भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
२४७
‘कर्क’ लग्न की कुण्डली के ‘एकादशभाव’ स्थित ‘राहु’ का फलादेश
कर्क लग्न : एकादशभाव : राहु
ग्यारहवें भाव में मित्र शुक्र की राशि पर
स्थित राहु के प्रभाव से जातक को बड़ी चतुराई
के साथ यथेष्ट धन का लाभ होता है, परन्तु
कभी-कभी सामान्य कठिनाइयां भी उठानी पड़ती
हैं तथा संकटों का सामना करना पड़ता है। कभी
कभी आकस्मिक रूप से भी धन-लाभ होता है।
‘कर्क’ लग्न की कुण्डली के ‘द्वादशभाव’ स्थित ‘राहु’ का फलादेश
कर्क लग्न : द्वादशभाव : राहु
बारहवें भाव में मित्र बुध की राशि में स्थित
राहु के प्रभाव से जातक को बाहरी स्थानों के संबंध
से गुप्त युक्तियों के बल पर लाभ होता है तथा
खर्च अधिक रहता है। वह परदेश में विशेष सम्मान
एवं ख्याति प्राप्त करता है।
ऐसा व्यक्ति अपनी कमजोरियों को प्रकट
नहीं करता तथा बड़ी चतुराई तथा बुद्धिमानी से
उन्नति एवं सफलता प्राप्त करता है।
‘कर्क’ लग्न में ‘केतु’
‘कर्क’ लग्न की कुण्डली के ‘प्रथमभाव’ स्थित ‘केतु’ का फलादेश
कर्क लग्न : प्रथमभाव : केतु
पहले भाव में शत्रु चन्द्रमा की राशि पर
स्थित केतु के प्रभाव से जातक के शरीर पर किसी
गहरी चोट अथवा घाव का निशान बनता है।
शारीरिक सौन्दर्य तथा स्वास्थ्य में कमी आती है।
चेचक की बीमारी हो सकती है तथा कभी-कभी
मृत्युतुल्य कष्ट भी भोगना पड़ता है।
२४८
'कर्क' लग्न की कुण्डली के द्वितीयभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश
कर्क लग्न : द्वितीयभाव : केतु दूसरे भाव में शत्रु सूर्य की राशि पर स्थित
केतु के प्रभाव से जातक के धन की अत्यधिक
हानि होती है तथा उसी के कारण बड़े संकटों का
सामना भी करना पड़ता है। कुटुम्ब से क्लेश मिलता
है। ऐसा व्यक्ति ऋण लेकर अपना काम चलाता है
तथा परिश्रम एवं गुप्त युक्तियों द्वारा अपने प्रभाव
की रक्षा करता है।
'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश
कर्क लग्न : तृतीयभाव : केतु तीसरे भाव में मित्र बुध की राशि पर स्थित
केतु के प्रभाव से जातक के पराक्रम में वृद्धि होती
है। वह गुप्त युक्तियों, विवेक तथा कठिन परिश्रम
द्वारा सफलता प्राप्त करता है।
ऐसा व्यक्ति उद्दण्ड स्वभाव तथा उग्र प्रकृति
का होता है। भाई-बहिनों के सुख में भी कमी
रहती है।
'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश
कर्क लग्न : चतुर्थभाव : केतु
चौथे भाव में मित्र शुक्र की राशि पर स्थित
केतु के प्रभाव से जातक को माता के सुख में कमी
रहती है तथा परदेश में जाकर रहना पड़ता है।
बार-बार स्थान का परिवर्तन भी करना पड़ता है।
कभी-कभी घोर संकट भी आ जाते हैं। अन्त में उसे
सामान्य सुख का लाभ भी होता है।
२४६
'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश
कर्क लग्न : पंचमभाव : केतु
पाँचवें भाव में शत्रु मंगल की राशि पर स्थित
केतु के प्रभाव से जातक को सन्तान-पक्ष से कष्ट
मिलता है तथा विद्याध्ययन में भी कठिनाइयाँ आती
हैं। परन्तु ऐसा व्यक्ति चतुर, चालाक तथा बातूनी
होने के कारण अपनी अयोग्यता को छिपाकर दूसरों
पर प्रभाव डालने में सफल हो जाता है। वह सन्तोषी
तथा शीलयुक्त भी नहीं होता।
'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश
कर्क लग्न : षष्ठभाव : केतु
छठे भाव में शत्रु गुरु की राशि पर स्थित केतु
के प्रभाव से जातक की शत्रु पक्ष में बड़ी सफलताएँ
मिलती हैं। वह कठिन स्थितियों में भी अपने धैर्य तथा
साहस को नहीं छोड़ता। ऐसा व्यक्ति स्वस्थ शरीर का,
साहसी तथा परिश्रमी होता है, परन्तु उसमें दया,
शील, सौजन्य आदि सद्गुण नहीं होते।
'कर्क' लग्न
२५०
'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश
कर्क लग्न : अष्टमभाव : केतु
आठवें भाव में मित्र शनि की राशि पर
स्थित केतु के प्रभाव से जातक को आयु-पक्ष में
अनेक बार मृत्यु-तुल्य कष्ट होते हैं तथा पुरातत्व की
हानि भी होती है। पेट विकारग्रस्त रहता है। धन
का संकट तथा गुप्त चिन्ताएं रहती हैं। ऐसा व्यक्ति
गुप्त रूप से अपनी उन्नति तथा सुख के लिए
निरन्तर प्रयत्नशील बना रहता है।
'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश
कर्क लग्न : नवमभाव : केतु
नवें भाव में शत्रु गुरु की राशि पर स्थित केतु
के प्रभाव से जातक को अपनी भाग्योन्नति के लिए
कठिन परिश्रम करना पड़ता है तथा कभी-कभी बड़े
संकटों तथा विफलताओं का शिकार भी होना
पड़ता है।
वह गुप्त रूप से अपनी उन्नति के लिए
प्रयत्न करता है, परन्तु भाग्योन्नति बड़ी धीमी गति
से ही होती है।
'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'दशमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश
कर्क लग्न : दशमभाव : केतु
दसवें भाव में शत्रु मंगल की राशि पर स्थित
केतु के प्रभाव से जातक को राज्य, पिता तथा
व्यवसाय के क्षेत्र में कठिनाइयां उठानी पड़ती हैं।
यश तथा प्रतिष्ठा को धक्का भी लगता है परन्तु वह
अपनी गुप्त युक्ति एवं परिश्रम द्वारा पुनः प्रतिष्ठा
प्राप्त करने के लिए प्रयत्नशील बना रहता है।
२५१
'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश
कर्क लग्न : एकादशभाव : केतु ग्यारहवें भाव में मित्र शुक्र की राशि पर
स्थित केतु के प्रभाव से जातक आर्थिक लाभ पाने
के लिए कठोर परिश्रम करता है तथा परिश्रम,
चतुराई एवं गुप्त युक्तियों के बल पर लाभ में
वृद्धि भी करता है।
ऐसे व्यक्ति को बारम्बार संकटों का सामना
करना पड़ता है, परन्तु वह कभी हिम्मत नहीं हारता
तथा परिश्रम से भी नहीं चुराता।
'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश
कर्क लग्न : द्वादशभाव : केतु बारहवें भाव में मित्र बुध की राशि पर स्थित
केतु के प्रभाव से जातक को खर्च के बारे में बहुत
परेशानी उठानी पड़ती है तथा बाहरी स्थानों के
सम्बन्धों से भी कष्ट ही मिलता है।
ऐसा जातक गुप्त युक्तियों से काम लेनेवाला,
परिश्रमी तथा भीतर-ही-भीतर दुःखी रहने वाला
होता है।
'कर्क' लग्न समाप्त
२४२
'सिंह' लग्न
[कुण्डली चक्र: लग्न (५) 'सिंह' लग्न, द्वितीय भाव (६), तृतीय भाव (७), चतुर्थ भाव (८), पंचम भाव (९), षष्ठ भाव (१०), सप्तम भाव (११), अष्टम भाव (१२), नवम भाव (१), दशम भाव (२), एकादश भाव (३), द्वादश भाव (४)]
५५९
['सिंह' लग्न की कुण्डलियों के विभिन्न भावों में स्थित
विभिन्न ग्रहों के फलादेश का पृथक-पृथक वर्णन]
'सिंह' लग्न का फलादेश
'सिंह' लग्न में जन्म लेने वाले जातक के शरीर का रंग पाण्डुवर्ण होता है।
वह पित्त एवं वायु के विकार से पीड़ित रहता है। ऐसा व्यक्ति रजोगुणी, वीर,
साहसी, अत्यन्त पराक्रमी, अहंकारी, क्रोधी, उग्रस्वभाव, अस्त्र-शस्त्र विद्या में निपुण
ढीठ, भोगी, तीक्ष्णबुद्धि, घुड़सवारी से प्रेम रखने वाला तथा मांस एवं रसीली
वस्तुओं का भोजन करने वाला होता है।
इसके हाथ बड़े होते हैं तथा छाती चौड़ी होती है। यह उदार तथा साधु-
सन्त-सेवी भी होता है।
इस लग्न वाला जातक अपनी आरंभिक अवस्था में सुखी, मध्यावस्था में
दुःखी तथा अन्तिमावस्था में पूर्ण सुखी रहता है। इसका भाग्योदय २१ अथवा २८
वर्ष की आयु में होता है। सिंह लग्न वाला व्यक्ति जहाँ प्रबल पराक्रमी होता है,
२५३
जहाँ आलसी भी पाया जाता है, परन्तु समय पड़ने पर यह अपना कमाल प्रदर्शित
कर दिखाता है।
'सिंह' लग्न वालों के अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित विभिन्न
ग्रहों का स्थायी फलादेश वाले दी गई उदाहरण कुण्डली संख्या ५५२ से ६५६ के बीच
देखना चाहिए।
गोचर-कुण्डली के ग्रहों का फलादेश किन उदाहरण-कुण्डलियों में देखें, इसे
आगे लिखे अनुसार समझ लेना चाहिए।
❦
'सिंह' लग्न में 'सूर्य' का फलादेश
१. 'सिंह' लग्न वालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित
'सूर्य' का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या ५५२ से ५६३ के बीच देखना
चाहिए।
२. 'सिंह' लग्न वालों की गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'सूर्य'
का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए—
जिस महीने में 'सूर्य'—
(क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या ५५२
(ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या ५५३
(ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या ५५४
(घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या ५५५
(च) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या ५५६
(छ) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या ५५७
(छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या ५५८
(ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या ५५६
(झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या ५६०
(ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या ५६१
(ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या ५६२
(ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या ५६३
'सिंह' लग्न में 'चन्द्रमा' का फलादेश
१. 'सिंह' लग्न वालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित
'चन्द्रमा' का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या ५६४ से ५७५ के बीच
देखना चाहिए।
२५४
२- 'सिंह' लग्न वालों की गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित
'चन्द्रमा' का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए—
जिस दिन 'चन्द्रमा'—
(क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या ५६४
(ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या ५६५
(ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या ५६६
(घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या ५६७
(ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या ५६८
(च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या ५६९
(छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या ५७०
(ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या ५७१
(झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या ५७२
(ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या ५७३
(ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या ५७४
(ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या ५७५
'सिंह' लग्न में 'मंगल' का फलादेश
१- 'सिंह' लग्न वालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित
'मंगल' का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या ५७६ से ५८७ के बीच देखना
चाहिए।
२- 'सिंह' लग्नवालों की गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'मंगल'
का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए—
जिस महीने में 'मंगल'—
(क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या ५७६
(ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या ५७७
(ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या ५७८
(घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या ५७९
(ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या ५८०
(च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या ५८१
(छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या ५८२
(ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या ५८३
(झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या ५८४
(ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या ५८५
(ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या ५८६
(ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या ५८७
२४५
'सिंह' लग्न में 'बुध' का फलादेश
१. 'सिंह' लग्न वालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित
'बुध' का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या ५८८ से ५६६ के बीच देखना
चाहिए।
२. 'सिंह' लग्न वालों को गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'बुध'
का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए—
जिस महीने में 'बुध'—
(क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या ५८८
(ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या ५८६
(ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या ५६०
(घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या ५६१
(ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या ५६२
(च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या ५६३
(छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या ५६४
(ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या ५६५
(झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या ५६६
(ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या ५६७
(ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या ५६८
(ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या ५६६
'सिंह' लग्न में 'गुरु' का फलादेश
१. 'सिंह' लग्न वालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित
'गुरु' का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या ६०० से ६११ के बीच देखना
चाहिए।
२. 'सिंह' लग्न वालों की गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'गुरु'
का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए—
जिस वर्ष में 'गुरु'—
(क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या ६००
(ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या ६०१
(ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या ६०२
(घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या ६०३
२५६
(ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या ६०४
(च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या ६०५
(छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या ६०६
(ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या ६०७
(झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या ६०८
(ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या ६०६
(ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या ६१०
(ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या ६११
'सिंह' लग्न में 'शुक्र' का फलादेश
१. 'सिंह' लग्न वालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित
'शुक्र' का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या ६१२ से ६२३ के बीच देखना
चाहिए ।
'सिंह' लग्नवालों की गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'शुक्र' का
अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए—
जिस महीने में 'शुक्र'—
(क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या ६१२
(ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या ६१३
(ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या ६१४
(घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्ता ६१५
(ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या ६१६
(च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या ६१७
(छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या ६१८
(ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या ६१६
(झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या ६२०
(ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या ६२१
(ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या ६२२
(ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या ६२३
'सिंह' लग्न में 'शनि' का फलादेश
१. 'सिंह' लग्नवालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित
शनि' का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या ६२४ से ६३५ के बीच देखना
चाहिए ।
२५७
२. 'सिंह' लग्न वालों को गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'शनि'
का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए—
जिस वर्ष में 'शनि'—
(क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या ६२४
(ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या ६२५
(ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या ६२६
(घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या ६२७
(ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या ६२८
(च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या ६२९
(छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या ६३०
(ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या ६३१
(झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या ६३२
(ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या ६३३
(ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या ६३४
(ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या ६३५
'सिंह' लग्न में 'राहु' का फलादेश
१ 'सिंह' लग्न वालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित
'राहु' का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या ६३६ से ६४७ के बीच देखना
चाहिए ।
२. 'सिंह' लग्न वालों को गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'राहु'
का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए—
जिस वर्ष में 'राहु'—
(क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या ६३६
(ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या ६३७
(ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या ६३८
(घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या ६३९
(ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या ६४०
(च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या ६४१
(छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या ६४२
(ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या ६४३
(झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या ६४४
(ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या ६४५
(ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या ६४६
(ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या ६४७
२५८
'सिंह' लग्न में 'केतु' का फलादेश
१. 'सिंह' लग्न वालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित
'केतु' का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या ६४८ से ६५९ के बीच देखना
चाहिए।
२. 'सिंह' लग्न वालों को गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'केतु'
का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए—
जिस वर्ष में 'केतु'—
(क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या ६४८
(ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या ६४९
(ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या ६५०
(घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या ६५१
(ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या ६५२
(च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या ६५३
(छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या ६५४
(ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या ६५५
(झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या ६५६
(ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या ६५७
(ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या ६५८
(ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या ६५९
'सिंह' लग्न में 'सूर्य'
'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित सूर्य का फलादेश
सिंह लग्न : प्रथमभाव : सूर्य
[कुण्डली संख्या: ५५७]
प्रथम भाव (लग्न): ५ (सिंह), सू.
द्वितीय भाव: ६ (कन्या) | तृतीय भाव: ७ (तुला)
चतुर्थ भाव: ८ (वृश्चिक) | पंचम भाव: ९ (धनु)
षष्ठ भाव: १० (मकर) | सप्तम भाव: ११ (कुम्भ)
अष्टम भाव: १२ (मीन) | नवम भाव: १ (मेष)
दशम भाव: २ (वृष) | एकादश भाव: ३ (मिथुन)
द्वादश भाव: ४ (कर्क)
पहले भाव में स्वराशि-स्थित सूर्य के प्रभाव से
जातक शारीरिक शक्ति, आत्मबल तथा सौन्दर्य का
लाभ प्राप्त करता है। वह बड़ा हिम्मती तथा लम्बे
कद का होता है।
सातवीं शत्रु-दृष्टि से सप्तमभाव को देखने से
जातक को स्त्री तथा दैनिक व्यवसाय के क्षेत्र में
कुछ कठिनाइयां आती हैं तथा असन्तोष बना
रहता है।
२५६
'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश
सिंह लग्न : द्वितीयभाव : सूर्य दूसरे भाव में मित्र बुध की राशि पर स्थित
सूर्य के प्रभाव से जातक के धन तथा कुटुम्ब के सुख
में वृद्धि होती है, परन्तु उसी के कारण कुछ परतंत्रता
का अनुभव भी होता है।
सातवीं मित्र-दृष्टि से अष्टमभाव को देखने
से आयु तथा पुरातत्त्व का लाभ होता है तथा जातक
समाज में प्रतिष्ठित व्यक्ति समझा जाता है।
'सिंह' लग्न को कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश
सिंह लग्न : तृतीयभाव : सूर्य तीसरे भाव में शत्रु शुक्र की तुला राशि पर
स्थित नीच के सूर्य के प्रभाव से जातकों का भाई-
बहिनों से वैमनस्य रहता है तथा पराक्रम में कुछ
कमी आती है। फिर भी वह जातक बड़ा हिम्मती
होता है।
सातवीं मित्रदृष्टि से नवमभाव को देखने
से जातक के भाग्य में वृद्धि होती है तथा वह धर्म
में भी आस्था रखता है।
'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश
सिंह लग्न : चतुर्थभाव : सूर्य चौथे भाव में मित्र मंगल की राशि पर
स्थित सूर्य के प्रभाव से जातक की माता, भूमि तथा
भवन आदि का सुख प्राप्त होता है तथा शरीर
सुखी रहता है।
सातवीं शत्रु-दृष्टि से दशमभाव को देखने
के कारण जातक का पिता से वैमनस्य रहता है
तथा राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में अधिक प्रयत्न
करने पर ही सफलता मिलती है।
२६०
'सिंह' लग्न को कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश
सिंह लग्न : पंचमभाव : सूर्य पाँचवें भाव में मित्र गुरु की राशि पर स्थित
सूर्य के प्रभाव से जातक को विद्या, बुद्धि तथा संतान
के क्षेत्र में अच्छी सफलता मिलती है। यह आत्मज्ञानी
तथा उग्र मस्तिष्क वाला होता है।
सातवीं मित्रदृष्टि से एकादशभाव को देखने
से बुद्धि-बल द्वारा पर्याप्त आमदनी होती है। ऐसा
व्यक्ति अहंकारी भी होता है।
'सिंह' लग्न को कुण्डली से 'षष्ठभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश
सिंह लग्न : षष्ठभाव : सूर्य छठे भाव में शत्रु शनि को राशि पर स्थित
सूर्य के प्रभाव से जातक शत्रुओं पर विजय प्राप्त
करता है तथा कठिनाइयों से घबराता नहीं है।
शारीरिक सौन्दर्य में कमी आती है तथा रोग एवं
परतंत्रता के योग भी बनते हैं।
सातवीं मित्रदृष्टि से द्वादशभाव को देखने
से खर्च अधिक रहता है तथा बाहरी स्थान के संबंध
से भी लाभ होता है।
'सिंह' लग्न को कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश
सिंह लग्न : सप्तमभाव : सूर्य सातवें भाव में शत्रु शनि की राशि पर
स्थित सूर्य के प्रभाव से जातक का स्त्री-पक्ष से
वैमनस्य रहता है तथा व्यवसाय के क्षेत्र में कठि-
नाइयों के बाद सफलता मिलती है।
सातवीं दृष्टि से प्रथमभाव को देखने से
शारीरिक शक्ति एवं स्वाभिमान में वृद्धि होती है
और वह अपने यश का विस्तार भी करता है।
२५१
'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश
सिंह लग्न : अष्टमभाव : सूर्य
आठवें भाव में मित्र गुरु की राशि पर स्थित
सूर्य के प्रभाव से जातक की कुछ कठिनाइयों के साथ
आयु एवं पुरातत्त्व का लाभ होता है तथा बाहरी
स्थानों के सम्बन्ध से शक्ति प्राप्त होती है।
सातवीं दृष्टि से द्वितीयभाव को देखने से
कठिन परिश्रम द्वारा धन एवं कौटुम्बिक सुख प्राप्त
होता है। ऐसा व्यक्ति क्रोधी स्वभाव का होता है।
'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश
सिंह लग्न : नवमभाव : सूर्य
नवें भाव में मित्र मंगल की राशि पर स्थित
उच्च के सूर्य के प्रभाव से जातक की भाग्य-शक्ति
प्रबल होती है तथा धर्म में भी अभिरुचि बनी रहती
है।
सातवीं नीच दृष्टि से तृतीयभाव को देखने
से जातक को भाई-बहिनों से असन्तोष रहता है तथा
पराक्रम के बारे में ऐसा व्यक्ति लापरवाह रहता
है। स्थूल शरीर वाला भाग्यवान तथा ईश्वर-भक्त
होता है।
'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'दशमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश
सिंह लग्न : दशमभाव : सूर्य
दसवें भाव में शत्रु शुक्र की राशि पर स्थित
सूर्य के प्रभाव से जातक का पिता से वैमनस्य रहता
है, परन्तु राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में उन्नति
एवं मान-प्रतिष्ठा का लाभ होता है।
सातवीं मित्र-दृष्टि से चतुर्थभाव को देखने
के कारण माता, भूमि तथा भवन का यथेष्ट सुख
भी मिलता है।
२६२
'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश
सिंह लग्न : एकादशभाव : सूर्य
ग्यारहवें भाव में मित्र बुध की राशि में
स्थित सूर्य के प्रभाव से जातक की आमदनी अच्छी
रहती है तथा शारीरिक शक्ति में वृद्धि होती है।
सातवीं मित्र-दृष्टि से पंचमभाव को देखने
से विद्या, बुद्धि तथा सन्तान का सुख भी यथेष्ट
मिलता है। ऐसे व्यक्ति की वाणी में कुछ उग्रता
रहती है और वह स्वार्थी भी होता है-
'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित सूर्य' का फलादेश
सिंह लग्न : द्वादशभाव : सूर्य
बारहवें भाव में मित्र चन्द्रमा की राशि पर
स्थित सूर्य के प्रभाव से जातक का शरीर दुर्बल
बना रहता है। बाहरी स्थानों से सम्बन्ध से लाभ
होता है तथा खर्च पर प्रभाव बना रहता है।
जातक भ्रमण का शौकीन भी होता है।
सातवीं शत्रु-दृष्टि से षष्ठभाव को देखने से
शत्रुपक्ष पर प्रभाव बना रहता है तथा अनेक
कठिनाइयों के बावजूद शत्रुओं पर विजय पाता है।
'सिंह' लग्न में 'चन्द्रमा'
'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश
सिंह लग्न : प्रथमभाव : चन्द्र
पहले भाव में मित्र सूर्य की राशि पर स्थित
चन्द्रमा के प्रभाव से जातक शरीर से दुर्बल, भ्रमण-
प्रिय तथा कुछ चिन्तित बना रहने वाला होता है।
सातवीं शत्रु-दृष्टि से सप्तमभाव को देखने से
स्त्री तथा व्यवसाय के क्षेत्र में कुछ कठिनाइयों तथा
हानि का सामना पड़ता है।
२६३
'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश
सिंह लग्न : द्वितीयभाव : चन्द्र दूसरे भाव में मित्र बुध की राशि पर
स्थित चन्द्रमा के प्रभाव से जातक की धन की
अल्प हानि होती है। उसका रहन-सहन ठाठदार
होता है। कुटुम्ब से भी कुछ असन्तोष रहता है
तथा बाहरी स्थानों से लाभ तथा सुख मिलता है।
सातवीं मित्र-दृष्टि से अष्टमभाव को
देखने से आयु-वृद्धि होती है तथा पुरातत्त्व का भी
कुछ कमी के साथ लाभ होता है।
'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश
सिंह लग्न : तृतीयभाव : चन्द्र तीसरे भाव में सामान्य मित्र शुक्र की राशि
पर स्थित चन्द्रमा के प्रभाव से जातक को भाई-
बहिन के सुख तथा पराक्रम में कुछ कमी रहती
है। बाहरी स्थानों के सम्बन्धों से लाभ होता है।
सातवीं मित्र-दृष्टि से नवमभाव को देखने
से भाग्य एवं धर्म की उन्नति होती है तथा खर्च
आराम से चलता रहता है। अन्य लोगों की दृष्टि
में ऐसा व्यक्ति धनी तथा सुखी समझा जाता है।
'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश
सिंह लग्न : चतुर्थभाव : चन्द्र चौथे भाव में मित्र मंगल की राशि पर
स्थित चन्द्रमा के प्रभाव से जातक की माता, भूमि
तथा भवन आदि का सुख कुछ कष्ट के साथ अल्प
परिमाण में मिलता है तथा घरेलू खर्चों से परेशानी
बनी रहती है।
सातवीं उच्च दृष्टि से दशमभाव को देखने
से पिता, राज्य एवं व्यवसाय के क्षेत्र में सहयोग,
सुख तथा सफलता की प्राप्ति होती है।
२६४
'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश
सिंह लग्न : पंचमभाव : चन्द्र पाँचवें भाव में मित्र गुरु की राशि पर स्थित
चन्द्रमा के प्रभाव से जातक को सन्तान तथा विद्या-
बुद्धि के क्षेत्र में बाधाएं रहती हैं। खर्च की चिन्ता
से मस्तिष्क परेशान भी रहता है !
सातवीं मित्रदृष्टि से एकादशभाव को देखने
से जातक बुद्धि-बल से आमदनी के क्षेत्र में सफलता
प्राप्त करता है, परन्तु उसे कुछ असन्तोष भी बना
रहता है ।
'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश
सिंह लग्न : षष्ठभाव : चन्द्र छठे भाव में शत्रु शनि की राशि पर स्थित
चन्द्रमा के प्रभाव से जातक को शत्रु-पक्ष द्वारा उत्पन्न
झगड़ों तथा रोग आदि में खर्च अधिक करना पड़ता
है, जिससे मन दुःखी बना रहता है।
सातवीं दृष्टि से स्वराशि में द्वादशभाव को
देखने से बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से लाभ होता है
तथा आय कम रहते हुए भी अधिक खर्च होता है।
वह खर्च के द्वारा ही शत्रु-पक्ष में सफलता भी पाता है।
'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश
सिंह लग्न : सप्तमभाव : चन्द्र
सातवें भाव में शत्रु शनि की राशि पर
स्थित चन्द्रमा के प्रभाव से जातक को स्त्री तथा
व्यवसाय के क्षेत्र में हानि उठानी पड़ती है तथा
घरेलू खर्च चलाने में कठिनाई आती है। बाहरी
स्थानों के सम्पर्क से लाभ होता है।
सातवीं मित्रदृष्टि से प्रथमभाव को देखने
के कारण शरीर दुर्बल तथा रहता है।
२६५
'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश
सिंह लग्न : अष्टमभाव : चन्द्र आठवें भाव में मित्र गुरु की राशि पर
स्थित चन्द्रमा के प्रभाव से जातक को आयु एवं
पुरातत्त्व के क्षेत्र में हानि तथा चिन्ता के अवसर
उपस्थित होते हैं। पेट में विकार रहता है तथा
बाहरी स्थानों से लाभ होता है।
सातवीं मित्रदृष्टि से द्वितीयभाव को देखने
से धन की भी कुछ हानि होती है तथा कौटुम्बिक
सुख भी अल्प परिमाण में प्राप्त होता है।
'सिंह' लग्न की कुण्डली से 'नवमभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश
सिंह लग्न : नवमभाव : चन्द्र
नवें भाव में मित्र मंगल की राशि पर स्थित
चन्द्रमा के प्रभाव से जातक के भाग्य की वृद्धि होती
है, परन्तु धर्म-पालन में कमी रहती है।
सातवीं सम-दृष्टि से तृतीयभाव को देखने
के कारण पराक्रम तथा भाई-बहिनों के सुख में भी
कुछ कमी बनी रहती है। ऐसा व्यक्ति मानसिक
दुर्बलता का शिकार भी होता है।
'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'दशमभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश
सिंह लग्न : दशमभाव : चन्द्र दसवें भाव में सामान्य मित्र शुक्र की राशि
पर स्थित उच्च के चन्द्रमा के प्रभाव से जातक पैतृक
सम्पत्ति का अधिक व्यय करता है तथा राज्य एवं
व्यवसाय के क्षेत्र में त्रुटिपूर्ण सफलताएँ प्राप्त
करता है।
सातवीं नीचदृष्टि से चतुर्थभाव को देखने
से माता, भूमि तथा भवन के सुख में कमी आती है
तथा खर्चे की अधिकता से मन अशान्त बना रहता है।
२६६
'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश
सिंह लग्न : एकादशभाव : चन्द्र ग्यारहवें भाव में मित्र बुध की राशि पर
स्थित चन्द्रमा के प्रभाव से जातक को बाहरी
स्थानों के सम्बन्ध से लाभ होता है, परन्तु खर्च
भी अधिक बना रहता है।
सातवीं मित्रदृष्टि से पंचमभाव को देखने
के कारण विद्या, बुद्धि तथा सन्तान के पक्ष में भी
कुछ कमी रहती है। बाहरी तौर पर ऐसा जातक
धनी समझा जाता है।
'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश
सिंह लग्न : द्वादशभाव : चन्द्र बारहवें भाव में स्वराशि में स्थित व्ययेश
चन्द्रमा के प्रभाव से जातक का खर्च अधिक रहता
है तथा बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से यश, सुख तथा
लाभ की प्राप्ति होती है।
सातवीं शत्रुदृष्टि से षष्ठभाव को देखने के
कारण जातक अपने मनोबल तथा खर्च के बल पर
शत्रु-पक्ष पर विजय पाता तथा प्रभाव स्थापित करता
है, परन्तु झगड़े-मुकदमे आदि में खर्च बहुत होता है।
'सिंह' लग्न में 'मंगल'
'सिंह' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'मंगल' का फलादेश
सिंह लग्न : प्रथमभाव : मंगल पहले भाव में मित्र सूर्य की राशि पर स्थित
मंगल के प्रभाव से जातक का व्यक्तित्व प्रभावशाली
होता है। वह भाग्यवान्, धर्मात्मा तथा ईश्वर-भक्त
भी होता है। चौथी दृष्टि से स्वराशि के चतुर्थभाव
को देखने के कारण माता, भूमि तथा भवन का सुख
मिलता है। सातवीं शत्रुदृष्टि से सप्तमभाव को
देखने से स्त्री तथा व्यवसाय के क्षेत्र में परेशानियां
आती हैं। आठवीं मित्रदृष्टि से अष्टमभाव को देखने
से आयु तथा पुरातत्त्व का लाभ प्राप्त होता है।