
आठवीं दृष्टि से स्वराशि में नवम भाव को
देखने से भाग्य तथा धर्म की विशेष उन्नति होती है। ऐसे व्यक्ति का रहन-सहन ठाठ-
बाट का होता है।
१३४०
'मीन' लग्न की कुण्डली में 'तृतीयभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश
मीनलग्न : तृतीयभाव : मंगल
तीसरे भाव में सामान्य मित्र 'शुक्र' की राशि
पर स्थित 'मंगल' के प्रभाव से जातक के पराक्रम की
विशेष वृद्धि होती है तथा धन-कुटुम्ब का सुख भी
मिलता
१६४
'मीन' लग्न की कुण्डली में 'पंचमभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश
मीन लग्न : पंचमभाव : मंगल पाँचवें भाव में मित्र 'चन्द्रमा' की राशि पर
स्थित नीच के 'मंगल' के प्रभाव से जातक का सन्तान
तथा विद्या का पक्ष दुर्बल रहता है। धन तथा कुटुम्ब के
सुख तथा भाग्य एवं धर्म के पक्ष में भी कमी रहती है।
चौथी सामान्य मित्रदृष्टि से अष्टम भाव को देखने से
आयु तथा पुरातत्त्व की शक्ति में कुछ वृद्धि होती है।
सातवीं उच्चदृष्टि से एकादश भाव को देखने से
आमदनी में वृद्धि होती है। बारहवीं शत्रुदृष्टि से
द्वादश भाव को देखने से खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी
संबंधों से असंतोषपूर्ण लाभ होता है।
'मीन' लग्न की कुण्डली में 'षष्ठभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश
मीन लग्न : षष्ठभाव : मंगल छठे भाव में मित्र 'सूर्य' की राशि पर स्थित
'मंगल' के प्रभाव से जातक शत्रु-पक्ष पर बहुत प्रभाव
रखता है। धन की कुछ कमी रहते हुए भी ठाठ से
खर्च चलाता है। कुटुम्ब से थोड़ा सुख मिलता है।
चौथी दृष्टि से स्वराशि में नवम भाव को देखने
भाग्य की उन्नति तथा धर्म का पालन होता है।
सातवीं शत्रुदृष्टि से द्वादश भाव को देखने से
खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी सम्बन्ध भी
असंतोषजनक रहते हैं। आठवीं मित्रदृष्टि से प्रथम
भाव को देखने से शारीरिक शक्ति, प्रभाव एवं सम्मान की वृद्धि होती है।
'मीन' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश
मीन लग्न : सप्तमभाव : मंगल सातवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर
स्थित 'मंगल' के प्रभाव से जातक को भाग्यशालिनी
स्त्री मिलती है तथा व्यवसाय में भी लाभ होता है।
वह धर्मात्मा तथा भाग्यवान् भी रहता है। चौथी
मित्रदृष्टि से दशम भाव को देखने से पिता, राज्य
एवं व्यवसाय के क्षेत्र में सफलताएँ मिलती हैं।
आमदनी खूब बढ़ती है।
सातवीं मित्रदृष्टि से प्रथम भाव को देखने से
शारीरिक सौन्दर्य, यश, प्रतिष्ठा तथा स्वाभिमान
की वृद्धि होती है। आठवीं दृष्टि से स्वराशि में द्वितीय भाव को देखने से धन तथा
कुटुम्ब का पर्याप्त सुख मिलता है।
५६५
'मीन' लग्न की कुण्डली में 'अष्टमभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश
मीन लग्न : अष्टमभाव : मंगल आठवें भाव में सामान्य मित्र 'शुक्र' की
राशि पर स्थित 'मंगल' के प्रभाव से जातक को आयु
में वृद्धि होती है तथा पुरातत्त्व का लाभ होता है,
किन्तु भाग्य, धर्म तथा यश में कमी आती है। चौथी
शत्रु तथा उच्चदृष्टि से एकादश भाव को देखने से
आमदनी अच्छी रहती है तथा अधिक मुनाफा उठाने
की प्रवृत्ति बनती है।
सातवीं दृष्टि से स्वराशि में द्वितीय भाव को
देखने से परिश्रम द्वारा धन का संचय होता है तथा कुटुम्ब का सुख भी मिलता है।
आठवीं शत्रुदृष्टि से तृतीय भाव को देखने से भाई-बहिनों के सुख में कुछ कमी रहती
है, परन्तु पराक्रम बढ़ता है।
'मीन' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश
नीच लग्न : नवमभाव : मंगल नवें भाव में स्वराशि-स्थित 'मंगल' के प्रभाव
से जातक के भाग्य तथा धर्म की वृद्धि होती है। वह
भाग्यशाली, धनी तथा यशस्वी होता है। चौथी शत्रु-
दृष्टि से द्वादश भाव को देखने से खर्च की कठिनाई
रहती है तथा बाहरी संबंधों से भी असन्तोष रहता है।
सातवीं शत्रुदृष्टि से तृतीय भाव को देखने से
कुछ कमी के साथ भाई-बहिनों का सुख मिलता है
तथा
५६६
'मीन' लग्न की कुण्डली में 'एकादशभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश
मीन लग्न : एकादशभाव : मंगल \t ग्यारहवें भाव में शत्रु 'शनि' की राशि पर
स्थित 'मंगल' के प्रभाव से जातक की आमदनी में
अत्यधिक वृद्धि होती है। वह बड़ा भाग्यशाली तथा
धर्मात्मा भी होता है। चौथी दृष्टि से स्वराशि में
द्वितीय भाव को देखने से धन तथा कुटुम्ब के सुख
की वृद्धि होती है।
सातवीं नीच तथा मित्रदृष्टि से पंचम भाव
को देखने से विद्या तथा सन्तान के पक्ष में कुछ कमी
रहती है। आठवीं मित्रदृष्टि से षष्ठभाव को देखने
से शत्रु-पक्ष पर विजय मिलती है तथा झगड़ों से लाभ होता है।
'मीन' लग्न की कुण्डली में 'द्वादशभाव' में स्थित 'मंगल' का फलादेश
मीन लग्न : द्वादशभाव : मंगल \t बारहवें भाव में शत्रु 'शनि' की राशि पर
स्थित 'मंगल' के प्रभाव से जातक का खर्च अधिक
रहता है तथा बाहरी संबंधों से लाभ होता है। धन
तथा कुटुम्ब के सुख में भी कमी रहती है। भाग्य तथा
धर्म की उन्नति में कठिनाइयां आती हैं। चौथी शत्रु-
दृष्टि से तृतीय भाव को देखने से भाई-बहिनों के सुख
में कुछ कमी रहती है, परन्तु पराक्रम में विशेष वृद्धि
होती है।
सातवीं शत्रुदृष्टि से षष्ठ भाव को देखने से
शत्रु-पक्ष पर प्रभाव बना रहता है। आठवीं मित्रदृष्टि से सप्तम भाव को देखने से
स्त्री तथा व्यवसाय से सुख एवं लाभ की प्राप्ति होती है।
'मीन' लग्न में 'बुध'
'मीन' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश
मीन लग्न : प्रथमभाव : बुध
पहले भाव में मित्र 'गुरु' की राशि पर स्थित
'गुरु' के प्रभाव से जातक के शारीरिक सौन्दर्य एवं
स्वास्थ्य में कुछ कमी रहती है। माता, भूमि तथा
भवन का सुख भी थोड़ा ही मिलता है।
सातवीं उच्च दृष्टि से स्वराशि में सप्तम भाव
को देखने से स्त्री-पक्ष से सुख मिलता है तथा व्यवसाय
में भी सफलता प्राप्त होती है।
५६७
'मीन' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश
मीन लग्न : द्वितीयभाव : बुध
दूसरे भाव में मित्र 'मंगल' की राशि पर स्थित
'बुध' के प्रभाव से जातक को धन तथा कुटुम्ब का सुख
प्राप्त होता है। माता तथा स्त्री के सुख में कुछ कमी
रहती है, परन्तु भूमि एवं भवन का लाभ होता है।
सातवीं मित्रदृष्टि से अष्टम भाव को देखने से
आयु एवं पुरातत्त्व का लाभ होता है। दैनिक जीवन
भी उल्लासपूर्ण बना रहता है।
'मीन' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश
मीन लग्न : तृतीयभाव : बुध
तीसरे भाव में मित्र 'शुक्र' की राशि पर स्थित
'बुध' के प्रभाव से जातक के पराक्रम की वृद्धि होती है
तथा भाई-बहिनों का अच्छा सुख मिलता है। माता,
भूमि, भवन, स्त्री तथा व्यवसाय के क्षेत्र में भी सुष्ठु-
सफलता की प्राप्ति होती है।
सातवीं मित्रदृष्टि से नवमभाव को देखने से
भाग्य तथा धर्म की उन्नति होती है। ऐसा व्यक्ति यश
भी प्राप्त करता है।
'मीन' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश
मीन लग्न : चतुर्थभाव : बुध
चौथे भाव में स्वराशि स्थित 'बुध' के प्रभाव से
जातक को माता, भूमि तथा भवन का विशेष सुख
मिलता है। स्त्री तथा दैनिक व्यवसाय के पक्ष में भी
सफलता मिलती है। घरेलू जीवन उल्लासपूर्ण रहता
है।
सातवीं मित्रदृष्टि से दशम भाव को देखने से
पिता, राज्य तथा व्यवसाय के क्षेत्र में भी सफलताएँ
मिलती हैं। ऐसा व्यक्ति धनी, सुखी तथा भाग्यशाली
होता है।
५६८
'मीन' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश
मीन लग्न : पंचमभाव : बुध
पाँचवें भाव में मित्र 'चन्द्रमा' की राशि पर स्थित
'बुध' के प्रभाव से जातक को विद्या, बुद्धि तथा सन्तान
के क्षेत्र में विशेष उन्नति प्राप्त होती है। वह मीठी
वाणी बोलने वाला तथा कार्य-कुशल होता है। माता,
भूमि तथा भवन का सुख भी मिलता है।
सातवीं मित्रदृष्टि से एकादश भाव को देखने से
आमदनी में वृद्धि होती है। ऐसा व्यक्ति सुखी, धनी,
विवेकी तथा यशस्वी होता है।
'मीन' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश
मीन लग्न : षष्ठभाव : बुध
छठे भाव में मित्र 'सूर्य' की राशि पर स्थित
'बुध' के प्रभाव से जातक · शत्रु-पक्ष में शान्ति से काम
निकालता है। माता तथा स्त्री से कुछ विरोध रहता
है। भूमि तथा भवन का सुख भी कम ही मिलता है।
व्यवसाय-क्षेत्र में बुद्धि-बल से सफलता मिलती है।
सातवीं मित्रदृष्टि से द्वादश भाव को देखने से
जातक का खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी संबंधों से
लाभ होता है।
'मीन' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश
मीन लग्न : सप्तमभाव : बुध
सातवें भाव में स्वराशि स्थित उच्च के 'बुध' के
प्रभाव से जातक को सुन्दर स्त्री मिलती है, तथा दैनिक
व्यवसाय में सफलता मिलती है घरेलू जीवन अच्छा
रहता है। माता, भूमि तथा भवन का श्रेष्ठ सुख भी
मिलता है।
सातवीं नीच तथा मित्रदृष्टि से प्रथम भाव को
देखने से शारीरिक स्वास्थ्य में कुछ कमी रहती है तथा
गृहस्थी को चलाने में परिश्रम अधिक करना पड़ता है।
५६६
'मीन' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश
मीन लग्न : अष्टमभाव : बुध सातवें भाव में मित्र 'शुक्र' की राशि पर स्थित
'बुध' के प्रभाव से जातक को आयु तथा पुरातत्व शक्ति
में वृद्धि होती है। दैनिक जीवन प्रभावपूर्ण रहता है।
स्त्री के सुख में अधिक तथा माता के सुख में सामान्य
कमी रहती है।
सातवीं मित्रदृष्टि से द्वितीय भाव को देखने से
धन तथा कुटुम्ब का सुख प्राप्त होता है। ऐसा व्यक्ति
सामान्यतः सुखी जीवन बिताता है।
'मीन' लग्न की कुण्डली में 'नवमभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश
मीन लग्न : नवमभाव : बुध
नवें भाव में मित्र 'मंगल' की राशि पर स्थित
'बुध' के प्रभाव से जातक के भाग्य तथा धर्म की वृद्धि
होती है। माता, भूमि, भवन, स्त्री तथा व्यवसाय का भी
श्रेष्ठ सुख मिलता है।
सातवीं मित्रदृष्टि से तृतीय भाव को देखने से
पराक्रम की वृद्धि होती है तथा भाई-बहिनों का सुख भी
मिलता है। ऐसा व्यक्ति सुखी, धनी, पराक्रमी तथा
यशस्वी होता है।
'मीन' लग्न की कुण्डली में 'दशमभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश
मीन लग्न : दशमभाव : बुध
दसवें भाव में मित्र 'गुरु' की राशि पर स्थित
'बुध' के प्रभाव से जातक को पिता, राज्य तथा
व्यवसाय के क्षेत्र में सहयोग, प्रतिष्ठा तथा लाभ की
प्राप्ति होती है। स्त्री-पक्ष से भी सुख मिलता है।
सातवीं दृष्टि से स्वराशि में चतुर्थ भाव को
देखने से माता, भूमि, भवन तथा घरेलू सुख की भी
यथेष्ट प्राप्ति होती है। ऐसा व्यक्ति धनी, यशस्वी तथा
सुखी होता है।
५७०
'मीन' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश
मीनलग्न : एकादशभाव : बुध ग्यारहवें भाव में मित्र 'शनि' की राशि पर
स्थित 'बुध' के प्रभाव से जातक की आमदनी में
अत्यधिक वृद्धि होती है। माता, भूमि, भवन, स्त्री तथा
व्यवसाय के क्षेत्र में भी सफलताएँ मिलती हैं।
सातवीं मित्र-दृष्टि से पंचम भाव को देखने से
विद्या-बुद्धि एवं सन्तान-पक्ष को विशेष उन्नति होती
है। ऐसा व्यक्ति बुद्धिमान्, मधुर-भाषी, धनी, सुखी
तथा यशस्वी होता है।
'मीन' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश
मीनलग्न : द्वादशभाव : बुध
बारहवें भाव में मित्र 'शनि' की राशि पर स्थित
'बुध' के प्रभाव से जातक का खर्च अधिक रहता है तथा
बाहरी सम्बन्धों से लाभ होता है। माता, भूमि, भवन,
घरेलू सुख, स्त्री तथा दैनिक व्यवसाय के क्षेत्र में परे-
शानियों का सामना करना पड़ता है।
सातवीं मित्र-दृष्टि से षष्ठभाव को देखने से शत्रु-
पक्ष पर विजय प्राप्त होती है। ऐसा व्यक्ति धैर्यवान्
तथा हिम्मत वाला होता है।
'मीन' लग्न में 'गुरु'
'मीन' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश
मीनलग्न : प्रथमभाव : गुरु पहले भाव में स्वराशि स्थित 'गुरु' के प्रभाव से
जातक के शारीरिक सौन्दर्य तथा प्रभाव में वृद्धि होती
है। उसे पिता, राज्य तथा व्यवसाय के पक्ष में भी
सफलताएँ मिलती हैं। वह बड़ा धनी तथा व्यवसायी
होता है। पांचवीं उच्च दृष्टि से पंचम भाव को देखने से
विद्या-बुद्धि तथा सन्तान का यथेष्ट लाभ होता है।
सातवीं मित्र-दृष्टि से सप्तम भाव को देखने से
स्त्री सुन्दर मिलती है तथा दैनिक व्यवसाय की वृद्धि होती
है। नवीं मित्र-दृष्टि से नवम भाव को देखने से भाग्य तथा
धर्म की विशेष उन्नति होती है।
५७१
'मीन' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश
मीनलग्न : द्वितीयभाव : गुरु दूसरे भाव में मित्र 'मंगल' की राशि पर स्थित
'गुरु' के प्रभाव से जातक के धन तथा कौटुम्बिक सुख की
पर्याप्त वृद्धि होती है, परन्तु शारीरिक स्वास्थ्य में कुछ
कमी आती है। पांचवीं मित्र-दृष्टि से षष्ठ भाव को देखने
से धन की शक्ति से शत्रु-पक्ष पर प्रभाव स्थापित होता है
तथा झगड़े के मामलों में धैर्य से काम लेकर सफलता
पाता है।
सातवीं शत्रु-दृष्टि से अष्टम भाव को देखने से
आयु तथा पुरातत्त्व की शक्ति में वृद्धि होती है। नवीं
दृष्टि से स्वराशि में दशम भाव को देखने से पिता, राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में
यथेष्ट सफलताएं मिलती हैं। ऐसा व्यक्ति धनी, सुखी तथा यशस्वी होता है।
'मीन' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश
मीनलग्न : तृतीयभाव : गुरु तीसरे भाव में शत्रु 'शुक्र' की राशि पर स्थित
'गुरु' के प्रभाव से जातक की भाई-बहिनों का सुख कुछ
मतभेद के साथ प्राप्त होता है तथा पराक्रम में वृद्धि
होती है। पिता से भी सामान्य मतभेद रहता है, परन्तु
राज्य तथा व्यवसाय के क्षेत्र में उन्नति होती है। पाँचवीं
मित्र-दृष्टि से सप्तमभाव को देखने से स्त्री-पक्ष से सुख
मिलता है तथा दैनिक व्यवसाय में सफलता मिलती है।
सातवीं मित्र-दृष्टि से नवमभाव को देखने से भाग्य
तथा धर्म की उन्नति होती है। नवीं नीच-दृष्टि से शत्रु
राशि में एकादश भाव को देखने से आमदनी के मार्ग में रुकावटें आती हैं।
'मीन' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश
मीनलग्न : चतुर्थभाव : गुरु चौथे भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित
'गुरु' के प्रभाव से जातक को माता, भूमि एवं भवन का
श्रेष्ठ सुख मिलता है। शारीरिक सौन्दर्य, प्रभाव, यश तथा
घरेलू सुख की वृद्धि होती है। पाँचवीं शत्रु-दृष्टि से अष्टम
भाव को देखने से आयु एवं पुरातत्त्व की वृद्धि होती है।
सातवीं दृष्टि से स्वराशि में दशमभाव को देखने
से पिता, राज्य तथा व्यवसाय के क्षेत्र में सफलताएं मिलती
है। नवीं शत्रु-दृष्टि से द्वादश भाव को देखने से खर्च के
कारण परेशानी रहती है तथा बाहरी स्थानों से भी असन्तोषजनक सम्बन्ध रहते हैं।
५७२
'मीन' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश
मीनलग्न : पंचमभाव : गुरु पाँचवें भाव में मित्र 'चन्द्रमा' की राशि पर
स्थित उच्च के 'गुरु' के प्रभाव से जातक को सन्तान,
विद्या-बुद्धि तथा वाणी का श्रेष्ठ लाभ होता है। पिता,
राज्य तथा व्यवसाय-पक्ष में भी सफलताएँ मिलती हैं।
पाँचवीं मित्र-दृष्टि से नवम भाव को देखने से भाग्य
तथा धर्म की उन्नति होती है।
सातवीं नीच-दृष्टि से एकादश भाव को देखने से
आमदनी के मार्ग में कठिनाइयाँ आती है। नवीं दृष्टि
से स्वराशि में प्रथमभाव को देखने से शारीरिक सौन्दर्य, प्रभाव, स्वाभिमान, प्रतिष्ठा
तथा स्वास्थ्य की वृद्धि होती है।
'मीन' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश
मीनलग्न : षष्ठभाव : गुरु छठे भाव में मित्र 'सूर्य' की राशि पर स्थित
'गुरु' के प्रभाव से जातक शत्रु-पक्ष पर प्रभावशाली
रहता है, परन्तु शारीरिक सौन्दर्य एवं स्वास्थ्य में कमी
आती है। पाँचवीं दृष्टि से स्वराशि में नवम भाव को
देखने से पिता, राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में सफल-
ताएँ मिलती हैं। वह अपने शारीरिक परिश्रम के बल
पर उन्नति करता है।
सातवीं शत्रु-दृष्टि से द्वादश भाव से देखने से
खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी सम्बन्धों से असंतोष
होता है। नवीं मित्र-दृष्टि से द्वितीय भाव को देखने से धन तथा कुटुम्ब के सुख की
वृद्धि होती है।
'मीन' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश
मीनलग्न : सप्तमभाव : गुरु सातवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित
'गुरु' के प्रभाव से जातक को सुन्दर स्त्री मिलती है
तथा स्त्री एवं दैनिक व्यवसाय के क्षेत्र में सुख
सफलता की प्राप्ति होती है। पिता, राज्य तथा
व्यवसाय के क्षेत्रों की उन्नति होती है। पाँचवीं नीच-
तथा शत्रु-दृष्टि से एकादश भाव को देखने से आमदनी
कम रहती है।
सातवीं दृष्टि से स्वराशि में प्रथम भाव को
देखने से शारीरिक सौन्दर्य, स्वास्थ्य, यश, प्रतिष्ठा तथा प्रभाव की वृद्धि होती है।
नवीं शत्रु-दृष्टि से तृतीय भाव को देखने से पराक्रम में अत्यधिक वृद्धि होती है तथा
कुछ असन्तोष के साथ भाई-बहिनों का सुख मिलता है।
५७३
'मीन' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश
मीनलग्न : अष्टमभाव : गुरु आठवें भाव में शत्रु 'शुक्र' की राशि पर स्थित
'गुरु' के प्रभाव से जातक की आयु तथा पुरातत्त्व-
शक्ति में वृद्धि होती है। पिता, राज्य तथा व्यवसाय
के क्षेत्र में कठिनाइयाँ आती हैं। शारीरिक सौन्दर्य
तथा स्वास्थ्य में भी कमी रहती है। पाँचवीं शत्रु-दृष्टि
से द्वादश भाव को देखने से खर्च अधिक रहता है।
सातवीं मित्र-दृष्टि से द्वितीय भाव को देखने से
धन-कुटुम्ब की वृद्धि होती है। नवीं मित्र-दृष्टि से
चतुर्थ भाव को देखने से माता, भूमि एवं भवन का सुख
भी प्राप्त होता है।
'मीन' लग्न की कुण्डली में 'नवमभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश
मीनलग्न : नवमभाव : गुरु नवें भाव में मित्र 'मंगल' की राशि पर स्थित
'गुरु' के प्रभाव से जातक के भाग्य तथा धर्म की विशेष
उन्नति होती है। राज्य, पिता एवं व्यवसाय-पक्ष से
भी लाभ होता है। पाँचवीं दृष्टि से स्वराशि में प्रथम
भाव को देखने से शारीरिक सौन्दर्य, प्रभाव, यश तथा
स्वाभिमान की वृद्धि होती है।
सातवीं शत्रु-दृष्टि से तृतीयभाव को देखने से
पराक्रम की वृद्धि होती है तथा भाई-बहिनों का सुख
मिलता है। नवीं उच्च तथा मित्र-दृष्टि से पंचम भाव
को देखने से विद्या, बुद्धि तथा सन्तान-पक्ष से यथेष्ट सुख का लाभ होता है। ऐसा
व्यक्ति वाणी का धनी तथा कलात्मक रुचि वाला होता है।
'मीन' लग्न की कुण्डली में 'दशमभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश
मीनलग्न : दशमभाव : गुरु दसवें भाव में स्वराशि-स्थित गुरु के प्रभाव से
जातक को पिता, राज्य तथा व्यवसाय-के क्षेत्र में यथेष्ट
सफलताओं तथा लाभ की प्राप्ति होती है। पाँचवीं मित्र
दृष्टि से द्वितीयभाव को देखने से धन तथा कुटुम्ब के सुख
की वृद्धि होती है।
सातवीं मित्र-दृष्टि से चतुर्थ भाव को देखने से
माता, भूमि एवं भवन का श्रेष्ठ सुख मिलता है। नवीं
मित्र-दृष्टि से षष्ठभाव को देखने से शत्रु-पक्ष पर अत्यधिक
प्रभाव रहता है तथा झगड़ों में विजय मिलती है। ऐसा व्यक्ति सुखी, धनी पराक्रमी
शूरवीर, हुकूमत करने वाला तथा यशस्वी होता है।
५७४
'मीन' लग्न की कुण्डली में 'एकादशभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश
मीनलग्न : एकादशभाव : गुरु ग्यारहवें भाव में शत्रु 'शनि' की राशि पर
स्थित 'गुरु' के प्रभाव से जातक की आमदनी में
बहुत कमी आती है। पिता, राज्य तथा व्यवसाय के
क्षेत्र में भी हानि होती है। भाग्योन्नति में रुकावटें
आती हैं। पाँचवीं शत्रु-दृष्टि से तृतीय भाव को देखने
से पराक्रम की अल्प वृद्धि होती है, परन्तु भाई-बहिनों
के सुख में कमी आती है।
सातवीं उच्च-दृष्टि से पंचम भाव को देखने से
सन्तान तथा विद्या-बुद्धि के सुख में उन्नति होती है।
नवीं मित्र-दृष्टि से सप्तमभाव को देखने से स्त्री सुन्दर मिलती है तथा उससे सुख-
सहयोग मिलता है। दैनिक व्यवसाय के क्षेत्र में भी सफलता मिलती है।
'मीन' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश
मीनलग्न : द्वादशभाव : गुरु बारहवें भाव में शत्रु 'शनि' की राशि पर स्थित
'गुरु' के प्रभाव से जातक का खर्च अधिक रहता है तथा
बाहरी सम्बन्धों से भी असन्तोष होता है। शारीरिक
सौन्दर्य, स्वास्थ्य, पिता, राज्य तथा व्यवसाय के सुख
तथा लाभ में भी कमी रहती है। पाँचवीं मित्र-दृष्टि से
चतुर्थ भाव को देखने से माता, भूमि तथा भवन का सुख
प्राप्त होता है।
सातवीं मित्र-दृष्टि से षष्ठ भाव को देखने से शत्रु
पक्ष में सफलता मिलती है। नवीं शत्रु-दृष्टि से अष्टम-
भाव को देखने से आयु तथा पुरातत्त्व का लाभ होता है परन्तु दैनिक जीवन प्रभावपूर्ण
बना रहता है।
'मीन' लग्न में 'शुक्र'
'मीन' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश
मीनलग्न : प्रथमभाव : शुक्र पहले भाव में सामान्य मित्र 'गुरु' की राशि
पर स्थित उच्च के 'शुक्र' के प्रभाव से जातक के
शारीरिक सौन्दर्य, स्वास्थ्य तथा प्रभाव में वृद्धि होती
है। आयु भी लम्बी होती है। भाई-बहिनों के सुख तथा
पराक्रम में वृद्धि होती है तथा पुरातत्त्व शक्ति का लाभ
होता है। दैनिक जीवन आनन्दमय बना रहता है।
सातवीं मित्र तथा नीच-दृष्टि से सप्तम भाव
को देखने से स्त्री के सुख में कमी आती है, गृहस्थ
जीवन असन्तोषपूर्ण रहता है तथा दैनिक व्यवसाय के
क्षेत्र में भी कठिनाइयाँ आती हैं।
५७५
'मीन' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश
मीनलग्न : द्वितीयभाव : शुक्र दूसरे भाव में सामान्य मित्र 'मंगल' की राशि
पर स्थित 'शुक्र' के प्रभाव से जातक पुरुषार्थ द्वारा धन-वृद्धि
का प्रयत्न करता है, परन्तु पूर्ण सफलता नहीं मिलती ।
कुटुम्ब के सुख में भी कुछ कमी रहती है ।
सातवीं दृष्टि से स्वराशि में अष्टम भाव को देखने
से आयु की वृद्धि होती है तथा पुरातत्त्व-शक्ति का लाभ
होता है । ऐसा व्यक्ति अपनी समझदारी से रईसी ढंग
का जीवन बिताता है ।
'मीन' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश
मीनलग्न : तृतीयभाव : शुक्र तीसरे भाव में स्वराशि में स्थित 'शुक्र' के प्रभाव
से जातक को भाई-बहिनों की शक्ति तो मिलती है,
परन्तु उनसे कुछ परेशानी भी रहती है । पराक्रम की
वृद्धि होती है । जातक को आयु तथा पुरातत्त्व का भी
लाभ होता है ।
सातवीं शत्रु-दृष्टि से नवमभाव को देखने से भाग्य
तथा धर्म की उन्नति में कुछ रुकावटें आती हैं, परन्तु वह
अपने परिश्रम के बल पर पर्याप्त सुखी तथा समृद्ध जीवन
बिताता है ।
'मीन' लग्न की कुण्डली में 'चतुर्थभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश
मीनलग्न : चतुर्थभाव : शुक्र चौथे भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित
'शुक्र' के प्रभाव से जातक को माता, भूमि तथा भवन
का सुख कुछ कमी के साथ प्राप्त होता है, परन्तु आयु
एवं पुरातत्त्व की वृद्धि होती है । पराक्रम बढ़ता है तथा
भाई-बहिनों का सुख भी मिलता है ।
सातवीं सामान्य मित्र-दृष्टि से दशम भाव को
देखने से पिता, राज्य एवं व्यवसाय के द्वारा सुख, सह-
योग सम्मान तथा प्रतिष्ठा की प्राप्ति होती है, परन्तु
लाभ में कुछ कमी रहती है ।