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भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

३२५
'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'तृतीयभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश
कन्यालग्न : तृतीयभाव : शनि तीसरे भाव में शत्रु मंगल' की राशि पर
स्थित 'शुक्र' के प्रभाव से जातक को भाई-बहिनों से
परेशानी रहती है, पर शत्रु-पक्ष पर विजय मिलती
है और पराक्रम की वृद्धि होती है। तीसरी दृष्टि
से स्वराशि के पंचमभाव को देखने से विद्या-बुद्धि
का लाभ होता है, परन्तु सन्तान-पक्ष में सामान्य
कठिनाइयां आती हैं।
सातवीं मित्रदृष्टि से नवमभाव को देखने
से परिश्रम द्वारा भाग्योन्नति होती है। दसवीं शत्रुदृष्टि से द्वादशभाव की देखने से खर्च
में कठिनाई का अनुभव होता है तथा बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से असन्तोष रहता है।
'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'चतुर्थभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश
कन्या लग्न : चतुर्थभाव : शनि चौथे भाव में शत्रु 'गुरु' की राशि पर स्थित
'शनि' के प्रभाव से जातक को माता, भूमि तथा
भवन के सुख में कमी रहती है तथा सन्तान के
पक्ष से भी परेशानी रहती है, परन्तु विद्या-बुद्धि का
लाभ होता है। तीसरी दृष्टि से स्वराशि में षष्ठभाव
की देखने से शत्रु-पक्ष पर विजय मिलती है तथा
झगड़ों से सुख-दुःख दोनों ही मिलते हैं।
सातवीं मित्रदृष्टि से दशमभाव को देखने से
पिता, राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में परिश्रम द्वारा
सफलता मिलती है। दसवीं मित्रदृष्टि से प्रथमभाव की देखने से परिश्रम एवं प्रभाव
की वृद्धि होती है, परन्तु शरीर कुछ अस्वस्थ बना रहता है।
'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'पंचमभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश
कन्या लग्न : पंचमभाव : शनि पाँचवें भाव में स्वराशि-स्थित 'शनि' के प्रभाव से
जातक की कुछ कठिनाइयों के साथ विद्या-बुद्धि एवं
सन्तान का लाभ होता है, परन्तु सन्तान से कुछ परेशानी
भी होती है। शत्रु-पक्ष में उसे गुप्त युक्तियों से विजय
मिलती है। तीसरी शत्रुदृष्टि से सप्तमभाव की देखने से
स्त्री-पक्ष से कुछ परेशानी रहती है तथा व्यवसाय में भी
कठिनाइयाँ आती हैं।
सातवीं शत्रु-दृष्टि से एकादशभाव की देखने से
परिश्रम द्वारा लाभ होता है। दसवीं उच्च दृष्टि से द्वितीय भाव की देखने से धन-
कुटुम्ब की वृद्धि होती है। ऐसा व्यक्ति संघर्षपूर्ण सुखी-सम्पन्न जीवन बिताता है।

३२६
'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'षष्ठभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश
कन्या लग्न : षष्ठभाव : शनि छठे भाव में स्वराशि-स्थित 'शनि' के प्रभाव से
जातक शत्रु-पक्ष पर अपने बुद्धि-बल से सफलता पाता है,
परन्तु विद्या एवं सन्तान के पक्ष में सामान्य कठिनाइयाँ
आती हैं। तीसरी नीच दृष्टि से अष्टम भाव को देखने
से आयु पर अनेक बार संकट आते हैं तथा पुरातत्त्व की
हानि होती है।
सातवीं शत्रु-दृष्टि से द्वादश भाव को देखने से
खर्च की परेशानी रहती है, तथा बाहरी सम्बन्ध भी सुखद
नहीं रहते। दसवीं शत्रु-दृष्टि से तृतीय भाव को देखने से भाई-बहिनों द्वारा कष्ट
मिलता है, परन्तु पराक्रम में वृद्धि होती है।
'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'सप्तमभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश
कन्यालग्न : सप्तमभाव : शनि सातवें भाव में शत्रु 'गुरु' की राशि पर
स्थित 'शनि' के प्रभाव से जातक को स्त्री तथा व्यवसाय
के क्षेत्र में कठिनाइयाँ आती हैं तथा गुह्येन्द्रिय में विकार
भी होता है। सन्तान के पक्ष से भी परेशानी रहती है,
परन्तु शत्रु-पक्ष में सफलता मिलती है। तीसरी मित्र-
दृष्टि से नवम भाव को देखने से जातक बुद्धि-बल द्वारा
भाग्योन्नति करता हुआ धर्म का पालन भी करता है।
सातवीं मित्र-दृष्टि से प्रथम भाव को देखने से
शरीर में रोग रहता है, परन्तु प्रभाव की वृद्धि होती है।
दसवीं शत्रु-दृष्टि से चतुर्थ भाव को देखने से माता, भूमि एवं भवन के सुख में कमी
आती है। ऐसा जातक अपने जन्म-स्थान में परेशानी का अनुभव करता है।
'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'अष्टमभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश
कन्या लग्न : अष्टमभाव : शनि आठवें भाव में शत्रु 'मंगल' की राशि पर स्थित
'शनि' के प्रभाव से जातक की आयु पर अनेक बार
संकट आते हैं तथा पुरातत्त्व की हानि होती है। तीसरी
दृष्टि से स्वराशि के दशमभाव को देखने से पिता तथा
राज्य-पक्ष में कुछ कठिनाइयाँ आती हैं, किन्तु व्यवसाय
के क्षेत्र में बुद्धि-बल से सामान्य सफलता मिलती है।
सातवीं उच्च-दृष्टि से द्वितीयभाव को देखने से
धन-संचय के लिए कठोर परिश्रम करना पड़ता है।
दसवीं दृष्टि से पंचमभाव को देखने से सन्तान-पक्ष से
कष्ट होता है। विद्या कम रहती है परन्तु चातुर्य अधिक होता है।

३२७
'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'नवमभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश
कन्यालग्न : नवमभाव : शनि नवें भाव में मित्र 'शुक्र' की राशि पर स्थित
'शनि' के प्रभाव से जातक बुद्धि-बल से भाग्योन्नति
करता तथा स्वधर्म का सामान्य परिपालन करता है।
संतान तथा विद्या के क्षेत्र में सफलता मिलती है।
तीसरी शत्रु-दृष्टि से एकादशभाव को देखने से आमदनी
के लिए विशेष प्रयत्न करना पड़ता है।
सातवीं शत्रु-दृष्टि से तृतीयभाव को देखने से
पराक्रम की वृद्धि होती है, परन्तु भाई-बहिनों से कुछ
वैमनस्य रहता है। दसवीं दृष्टि से स्वराशि के षष्ठ-
भाव को देखने से शत्रु-पक्ष में विजय मिलती है तथा झगड़ों से लाभ होता है।
ऐसा व्यक्ति बड़ा चतुर, नीतिज्ञ, प्रभावशाली तथा हिम्मती होता है।
'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'दशमभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश
कन्या लग्न : दशमभाव : शनि दसवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित
शनि के प्रभाव से जातक की पिता-पक्ष से परेशानी
रहती है, परन्तु राज्य-पक्ष से सम्मान एवं व्यवसाय-
पक्ष से लाभ होता है। विद्या तथा सन्तान का भी सुख
मिलता है। तीसरी शत्रु-दृष्टि से द्वादशभाव को देखने
से खर्च के मामले में असन्तोष रहता है तथा बाहरी
स्थानों का सम्बन्ध भी सुखदायी नहीं रहता।
सातवीं शत्रु-दृष्टि से चतुर्थभाव को देखने से
माता एवं भूमि के सुख में कुछ कमी रहती है। दसवीं
शत्रु-दृष्टि से सप्तमभाव को देखने से स्त्री के सुख में कमी आती है तथा दैनिक
व्यवसाय के क्षेत्र में कठिन परिश्रम से ही सफलता मिलती है।
'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'एकादशभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश
कन्या लग्न : एकादशभाव : शनि ग्यारहवें भाव में शत्रु 'चन्द्रमा' की राशि पर
स्थित 'शनि' के प्रभाव से जातक की आमदनी में खूब
वृद्धि होती है तथा शत्रु-पक्ष से भी लाभ होता है।
तीसरी मित्र-दृष्टि से प्रथमभाव को देखने से शरीर में
रोग रहता है।
सातवीं दृष्टि से स्वराशि में पंचमभाव को देखने
से सन्तान तथा विद्या-बुद्धि की शक्ति प्राप्त होती है।
दसवीं नीच-दृष्टि से अष्टमभाव को देखने से पुरातत्त्व की
हानि होती है तथा आयु पर भी अनेक संकट आते हैं।

३२८
'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'द्वादशभाव' में स्थित 'शनि' का फलादेश
कन्या लग्न : द्वादशभाव : शनि
बारहवें भाव में शत्रु 'सूर्य' की राशि पर
स्थित 'शनि' के प्रभाव से जातक का खर्च अधिक रहता
है तथा बाहरी सम्बन्धों से परेशानी रहती है। तीसरी
उच्च-दृष्टि से द्वितीयभाव को देखने से धन तथा कुटुम्ब
की वृद्धि विशेष प्रयत्न करने से होती है।
सातवीं दृष्टि से स्वराशि में षष्ठभाव को देखने
से शत्रु-पक्ष पर प्रभाव रहता है, परन्तु रोगादि से कुछ
कष्ट होता है। दसवीं मित्र-दृष्टि से नवमभाव को देखने
से बुद्धि-योग द्वारा भाग्य की उन्नति होती है तथा धर्म
में रुचि भी रहती है। ऐसा व्यक्ति शान-शौकत में खूब खर्च करता है।
'कन्या' लग्न में 'राहु'
'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'प्रथमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
कन्या लग्न : प्रथमभाव : राहु
पहले भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित
'राहु' के प्रभाव से जातक शारीरिक दृष्टि से शक्ति-
शाली, दृढ़ मनोबल वाला तथा स्वाभिमानी होता है,
परन्तु कभी-कभी उसे शारीरिक कष्ट भी उठाने पड़ते हैं।
वह गहरी सूझ-बूझ वाला तथा कठोर परिश्रमी होता है।
मानसिक रूप से चिन्तित रहते हुए भी बड़े धैर्य से काम
लेकर उन्नति करता है।
'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'द्वितीयभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
कन्या लग्न : द्वितीयभाव : राहु
दूसरे भाव में मित्र 'शुक्र' की राशि पर स्थित
'राहु' के प्रभाव से जातक धन-कुटुम्ब की ओर से परे-
शान रहता है। वह गुप्त प्रयत्न तथा कठिन परिश्रम
द्वारा कुछ धन-संचय भी करता है तथा सकट रूप में
धनवान् भी समझा जाता है। कभी-कभी उसे आकस्मिक
लाभ तथा हानि—दोनों ही होते हैं।

३२६
'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'तृतीयभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
कन्यालग्न : तृतीयभाव : राहु
तीसरे भाव में शत्रु 'मंगल' की राशि पर स्थित
'राहु' के प्रभाव से जातक के पराक्रम में वृद्धि होती है,
परन्तु भाई-बहिनों से परेशानी मिलती है।
ऐसा व्यक्ति गुप्त युक्तियों एवं हिम्मत के बल
पर सफलता प्राप्त करता है तथा स्वार्थ-सिद्धि के लिए
भले-बुरे का विचार नहीं करता।
'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'चतुर्थभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
कन्या लग्न : चतुर्थभाव : राहु
चौथे भाव में शत्रु 'गुरु' की राशि पर स्थित
'राहु' के प्रभाव से जातक को माता का अच्छा सुख
मिलता है, परन्तु भूमि, भवन एवं घरेलू सुख में कमी
रहती है। घरेलू कारणों से कभी-कभी घोर संकटों का
सामना भी करना पड़ता है। परदेश में रहने का योग
भी उपस्थित होता है। जन्म-भूमि में उसे दुःख मिलता
है, परन्तु बाहरी स्थान में सुख प्राप्त होता है।
'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'पंचमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
कन्या लग्न : पंचमभाव : राहु पाँचवें भाव में मित्र 'शनि' की राशि पर स्थित
'राहु' के प्रभाव से जातक की सन्तान-पक्ष से कष्ट
मिलता है तथा विद्या के क्षेत्र में कठिनाइयां आती हैं।
ऐसा व्यक्ति विद्वान् न होने पर भी बातें करने
में बड़ा चतुर होता है तथा अपने स्वार्थ को सिद्ध करने
के लिए सत्यासत्य का विचार भी नहीं करता। कभी-
कभी उसे चिन्ताएं भी परेशान करती रहती हैं।

३३०
'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'षष्ठभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
कन्यालग्न : षष्ठभाव : राहु छठे भाव में मित्र 'शनि' की राशि पर स्थित
'राहु' के प्रभाव से जातक शत्रु-पक्ष पर प्रभावशाली रहता
है तथा झगड़ों एवं संकटों के समय हिम्मत तथा धैर्य से
काम लेकर, अपनी कमजोरी को प्रकट नहीं होने देता।
वह कठिन संकटों के समय भी विचलित नहीं
होता और उन पर अपनी गुप्त युक्तियों द्वारा नियन्त्रण
पा लेता है।
'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'सप्तमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
कन्या लग्न : सप्तमभाव : राहु
सातवें भाव में शत्रु 'गुरु' की राशि पर स्थित
'राहु' के प्रभाव से जातक की स्त्री-पक्ष से कष्ट मिलता
है तथा व्यवसाय के क्षेत्र में भी कठिनाइयाँ आती हैं।
उसको मूतेन्द्रिय में विकार भी हो सकता है।
ऐसा व्यक्ति गुप्त युक्तियों तथा कठिन परिश्रम
के बल पर ही अपना काम चलाता रहता है।
'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'अष्टमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
कन्यालग्न : अष्टमभाव : राहु आठवें भाव में शत्रु 'मंगल' की राशि पर
स्थित 'राहु' के प्रभाव से जातक को जीवन में अनेक
बार खतरों का सामना करना पड़ता है तथा मृत्यु-
तुल्य कष्ट भी भोगने पड़ते हैं। उसके पेट में भी विकार
रहता है।
गुप्त युक्तियों, धैर्य तथा साहस के बल पर वह
आगे बढ़ता है। उसे चिन्ताएँ तथा परेशानियाँ हमेशा
घेरे रहती हैं।
'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'नवमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
कन्यालग्न : नवमभाव : राहु नवें भाव में मित्र 'शुक्र' की राशि पर स्थित
'राहु' के प्रभाव से जातक अपनी भाग्योन्नति के लिए
कठोर परिश्रम करता है तथा धर्म का उचित पालन
नहीं कर पाता।
कभी-कभी उसे भाग्य के विषय में घोर संकटों
का सामना भी करना पड़ता है। ऐसा व्यक्ति अपनी
गुप्त युक्तियों, धैर्य तथा साहस के बल पर ही थोड़ी
बहुत उन्नति कर पाता है।

३३१
'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'दशमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
कन्यालग्न : दशमभाव : राहु दसवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित
उच्च 'राहु' के प्रभाव से जातक अपने पिता के साथ
संघर्ष करता हुआ उन्नति करता है। राज्य तथा
व्यवसाय के क्षेत्र में भी उसे गुप्त युक्ति एवं चातुर्य के
बल पर ही सम्मान एवं सफलता की प्राप्ति होती है।
कभी-कभी संकट भी आते हैं, परन्तु फिर स्थिति ठीक
ही आती है।
'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'एकादशभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
कन्यालग्न : एकादशभाव : राहु ग्यारहवें भाव में शत्रु 'चन्द्रमा' की राशि पर
स्थित 'राहु' के प्रभाव से जातक की आमदनी खूब रहती
है, परन्तु कठिनाइयों का सामना भी बहुत करना पड़ता
है। उसे कभी बहुत लाभ तो कभी बहुत घाटा होता है।
वह अपनी गुप्त युक्तियों, धैर्य, साहस तथा परिश्रम के
सहारे लाभ उठाता है, परन्तु कभी-कभी धोखा भी खा
जाता है।
'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'द्वादशभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
कन्यालग्न : द्वादशभाव : राहु बारहवें भाव में शत्रु 'सूर्य' की राशि पर स्थित
'राहु' के प्रभाव से जातक को खर्च-सम्बन्धी कठिनाइयां
बहुत रहती हैं तथा बाहरी सम्पर्कों से भी कष्ट
होता है।
ऐसा व्यक्ति गुप्त युक्तियों, धैर्य, साहस तथा
परिश्रम के सहारे अपना खर्च चलाता है। कभी-कभी
उसे आकस्मिक धन-लाभ भी हो जाता है।

३३२
'कन्या' लग्न में 'केतु'
'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'प्रथमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश
कन्या लग्न : प्रथमभाव : केतु पहले भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित
'केतु' के प्रभाव से जातक को शारीरिक कष्ट एवं
चिन्ताओं का सामना करना पड़ता है। शरीर पर कोई
गहरी चोट लगने अथवा रोग होने का योग भी बनता
है। शारीरिक सौन्दर्य में कमी रहती है। ऐसा व्यक्ति
गुप्त युक्तियों वाला, हिम्मती, धैर्यवान् तथा अख्खड़
स्वभाव का होता है।
'कन्या' लग्न की कुंडली में 'द्वितीयभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश
कन्या लग्न : द्वितीयभाव : केतु दूसरे भाव में मित्र 'शुक्र' की राशि पर
स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक के धन तथा
कौटुम्बिक सुख में कमी आती है। कभी-कभी
आकस्मिक धन-हानि भी होती है तो कभी-कभी
आकस्मिक रूप से धन-लाभ भी हो जाता है।
ऐसा व्यक्ति धन की वृद्धि के लिए अथक
परिश्रम करता है, तथा हर समय परेशान बना
रहता है।
'कन्या' लग्न की कुंडली में 'तृतीयभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश
कन्या लग्न : तृतीयभाव : केतु तीसरे भाव में शत्रु 'मंगल' की राशि पर
स्थित केतु के प्रभाव से जातक के पराक्रम की
अत्यधिक वृद्धि होती है, परन्तु भाई-बहिनों से
परेशानी मिलती है।
ऐसा व्यक्ति संकट के समय भी हिम्मत
नहीं हारता तथा अपने ही बाहु-बल का भरोसा
रखता है। वह कठिन परिश्रमी भी होता है।

३३३
'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'चतुर्थभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश
कन्या लग्न : चतुर्थभाव : केतु
चौथे भाव में शत्रु 'गुरु' की राशि पर स्थित उच्च के केतु के प्रभाव से जातक को माता, भूमि तथा भवन का सुख प्राप्त होता है। घरेलू जीवन ठाठदार होता है। इसके लिए उसे विशेष परिश्रम भी करना पड़ता है।
कभी-कभी घरेलू सुख में संकट भी आता है और कभी सुख में वृद्धि भी हो जाती है।
'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'पंचमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश
कन्या लग्न : पंचमभाव : केतु
पांचवें भाव में मित्र 'शनि' की राशि पर स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक की सन्तान-पक्ष से चिन्ता रहती है तथा विद्या-प्राप्ति के लिए कठिन परिश्रम करना पड़ता है।
ऐसा व्यक्ति अपनी विद्या-बुद्धि में कमी को स्वयं अनुभव करता है, परन्तु फिर भी स्वयं को बड़ा समझदार तथा योग्य प्रदर्शित करता है। वह बातचीत में बड़ा तेज होता है।
'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'षष्ठभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश
कन्या लग्न : षष्ठभाव : केतु
छठे भाव में मित्र 'शनि' की राशि पर स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक शत्रु-पक्ष पर अपना विशेष प्रभाव रखता है। उसे ननसाल-पक्ष से परेशानी उठानी पड़ती है।
ऐसा व्यक्ति बड़ा धैर्यवान्, गुप्त युक्तियों वाला, बहादुर, निर्भय तथा अक्खड़ स्वभाव का होता है और इन्हीं विशेषताओं के कारण अपना काम बना लेने में सफलता भी प्राप्त करता है।

३३४
'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'सप्तमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश
कन्यालग्न : सप्तमभाव : केतु सातवें भाव में शत्रु 'गुरु' की राशि पर स्थित
'केतु' के प्रभाव से जातक की स्त्री-पक्ष से कष्ट
मिलता है तथा व्यवसाय के क्षेत्र में भी बड़ी कठि-
नाइयाँ आती हैं, परन्तु वह अपनी गुप्त युक्ति, धैर्य-
तथा साहस के बल पर उनके निराकरण का प्रयत्न
करता है। उसका गृहस्थ-जीवन बड़ी कठिनाइयों से
सफल बनता है। उसकी मूलेन्द्रिय में विकार होने की
संभावना भी रहती है।
'कन्या' लग्न की कुंडली में 'अष्टमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश
कन्यालग्न : अष्टमभाव : केतु
आठवें भाव में शत्रु 'मंगल' की राशि पर स्थित
'केतु' के प्रभाव से जातक के जीवन में अनेक बार
प्राणान्तक कष्ट उपस्थित होता है तथा पुरातत्त्व की
हानि भी होती है। उसके पेट में भी विकार रहता
है।
ऐसा व्यक्ति बड़ा परिश्रमी, क्रोधी, धैर्यवान्,
हिम्मत तथा तेजी से काम करने वाला होता है।
'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'नवमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश
कन्यालग्न : नवमभाव : केतु
नवें भाव में मित्र 'शुक्र' की राशि पर स्थित
'केतु' के प्रभाव से जातक की धर्म-क्षेत्र में कमी रहती
है तथा भाग्योन्नति में भी बड़े संकट आते हैं।
ऐसा व्यक्ति अपने चातुर्य, गुप्त युक्तियों,
बुद्धि तथा साहस के बल पर संकटों से अपनी रक्षा
करता है तथा कभी-कभी विशेष चिन्तनीय स्थितियों
में होकर भी गुजरता है।

३३५
'कन्या' लग्न की कुंडली में 'दशमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश
कन्या लग्न : दशमभाव : केतु
दसवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर
स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक को पिता के क्षेत्र
में हानि उठानी पड़ती है तथा राज्य एवं व्यवसाय
के क्षेत्र में अधिक प्रभाव स्थापित नहीं होता। उसे
भाव-हानि, धन-हानि आदि का शिकार बनना पड़ता
है। वह झगड़े-झंझट तथा परेशानियों में अक्सर फंसता
रहता है।
'कन्या' लग्न की कुंडली में 'एकादशभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश
कन्या लग्न : एकादशभाव : केतु
ग्यारहवें भाव में शत्रु 'चन्द्रमा' की राशि
पर स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक की आमदनी
के साधनों में वृद्धि होती है, परन्तु उसे मानसिक-
परेशानियों भी बहुत रहती हैं। कभी-कभी उसे संकट
एवं हानि का सामना करना पड़ता है तो कभी-कभी
आकस्मिक लाभ भी होता है। ऐसा व्यक्ति बड़ा
धैर्यवान् तथा परिश्रमी होता है।
'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'द्वादशभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश
कन्या लग्न : द्वादशभाव : केतु
बारहवें भाव में शत्रु 'सूर्य' की राशि पर
स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक को खर्चे के कारण
अनेक चिन्ताओं तथा परेशानियों का सामना
करना पड़ता है। बाहरी स्थानों के सम्बन्ध भी
कष्टकारक सिद्ध होते हैं। वह कभी-कभी संकटों
का शिकार भी बनता है, परन्तु अपने धैर्य एवं
गुप्त युक्तियों के बल पर जैसे-तैसे छुटकारा भी पा
लेता है।

३३६
'तुला' लग्न
७६६
['तुला' लग्न की कुण्डलियों के विभिन्न भावों में स्थित विभिन्न
ग्रहों के फलादेश का पृथक्-पृथक् वर्णन]
'तुला' लग्न का फलादेश
'तुला' लग्न में जन्म लेने वाला जातक गौर वर्ण, शिथिल शरीर तथा मोटी
नाक वाला होता है। वह कफ प्रकृति वाला एव वीर्यविकारयुक्त भी होता है।
ऐसा व्यक्ति गुणी, धनी, यशस्वी, परोपकारी, प्रियवादी, सत्यवादी, सतोगुणी,
तीर्थ-प्रेमी, निर्लोभ, व्यवसाय-कुशल, ज्योतिषी, भ्रमणशील तथा अपने कुल का भूषण
होता है। वह राज्य द्वारा सम्मानित, देव-पूजन में चित्त लगानेवाला तथा पर-स्त्रियों
से प्रेम रखने वाला भी होता है।
'तुला' लग्न में जन्म लेने वाले जातक को अपनी आरम्भिक अवस्था में दुःख
भोगना पड़ता है, मध्यमावस्था में वह सुख प्राप्त करता है तथा अन्तिमावस्था
सामान्य स्थिति में बीतती है।
'तुला' लग्न के जातक का भाग्योदय ३१ अथवा ३२ वर्ष की आयु में
होता है।
'तुला' लग्न वालों को अपनी जन्म-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित
विभिन्न ग्रहों का स्थायी फलादेश आगे दी गई उदाहरण-कुण्डली संख्या ७७० से
८७७ के बीच देखना चाहिए।
गोचर-कुण्डली से ग्रहों का फलादेश किन उदाहरण-कुण्डलियों में देखें, इसे
आगे लिखे अनुसार समझ लेना चाहिए।

३३७
'तुला' लग्न में 'सूर्य' का फलादेश
१—'तुला' लग्न वालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित
'सूर्य' का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या ७७० से ७८१ के बीच देखना
चाहिए।
२—'तुला' लग्न वालों को गोचर-कुण्डली के विभिन्न बालों में स्थित 'सूर्य'
का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए—
चित महीने में 'सूर्य'—
(क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या ७७०
(ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या ७७१
(ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या ७७२
(घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या ७७३
(ङ) 'सिंह' राशि पर हो की संख्या ७७४
(च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या ७७५
(छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या ७७६
(ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या ७७७
(झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या ७७८
(ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या ७७९
(ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या ७८०
(ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या ७८१
'तुला' लग्न में 'चन्द्रमा' का फलादेश
१—'तुला' लग्न वालों की अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित
'चन्द्रमा' का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या ७८२ के ७९३ के बीच देखना
चाहिए।
२—'तुला' लग्न वालों की गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित
'चन्द्रमा' का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए—
जिस दिन 'चन्द्रमा'—
(क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या ७८२
(ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या ७८३
(ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या ७८४
(घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या ७८५
(ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या ७८६
(च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या ७८७

३३८
(छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या ७८८
(ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या ७८६
(झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या ७६०
(ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या ७६१
(ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या ७६२
(ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या ७६३
'तुला' लग्न में 'मंगल' का फलादेश
१—'तुला' लग्न वालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित
'मंगल' का स्थायी फलादेश संख्या उदाहरण-कुण्डली ७६४ से ८०५ के बीच देखना
चाहिए।
२—'तुला' लग्न वालों को गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'मंगल'
का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए—
जिस महीने में 'मंगल'—
(क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या ७६४
(ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या ७६५
(ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या ७६६
(घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या ७६७
(ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या ७६८
(च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या ७६६
(छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या ८००
(ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या ८०१
(झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या ८०२
(ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या ८०३
(ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या ८०४
(ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या ८०५
'तुला' लग्न में 'बुध' का फलादेश
१—'तुला' लग्न वालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित
'बुध' का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या ८०६ से ८१७ के बीच देखना
चाहिए।
२—'तुला' लग्न वालों को गोचर-कुण्डली से विभिन्न भावों में स्थित 'मंगल'

३३६
का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए—
जिस महीने में 'बुध'—
(क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या ८०६
(ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या ८०७
(ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या ८०८
(घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या ८०९
(ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या ८१०
(च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या ८११
(छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या ८१२
(ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या ८१३
(झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या ८१४
(ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या ८१५
(ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या ८१६
(ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या ८१७
'तुला' लग्न में 'गुरु' का फलादेश
१—'तुला' लग्न वालों की अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित
'गुरु' का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या ८१८ से ८२९ के बीच देखना
चाहिए ।
२—'तुला' लग्न वालों की गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'गुरु'
का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए—
जिस वर्ष में 'गुरु'—
(क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या ८१८
(ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या ८१९
(ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या ८२०
(घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या ८२१
(ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या ८२२
(च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या ८२३
(छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या ८२४
(ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या ८२५ यत
(झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या ८२६
(ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या ८२७
(ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या ८२८
(ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या ८२९

३. तृतीय खण्ड: षष्ठ, सप्तम, अष्टम एवं नवम भावस्थ ग्रह-फल, रोग, विवाह व भाग्य

३४०
'तुला' लग्न में 'शुक्र' का फलादेश
१—'तुला' लग्न वालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित
'शुक्र' का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या ८३० से ८४१ के बीच देखना
चाहिए।
२—'तुला' लग्न वालों को गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'शुक्र'
का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए—
चित्त महीने में 'शुक्र'—
(क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या ८३०
(ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या ८३१
(ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या ८३२
(घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या ८३३
(ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या ८३४
(च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या ८३५
(छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या ८३६
(ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या ८३७
(झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या ८३८
(ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या ८३९
(ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या ८४०
(ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या ८४१
'तुला' लग्न में 'शनि' का फलादेश
१. 'तुला' लग्न वालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित
'शनि' का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या ८४२ से ८५३ के बीच देखना
चाहिए।
२. 'तुला' लग्न वालों की गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'शनि'
का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए।
जिस वर्ष में 'शनि'—
(क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या ८४२
(ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या ८४३
(ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या ८४४
(घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या ८४५
(ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या ८४६
(च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या ८४७

३४१
(छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या ८४८
(ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या ८४९
(झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या ८५०
(ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या ८५१
(ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या ८५२
(ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या ८५३
'तुला' लग्न में 'राहु' का फलादेश
१. 'तुला' लग्न वालों की अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित
'राहु' का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या ८५४ से ८६५ के बीच देखना
चाहिए।
२. 'तुला' लग्न वालों को गोचर-कुण्डली के विभिन्न भागों में स्थित 'राहु'
का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए—
जिस वर्ष में 'राहु'—
(क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या ८५४
(ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या ८५५
(ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या ८५६
(घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या ८५७
(ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या ८५८
(च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या ८५६
(छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या ८६०
(ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या ८६१
(झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या ८६२
(ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या ८६३
(ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या ८६४
(ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या ८६५
'वृष' लग्न में 'केतु' का फलादेश
१. 'तुला' लग्न वालों को अपनी जन्म-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित
'केतु' का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या ८६६ से ८७७ के बीच देखना
चाहिए।
२. 'तुला' लग्न वालों को गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'केतु'

३४२
का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण कुण्डलियों में देखना चाहिए—
जिस वर्ष में 'केतु'—
(क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या ८६६
(ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या ८६७
(ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या ८६८
(घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या ८६९
(ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या ८७०
(च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या ८७१
(छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या ८७२
(ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या ८७३
(झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या ८७४
(ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या ८७५
(ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या ८७६
(ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या ८७७
●
'तुला' लग्न में 'सूर्य'
'तुला' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश
तुला लग्न : प्रथमभाव : सूर्य
शरीर-स्थान में अपने शत्रु शुक्र की राशि पर
स्थित नीच के शनि के प्रभाव से जातक की शरीर में
सदा दुर्बलता तथा सौन्दर्य की कमी का अनुभव होता
है। वह किसी की गुलामी करने में हानि समझता है।
पराक्रम की भी कमी रहती है। सातवीं उच्च दृष्टि से
मित्र मंगल की राशि में सप्तम भाव को देखने से स्त्री
पक्ष से लाभ होता है। सुन्दर स्त्री मिलती है। भोग-
शक्ति तथा व्यवसाय पक्ष को उन्नति होती है।
'तुला' लग्न की कुण्डली में 'द्वितीयभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश
तुला लग्न : द्वितीयभाव : सूर्य
दूसरे भाव में मित्र 'मंगल' की राशि पर स्थित
'सूर्य' के प्रभाव से जातक को धन तथा कुटुम्ब का
पर्याप्त सुख मिलता है और वह धनी तथा प्रभावशाली
भी होता है।
सातवीं शत्रुदृष्टि से अष्टमभाव को देखने से
पुरातत्व तथा आयु के पक्ष में कुछ कमी बनी
रहती है।

३४३
'तुला' लग्न की कुण्डली में 'तृतीयभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश
तुला लग्न : तृतीयभाव : सूर्य
तीसरे भाव में मित्र 'गुरु' की राशि पर स्थित
'सूर्य' के प्रभाव से जातक की भाई-बहिनों के सुख
तथा पराक्रम में वृद्धि होती है। ऐसा व्यक्ति अपने
बाहु-बल का भरोसा अधिक रखता है।
सातवीं मित्रदृष्टि से नवमभाव को देखने से
भाग्य तथा धर्म में वृद्धि होती है तथा आमदनी अच्छी
बनी रहती है।
७७२
'तुला' लग्न की कुण्डली में 'चतुर्थभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश
तुला लग्न : चतुर्थभाव : सूर्य
चौथे भाव में शत्रु 'शनि' की राशि पर स्थित
'सूर्य' के प्रभाव से जातक की भूमि, भवन तथा माता
का अपूर्ण सुख रहता है तथा आय के पक्ष में भी
कठिनाइयां आती हैं।
सातवीं मित्रदृष्टि से दशमभाव को देखने से
पिता, राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में सुख, सफलता,
यश तथा सम्मान की प्राप्ति होती है।
७७३
'तुला' लग्न की कुण्डली में 'पंचमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश
तुला लग्न : पंचमभाव : सूर्य
पाँचवें भाव में शत्रु 'शनि' की राशि पर स्थित
'सूर्य' के प्रभाव से जातक की सन्तान-पक्ष से असंतोषपूर्ण
लाभ होता है तथा विद्याध्ययन में भी बड़ी कठिनाइयों
से सफलता मिलती है।
सातवीं दृष्टि से स्वराशि के एकादश भाव को
देखने से बुद्धि-योग का तथा कठिन परिश्रम द्वारा श्रेष्ठ
आमदनी का लाभ मिलता है, परन्तु दिमाग में कुछ
परेशानियां भी रहती हैं।
७७४

३४४
'तुला' लग्न की कुण्डली में 'षष्ठभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश
तुलालग्न : षष्ठभाव : सूर्य छठे भाव में मित्र 'गुरु' की राशि पर स्थित
'सूर्य' के प्रभाव से जातक को शत्रु-पक्ष पर विजय
मिलती है तथा शत्रुओं से लाभ भी होता है । आमदनी
भी अच्छी रहती है।
सातवीं मित्रदृष्टि से द्वादश भाव को देखने से
खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी सम्बन्धों से लाभ
होता है। ऐसा व्यक्ति बड़ा बहादुर तथा हिम्मती
होता है।
'तुला' लग्न की कुण्डली में 'सप्तमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश
तुला लग्न : सप्तमभाव : सूर्य
सातवें भाव में मित्र 'मंगल' की राशि पर
स्थित 'सूर्य' के प्रभाव से जातक को सुन्दर पत्नी
मिलती है तथा स्त्री एवं व्यवसाय के पक्ष से लाभ
भी खूब होता है।
सातवीं नीचदृष्टि से प्रथमभाव को देखने से
शारीरिक सौन्दर्य तथा स्वास्थ्य में कमी रहती है
तथा चित्त भी चिन्ताग्रस्त बना रहता है।
'तुला' लग्न की कुण्डली में 'अष्टमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश
तुला लग्न : अष्टमभाव : सूर्य आठवें भाव में शत्रु 'शुक्र' की राशि पर स्थित
एकादशेश 'सूर्य' के प्रभाव से जातक कठिन परिश्रम से
धनोपार्जन करता है तथा बाहरी सम्बन्धों से लाभ होता
है। आयु की वृद्धि होती है तथा पुरातत्त्व-लाभ में कमी
आती है।
सातवीं मित्रदृष्टि से द्वितीय भाव को देखने से
जातक धन-वृद्धि के लिए प्रयत्नशील बना रहता है तथा
कुटुम्ब का सुख भी प्राप्त करता है।