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सर्वकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

पृष्ठ 282, कुल 638 में से

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'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश
सिंह लग्न : द्वितीयभाव : केतु
दूसरे भाव में मित्र बुध की राशि पर स्थित केतु
के प्रभाव से जातक की धन-संचय में कमी रहती है,
जिसके कारण उसे अनेक कठिनाइयों तथा चिन्ताओं का
सामना करना पड़ता है। वह धन-वृद्धि के लिए कठिन
परिश्रम करता है तथा गुप्त युक्तियों के आश्रय से
प्रतिष्ठा की बढ़ाने का प्रयत्न भी करता है। उसे पूर्ण
कौटुम्बिक सुख भी प्राप्त नहीं होता है।
'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश
सिंह लग्न : तृतीयभाव : केतु
तीसरे भाव में मित्र शुक्र की राशि पर स्थित
केतु के प्रभाव से जातक को भाई-बहिनों से कष्ट
प्राप्त होता है, परन्तु पराक्रम की वृद्धि होती है।
ऐसा व्यक्ति निडर, साहसी, पराक्रमी,
परिश्रमी, चतुर तथा शक्तिशाली होता है, साथ ही
हठी तथा लापरवाह भी रहता है। वह प्रत्येक कार्य
को अपने बाहुबल से ही पूरा करता है।
'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश
सिंह लग्न : चतुर्थभाव : केतु
चौथे भाव में शत्रु मंगल की राशि पर स्थित
केतु के प्रभाव से जातक की माता के सुख में कमी
आती है। घरेलू सुख में अशान्ति रहती है तथा
भूमि-भवन का सुख भी नहीं मिलता। उसे परदेश
में जाकर रहना पड़ता है।
ऐसा व्यक्ति कठिन परिश्रमी तथा गुप्त
युक्तियों का प्रयोग करने वाला होता है, फिर भी
प्रायः परेशान ही बना रहता है।