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भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

२७८
'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश
सिंह लग्न : एकादशभाव : गुरु
ग्यारहवें भाव में मित्र बुध की राशि पर
स्थित गुरु के प्रभाव से जातक की आमदनी बढ़ती
है। आयु तथा पुरातत्त्व की भी वृद्धि होती है।
पाँचवीं शत्रुदृष्टि से तृतीयभाव को देखने से पराक्रम
की वृद्धि होती है, परन्तु भाई-बहिनों से मतभेद
रहता है।
सातवीं दृष्टि से स्वराशि में पञ्चमभाव को
देखने से सन्तान, विद्या एवं बुद्धि का लाभ मिलता
है। नवीं शत्रु-दृष्टि से सप्तमभाव को देखने से स्त्री तथा दैनिक व्यवसाय के क्षेत्र में
परेशानियां आती रहती हैं।
'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'गुरु' का फलादेश
सिंह लग्न : द्वादशभाव : गुरु
बारहवें भाव में मित्र चन्द्रमा की राशि में
स्थित गुरु के प्रभाव से जातक का खर्च अधिक
रहता है तथा बाहरी स्थानों से सम्बन्ध से लाभ
मिलता है। विद्या, बुद्धि तथा सन्तान के क्षेत्र में
त्रुटिपूर्ण सफलता मिलती है।
पाँचवीं मित्र-दृष्टि से चतुर्थभाव को देखने
से माता, भूमि, भवन आदि का सुख प्राप्त होता
है। सातवीं नीच-दृष्टि से षष्ठभाव को देखने से
शत्रु-पक्ष से परेशानी बनी रहती है। नवीं दृष्टि से
स्वराशि में अष्टमभाव को देखने से आयु की विशेष शक्ति मिलती है तथा पुरातत्त्व
का सामान्य लाभ होता है।
'सिंह' लग्न में 'शुक्र'
'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश
सिंह लग्न : प्रथमभाव : शुक्र
पहले भाव में शत्रु सूर्य की राशि पर स्थित
शुक्र के प्रभाव से जातक की शारीरिक सौन्दर्य,
श्रृंगार, यश तथा प्रभाव की प्राप्ति होती है। भाई-
बहिन एवं पिता से मतभेद रहते हुए भी सुख
मिलता है।
सातवीं मित्रदृष्टि से सप्तमभाव को देखने
से स्त्री के पक्ष में सफलता मिलती है तथा दैनिक
व्यवसाय में लाभ होता है।

२७६
'सिंह' लग्न की कुण्डली से 'द्वितीयभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश
सिंह लग्न : द्वितीयभाव : शुक्र
दूसरे भाव में मित्र बुध की राशि पर
स्थित नीच के शुक्र के प्रभाव से जातक को धन
तथा कौटुम्बिक सुखअल्प मात्रा में प्राप्त होता है।
पिता, व्यवसाय, राज्य तथा पराक्रम के क्षेत्र में
भी कमी बनी रहती है।
सातवीं उच्च दृष्टि से अष्टमभाव को देखने
से जातक को आयु में वृद्धि होती है तथा पुरातत्व
का लाभ होता है, परन्तु ऐसा व्यक्ति ऐश्वर्य-
शालियों जैसा जीवन व्यतीत करता है।
'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश
सिंह लग्न : तृतीयभाव : शुक्र
तीसरे भाव में स्वराशि-स्थित शुक्र के प्रभाव
से जातक के पराक्रम में वृद्धि होती है तथा भाई-
बहिनों का सुख मिलता है। पिता, राज्य तथा
व्यवसाय द्वारा भी लाभ प्राप्त होता है।
सातवीं शत्रु-दृष्टि से नवमभाव को देखने
से जातक अपने पुरुषार्थ द्वारा भाग्य तथा धर्म की
वृद्धि करता है। वह बड़ा चतुर, योग्य तथा परि-
श्रमी भी होता है।
'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश
सिंह लग्न : चतुर्थभाव : शुक्र
चौथे भाव में शत्रु मंगल की राशि पर
स्थित शुक्र के प्रभाव से जातक का माता के साथ
सामान्य मतभेद रहता है, परन्तु भूमि एवं भवन
का लाभ प्राप्त होता है।
सातवीं दृष्टि से स्वराशि के दशमभाव को
देखने से पिता, राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में लाभ,
सफलता तथा यश की प्राप्ति होती है। भाई-बहिन
का सुख भी यथेष्ट मिलता है तथा रहन-सहन भी
रईसों-जैसा होता है।

२८०
'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश
सिंह लग्न : पंचमभाव : शुक्र पाँचवें भाव में शत्रु गुरु की राशि पर स्थित
शुक्र के प्रभाव से जातक को विद्या, बुद्धि एवं संतान
के क्षेत्र में सफलता मिलती है। भाई-बहिन एवं
पिता का सुख भी प्राप्त होता है। वह अपनी
योग्यता एवं चातुर्य के बल पर सर्वत्र सम्मानित भी
होता है।
सातवीं मित्रदृष्टि से एकादशभाव को देखने
से परिश्रम द्वारा पर्याप्त लाभ होता है तथा राज्य-
पक्ष में भी सम्मान, सुख एवं लाभ मिलता है। ऐसा
व्यक्ति राजनीतिज्ञ, सुखी, धनी, यशस्वी तथा चतुर होता है।
'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश
सिंह लग्न : षष्ठभाव : शुक्र छठे भाव में मित्र शनि की राशि पर स्थित
शुक्र के प्रभाव से जातक बड़ा चतुर, प्रभावशाली तथा
शत्रुओं पर विजय पाने वाला होता है। पिता के साथ
सामान्य मतभेद रहता है, परन्तु राज्य-पक्ष में उन्नति
एवं सफलता मिलती है।
सातवीं शत्रुदृष्टि से द्वादशभाव को देखने से
खर्च अधिक रहता है, परन्तु बाहरी सम्बन्धों से सुख
और लाभ की प्राप्ति होती है। ऐसा व्यक्ति गुप्त
युक्तियों के बल पर सफलताएँ प्राप्त करता है।
'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश
सिंह लग्न : सप्तमभाव : शुक्र सातवें भाव में मित्र शनि की राशि पर
स्थित शुक्र के प्रभाव से जातक को स्त्री तथा व्यवसाय
के क्षेत्र में विशेष सफलता मिलती है तथा भाई-
बहिन एवं पिता का सुख भी मिलता है। यह
कुशलतापूर्वक गृहस्थी का संचालन करता है तथा
यश प्राप्त करता है।
सातवीं शत्रुदृष्टि से प्रथमभाव को देखने से
जातक को शारीरिक शक्ति, प्रभाव, मनोबल तथा
हिम्मत वृद्धि होती है। ऐसा व्यक्ति बहादुर तथा हुकूमत करने वाला होता है।

२६१
'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश
सिंह लग्न : अष्टमभाव : शुक्र आठवें भाव में शत्रु गुरु की राशि पर स्थित
उच्च के शुक्र के प्रभाव से जातक को आयु तथा पुरा-
तत्त्व का लाभ होता है तथा भाई-बहिन एवं पिता से
सुख में कुछ त्रुटिपूर्ण सफलता मिलती है। दैनिक जीवन
में वह बड़ा प्रभावशाली रहता है। राज्य-पक्ष में भी
सफलताएँ मिलती हैं।
सातवीं नीचदृष्टि से द्वितीयभाव को देखने के
कारण धन के संचय तथा कौटुम्बिक सुख में कुछ कमी
बनी रहती है।
'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश
सिंह लग्न : नवमभाव : शुक्र नवें भाव में शत्रु मंगल की राशि पर स्थित
शुक्र के प्रभाव से जातक को पिता, राज्य तथा व्यवसाय
के क्षेत्र में सफलता, सुख तथा सम्मान की प्राप्ति
होती है।
सातवीं दृष्टि से स्वराशि के तृतीयभाव को देखने
से भाई-बहिन के सुख तथा पराक्रम में वृद्धि होती है।
ऐसा व्यक्ति सुखी, धनी, परिश्रमी, यशस्वी,
चतुर तथा हिम्मत वाला होता है।
'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'दशमभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश
सिंह लग्न : दशमभाव : शुक्र दसवें भाव में स्वराशि पर स्थित शुक्र के
प्रभाव से जातक को पिता, राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र
में अत्यधिक सफलताएँ मिलती हैं तथा यश, सुख एवं
लाभ की प्राप्ति होती है। भाई-बहिनों का सुख भी
पर्याप्त रहता है।
सातवीं शत्रुदृष्टि से चतुर्थभाव को देखने से माता,
मकान तथा भूमि का अच्छा सुख मिलता है। ऐसा
व्यक्ति चतुर, प्रभावशाली, परिश्रमी तथा भाग्यवान्
होता है।

२८३
'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश
सिंह लग्न : एकादशभाव : शुक्र ग्यारहवें भाव में मित्र बुध की राशि पर स्थित
शुक्र के प्रभाव से जातक की आमदनी में खूब वृद्धि होती
है तथा भाई-बहिन एवं पिता का श्रेष्ठ सुख भी मिलता
है।
सातवीं शत्रुदृष्टि से पंचमभाव को देखने से
विद्या, बुद्धि एवं सन्तान का भी विशेष लाभ होता है।
ऐसा व्यक्ति अपनी वाणी द्वारा सबको प्रभावित
करने वाला, सुखी, धनी तथा यशस्वी होता है।
'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश
सिंह लग्न : द्वादशभाव : शुक्र बारहवें भाव में शत्रु चन्द्रमा की राशि पर स्थित
शुक्र के प्रभाव से जातक का खर्च अधिक रहता है तथा
बाहरी स्थान के सम्बन्ध से लाभ होता है। पिता तथा
भाई-बहिन के सुख तथा पराक्रम में कुछ कमी रहती है।
सातवीं मित्रदृष्टि से षष्ठभाव को देखने के कारण
जातक शत्रु-पक्ष में चातुर्य द्वारा प्रभावशाली बना रहता
है तथा अपनी हिम्मत से सभी झगड़ों में विजय प्राप्त
करता है।
'सिंह' लग्न में 'शनि'
'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश
सिंह लग्न : प्रथमभाव : शनि पहले भाव में शत्रु सूर्य की राशि पर स्थित शनि
के प्रभाव से जातक की शारीरिक कष्ट, रोगादि होते हैं,
परन्तु शत्रु-पक्ष पर कुछ प्रभाव बना रहता है। तीसरी
उच्च-दृष्टि से तृतीयभाव को देखने से भाई-बहिन के सुख
तथा पराक्रम की वृद्धि होती है।
सातवीं दृष्टि से स्वराशि के सप्तमभाव को देखने
से कुछ कठिनाइयों के साथ स्त्री तथा व्यवसाय के क्षेत्र
में सुख प्राप्त होता है। दसवीं मित्रदृष्टि से दशमभाव
को देखने से पिता, राज्य एवं व्यवसाय के लाभ, यश तथा सुख प्राप्त होता है।

२८४
'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश
सिंह लग्न : पञ्चमभाव : शनि पाँचवें भाव में शत्रु गुरु की राशि पर स्थित
शनि के प्रभाव से जातक को विद्या, बुद्धि एवं सन्तान के
पक्ष में कुछ परेशानी रहती है। तीसरी दृष्टि से स्व-
राशि में सप्तमभाव को देखने से स्त्री तथा व्यवसाय
से सुख मिलता है। स्त्री बुद्धिमती होती है।
सातवीं मित्रदृष्टि से एकादश-भाव को देखने से
आय में वृद्धि होती है। दसवीं मित्रदृष्टि से द्वितीयभाव
को देखने से धन की वृद्धि होती है तथा सामान्य
कौटुम्बिक सुख भी मिलता है। ऐसा जातक बड़ा विषयी होता है।
'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश
सिंह लग्न : षष्ठभाव : शनि छठे भाव में स्वराशिस्थ शनि के प्रभाव से
जातक शत्रु-पक्ष पर प्रभावी रहता है तथा ननिहाल
से भी शक्ति प्राप्त करता है। दैनिक खर्च के संचालन
में तथा स्त्री-पक्ष से कुछ असन्तोष रहता है। तीसरी
शत्रु-दृष्टि से अष्टमभाव को देखने के कारण
पुरातत्त्व का सामान्य लाभ होता है, परन्तु आयु के
विषय में कुछ अशान्ति रहती है।
सातवीं शत्रु-दृष्टि से द्वादशभाव को देखने
से खर्च अधिक होता है, जिससे परेशानी रहती है।
दसवीं उच्चदृष्टि से तृतीयभाव को देखने से पराक्रम की वृद्धि होती है तथा भाई-
बहिनों का सुख मिलता है। ऐसा व्यक्ति हिम्मत से कठिनाइयों पर विजय पाता है।
'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश
सिंह लग्न : सप्तमभाव : शनि सातवें भाव में स्वराशिस्थ शनि के प्रभाव
से जातक की स्त्री-पक्ष तथा दैनिक व्यवसाय में
कठिनाइयाँ बनी रहती हैं। शत्रु-पक्ष पर प्रभाव
रहता है। तीसरी नीचदृष्टि से नवमभाव को
देखने से भाग्य तथा धर्म की कुछ हानि होती है
तथा यश में कमी आती है।
सातवीं शत्रुदृष्टि से प्रथम भाव को देखने
से शारीरिक सौन्दर्य एवं मानसिक शक्ति का ह्रास
होता है। दसवीं शत्रुदृष्टि से चतुर्थभाव को देखने
से माता, भूमि तथा भवन के सुख में भी कमी आ जाती है।

२८३
'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश
सिंह लग्न : द्वितीयभाव : शनि दूसरे भाव में मित्र बुध की राशि पर स्थित
शनि के प्रभाव से जातक को धन तथा कुटुम्ब के
क्षेत्र में हानि-लाभ दोनों की प्राप्ति होती है। स्त्री
तथा व्यवसाय के क्षेत्र में बाधाएँ आती हैं। तीसरी
शत्रुदृष्टि से चतुर्थभाव को देखने से माता, भूमि
एवं भवन के सुख में कुछ कमी रहती है।
सातवीं शत्रुदृष्टि से अष्टमभाव को देखने
से आयु तथा पुरातत्त्व के विषय में असन्तोष रहता
है। दसवीं मित्रदृष्टि से एकादश भाव को देखने से
आमदनी में वृद्धि होती है। ऐसे व्यक्ति का जीवन सुख-दुःखपूर्ण बना रहता है।
'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश
सिंहलग्न : तृतीयभाव : शनि तीसरे भाव में मित्र शुक्र की राशि पर
स्थित शनि के प्रभाव से जातक के प्रभाव तथा
पराक्रम में बहुत वृद्धि होती है तथा भाई-बहिनों का
सुख भी मिलता है। शत्रु-पक्ष पर विजय मिलती है
तथा स्त्री-पक्ष पर विशेष प्रभाव बना रहता है।
दैनिक आमदनी भी अच्छी रहती है। तीसरी शत्रु-
दृष्टि से पंचमभाव को देखने से सन्तान, विद्या तथा
बुद्धि के क्षेत्र में कुछ कठिनाइयाँ रहती हैं।
सातवीं नीचदृष्टि से नवम भाव को देखने
से भाग्य तथा धर्म के क्षेत्र में कमी आती है। दसवीं शत्रुदृष्टि से द्वादशभाव को देखने
से खर्च अधिक रहता है, जिसके कारण परेशानी भी रहती है।
'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश
सिंहलग्न : चतुर्थभाव : शनि चौथे भाव में शत्रु मंगल की राशि पर स्थित
शनि के प्रभाव से जातक की माता, भूमि तथा
भवन के सुख में त्रुटिपूर्ण सफलता मिलती है। स्त्री
तथा दैनिक व्यवसाय के क्षेत्र में भी असन्तोष
रहता है।
तीसरी दृष्टि से स्वराशि में षष्ठभाव को
देखने से शत्रु पक्ष पर प्रभाव रहता है, परन्तु कुछ
कठिनाइयों के साथ शत्रुओं पर विजय मिलती है।
सातवीं मित्रदृष्टि से दशमभाव को देखने से पिता,
राज्य तथा व्यवसाय के क्षेत्र में सुख, सम्मान तथा सफलता की प्राप्ति होती है।
दसवीं दृष्टि से प्रथमभाव को देखने से शरीर में रोग रहता है तथा सौन्दर्य में कुछ
कमी आती है।

२८६
'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश
सिंह लग्न : एकादशभाव : शनि ग्यारहवें भाव में मित्र बुध की राशि पर स्थित
शनि के प्रभाव से जातक की आमदनी खूब रहती है।
शत्रु-पक्ष से भी विशेष लाभ होता है। कुछ परेशानियों के
साथ स्त्री का सुख मिलता है तथा दैनिक व्यवसाय के
क्षेत्र में भी अच्छी सफलता मिलती है।
तीसरी शत्रुदृष्टि से प्रथमभाव को देखने से
शारीरिक सौन्दर्य में कमी आती है तथा रोग का शिकार
बनना पड़ता है। सातवीं शत्रुदृष्टि से पंचमभाव को
देखने से सन्तान एवं विद्या-बुद्धि के क्षेत्र में कमी रहती
है। दसवीं शत्रुदृष्टि से अष्टमभाव को देखने से पुरातत्त्व में कमी आती है तथा आयु
के विषय में भी चिन्ताएं बढ़ आती हैं।
'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'शनि' का फलादेश
सिंह लग्न : द्वादशभाव : शनि बारहवें भाव में शत्रु चन्द्रमा की राशि पर
स्थित शनि के प्रभाव से जातक का खर्च अधिक होता है
तथा बाहरी संबंधों से कुछ लाभ होता है। शत्रु-पक्ष से
परेशानी भी मिलती है।
तीसरी मित्रदृष्टि से द्वितीयभाव की देखने से
धन-जन की वृद्धि के लिए विशेष परिश्रम करना
पड़ता है।
सातवीं दृष्टि से स्वराशि में षष्ठभाव को देखने
से शत्रु-पक्ष पर प्रभाव स्थापित होता है। दसवीं नीच-
दृष्टि से नवमभाव की देखने से भाग्योन्नति में कठिनाइयां आती हैं तथा धर्म की
भी हानि होती है। ऐसा व्यक्ति स्त्री-पक्ष तथा व्यवसाय से कष्ट पाने वाला, अपयशी
तथा रोगी होता है।
'सिंह' लग्न में 'राहु'
'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
सिंह लग्न : प्रथमभाव : राहु
पहले भाव में शत्रु सूर्य की राशि पर स्थित राहु
के प्रभाव के जातक के शारीरिक सौन्दर्य तथा सुख में
कमी आती है तथा कभी-कभी घोर कष्टों का सामना
भी करना पड़ता है। ऐसा व्यक्ति गुप्त युक्तियों तथा
साहस के सहारे आगे बढ़ता है तथा भीतरी चिन्ताओं
से चिन्तित भी बना रहता है।

२८७
'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
सिंह लग्न : द्वितीयभाव : राहु
दूसरे भाव में मित्र बुध की राशि पर स्थित
राहु के प्रभाव से जातक की धन तथा कुटुम्ब के सुख में
कुछ कठिनाइयों के साथ सफलता मिलती है। कभी-कभी
उसे घोर आर्थिक कष्ट भी उठाना पड़ता है तथा ऋण-
ग्रस्त भी होना पड़ता है तो कभी आकस्मिक धन का लाभ
भी होता रहता है। ऐसा व्यक्ति चतुर तथा चालाक
होता है तथा धन-वृद्धि के लिए कठिन परिश्रम करता है।
'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
सिंह लग्न : तृतीयभाव : राहु
तीसरे भाव में मित्र शुक्र की राशि पर स्थित
राहु के प्रभाव से जातक के पराक्रम की विशेष वृद्धि
होती है तथा भाई-बहिन की ओर से कुछ कष्ट प्राप्त
होता है।
ऐसा व्यक्ति बड़ा साहसी, धैर्यवान् तथा परिश्रमी
होता है। वह गुप्त युक्तियों द्वारा गंभीरतापूर्वक अपनी
स्वार्थ-सिद्धि करता है तथा दृढ़ निश्चयी होता है।
'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
सिंह लग्न : चतुर्थभाव : राहु
चौथे भाव में शत्रु मंगल की राशि पर स्थित
राहु के प्रभाव से जातक की मातृ पक्ष से कष्ट मिलता
है तथा भूमि, भवन आदि के सुख में बाधा उत्पन्न होती
है। उसे परदेश में जाकर रहना पड़ता है। परन्तु वह
हिम्मत, गुप्त युक्ति एवं धीरज के साथ सुख के साधनों
को जुटाता तथा संकटों का सामना करता है।

२८८
'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
सिंह लग्न : पंचमभाव : राहु
पाँचवें भाव में शत्रु गुरु की राशि पर स्थित
नीच के राहु के प्रभाव से जातक को सन्तान-पक्ष से कष्ट
मिलता है तथा विद्या की कमी रहती है। वह बुद्धि-बल
से अपनी अयोग्यता को छिपाने का प्रयत्न करता है।
परन्तु उसकी वाणी में विनम्रता, शिष्टता एवं सत्य का
अभाव रहता है। वह गुप्त युक्तियों से स्वार्थ-सिद्धि
करता है।
'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
सिंह लग्न : षष्ठभाव : राहु
छठे भाव में मित्र शनि की राशि पर स्थित राहु
के प्रभाव से जातक युक्ति-बल से शत्रु-पक्ष पर विजय
प्राप्त करता है। कभी-कभी उसे शत्रुओं द्वारा अधिक
परेशान भी किया जाता है। वह बड़ा हिम्मती, बहादुर,
धैर्यवान् तथा साहसी होता है। झगड़े के समय वह अपनी
बहादुरी का प्रदर्शन करता है। उसे अपनी ननसाल के
पक्ष से हानि भी उठानी पड़ती है।
'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
सिंह लग्न : सप्तमभाव : राहु
सातवें भाव में मित्र शनि की राशि पर स्थित राहु
के प्रभाव से जातक की स्त्री-पक्ष से कष्ट मिलता है तथा
दैनिक व्यवसाय के क्षेत्र में भी घोर परेशानियां आती रहती
हैं, परन्तु वह बड़ी हिम्मत तथा धैर्य के साथ उनका
मुकाबला करता है। कभी-कभी संकटों से बहुत घिर जाता
है, किन्तु गुप्त युक्तियों द्वारा उन्हें पार कर जाता है।

२८६
'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
सिंह लग्न : अष्टमभाव : राहु
आठवें भाव में शत्रु गुरु की राशि पर स्थित राहु
के प्रभाव से जातक की अपने जीवन में अनेक बार मृत्यु-
तुल्य कष्टों का सामना करना पड़ता है। उसके पेट के
निम्न भाग में विकार रहता है तथा उसे चिन्ताएं एवं
परेशानियां घेरे रहती हैं। उसे पुरातत्त्व की हानि भी
उठानी पड़ती है।

'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
सिंह लग्न : नवमभाव : राहु नवें भाव में शत्रु मंगल की राशि पर स्थित राहु
के प्रभाव से जातक की भाग्योन्नति में अनेक बार
रुकावटें आती हैं तथा परेशानियां उठ खड़ी होती हैं।
उसे धर्म-पालन में अरुचि रहती है।
ऐसा व्यक्ति अपने भाग्य की वृद्धि के लिए अनेक
प्रकार की युक्तियों का सहारा लेता है तथा धैर्यवान्,
हिम्मती एवं साहसी होने के कारण परेशानियों की हटाने
में कुछ सफल भी हो जाता है।

'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'दशमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
सिंह लग्न : दशमभाव : राहु
दसवें भाव में अपने मित्र शुक्र की राशि पर स्थित
राहु के प्रभाव से जातक की पिता के सुख में कमी रहती
है तथा राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में भी कठिनाइयों का
सामना करना पड़ता है। परन्तु गुप्त युक्तियों के बल पर
वह अनेक कठिनाइयों को पार कर जाता है तथा कुछ
उन्नति भी प्राप्त कर लेता है।

२६०
'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
सिंह लग्न : एकादशभाव : राहु
ग्यारहवें भाव में मित्र बुध की राशि पर स्थित
राहु के प्रभाव के जातक की आमदनी में बहुत वृद्धि
होती है तथा कभी-कभी आकस्मिक धन-लाभ भी होता
है। वह अपने धैर्य, साहस, परिश्रम तथा गुप्त युक्तियों
के बल पर लाभ को बढ़ाता रहता है, परन्तु कभी-कभी
उसे हानि भी उठानी पड़ती है।
'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
सिंह लग्न : द्वादशभाव : राहु
बारहवें भाव में शत्रु चन्द्रमा की राशि पर स्थित
राहु के प्रभाव से जातक को अपना खर्च चलाने के लिए
हर समय चिन्तित रहना पड़ता है तथा कभी-कभी घोर
कष्टों का सामना भी करना पड़ता है।
उसे बाहरी सम्बन्धों से भी हानि पहुँचती है।
परन्तु गुप्त युक्तियों, परिश्रम तथा साहस के बल पर वह
थोड़ी-बहुत सफलता भी प्राप्त कर लेता है।
'सिंह' लग्न में 'केतु' का फलादेश
'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश
सिंह लग्न : प्रथमभाव : केतु
पहले भाव में शत्रु सूर्य की राशि पर स्थित केतु के
प्रभाव से जातक के शारीरिक स्वास्थ्य एवं सौन्दर्य में
कमी आती है तथा कभी बाहरी चोट भी लगती है,
जिसका शरीर पर स्थायी चिह्न बन जाता है।
ऐसा व्यक्ति भीतर से काफी चिन्तित रहता है तथा
सुख पाने के लिए कठिन परिश्रम करता है।

२६१
'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश
सिंह लग्न : द्वितीयभाव : केतु
दूसरे भाव में मित्र बुध की राशि पर स्थित केतु
के प्रभाव से जातक की धन-संचय में कमी रहती है,
जिसके कारण उसे अनेक कठिनाइयों तथा चिन्ताओं का
सामना करना पड़ता है। वह धन-वृद्धि के लिए कठिन
परिश्रम करता है तथा गुप्त युक्तियों के आश्रय से
प्रतिष्ठा की बढ़ाने का प्रयत्न भी करता है। उसे पूर्ण
कौटुम्बिक सुख भी प्राप्त नहीं होता है।
'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश
सिंह लग्न : तृतीयभाव : केतु
तीसरे भाव में मित्र शुक्र की राशि पर स्थित
केतु के प्रभाव से जातक को भाई-बहिनों से कष्ट
प्राप्त होता है, परन्तु पराक्रम की वृद्धि होती है।
ऐसा व्यक्ति निडर, साहसी, पराक्रमी,
परिश्रमी, चतुर तथा शक्तिशाली होता है, साथ ही
हठी तथा लापरवाह भी रहता है। वह प्रत्येक कार्य
को अपने बाहुबल से ही पूरा करता है।
'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश
सिंह लग्न : चतुर्थभाव : केतु
चौथे भाव में शत्रु मंगल की राशि पर स्थित
केतु के प्रभाव से जातक की माता के सुख में कमी
आती है। घरेलू सुख में अशान्ति रहती है तथा
भूमि-भवन का सुख भी नहीं मिलता। उसे परदेश
में जाकर रहना पड़ता है।
ऐसा व्यक्ति कठिन परिश्रमी तथा गुप्त
युक्तियों का प्रयोग करने वाला होता है, फिर भी
प्रायः परेशान ही बना रहता है।

२६२
'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश
सिंह लग्न : पंचमभाव : केतु
पाँचवें भाव में शत्रु गुरु की राशि पर स्थित
उच्च के केतु के प्रभाव से जातक की सन्तान-पक्ष से शक्ति
मिलती है, परन्तु कभी-कभी कष्ट भी उठाने पड़ते हैं।
विद्या-बुद्धि के क्षेत्र में परिश्रम करने पर भी अधिक
सफलता नहीं मिलती। ऐसा व्यक्ति स्वयं को बुद्धिमान्
भी समझता है, परन्तु उसकी वाणी में प्रभाव नहीं होता।
'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश
सिंह लग्न : षष्ठभाव : केतु
छठे भाव में मित्र शनि की राशि पर स्थित
केतु के प्रभाव से जातक अपने परिश्रम द्वारा शत्रु पर
विजय प्राप्त करता है। वह बड़ा हिम्मती तथा
धैर्यवान् होता है। गुप्त युक्तियों तथा आन्तरिक
साहस के बल पर वह निरन्तर आगे बढ़ने का
प्रयत्न करता है तथा मुसीबतें आने पर भी घबराता
नहीं है। उसे अपने ननिहाल पक्ष से हानि भी उठानी
पड़ती है।
'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश
सिंह लग्न : सप्तमभाव : केतु
सातवें भाव में मित्र शनि की राशि पर स्थित
केतु के प्रभाव से जातक की स्त्री-सुख तथा व्यवसाय-पक्ष
में कमी का सामना करना होता है। वह अपने साहस,
धैर्य तथा गुप्त युक्तियों के बल पर गृहस्थी को चलाता
है। कभी-कभी बड़ी मुसीबतों में भी फँसता है, परन्तु
धैर्य तथा साहस को नहीं छोड़ता और अन्त में सफलता
पाकर ही रहता है। उसकी मूत्रेन्द्रिय में विकार होने
की संभावना भी रहती है।
'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश
सिंह लग्न : अष्टमभाव : केतु
आठवें भाव में शत्रु गुरु की राशि पर स्थित केतु
के प्रभाव से जातक को जीवन में अनेक बार मृत्यु-तुल्य
कष्टों का सामना करना पड़ता है तथा पुरातत्त्व की हानि
भी उठानी पड़ती है। वह सदैव चिन्तित रहता है, फिर
भी धैर्य और साहस को नहीं छोड़ता। और परिश्रम
तथा गुप्त युक्तियों के बल पर वह कठिनाइयों पर विजय
पाता है। उसके पेट के निम्न भाग में कुछ विकार भी
रहता है।

२६३
'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश
सिंह लग्न : नवमभाव : केतु
नवें भाव में शत्रु मंगल की राशि पर स्थित
केतु के प्रभाव से जातक की भाग्योन्नति में बाधाएँ
आती हैं तथा धर्म के पक्ष में भी कमजोरी रहती है।
वह कठिन परिश्रम करने पर भी यशस्वी
नहीं बन पाता तथा कभी-कभी घोर संकटों में पड़
जाता है। भाग्यहीन होने पर भी वह अपने परिश्रम,
धैर्य, साहस तथा गुप्त युक्तियों के बल पर कुछ
सफलता एवं शक्ति प्राप्त कर लेता है।
'सिंह लग्न' की कुण्डली के 'दशमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश
सिंह लग्न : दशमभाव : केतु
दसवें भाव में मित्र शुक्र की राशि पर स्थित
केतु के प्रभाव से जातक को पिता से कुछ कष्ट
मिलता है तथा राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में
सफलता पाने के लिए घोर परिश्रम करना पड़ता
है।
वह अपने धैर्य, साहस, चातुर्य, बुद्धि-बल तथा
परिश्रम द्वारा कठिनाइयों पर विजय प्राप्त करता
हुआ आगे बढ़ता है और तरक्की भी करता है।
'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश
सिंह लग्न : एकादशभाव : केतु
ग्यारहवें भाव में मित्र बुध की राशि पर स्थित
केतु के प्रभाव से जातक को धन की कमी का दुःख
विशेष रूप से अनुभव होता है तथा वह अपनी आमदनी
बढ़ाने के लिए घोर परिश्रम तथा संघर्ष करता है। वह
लाभ उठाने के लिए उचित-अनुचित का विचार भी नहीं
करता तथा गुप्त युक्तियों एवं धैर्य के बल पर
कठिनाइयों को पार कर लेता है।
'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'केतु का फलादेश
सिंह लग्न : द्वादशभाव : केतु
बारहवें भाव में शत्रु चन्द्रमा की राशि पर
स्थित केतु के प्रभाव से जातक अपने खर्च को बड़ी
कठिनाई से चला पाता है। उसे मानसिक चिन्ताएँ
तथा परेशानियां घेरे रहती हैं। वह अनेक बार संकटों
तथा हानियों का सामना करता है, परन्तु अपने गुप्त
धैर्य, युक्तिबल, परिश्रम तथा साहस के बल पर उन
कठिनाइयों पर विजय पाता हुआ अपने काम को
जैसे-तैसे चलाता रहता है।

२६४
‘कन्या’ लग्न
६६०
[‘कन्या’ लग्न की कुण्डलियों के विभिन्न गृहों में स्थित
विभिन्न ग्रहों के फलादेश का पृथक्-पृथक् वर्णन]
‘कन्या लग्न’ का फलादेश
‘कन्या’ लग्न में जन्म लेने वाले जातक का शरीर सामान्य अथवा स्थूल और
सुन्दर होता है। इसकी आँखें बड़ी-बड़ी होती हैं। यह कफ एवं पित्त प्रकृतिवाला,
सत्यभाषी, प्रियवादी, गंभीर, भावुक-मिजाज, अपने मन की बात की छिपाने वाला,
सदैव प्रसन्न रहने वाला, चतुर, काम-क्रीड़ा-कुशल, मायावी, भोगी, विचारशील,
डरपोक, यात्रा-प्रेमी, गणितज्ञ, धर्म में रुचि रखने वाला तथा अनेक प्रकार के गुणों
तथा कला-कौशलों से युक्त होता है।
इसे सुन्दर स्त्री प्राप्त होती है तथा कन्या-सन्तति अधिक होती है। यह
भ्रातृ-द्रोही तथा स्त्री द्वारा पराजित भी होता है।
इस लग्न वाला जातक बाल्यावस्था में सुखी, मध्यमावस्था में सामान्य तथा
अन्तिमावस्था में दुःख भोगने वाला होता है। इसका भाग्योदय २४ से ३६ वर्ष की
आयु के बीच होता है। इसी अवधि में यह अपने धर्म तथा ऐश्वर्य की वृद्धि करता
है, परन्तु यह अन्त तक नहीं टिक पाता।

२६५
'कन्या' लग्न वालों की अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित
विभिन्न ग्रहों का स्थायी फलादेश आगे दी गई उदाहरण-कुण्डली संख्या ६६१ से ७६८
के बीच देखना चाहिए ।
गोचर-कुण्डली के ग्रहों का फलादेश किन उदाहरण-कुण्डलियों में देखें, इसे आगे
लिखे अनुसार समझ लेना चाहिए ।
'कन्या' लग्न में 'सूर्य' का फलादेश
१—'कन्या' लग्न वालों की अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित
'सूर्य' का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या ६६१ से ६७२ के बीच देखना
चाहिए ।
२—'कन्या' लग्न वालों को अपनी गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित
'सूर्य' का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए—
जिस महीने में 'सूर्य'—
(क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या ६६१
(ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या ६६२
(ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या ६६३
(घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या ६६४
(ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या ६६५
(ख) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या ६६६
(छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या ६६७
(ख) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या ६६८
(क) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या ६६९
(ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या ६७०
(ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या ६७१
(ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या ६७२
'कन्या' लग्न में 'चन्द्रमा' का फलादेश
१

२६६
२—'कन्या' लग्न वालों की गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित
'चन्द्रमा' का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए—
जिस दिन 'चन्द्रमा'—
(क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या ६७३
(ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या ६७४
(ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या ६७५
(घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या ६७६
(ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या ६७७
(च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या ६७८
(छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या ६७९
(ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या ६८०
(झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या ६८१
(ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या ६८२
(ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या ६८३
(ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या ६८४
'कन्या' लग्न में 'मंगल' का फलादेश
१—'कन्या' लग्न वालों की अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित
'मंगल' का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या ६८५ से ६९६ के बीच देखना
चाहिए।
२—'कन्या' लग्न वालों की गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'मंगल'
का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए—
जिस महीने में 'मंगल'—
(क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या ६८५
(ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या ६८६
(ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या ६८७
(घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या ६८८
(ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या ६८९
(च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या ६९०
(छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या ६९१
(ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या ६९२
(झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या ६९३
(ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या ६९४
(ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या ६९५
(ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या ६९६

२९७
'कन्या' लग्न में 'बुध' का फलादेश
१—'कन्या' लग्न वालों की अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित
'बुध' का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या ६९७ से ७०८ के बीच देखना
चाहिए।
२—'कन्या' लग्न वालों को गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'बुध'
का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए—
जिस महीने में 'बुध'—
(क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या ६९७
(ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या ६९८
(ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या ६९९
(घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या ७००
(ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या ७०१
(च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या ७०२
(छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या ७०३
(ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या ७०४
(झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या ७०५
(ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या ७०६
(ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या ७०७
(ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या ७०८
'कन्या' लग्न में 'गुरु' का फलादेश
१—'कन्या' लग्न वालों की अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित
'गुरु' का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या ७०९ से ७२० के बीच देखना
चाहिए।
२—'कन्या' लग्न वालों की गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'गुरु'
का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए—
जिस वर्ष में 'गुरु'—
(क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या ७०९
(ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या ७१०
(ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या ७११

२६८
(घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या ७१२
(ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या ७१३
(च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या ७१४
(छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या ७१५
(ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या ७१६
(झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या ७१७
(ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या ७१८
(ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या ७१६
(ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या ७२०
'कन्या' लग्न में 'शुक्र' का फलादेश
१—'कन्या' लग्न वालों की अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित
'शुक्र' का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुंडली संख्या ७२१ से ७३२ के बीच देखना
चाहिए ।
२—'कन्या' लग्न वालों को गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'गुरु'
का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए—
जिस महीने में 'शुक्र'—
(क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या ७२१
(ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या ७२२
(ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या ७२३
(घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या ७२४
(ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या ७२५
(च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या ७२६
(छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या ७२७
(ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या ७२८
(झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या ७२९
(ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या ७३०
(ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या ७३१
(ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या ७३२
'कन्या' लग्न में 'शनि' का फलादेश
१—'कन्या' लग्न वालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित
'शनि' का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या ७३३ से ७४४ के बीच देखना
चाहिए ।