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भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

३१५
'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'नवमभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश
कन्या लग्न : नवमभाव : बुध नवें भाव में मित्र 'शुक्र' की राशि पर स्थित
'बुध' के प्रभाव से जातक के भाग्य एवं धर्म की उन्नति
होती है तथा राज्य, पिता एवं व्यवसाय के क्षेत्र में भी
सफलताएँ मिलती हैं ।
सातवीं मित्रदृष्टि से तृतीयभाव को देखने से
भाई-बहिन के सुख तथा पराक्रम में वृद्धि होती है। ऐसा
व्यक्ति सज्जन, सुखी, यशस्वी तथा धनी होता है।
'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'दशमभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश
कन्या लग्न : दशमभाव : बुध दसवें भाव में स्वक्षेत्री 'बुध' के प्रभाव से जातक
को राज्य, पिता एवं व्यवसाय के क्षेत्र में अत्यधिक
सफलता, यश तथा सम्मान की प्राप्ति होती है। ऐसा
व्यक्ति सुन्दर, यशस्वी, स्वाभिमानी तथा सुखी होता है।
सातवीं मित्रदृष्टि से चतुर्थभाव को देखने से
माता, भूमि, भवन आदि का सुख भी पर्याप्त उपलब्ध
होता है। घरेलू जीवन सुख, शान्ति तथा ऐश्वर्य से पूर्ण
रहता है।
'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'एकादशभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश
कन्या लग्न : एकादशभाव : बुध ग्यारहवें भाव में शत्रु 'चन्द्रमा' की राशि पर
स्थित 'बुध' के प्रभाव से जातक की आमदनी अच्छी
रहती है तथा पिता, राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में भी
सफलताएँ प्राप्त होती हैं। शारीरिक सौन्दर्य, मनोबल
एवं सुख में भी वृद्धि होती है।
सातवीं मित्रदृष्टि से पञ्चमभाव को देखने से
जातक को विद्या, बुद्धि एवं सन्तान के क्षेत्र में भी विशेष
उन्नति प्राप्त होती है। ऐसा व्यक्ति सुखी, धनी, विद्वान्
तथा ऐश्वर्यशाली होता है।

३१६
'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'द्वादशभाव' स्थित 'बुध' का फलादेश
कन्यालग्न : द्वादशभाव : बुध बारहवें भाव में मित्र 'सूर्य' की राशि पर स्थित
'बुध' के प्रभाव से जातक का खर्च अधिक होता है तथा
बाहरी स्थानों के सम्पर्क से सम्मान तथा लाभ की प्राप्ति
होती है। परन्तु पिता, राज्य तथा व्यवसाय के क्षेत्र में
असन्तोष रहता है।
सातवीं मित्रदृष्टि से षष्ठभाव को देखने से शत्रु-
पक्ष पर सफलता मिलती है। ऐसा व्यक्ति दूरदर्शी,
विवेकी तथा बुद्धिमान् होता है।
'कन्या' लग्न में 'गुरु'
'कन्या' लग्न की कुंडली में 'प्रथमभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश
कन्यालग्न : प्रथमभाव : बुध पहले भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित
'गुरु' के प्रभाव से जातक को श्रेष्ठ शारीरिक सौन्दर्य एवं
स्वास्थ्य की प्राप्ति होती हैं। माता, भूमि तथा भवन का
सुख भी मिलता है। पांचवीं नीचदृष्टि से पंचमभाव को
देखने से विद्या, बुद्धि एवं सन्तान के क्षेत्र में कठिनाइयां
आती रहती हैं। सातवीं दृष्टि से स्वराशि में सप्तमभाव
को देखने से स्त्री एवं व्यवसाय के क्षेत्र में सुख मिलता
है। नवीं शत्रुदृष्टि से नवमभाव को देखने से भाग्योन्नति
एवं धर्म के क्षेत्र में बाधाएं आती रहती हैं। परन्तु ऐसा
व्यक्ति सज्जन तथा धनी होता है।
'कन्या' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश
कन्यालग्न : द्वितीयभाव : बुध दूसरे भाव में सामान्य शत्रु 'शुक्र' की राशि पर
स्थित 'गुरु' के प्रभाव से जातक को धन, कुटुम्ब का
सुख मिलता है, परन्तु माता एवं स्त्री के सुख में कुछ
बाधाएं आती हैं जबकि व्यवसाय-पक्ष की उन्नति होती
है। पाँचवीं शत्रु-दृष्टि से अष्टमभाव की देखने से शत्रु-
पक्ष में प्रभाव स्थापित होता है।
सातवीं मित्र-दृष्टि से अष्टमभाव को देखने से
आयु तथा पुरातत्त्व का लाभ होता है। नवीं मित्र-
दृष्टि से एकादशभाव की देखने से पिता, राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में लाभ, यश
तथा सम्मान की प्राप्ति होती है।

३१७
'कन्या' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश
कन्या लग्न : तृतीयभाव : गुरु तीसरे भाव में मित्र 'मंगल' की राशि पर स्थित
'गुरु' के प्रभाव से जातक के पराक्रम तथा भाई-बहिन के
सुख में वृद्धि होती है और माता, भूमि तथा भवन का
सुख भी प्राप्त होता है। पाँचवीं दृष्टि से स्वराशि में
सप्तमभाव को देखने से स्त्री तथा व्यवसाय के पक्ष से
भी सफलताएँ मिलती हैं। स्त्री सुन्दर मिलती है।
सातवीं शत्रु-दृष्टि से नवमभाव को देखने से भाग्य
तथा धर्म के क्षेत्र में कुछ रुकावटों के साथ उन्नति होती
है। नवीं उच्चदृष्टि से एकादशभाव को देखने से आमदनी बहुत अच्छी रहती है।
ऐसा जातक धनी तथा सुखी रहता है।
'कन्या' लग्न की कुण्डली से 'चतुर्थभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश
कन्या लग्न : चतुर्थभाव : बुध चौथे भाव में स्वक्षेत्री 'गुरु' के प्रभाव से जातक
को माता, भूमि तथा भवन का यथेष्ट सुख मिलता है।
स्त्री तथा व्यवसाय के क्षेत्र में भी सफलताएँ मिलती
हैं।
पाँचवीं मित्र-दृष्टि से अष्टमभाव को देखने से
आयु तथा पुरातत्त्व का लाभ होता है। सातवीं मित्र-
दृष्टि से दशमभाव को देखने से पिता, राज्य एवं
व्यवसाय के क्षेत्र में सफलताएं मिलती रहती हैं।
नवीं मित्र-दृष्टि से द्वादशभाव को देखने से खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी स्थानों
के सम्बन्ध में लाभ मिलता है।
'कन्या' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश
कन्या लग्न : पंचमभाव : गुरु पाँचवें भाव में शत्रु 'शनि' की राशि पर नीच
के गुरु के प्रभाव से जातक की सन्तान पक्ष से कष्ट
मिलता है तथा विद्या एवं बुद्धि में कमी रहती है। मातृ-
पक्ष भी कमजोर रहता है। पांचवी शत्रु-दृष्टि से नवम-
भाव को देखने से भाग्य एवं धर्म की सामान्य वृद्धि
होती है। सातवीं उच्च-दृष्टि से एकादशभाव को देखने
से आमदनी में वृद्धि होती है तथा नवीं मित्र-दृष्टि से
प्रथमभाव को देखने से शारीरिक, शक्ति, सम्मान, प्रभाव
एवं कार्य-कुशलता में वृद्धि होती है। ऐसा व्यक्ति सुखी
तथा सामान्य धनी होता है।

३१८
'कन्या' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश
कन्या लग्न : षष्ठभाव : गुरु छठे भाव में शत्रु 'शनि' की राशि पर स्थित
'गुरु' के प्रभाव से जातक शत्रु-पक्ष में नम्रता से काम
निकालता है। माता, भूमि एवं भवन के सुख में भी
कमी रहती है। पाँचवीं मित्र-दृष्टि से दशमभाव को
देखने से पिता, राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में कुछ
सफलताओं, सुख तथा यश की प्राप्ति होती है।
सातवीं मित्र-दृष्टि से द्वादशभाव को देखने से
खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी संबंधों से लाभ
होता है। नवीं शत्रु-दृष्टि से द्वितीयभाव को देखने से कुटुम्ब का सामान्य सुख
मिलता है तथा धन-संचय के लिए अधिक परिश्रम करना पड़ता है।
'कन्या' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश
कन्या लग्न : सप्तमभाव : गुरु सातवें भाव में स्वक्षेत्री 'गुरु' के प्रभाव से
जातक को स्त्री एवं व्यवसाय-पक्ष में पर्याप्त लाभ
मिलता है। माता, भूमि तथा मकान का यथेष्ट सुख
भी प्राप्त होता है। पाँचवीं उच्चदृष्टि से एकादशभाव
को देखने से आमदनी में बहुत वृद्धि होती है।
सातवीं मित्र-दृष्टि से प्रथमभाव को देखने से
शारीरिक-सुख, मान एवं सौन्दर्य की प्राप्ति होती है।
नवीं मित्र-दृष्टि से तृतीयभाव को देखने से भाई-बहिनों
के सुख एवं पराक्रम में वृद्धि होती है। ऐसा व्यक्ति
सुखी, धनी तथा यशस्वी होता है।
'कन्या' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश
कन्या लग्न : अष्टमभाव : गुरु आठवें भाव में मित्र 'मंगल' की राशि पर
स्थित 'गुरु' के प्रभाव से जातक को आयु तथा पुरातत्त्व
का लाभ होता है। परन्तु स्त्री तथा व्यवसाय के सुख
में कुछ कमी आती है।
पाँचवीं मित्र-दृष्टि से द्वादशभाव को देखने से
खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी सम्बन्धों से लाभ
होता है। सातवीं शत्रु-दृष्टि से द्वितीयभाव को देखने से
धन-वृद्धि के लिए विशेष परिश्रम करना पड़ता है तथा
कौटुम्बिक सुख में भी कमी आती है। नवीं दृष्टि से
स्वराशि में चतुर्थभाव को देखने से माता, भूमि तथा भवन का सुख कुछ परेशानियों
के साथ मिलता है।

३१६
'कन्या' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश
कन्या लग्न : नवमभाव : गुरु नवें भाव में शत्रु 'शुक्र' की राशि पर स्थित
'गुरु' के प्रभाव से जातक की भाग्योन्नति में कुछ कठि-
नाइयाँ आती हैं। स्त्री तथा व्यवसाय के क्षेत्र में भी कुछ
कमी रहती है, परन्तु माता, भूमि तथा भवन का सुख
प्राप्त होता है। पाँचवीं मित्र-दृष्टि से प्रथमभाव को
देखने से सुख-सम्मान की वृद्धि होती है तथा भोगेच्छा
प्रबल रहती है।
सातवीं मित्र-दृष्टि से तृतीयभाव को देखने से
भाई-बहिन के सुख तथा पराक्रम में वृद्धि होती है। नवीं नीच-दृष्टि से पंचमभाव
को देखने से विद्या तथा सन्तान के पक्ष में कुछ कमजोरी आती है।
'कन्या' लग्न की कुण्डली के 'दशमभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश
कन्या लग्न : दशमभाव : गुरु दसवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित
'गुरु' के प्रभाव से जातक की पिता, राज्य तथा व्यव-
साय से लाभ होता है। स्त्री सुन्दर तथा प्रभावशाली
मिलती है। पाँचवीं शत्रु-दृष्टि से द्वितीयभाव को देखने
से धन, कुटुम्ब का सामान्य लाभ होता है।
सातवीं दृष्टि अपनी राशि में चतुर्थभाव को
देखने से माता, भूमि तथा भवन का श्रेष्ठ सुख मिलता
है।
नवीं शत्रु-दृष्टि से षष्ठभाव को देखने के कारण
शत्रु-पक्ष में शान्ति-नीति से विजय मिलती है तथा उससे लाभ भी होता है।
'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'एकादशभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश
कन्या लग्न : एकादशभाव : गुरु ग्यारहवें भाव में मित्र 'चन्द्रमा' की राशि पर
स्थित 'गुरु' के प्रभाव से जातक की आमदनी बढ़ती है
तथा माता, भूमि एवं मकान का यथेष्ट सुख भी मिलता
है। पाँचवीं मित्रदृष्टि से तृतीय भाव को देखने से पराक्रम
एवं भाई-बहिनों के सुख में वृद्धि होती है।
सातवीं नीचदृष्टि से पंचमभाव को देखने से
सन्तान-पक्ष से परेशानी रहती है तथा विद्या-बुद्धि में
कमी आती है। नवीं दृष्टि से स्वराशि में सप्तम भाव को
देखने से सुन्दर तथा योग्य पत्नी मिलती है। भोगादि का
श्रेष्ठ सुख प्राप्त होता है तथा व्यवसाय में भी उन्नति होती है।

३२०
'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'द्वादशभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश
कन्या लग्न : द्वादशभाव : गुरु बारहवें भाव में मित्र 'सूर्य' की राशि पर स्थित
'गुरु' के प्रभाव से जातक का खर्च अधिक रहता है
तथा बाहरी संबंधों से लाभ भी मिलता है। स्त्री के
सुख में कमी आती है। पाँचवीं दृष्टि से स्वराशि में
चतुर्थभाव को देखने से माता, भूमि तथा भवन का
सामान्य सुख मिलता है।
सातवीं शत्रदृष्टि से षष्ठभाव को देखने से शत्रु
पक्ष में नम्रता से काम निकालना पड़ता है। नवीं
मित्रदृष्टि से अष्टम भाव को देखने से आयु तथा
पुरातत्त्व का लाभ होता है। ऐसा जातक सामान्यतः सुखी जीवन बिताता है।
'कन्या' लग्न में 'शुक्र'
'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'प्रथमभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश
कन्या लग्न : प्रथमभाव : शुक्र पहले भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित
नीच के 'शुक्र' के प्रभाव से जातक के धन तथा
कौटुम्बिक सुख में कुछ कमी रहती है और वह अधर्म-
पूर्वक भी धन कमाने का प्रयत्न करता है।
सातवीं उच्चदृष्टि से सप्तम भाव को देखने से
स्त्री सुन्दर तथा भाग्यवान् मिलती है तथा व्यवसाय एवं
भोगादि में भी पर्याप्त सफलता प्राप्त होती है।
'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'द्वितीयभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश
कन्या लग्न : द्वितीयभाव : शुक्र दूसरे भाव में स्वराशि स्थित शुक्र के प्रभाव
से जातक के धन तथा कुटुम्ब की वृद्धि होती है। वह
भाग्यवान्, यशस्वी तथा धर्मात्मा भी होता है।
सातवीं शत्रुदृष्टि से अष्टम भाव को देखने से
जातक को आयु तथा पुरातत्त्व का भी लाभ होता है।
ऐसा व्यक्ति चतुर, धनी, सुखी तथा यशस्वी होता है।

३२१
'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'तृतीयभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश
कन्या लग्न : तृतीयभाव : शुक्र तीसरे भाव में शत्रु 'मंगल' की राशि पर स्थित
'शुक्र' के प्रभाव से जातक को भाई-बहिन का अच्छा
सुख मिलता है तथा पराक्रम में भी वृद्धि होती है।
कौटुम्बिक सुख को भी वह बढ़ाता है।
सातवीं दृष्टि से स्वराशि वाले नवमभाव को
देखने से भाग्य तथा धर्म में बहुत वृद्धि होती है। ऐसा
व्यक्ति बहुत सुखी, धनी, धर्मात्मा तथा भाग्यशाली
होता है।
'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'चतुर्थभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश
कन्या लग्न : चतुर्थभाव : शुक्र चौथे भाव में शत्रु 'गुरु' की राशि पर स्थित
शुक्र' के प्रभाव से जातक को माता, भूमि तथा भवन का
यथेष्ट लाभ होता है तथा धन एवं कुटुम्ब का सुख भी
मिलता है।
सातवीं मित्रदृष्टि से दशमभाव को देखने से
राज्य, पिता तथा व्यवसाय के क्षेत्र में सुख, सम्मान तथा
लाभ की प्राप्ति होती है। ऐसा व्यक्ति धर्म का पालन भी
करता है।
'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'पंचमभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश
कन्या लग्न : पंचमभाव : शुक्र पांचवें भाव में मित्र 'शनि' की राशि पर स्थित
शुक्र के प्रभाव से जातक को सन्तान-पक्ष से श्रेष्ठ लाभ
होता है तथा विद्या-बुद्धि की वृद्धि के साथ धन, धर्म
तथा भाग्य की वृद्धि भी होती है।
सातवीं शत्रुदृष्टि से एकादशभाव को देखने से
जातक अपनी बुद्धि एवं चातुर्य के बल पर आमदनी को
बढ़ाता है तथा निरन्तर उन्नति करता रहता है।

३२२
'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'षष्ठभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश
कन्या लग्न : षष्ठभाव : शुक्र छठे भाव में मित्र 'शनि' की राशि पर स्थित
'शुक्र' के प्रभाव से जातक के भाग्य, धन तथा कौटुम्बिक
सुख में कुछ कमी आती है तथा धर्म में भी अरुचि रहती
है, फिर भी वह अपनी चतुराई द्वारा भाग्य तथा धन की
वृद्धि करता है तथा परिश्रम द्वारा शत्रु-पक्ष में सफलताएँ
पाता है। उसे झगड़े-मुकदमों से भी लाभ होता है।
सातवीं शत्रुदृष्टि से द्वादशभाव को देखने से खर्च
अधिक रहता है तथा बाहरी संबंधों से सुख एवं लाभ की
प्राप्ति होती है।
'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'सप्तमभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश
कन्या लग्न : सप्तमभाव : शुक्र सातवें भाव में सामान्य शत्रु 'गुरु' की राशि
पर स्थित उच्च के 'शुक्र' के प्रभाव से जातक की सुन्दर
स्त्री मिलती है तथा व्यवसाय के क्षेत्र में भी सफलताएँ
मिलती हैं। ऐसा व्यक्ति भोगी, धर्मात्मा, सुखी तथा
भाग्यवान् होता है।
सातवीं नीचदृष्टि से प्रथमभाव को देखने से
शारीरिक सौन्दर्य में कुछ कमी आती है। ऐसा व्यक्ति
धन-वृद्धि के लिए शारीरिक सुखों की चिन्ता नहीं करता।
'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'अष्टमभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश
कन्या लग्न : अष्टमभाव : शुक्र आठवें भाव में शत्रु 'मंगल' की राशि पर
स्थित 'शुक्र' के प्रभाव से जातक का भाग्य कमजोर
रहता है तथा धन-संचय में भी कठिनाइयाँ आती
हैं। धर्म का समुचित पालन भी नहीं हो पाता।
पर आयु तथा पुरातत्त्व का लाभ होता है।
सातवीं नीच दृष्टि से स्वराशि वाले द्वितीय
भाव को देखने से जातक गुप्त चातुर्य एवं कठोर
परिश्रम द्वारा धन-संचय करता है।

३२३
'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'नवमभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश
कन्या लग्न : नवमभाव : शुक्र नवें भाव में स्वराशि-स्थित 'शुक्र' के प्रभाव
से जातक बडा भाग्यशाली तथा धर्मात्मा होता है।
उसके धन, सम्मान तथा यश में भी वृद्धि होती है।
सातवीं सामान्य मित्रदृष्टि से तृतीयभाव को
देखने से भाई-बहिनों की शक्ति तथा पुरुषार्थ में वृद्धि
होती है। साथ ही धन एव कुटुम्ब का पूर्ण सुख भी
मिलता है।
'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'दशमभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश
कन्या लग्न : दशमभाव दसवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित
शुक्र' के प्रभाव से जातक को पिता, राज्य तथा
'व्यवसाय के क्षेत्र में विशेष सुख, सम्मान तथा
सफलताएँ प्राप्त होती हैं। वह अपने अच्छे कर्मों
से धन एव कुटुम्ब की वृद्धि करता है।
सातवीं सामान्य शत्रुदृष्टि से चतुर्थभाव को
देखने से माता, भूमि एवं भवन आदि का सुख
कुछ कमी के साथ प्राप्त होता है।
'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'एकादशभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश
कन्या लग्न : एकादशभाव : शुक्र ग्यारहवें भाव में शत्रु 'चन्द्रमा' की राशि
पर स्थित 'शुक्र' के प्रभाव से जातक की आमदनी
अच्छी रहती है। वह धनी, कुटुम्बवाला, धर्मात्मा,
भाग्यशाली तथा न्यायी होता है।
सातवीं मित्रदृष्टि से पंचमभाव को देखने
के कारण विद्या-बुद्धि की उन्नति होती है तथा
सन्तान-पक्ष से सुख मिलता है।
ऐसा व्यक्ति प्रभावयुक्त वाणी का धनी,
चतुर, निपुण, सुखी तथा यशस्वी होता है।

३२४
'कन्या' लग्न की कुण्डली में द्वादशभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश
कन्या लग्न : द्वादशभाव : शुक्र बारहवें भाव में शत्रु 'सूर्य' की राशि पर
स्थित शुक्र' के प्रभाव से जातक का खर्च अधिक
रहता है, बाहरी सम्बन्धों से हानि होती है, धन-
संचय नहीं हो पाता तथा भाग्योन्नति में व्यवधान
पड़ता है । कौटुम्बिक सुख में भी कमी रहती है ।
सातवीं मित्रदृष्टि से षष्ठभाव को देखने
से शत्रु-पक्ष एवं झगड़े-मुकदमों में सफलता एवं
लाभ की प्राप्ति होती है ।
'कन्या लग्न में 'शनि'
'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'प्रथमभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश
कन्या लग्न : प्रथमभाव - शनि पहले भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर
स्थित 'शनि' के प्रभाव से जातक का शरीर रोगी
रहता है । विद्या-बुद्धि तथा सन्तान का सुख प्राप्त
होता है, परन्तु सन्तान से वैमनस्य रहता है । शत्रु-
पक्ष पर विजय मिलती है । तीसरी शत्रुदृष्टि से
तृतीयभाव को देखने से भाई-बहिनों के सुख में कुछ
कमी रहती है । सातवीं शत्रुदृष्टि से सप्तमभाव
को देखने से स्त्री से कुछ वैमनस्य रहता है तथा
व्यवसाय के क्षेत्र में अधिक मेहनत करनी पड़ती
है । दसवीं मित्रदृष्टि से दशमभाव को देखने से पिता की ओर से सामान्य परेशानी
रहती है तथा राज्य एवं व्यापार के क्षेत्र में सफलता मिलती है ।
'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'द्वितीयभाव' स्थित 'शनि का फलादेश
कन्या लग्न : द्वितीयभाव - शनि दूसरे भाव में मित्र 'शुक्र' की राशि पर स्थित
'शनि' के प्रभाव से जातक विद्या-बुद्धि का सुख
प्राप्त करता है तथा सन्तान से वैमनस्य रहता है ।
तीसरी शत्रुदृष्टि से चतुर्थभाव को देखने से
माता भूमि तथा भवन के सुख में कमी आती है ।
सातवीं नीच दृष्टि से अष्टमभाव को देखने
से आयु तथा पुरातत्त्व को कुछ हानि होती है ।
दसवीं शत्रु-दृष्टि से एकादशभाव को देखने
से आमदनी के क्षेत्र में कठिनाइयों के साथ सफलता
मिलती है। ऐसा व्यक्ति प्रत्येक क्षेत्र में संघर्षशील रहता है तथा शत्रु-पक्ष पर
विजय प्राप्त करता है ।

३२५
'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'तृतीयभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश
कन्यालग्न : तृतीयभाव : शनि तीसरे भाव में शत्रु मंगल' की राशि पर
स्थित 'शुक्र' के प्रभाव से जातक को भाई-बहिनों से
परेशानी रहती है, पर शत्रु-पक्ष पर विजय मिलती
है और पराक्रम की वृद्धि होती है। तीसरी दृष्टि
से स्वराशि के पंचमभाव को देखने से विद्या-बुद्धि
का लाभ होता है, परन्तु सन्तान-पक्ष में सामान्य
कठिनाइयां आती हैं।
सातवीं मित्रदृष्टि से नवमभाव को देखने
से परिश्रम द्वारा भाग्योन्नति होती है। दसवीं शत्रुदृष्टि से द्वादशभाव की देखने से खर्च
में कठिनाई का अनुभव होता है तथा बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से असन्तोष रहता है।
'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'चतुर्थभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश
कन्या लग्न : चतुर्थभाव : शनि चौथे भाव में शत्रु 'गुरु' की राशि पर स्थित
'शनि' के प्रभाव से जातक को माता, भूमि तथा
भवन के सुख में कमी रहती है तथा सन्तान के
पक्ष से भी परेशानी रहती है, परन्तु विद्या-बुद्धि का
लाभ होता है। तीसरी दृष्टि से स्वराशि में षष्ठभाव
की देखने से शत्रु-पक्ष पर विजय मिलती है तथा
झगड़ों से सुख-दुःख दोनों ही मिलते हैं।
सातवीं मित्रदृष्टि से दशमभाव को देखने से
पिता, राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में परिश्रम द्वारा
सफलता मिलती है। दसवीं मित्रदृष्टि से प्रथमभाव की देखने से परिश्रम एवं प्रभाव
की वृद्धि होती है, परन्तु शरीर कुछ अस्वस्थ बना रहता है।
'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'पंचमभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश
कन्या लग्न : पंचमभाव : शनि पाँचवें भाव में स्वराशि-स्थित 'शनि' के प्रभाव से
जातक की कुछ कठिनाइयों के साथ विद्या-बुद्धि एवं
सन्तान का लाभ होता है, परन्तु सन्तान से कुछ परेशानी
भी होती है। शत्रु-पक्ष में उसे गुप्त युक्तियों से विजय
मिलती है। तीसरी शत्रुदृष्टि से सप्तमभाव की देखने से
स्त्री-पक्ष से कुछ परेशानी रहती है तथा व्यवसाय में भी
कठिनाइयाँ आती हैं।
सातवीं शत्रु-दृष्टि से एकादशभाव की देखने से
परिश्रम द्वारा लाभ होता है। दसवीं उच्च दृष्टि से द्वितीय भाव की देखने से धन-
कुटुम्ब की वृद्धि होती है। ऐसा व्यक्ति संघर्षपूर्ण सुखी-सम्पन्न जीवन बिताता है।

३२६
'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'षष्ठभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश
कन्या लग्न : षष्ठभाव : शनि छठे भाव में स्वराशि-स्थित 'शनि' के प्रभाव से
जातक शत्रु-पक्ष पर अपने बुद्धि-बल से सफलता पाता है,
परन्तु विद्या एवं सन्तान के पक्ष में सामान्य कठिनाइयाँ
आती हैं। तीसरी नीच दृष्टि से अष्टम भाव को देखने
से आयु पर अनेक बार संकट आते हैं तथा पुरातत्त्व की
हानि होती है।
सातवीं शत्रु-दृष्टि से द्वादश भाव को देखने से
खर्च की परेशानी रहती है, तथा बाहरी सम्बन्ध भी सुखद
नहीं रहते। दसवीं शत्रु-दृष्टि से तृतीय भाव को देखने से भाई-बहिनों द्वारा कष्ट
मिलता है, परन्तु पराक्रम में वृद्धि होती है।
'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'सप्तमभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश
कन्यालग्न : सप्तमभाव : शनि सातवें भाव में शत्रु 'गुरु' की राशि पर
स्थित 'शनि' के प्रभाव से जातक को स्त्री तथा व्यवसाय
के क्षेत्र में कठिनाइयाँ आती हैं तथा गुह्येन्द्रिय में विकार
भी होता है। सन्तान के पक्ष से भी परेशानी रहती है,
परन्तु शत्रु-पक्ष में सफलता मिलती है। तीसरी मित्र-
दृष्टि से नवम भाव को देखने से जातक बुद्धि-बल द्वारा
भाग्योन्नति करता हुआ धर्म का पालन भी करता है।
सातवीं मित्र-दृष्टि से प्रथम भाव को देखने से
शरीर में रोग रहता है, परन्तु प्रभाव की वृद्धि होती है।
दसवीं शत्रु-दृष्टि से चतुर्थ भाव को देखने से माता, भूमि एवं भवन के सुख में कमी
आती है। ऐसा जातक अपने जन्म-स्थान में परेशानी का अनुभव करता है।
'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'अष्टमभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश
कन्या लग्न : अष्टमभाव : शनि आठवें भाव में शत्रु 'मंगल' की राशि पर स्थित
'शनि' के प्रभाव से जातक की आयु पर अनेक बार
संकट आते हैं तथा पुरातत्त्व की हानि होती है। तीसरी
दृष्टि से स्वराशि के दशमभाव को देखने से पिता तथा
राज्य-पक्ष में कुछ कठिनाइयाँ आती हैं, किन्तु व्यवसाय
के क्षेत्र में बुद्धि-बल से सामान्य सफलता मिलती है।
सातवीं उच्च-दृष्टि से द्वितीयभाव को देखने से
धन-संचय के लिए कठोर परिश्रम करना पड़ता है।
दसवीं दृष्टि से पंचमभाव को देखने से सन्तान-पक्ष से
कष्ट होता है। विद्या कम रहती है परन्तु चातुर्य अधिक होता है।

३२७
'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'नवमभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश
कन्यालग्न : नवमभाव : शनि नवें भाव में मित्र 'शुक्र' की राशि पर स्थित
'शनि' के प्रभाव से जातक बुद्धि-बल से भाग्योन्नति
करता तथा स्वधर्म का सामान्य परिपालन करता है।
संतान तथा विद्या के क्षेत्र में सफलता मिलती है।
तीसरी शत्रु-दृष्टि से एकादशभाव को देखने से आमदनी
के लिए विशेष प्रयत्न करना पड़ता है।
सातवीं शत्रु-दृष्टि से तृतीयभाव को देखने से
पराक्रम की वृद्धि होती है, परन्तु भाई-बहिनों से कुछ
वैमनस्य रहता है। दसवीं दृष्टि से स्वराशि के षष्ठ-
भाव को देखने से शत्रु-पक्ष में विजय मिलती है तथा झगड़ों से लाभ होता है।
ऐसा व्यक्ति बड़ा चतुर, नीतिज्ञ, प्रभावशाली तथा हिम्मती होता है।
'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'दशमभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश
कन्या लग्न : दशमभाव : शनि दसवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित
शनि के प्रभाव से जातक की पिता-पक्ष से परेशानी
रहती है, परन्तु राज्य-पक्ष से सम्मान एवं व्यवसाय-
पक्ष से लाभ होता है। विद्या तथा सन्तान का भी सुख
मिलता है। तीसरी शत्रु-दृष्टि से द्वादशभाव को देखने
से खर्च के मामले में असन्तोष रहता है तथा बाहरी
स्थानों का सम्बन्ध भी सुखदायी नहीं रहता।
सातवीं शत्रु-दृष्टि से चतुर्थभाव को देखने से
माता एवं भूमि के सुख में कुछ कमी रहती है। दसवीं
शत्रु-दृष्टि से सप्तमभाव को देखने से स्त्री के सुख में कमी आती है तथा दैनिक
व्यवसाय के क्षेत्र में कठिन परिश्रम से ही सफलता मिलती है।
'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'एकादशभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश
कन्या लग्न : एकादशभाव : शनि ग्यारहवें भाव में शत्रु 'चन्द्रमा' की राशि पर
स्थित 'शनि' के प्रभाव से जातक की आमदनी में खूब
वृद्धि होती है तथा शत्रु-पक्ष से भी लाभ होता है।
तीसरी मित्र-दृष्टि से प्रथमभाव को देखने से शरीर में
रोग रहता है।
सातवीं दृष्टि से स्वराशि में पंचमभाव को देखने
से सन्तान तथा विद्या-बुद्धि की शक्ति प्राप्त होती है।
दसवीं नीच-दृष्टि से अष्टमभाव को देखने से पुरातत्त्व की
हानि होती है तथा आयु पर भी अनेक संकट आते हैं।

३२८
'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'द्वादशभाव' में स्थित 'शनि' का फलादेश
कन्या लग्न : द्वादशभाव : शनि
बारहवें भाव में शत्रु 'सूर्य' की राशि पर
स्थित 'शनि' के प्रभाव से जातक का खर्च अधिक रहता
है तथा बाहरी सम्बन्धों से परेशानी रहती है। तीसरी
उच्च-दृष्टि से द्वितीयभाव को देखने से धन तथा कुटुम्ब
की वृद्धि विशेष प्रयत्न करने से होती है।
सातवीं दृष्टि से स्वराशि में षष्ठभाव को देखने
से शत्रु-पक्ष पर प्रभाव रहता है, परन्तु रोगादि से कुछ
कष्ट होता है। दसवीं मित्र-दृष्टि से नवमभाव को देखने
से बुद्धि-योग द्वारा भाग्य की उन्नति होती है तथा धर्म
में रुचि भी रहती है। ऐसा व्यक्ति शान-शौकत में खूब खर्च करता है।
'कन्या' लग्न में 'राहु'
'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'प्रथमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
कन्या लग्न : प्रथमभाव : राहु
पहले भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित
'राहु' के प्रभाव से जातक शारीरिक दृष्टि से शक्ति-
शाली, दृढ़ मनोबल वाला तथा स्वाभिमानी होता है,
परन्तु कभी-कभी उसे शारीरिक कष्ट भी उठाने पड़ते हैं।
वह गहरी सूझ-बूझ वाला तथा कठोर परिश्रमी होता है।
मानसिक रूप से चिन्तित रहते हुए भी बड़े धैर्य से काम
लेकर उन्नति करता है।
'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'द्वितीयभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
कन्या लग्न : द्वितीयभाव : राहु
दूसरे भाव में मित्र 'शुक्र' की राशि पर स्थित
'राहु' के प्रभाव से जातक धन-कुटुम्ब की ओर से परे-
शान रहता है। वह गुप्त प्रयत्न तथा कठिन परिश्रम
द्वारा कुछ धन-संचय भी करता है तथा सकट रूप में
धनवान् भी समझा जाता है। कभी-कभी उसे आकस्मिक
लाभ तथा हानि—दोनों ही होते हैं।

३२६
'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'तृतीयभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
कन्यालग्न : तृतीयभाव : राहु
तीसरे भाव में शत्रु 'मंगल' की राशि पर स्थित
'राहु' के प्रभाव से जातक के पराक्रम में वृद्धि होती है,
परन्तु भाई-बहिनों से परेशानी मिलती है।
ऐसा व्यक्ति गुप्त युक्तियों एवं हिम्मत के बल
पर सफलता प्राप्त करता है तथा स्वार्थ-सिद्धि के लिए
भले-बुरे का विचार नहीं करता।
'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'चतुर्थभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
कन्या लग्न : चतुर्थभाव : राहु
चौथे भाव में शत्रु 'गुरु' की राशि पर स्थित
'राहु' के प्रभाव से जातक को माता का अच्छा सुख
मिलता है, परन्तु भूमि, भवन एवं घरेलू सुख में कमी
रहती है। घरेलू कारणों से कभी-कभी घोर संकटों का
सामना भी करना पड़ता है। परदेश में रहने का योग
भी उपस्थित होता है। जन्म-भूमि में उसे दुःख मिलता
है, परन्तु बाहरी स्थान में सुख प्राप्त होता है।
'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'पंचमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
कन्या लग्न : पंचमभाव : राहु पाँचवें भाव में मित्र 'शनि' की राशि पर स्थित
'राहु' के प्रभाव से जातक की सन्तान-पक्ष से कष्ट
मिलता है तथा विद्या के क्षेत्र में कठिनाइयां आती हैं।
ऐसा व्यक्ति विद्वान् न होने पर भी बातें करने
में बड़ा चतुर होता है तथा अपने स्वार्थ को सिद्ध करने
के लिए सत्यासत्य का विचार भी नहीं करता। कभी-
कभी उसे चिन्ताएं भी परेशान करती रहती हैं।

३३०
'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'षष्ठभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
कन्यालग्न : षष्ठभाव : राहु छठे भाव में मित्र 'शनि' की राशि पर स्थित
'राहु' के प्रभाव से जातक शत्रु-पक्ष पर प्रभावशाली रहता
है तथा झगड़ों एवं संकटों के समय हिम्मत तथा धैर्य से
काम लेकर, अपनी कमजोरी को प्रकट नहीं होने देता।
वह कठिन संकटों के समय भी विचलित नहीं
होता और उन पर अपनी गुप्त युक्तियों द्वारा नियन्त्रण
पा लेता है।
'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'सप्तमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
कन्या लग्न : सप्तमभाव : राहु
सातवें भाव में शत्रु 'गुरु' की राशि पर स्थित
'राहु' के प्रभाव से जातक की स्त्री-पक्ष से कष्ट मिलता
है तथा व्यवसाय के क्षेत्र में भी कठिनाइयाँ आती हैं।
उसको मूतेन्द्रिय में विकार भी हो सकता है।
ऐसा व्यक्ति गुप्त युक्तियों तथा कठिन परिश्रम
के बल पर ही अपना काम चलाता रहता है।
'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'अष्टमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
कन्यालग्न : अष्टमभाव : राहु आठवें भाव में शत्रु 'मंगल' की राशि पर
स्थित 'राहु' के प्रभाव से जातक को जीवन में अनेक
बार खतरों का सामना करना पड़ता है तथा मृत्यु-
तुल्य कष्ट भी भोगने पड़ते हैं। उसके पेट में भी विकार
रहता है।
गुप्त युक्तियों, धैर्य तथा साहस के बल पर वह
आगे बढ़ता है। उसे चिन्ताएँ तथा परेशानियाँ हमेशा
घेरे रहती हैं।
'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'नवमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
कन्यालग्न : नवमभाव : राहु नवें भाव में मित्र 'शुक्र' की राशि पर स्थित
'राहु' के प्रभाव से जातक अपनी भाग्योन्नति के लिए
कठोर परिश्रम करता है तथा धर्म का उचित पालन
नहीं कर पाता।
कभी-कभी उसे भाग्य के विषय में घोर संकटों
का सामना भी करना पड़ता है। ऐसा व्यक्ति अपनी
गुप्त युक्तियों, धैर्य तथा साहस के बल पर ही थोड़ी
बहुत उन्नति कर पाता है।

३३१
'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'दशमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
कन्यालग्न : दशमभाव : राहु दसवें भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित
उच्च 'राहु' के प्रभाव से जातक अपने पिता के साथ
संघर्ष करता हुआ उन्नति करता है। राज्य तथा
व्यवसाय के क्षेत्र में भी उसे गुप्त युक्ति एवं चातुर्य के
बल पर ही सम्मान एवं सफलता की प्राप्ति होती है।
कभी-कभी संकट भी आते हैं, परन्तु फिर स्थिति ठीक
ही आती है।
'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'एकादशभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
कन्यालग्न : एकादशभाव : राहु ग्यारहवें भाव में शत्रु 'चन्द्रमा' की राशि पर
स्थित 'राहु' के प्रभाव से जातक की आमदनी खूब रहती
है, परन्तु कठिनाइयों का सामना भी बहुत करना पड़ता
है। उसे कभी बहुत लाभ तो कभी बहुत घाटा होता है।
वह अपनी गुप्त युक्तियों, धैर्य, साहस तथा परिश्रम के
सहारे लाभ उठाता है, परन्तु कभी-कभी धोखा भी खा
जाता है।
'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'द्वादशभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
कन्यालग्न : द्वादशभाव : राहु बारहवें भाव में शत्रु 'सूर्य' की राशि पर स्थित
'राहु' के प्रभाव से जातक को खर्च-सम्बन्धी कठिनाइयां
बहुत रहती हैं तथा बाहरी सम्पर्कों से भी कष्ट
होता है।
ऐसा व्यक्ति गुप्त युक्तियों, धैर्य, साहस तथा
परिश्रम के सहारे अपना खर्च चलाता है। कभी-कभी
उसे आकस्मिक धन-लाभ भी हो जाता है।

३३२
'कन्या' लग्न में 'केतु'
'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'प्रथमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश
कन्या लग्न : प्रथमभाव : केतु पहले भाव में मित्र 'बुध' की राशि पर स्थित
'केतु' के प्रभाव से जातक को शारीरिक कष्ट एवं
चिन्ताओं का सामना करना पड़ता है। शरीर पर कोई
गहरी चोट लगने अथवा रोग होने का योग भी बनता
है। शारीरिक सौन्दर्य में कमी रहती है। ऐसा व्यक्ति
गुप्त युक्तियों वाला, हिम्मती, धैर्यवान् तथा अख्खड़
स्वभाव का होता है।
'कन्या' लग्न की कुंडली में 'द्वितीयभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश
कन्या लग्न : द्वितीयभाव : केतु दूसरे भाव में मित्र 'शुक्र' की राशि पर
स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक के धन तथा
कौटुम्बिक सुख में कमी आती है। कभी-कभी
आकस्मिक धन-हानि भी होती है तो कभी-कभी
आकस्मिक रूप से धन-लाभ भी हो जाता है।
ऐसा व्यक्ति धन की वृद्धि के लिए अथक
परिश्रम करता है, तथा हर समय परेशान बना
रहता है।
'कन्या' लग्न की कुंडली में 'तृतीयभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश
कन्या लग्न : तृतीयभाव : केतु तीसरे भाव में शत्रु 'मंगल' की राशि पर
स्थित केतु के प्रभाव से जातक के पराक्रम की
अत्यधिक वृद्धि होती है, परन्तु भाई-बहिनों से
परेशानी मिलती है।
ऐसा व्यक्ति संकट के समय भी हिम्मत
नहीं हारता तथा अपने ही बाहु-बल का भरोसा
रखता है। वह कठिन परिश्रमी भी होता है।

३३३
'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'चतुर्थभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश
कन्या लग्न : चतुर्थभाव : केतु
चौथे भाव में शत्रु 'गुरु' की राशि पर स्थित उच्च के केतु के प्रभाव से जातक को माता, भूमि तथा भवन का सुख प्राप्त होता है। घरेलू जीवन ठाठदार होता है। इसके लिए उसे विशेष परिश्रम भी करना पड़ता है।
कभी-कभी घरेलू सुख में संकट भी आता है और कभी सुख में वृद्धि भी हो जाती है।
'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'पंचमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश
कन्या लग्न : पंचमभाव : केतु
पांचवें भाव में मित्र 'शनि' की राशि पर स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक की सन्तान-पक्ष से चिन्ता रहती है तथा विद्या-प्राप्ति के लिए कठिन परिश्रम करना पड़ता है।
ऐसा व्यक्ति अपनी विद्या-बुद्धि में कमी को स्वयं अनुभव करता है, परन्तु फिर भी स्वयं को बड़ा समझदार तथा योग्य प्रदर्शित करता है। वह बातचीत में बड़ा तेज होता है।
'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'षष्ठभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश
कन्या लग्न : षष्ठभाव : केतु
छठे भाव में मित्र 'शनि' की राशि पर स्थित 'केतु' के प्रभाव से जातक शत्रु-पक्ष पर अपना विशेष प्रभाव रखता है। उसे ननसाल-पक्ष से परेशानी उठानी पड़ती है।
ऐसा व्यक्ति बड़ा धैर्यवान्, गुप्त युक्तियों वाला, बहादुर, निर्भय तथा अक्खड़ स्वभाव का होता है और इन्हीं विशेषताओं के कारण अपना काम बना लेने में सफलता भी प्राप्त करता है।

३३४
'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'सप्तमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश
कन्यालग्न : सप्तमभाव : केतु सातवें भाव में शत्रु 'गुरु' की राशि पर स्थित
'केतु' के प्रभाव से जातक की स्त्री-पक्ष से कष्ट
मिलता है तथा व्यवसाय के क्षेत्र में भी बड़ी कठि-
नाइयाँ आती हैं, परन्तु वह अपनी गुप्त युक्ति, धैर्य-
तथा साहस के बल पर उनके निराकरण का प्रयत्न
करता है। उसका गृहस्थ-जीवन बड़ी कठिनाइयों से
सफल बनता है। उसकी मूलेन्द्रिय में विकार होने की
संभावना भी रहती है।
'कन्या' लग्न की कुंडली में 'अष्टमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश
कन्यालग्न : अष्टमभाव : केतु
आठवें भाव में शत्रु 'मंगल' की राशि पर स्थित
'केतु' के प्रभाव से जातक के जीवन में अनेक बार
प्राणान्तक कष्ट उपस्थित होता है तथा पुरातत्त्व की
हानि भी होती है। उसके पेट में भी विकार रहता
है।
ऐसा व्यक्ति बड़ा परिश्रमी, क्रोधी, धैर्यवान्,
हिम्मत तथा तेजी से काम करने वाला होता है।
'कन्या' लग्न की कुण्डली में 'नवमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश
कन्यालग्न : नवमभाव : केतु
नवें भाव में मित्र 'शुक्र' की राशि पर स्थित
'केतु' के प्रभाव से जातक की धर्म-क्षेत्र में कमी रहती
है तथा भाग्योन्नति में भी बड़े संकट आते हैं।
ऐसा व्यक्ति अपने चातुर्य, गुप्त युक्तियों,
बुद्धि तथा साहस के बल पर संकटों से अपनी रक्षा
करता है तथा कभी-कभी विशेष चिन्तनीय स्थितियों
में होकर भी गुजरता है।