सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

पृष्ठ 335, कुल 638 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 335

३४४
'तुला' लग्न की कुण्डली में 'षष्ठभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश
तुलालग्न : षष्ठभाव : सूर्य छठे भाव में मित्र 'गुरु' की राशि पर स्थित
'सूर्य' के प्रभाव से जातक को शत्रु-पक्ष पर विजय
मिलती है तथा शत्रुओं से लाभ भी होता है । आमदनी
भी अच्छी रहती है।
सातवीं मित्रदृष्टि से द्वादश भाव को देखने से
खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी सम्बन्धों से लाभ
होता है। ऐसा व्यक्ति बड़ा बहादुर तथा हिम्मती
होता है।
'तुला' लग्न की कुण्डली में 'सप्तमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश
तुला लग्न : सप्तमभाव : सूर्य
सातवें भाव में मित्र 'मंगल' की राशि पर
स्थित 'सूर्य' के प्रभाव से जातक को सुन्दर पत्नी
मिलती है तथा स्त्री एवं व्यवसाय के पक्ष से लाभ
भी खूब होता है।
सातवीं नीचदृष्टि से प्रथमभाव को देखने से
शारीरिक सौन्दर्य तथा स्वास्थ्य में कमी रहती है
तथा चित्त भी चिन्ताग्रस्त बना रहता है।
'तुला' लग्न की कुण्डली में 'अष्टमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश
तुला लग्न : अष्टमभाव : सूर्य आठवें भाव में शत्रु 'शुक्र' की राशि पर स्थित
एकादशेश 'सूर्य' के प्रभाव से जातक कठिन परिश्रम से
धनोपार्जन करता है तथा बाहरी सम्बन्धों से लाभ होता
है। आयु की वृद्धि होती है तथा पुरातत्त्व-लाभ में कमी
आती है।
सातवीं मित्रदृष्टि से द्वितीय भाव को देखने से
जातक धन-वृद्धि के लिए प्रयत्नशील बना रहता है तथा
कुटुम्ब का सुख भी प्राप्त करता है।