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भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

२०१
'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
मिथुन लग्न : द्वितीयभाव : राहु
दूसरे भाव में शत्रु चन्द्रमा की राशि पर स्थित
राहु के प्रभाव से जातक को धन-सम्पत्ति तथा कौटुम्बिक
सुख की बड़ी हानि उठानी पड़ती है। गुप्त युक्तियों
तथा कठिन परिश्रम का आश्रय लेने पर भी धन-प्राप्ति
के क्षेत्र में सामान्य सफलताएँ ही मिलती हैं। उसे बहुत
समय बाद धन का अल्प सुख मिलता है।
४१८
'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
मिथुन लग्न : तृतीयभाव : राहु
तीसरे भाव में शत्रु सूर्य की राशि पर स्थित
राहु के प्रभाव से जातक के पराक्रम में वृद्धि होती है,
परन्तु भाई-बहिन के सुख में कमी आती है। वह अपनी
उन्नति के लिए बहुत हिम्मत तथा परिश्रम से लगा
रहता है। ऐसा व्यक्ति बड़ा धैर्यवान्, हिम्मती तथा
गुप्त युक्तियों से सम्पन्न होता है। परन्तु कभी-कभी
उसे बड़े संकटों का सामना भी करना पड़ता है।
४२०
'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
मिथुन लग्न : चतुर्थभाव : राहु
चौथे भाव में मित्र बुध की राशि पर स्थित
राहु के प्रभाव से जातक की माता, भूमि, भवन एवं
घरेलू सुख में कमी तथा असन्तोष की प्राप्ति होती है।
वह गुप्त युक्तियों के बल पर सुख-प्राप्ति का प्रयत्न
करता है, परन्तु उसकी इच्छा भली-भाँति पूर्ण नहीं हो
पाती।
४२१

२०२
'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
मिथुन लग्न : पंचमभाव : राहू पाँचवें भाव में मित्र शुक्र की राशि पर
स्थित राहु के प्रभाव में जातक को अनेक कठि-
नाइयो के बाद विद्या तथा बुद्धि के क्षेत्र में सफ-
लता मिलती है, परन्तु सन्तान-पक्ष में कष्ट ही
बना रहता है।
ऐसा व्यक्ति गुप्त युक्तियों का ज्ञाता-
बुद्धिमान, असत्यवादी, प्रभावोत्पादक तथा अनेक
प्रकार की चिंताओं से ग्रस्त होता है।
४२२
'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
मिथुन लग्न : षष्ठभाव : राहू
छठे भाव में शत्रु मंगल की राशि पर स्थित
राहू के प्रभाव से जातक शत्रु पर अपना विशेष
प्रभाव बनाये रखता है तथा उन पर विजय पाता है।
ऐसा व्यक्ति अपनी कमजोरियों को प्रकट नहीं होने
देता तथा बड़ा साहसी, धैर्यवान, चतुर, पराक्रमी
तथा गुप्त युक्तियों का जानकार होता है।
४२३
मिथुन' लग्न की कुण्डली में 'सप्तमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
मिथुन लग्न : सप्तमभाव : राहू सातवें भाव में शत्रु गुरु की राशि पर
स्थित राहू के प्रभाव से जातक की स्त्री को बहुत
कष्ट प्राप्त होता है तथा व्यवसाय के क्षेत्र में भी
बड़ी कठिनाइयां आती रहती हैं।
ऐसे व्यक्ति की मूलेन्द्रिय में भी कोई
विकार होता है। यह गुप्त युक्तियों तथा असत्य-
भाषण आदि के अनुचित तरीकों से भी अपना
४२४ स्वार्थ-साधन करने से नहीं चूकता

२०३
'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
मिथुन लग्न : अष्टमभाव : राहु
आठवें भाव में मित्र शनि की राशि पर
स्थित राहु के प्रभाव से जातक की पुरातत्त्व
एवं आयु के विषय में अनेक प्रकार के संकटों
का सामना करना पड़ता है। उसके पेट के निम्न
भाग में कोई विकार भी होता है।
ऐसा व्यक्ति कठिन परिश्रम तथा गुप्त
युक्तियों के गल पर सफलता पाने के लिए प्रयत्न-
शील रहता है तथा अपनी कठिनाइयों के विषय
में किसी की पता नहीं चलने देता।
'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
मिथुन लग्न : नवमभाव : राहु
नवें भाव में मित्र शनि की राशि पर स्थित
राहु के प्रभाव से जातक की भाग्योन्नति में अनेक
कठिनाइयां आती हैं। वह अपने परिश्रम तथा
गुप्त युक्तियों के बल पर भाग्य की वृद्धि तो करता
है, परन्तु पूर्ण सुख-सम्मान प्राप्त नहीं कर पाता।
उसका धर्म-पालन भी ढोंग-जैसा ही होता है।
कहीं बहुत बाद में उसे थोड़ी-सी सफलता मिल
पाती है।
'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'दशमभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
मिथुन लग्न : दशमभाव : राहु
दसवें भाव में शत्रु गुरु की राशि पर स्थित
राहु के प्रभाव से जातक की राज्य, पिता तथा
व्यवसाय के क्षेत्र में कठिनाइयों का सामना करना
पड़ता है तथा अत्यन्त कठिन परिश्रम के बाद ही
थोड़ी-बहुत सफलता मिल पाती है। ऐसे व्यक्ति
पर बार-बार संकट आते रहते हैं, अन्त में थोड़ी-
तो सफलता भी मिलती है।

२०४
'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
मिथुन लग्न : एकादशभाव : राहु ग्यारहवें भाव में शत्रु मंगल की राशि पर
स्थित राहु के प्रभाव से जातक गुप्त युक्तियों
का आश्रय लेकर आमदनी की वृद्धि करता है
तथा कठिन परिश्रम द्वारा पर्याप्त धन भी उपार्जित
करता है। कभी-कभी उसे घोर संकटों का सामना
भी करना पड़ता है परन्तु अन्त में विशेष सफलता
भी मिलती है। ऐसा व्यक्ति थोड़े लाभ से
सन्तुष्ट रहकर भी विशेष लाभ के लिए नित नई
योजनाएं बनाता रहता है।
'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'राहु' का फलादेश
मिथुन लग्न : द्वादशभाव : राहु बारहवें भाव में मित्र शुक्र की राशि पर
स्थित राहु के प्रभाव से जातक का खर्च अधिक
होता है और इसी कारण उसे कभी-कभी बड़ी
कठिनाइयों का सामना भी करना पड़ता है। उसे
बाहरी स्थानों के सम्बन्ध से लाभ भी होता है।
गुप्त युक्तियों, परिश्रम तथा चातुर्य के बल
पर वह अपना खर्च चलाता है तथा बाहरी लोगों
की दृष्टि में वह प्रभावशाली बना रहता है।
'मिथुन' लग्न में 'केतु'
'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश
मिथुन लग्न : प्रथमभाव : केतु
पहले भाव में मित्र बुध की राशि पर
स्थित केतु के प्रभाव से जातक में शारीरिक सौंदर्य
में कमी रहती है। वह गुप्त चिंताओं, रोग, चोट
आदि का शिकार बनता रहता है। गुप्त युक्तियों
तथा शारीरिक परिश्रम के बल पर वह अपने
स्वार्थों की पूर्ति करता है। विवेकी होने पर भी
उसमें स्वाभिमान कम होता है।

२०५
'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश
मिथुन लग्न : द्वितीयभाव : केतु दूसरे भाव में शत्रु चन्द्रमा की राशि पर
स्थित केतु के प्रभाव से जातक धन तथा कुटुम्ब के
बारे में चिन्ता-ग्रस्त बना रहता है। धन-संचय
न हो पाने से कभी-कभी अत्यधिक कष्ट पाता है
तथा कौटुम्बिक कारणों से मानसिक क्लेश का
शिकार भी होता है। वह धैर्य, साहस एवं गुप्त
युक्तियों का आश्रय लेकर ही अपनी कठिनाइयों
पर थोड़ी-बहुत विजय प्राप्त कर पाता है।
'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश
मिथुन लग्न : तृतीय भाव : केतु
तीसरे भाव में शत्रु सूर्य की राशि पर
स्थित केतु के प्रभाव से जातक के पराक्रम में तो
अत्यधिक वृद्धि होती है, परन्तु भाई-बहिन के सुख
में कमी आ जाती है। वह अपने पराक्रम-विषयक
कारणों से ही परेशानी उठाता है। ऐसा जातक
बड़ा दम्मी, हिम्मती, हठी, बहादुर तथा साहसी
होता है।
'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश
मिथुन लग्न : चतुर्थभाव : केतु
चौथे भाव में मित्र बुध की राशि पर स्थित
केतु के प्रभाव से जातक घरेलू सुखों की पाने के
लिए बड़ी चतुराई का आश्रय लेकर सफल होता
है। भूमि तथा भवन का सुख भी कुछ कमी के
साथ मिलता है। अपने गुप्त साहस एवं धैर्य के
बल पर अन्त में उसे सुख-प्राप्ति में सफलता भी
मिलती है।

२०६
'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश
मिथुन लग्न : पंचमभाव : केतु पाँचवें भाव में मित्र शुक्र की राशि पर
स्थित केतु के प्रभाव से जातक की विद्याध्ययन
में कठिनाइयाँ आती हैं तथा सन्तान-पक्ष में भी
कठिनाइयों के साथ ही सामान्य सफलता मिलती
है।
ऐसा व्यक्ति अपने गुप्त धैर्य की शक्ति,
चातुर्य तथा हिम्मत के बल पर ही विद्या के तथा
अन्य क्षेत्रों में सफलताएँ प्राप्त करता है।
'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश
मिथुन लग्न : षष्ठभाव : केतु
छठे भाव में शत्रु मंगल की राशि पर
स्थित केतु के प्रभाव से जातक अपनी गुप्त युक्तियों
द्वारा शत्रुओं का दमन करने में समर्थ होता है
तथा मुकदमे आदि में सफलताएँ प्राप्त करता है।
ऐसा व्यक्ति अपनी आन्तरिक कमजोरी
को छिपाने में कुशल होता है तथा बड़ी हिम्मत
से काम लेकर लोगों को आश्चर्य में डाल देता है।
'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश
मिथुन लग्न : सप्तमभाव : केतु
सातवें भाव में शत्रु गुरु की राशि पर
स्थित केतु के प्रभाव से जातक की स्त्री तथा
व्यवसाय के क्षेत्र में कुछ कठिनाइयों के बाद
सफलता प्राप्त होती है। उसके जीवन में इन्द्रिय-
भोगों की अधिकता रहती है। ऐसा व्यक्ति
कठिन परिश्रम तथा गुप्त युक्तियों के बल पर
अत्यधिक उन्नति भी कर लेता है।

२०७
'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश
मिथुन लग्न : अष्टमभाव : केतु
आठवें भाव में मित्र शनि की राशि पर
स्थित केतु के प्रभाव से जातक की पुरातत्त्व की
हानि होती है तथा आयु के सम्बन्ध में भी अनेक
बार संकटों का सामना करना पड़ता है। ऐसा
व्यक्ति अपनी हिम्मत तथा बहादुरी के बल पर
संकट के समय भी धैर्य को नहीं खोता। उसे पेट
की कोई बीमारी भी हो सकती है।
'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश
मिथुन लग्न : नवमभाव : केतु
नवें भाव में मित्र शनि की राशि पर
स्थित केतु के प्रभाव से जातक की भाग्योन्नति में
कुछ बाधाएँ आती हैं, परन्तु परिश्रम द्वारा थोड़ी-
बहुत सफलता भी मिलती है। ऐसा व्यक्ति धर्म
का पूर्ण पालन नहीं कर पाता। वह अपनी गुप्त
युक्तियों तथा कठिन परिश्रम के बल पर सभी
क्षेत्रों में न्यूनाधिक सफलताएँ प्राप्त करता
रहता है।
'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश
मिथुन लग्न : दशमभाव : केतु
दसवें भाव में अपने शत्रु गुरु की राशि
पर स्थित केतु के प्रभाव से जातक को पिता,
राज्य एवं व्यवसाय के पक्ष में अनेक कठिनाइयों
का सामना करना पड़ता है। मान-प्रतिष्ठा की भी
कभी-कभी बड़ी हानि उठानी पड़ती है। गुप्त
युक्तियों तथा कठिन परिश्रम के बाद ही उसे
सामान्य सफलता मिल पाती है।

२०८
'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश
मिथुन लग्न : एकादशभाव : केतु
ग्यारहवें भाव में शत्रु मंगल की राशि
पर स्थित केतु के प्रभाव से जातक की आमदनी
के क्षेत्र में कठिन परिश्रम करना पड़ता है तथा
कभी-कभी घोर संकटों का सामना भी करना
पड़ता है। अपने धैर्य, साहस तथा परिश्रम से ही
उसे अन्त में कठिनाइयों पर विजय तथा आमदनी
के क्षेत्र में थोड़ी-बहुत सफलता मिलती है।
'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'केतु' का फलादेश
मिथुन लग्न : द्वादशभाव : केतु
बारहवें भाव में मित्र शुक्र की राशि पर
स्थित केतु के प्रभाव से जातक का खर्च अधिक
रहता है, जिसके कारण उसे कभी-कभी भारी
संकटों का सामना करना पड़ता है। बाहरी
स्थानों के सम्बन्ध से भी उसे कुछ परेशानी बनी
रहती है। परन्तु ऐसा जातक अपनी हिम्मत,
गुप्त युक्ति, परिश्रम तथा चतुराई के बल पर
येन-केन-प्रकारेण अपना खर्च चलाता रहता है।

है;" - is it a semicolon (;)?
"मिष्टान्न-भोजी होता है; परन्तु इसके साथ ही"
Yes, it is a semicolon (;) followed by "परन्तु".

Line 10:
"अत्यन्त ढीठ, कुटिल-स्वभाव, मित्र-द्रोही तथा कभी-कभी विपरीत-बुद्धि का परिचय"
"ढीठ" - ढ + ी + ठ. Correct.
"कुटिल-स्वभाव" - hyphenated.
"मित्र-द्रोही" - hyphenated.
"कभी-कभी" - hyphenated.
"विपरीत-बुद्धि" - hyphenated.

Line 11:
"देने वाला भी होता है।"

Line 12:
"इस लग्न वाला व्यक्ति अपने शत्रुओं से पीड़ित रहता है। उसके कन्या-"
"कन्या-" - hyphen at end of line.

Line 13:
"सन्तानें अधिक होती हैं तथा उसे अपना जन्म-स्थान छोड़कर परदेश में निवास करना"
"जन्म-स्थान" - hyphenated.

Line 14:
"पड़ता है।"

Line 15:
"इस लग्न पाने जातक का भाग्योदय १६-१७ वर्ष की आयु में ही ही जाता है।"

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Let's include the chart representation clearly between and .
Everything looks solid and accurate.२०६
'कर्क' लग्न
५ |

२१०
'कर्क' लग्न वालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न दालों में स्थित विभिन्न
ग्रहों का स्थायी फलादेश आगे दी गई उदाहरण-कुण्डली संख्या ४४३ से ५५० के बीच
देखना चाहिए।
गोचर-कुण्डली के ग्रहों का फलादेश किन उदाहरण-कुण्डलियों में देखें, इसे
आगे लिखे अनुसार समझ लेना चाहिए।
'कर्क' लग्न में 'सूर्य' का फलादेश
१—'कर्क' लग्न वालों की अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित
'सूर्य' का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या ४४३ से ४५४ के बीच देखना
चाहिए।
२—'कर्क' लग्न वालों को गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'सूर्य'
का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए—
जिस महीने में सूर्य—
(क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या ४४३
(ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या ४४४
(ग) 'मिथुन' राशि पर ही तो संख्या ४४५
(घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या ४४६
(ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या ४४७
(च) 'कन्या' राशि पर ही तो संख्या ४४८
(छ) 'तुला' राशि पर हो की संख्या ४४९
(ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या ४५०
(झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या ४५१
(ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या ४५२
(ट) 'कुम्भ' राशि पर ही तो संख्या ४५३
(ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या ४५४
'कर्क' लग्न में 'चन्द्रमा' का फलादेश
१—'कर्क' लग्न वालों की अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित
'चन्द्रमा' का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या ४५५ से ४६६ के बीच देखना
चाहिए।
२—'कर्क' लग्न वालों की गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित

२११
'चन्द्रमा' का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए—
जिस दिन 'चन्द्रमा'—
(क) 'मेष' राशि पर हो तो संख्या ४५५
(ख) 'वृष' राशि पर हो तो संख्या ४५६
(ग) 'मिथुन' राशि पर हो तो संख्या ४५७
(घ) 'कर्क' राशि पर हो तो संख्या ४५८
(ङ) 'सिंह' राशि पर हो तो संख्या ४५६
(च) 'कन्या' राशि पर हो तो संख्या ४६०
(छ) 'तुला' राशि पर हो तो संख्या ४६१
(ज) 'वृश्चिक' राशि पर हो तो संख्या ४६२
(झ) 'धनु' राशि पर हो तो संख्या ४६३
(ञ) 'मकर' राशि पर हो तो संख्या ४६४
(ट) 'कुम्भ' राशि पर हो तो संख्या ४६५
(ठ) 'मीन' राशि पर हो तो संख्या ४६६
'कर्क' लग्न में 'मंगल' का फलादेश
१—'कर्क' लग्न वालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित
'मङ्गल' का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या ४६७ से ४७८ के बीच देखना
चाहिए।
२—'कर्क' लग्न वालों को गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'मङ्गल'
का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए—
जिस महीने में 'मङ्गल'—
(क) 'मेष' राशि पर स्थित हो तो संख्या ४६७
(ख) 'वृष' राशि पर स्थित हो तो संख्या ४६८
(ग) 'मिथुन' राशि पर स्थित हो तो संख्या ४६६
(घ) 'कर्क' राशि पर स्थित हो तो संख्या ४७०
(ङ) 'सिंह' राशि पर स्थित हो तो संख्या ४७१
(च) 'कन्या' राशि पर स्थित हो तो संख्या ४७२
(छ) 'तुला' राशि पर स्थित हो तो संख्या ४७३
(ज) 'वृश्चिक' राशि पर स्थित हो तो संख्या ४७४
(झ) 'धनु' राशि पर स्थित हो तो संख्या ४७५
(ञ) 'मकर' राशि पर स्थित हो तो संख्या ४७६
(ट) 'कुम्भ' राशि पर स्थित हो तो संख्या ४७७
(ठ) 'मीन' राशि पर स्थित हो तो संख्या ४७८

२१२
'कर्क' लग्न में 'बुध' का फलादेश
१—'कर्क' लग्न वालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित
'बुध' का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या ४७६ से ४६० के बीच देखना
चाहिए।
२—'कर्क' लग्न वालों को गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'बुध'
का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए—
जिस महीने में 'बुध'—
(क) 'मेष' राशि पर स्थित हो तो संख्या ४७६
(ख) 'वृष' राशि पर स्थित हो तो संख्या ४८०
(ग) 'मिथुन' राशि पर स्थित हो तो संख्या ४८१
(घ) 'कर्क' राशि पर स्थित हो तो संख्या ४८२
(ङ) 'सिंह' राशि पर स्थित हो तो संख्या ४८३
(च) 'कन्या' राशि पर स्थित हो तो संख्या ४८४
(छ) 'तुला' राशि पर स्थित हो तो संख्या ४८५
(ज) 'वृश्चिक' राशि पर स्थित हो तो संख्या ४८६
(झ) 'धनु' राशि पर स्थित हो तो संख्या ४८७
(ञ) 'मकर' राशि पर स्थित हो तो संख्या ४८८
(ट) 'कुम्भ' राशि पर स्थित तो हो संख्या ४८६
(ठ) 'मीन' राशि पर स्थित हो तो संख्या ४६०
'कर्क' लग्न में 'गुरु' का फलादेश
१—'कर्क' लग्न वालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित
'गुरु' का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या ४६१ से ५०२ के बीच देखना
चाहिए।
२—'कर्क' लग्न वालों को गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'गुरु'
का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए—
जिस वर्ष में 'गुरु'—
(क) 'मेष' राशि पर स्थित हो तो संख्या ४६१
(ख) 'वृष' राशि पर स्थित हो तो संख्या ४६२
(ग) 'मिथुन' राशि पर स्थित हो यो संख्या ४६३
(घ) 'कर्क' राशि पर स्थित हो तो संख्या ४६४
(ङ) 'सिंह' राशि पर स्थित हो तो संख्या ४६५
(ज) 'कन्या' राशि पर स्थित हो तो संख्या ४६६

२१३
(छ) 'तुला' राशि पर स्थित हो तो संख्या ४६७
(ज) 'वृश्चिक' राशि पर स्थित हो तो संख्या ४६८
(झ) 'धनु' राशि पर स्थित हो तो संख्या ४६६
(ञ) 'मकर' राशि पर स्थित हो तो संख्या ५००
(ट) 'कुम्भ' राशि पर स्थित हो तो संख्या ५०१
(ठ) 'मीन' राशि पर स्थित हो तो संख्या ५०२
'कर्क' लग्न में 'शुक्र' का फलादेश
१—'कर्क' लग्न वालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित
'शुक्र' का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या ५०३ से ५१४ के बीच देखना
चाहिए।
२—'कर्क' लग्न वालों को गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'शुक्र'
का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए—
जिस महीने में 'शुक्र'—
(क) 'मेष' राशि पर स्थित हो तो संख्या ५०३
(ख) 'वृष' राशि पर स्थित हो तो संख्या ५०४
(ग) 'मिथुन' राशि पर स्थित हो तो संख्या ५०५
(घ) 'कर्क' राशि पर स्थित हो तो संख्या ५०६
(ङ) 'सिंह' राशि पर स्थित हो तो संख्या ५०७
(च) 'कन्या' राशि पर स्थित हो तो संख्या ५०८
(छ) 'तुला' राशि पर स्थित हो तो संख्या ५०६
(ज) 'वृश्चिक' राशि पर स्थित हो तो संख्या ५१०
(झ) 'धनु' राशि पर स्थित हो तो संख्या ५११
(ञ) 'मकर' राशि पर स्थित हो तो संख्या ५१२
(ट) 'कुम्भ' राशि पर स्थित हो तो संख्या ५१३
(ठ) 'मीन' राशि पर स्थित हो तो संख्या ५१४
'कर्क' लग्न में 'शनि' का फलादेश
१—'कर्क' लग्न वालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित
'शनि' का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या ५१५ से ५२६ के बीच देखना
चाहिए।
२—'कर्क' लग्न वालों को गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'शनि'

२१४
का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए—
जिस वर्ष में 'शनि'—
(क) 'मेष' राशि पर स्थित हो तो संख्या ५१५
(ख) 'वृष' राशि पर स्थित हो तो संख्या ५१६
(ग) 'मिथुन' राशि पर स्थित हो तो संख्या ५१७
(घ) 'कर्क' राशि पर स्थित हो तो संख्या ५१८
(ङ) 'सिंह' राशि पर स्थित हो तो संख्या ५१६
(च) 'कन्या' राशि पर स्थित हो तो संख्या ५२०
(छ) 'तुला' राशि पर स्थित हो तो संख्या ५२१
(ज) 'वृश्चिक' राशि पर स्थित हो तो संख्या ५२२
(झ) 'धनु' राशि पर स्थित हो तो संख्या ५२३
(ञ) 'मकर' राशि पर स्थित हो तो संख्या ५२४
(ट) 'कुम्भ' राशि पर स्थित हो तो संख्या ५२५
(ठ) 'मीन' राशि पर स्थित हो तो संख्या ५२६
'कर्क' लग्न में 'राहु' का फलादेश
१—'कर्क' लग्न वालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित
'राहु' का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या ५२७ से ५३८ के बीच देखना
चाहिए।
२—'कर्क' लग्न वालों को गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'राहु'
का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए—
जिस वर्ष में 'राहु'—
(क) 'मेष' राशि पर स्थित हो तो संख्या ५२७
(ख) 'वृष' राशि पर स्थित हो तो संख्या ५२८
(ग) 'मिथुन' राशि पर स्थित हो तो संख्या ५२६
(घ) 'कर्क' राशि पर स्थित हो तो संख्या ५३०
(ङ) 'सिंह' राशि पर स्थित हो तो संख्या ५३१
(च) 'कन्या' राशि पर स्थित हो तो संख्या ५३२
(छ) 'तुला' राशि पर स्थित हो तो संख्या ५३३
(ज) 'वृश्चिक' राशि पर स्थित हो तो संख्या ५३४
(झ) 'धनु' राशि पर स्थित हो तो संख्या ५३५
(ञ) 'मकर' राशि पर स्थित हो तो संख्या ५३६
(ट) 'कुम्भ' राशि पर स्थित हो तो संख्या ५३७
(ठ) 'मीन' राशि पर स्थित हो तो संख्या ५३८

२१५
'कर्क' लग्न में 'केतु' का फलादेश
१—'कर्क' लग्न वालों को अपनी जन्मकुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित
'केतु' का स्थायी फलादेश उदाहरण-कुण्डली संख्या ५३६ से ५५० के बीच देखना
चाहिए।
२—'कर्क' लग्न वालों को गोचर-कुण्डली के विभिन्न भावों में स्थित 'केतु'
का अस्थायी फलादेश निम्नलिखित उदाहरण-कुण्डलियों में देखना चाहिए—
जिस वर्ष में 'केतु'—
(क) 'मेष' राशि पर स्थित हो तो संख्या ५३६
(ख) 'वृष' राशि पर स्थित हो तो संख्या ५४०
(ग) 'मिथुन' राशि पर स्थित हो तो संख्या ५४१
(घ) 'कर्क' राशि पर स्थित हो तो संख्या ५४२
(ङ) 'सिंह' राशि पर स्थित हो तो संख्या ५४३
(च) 'कन्या' राशि पर स्थित हो तो संख्या ५४४
(छ) 'तुला' राशि पर स्थित हो तो संख्या ५४५
(ज) 'वृश्चिक' राशि पर स्थित हो तो संख्या ५४६
(झ) 'धनु' राशि पर स्थित हो तो संख्या ५४७
(ञ) 'मकर' राशि पर स्थित हो तो संख्या ५४८
(ट) 'कुम्भ' राशि पर स्थित हो तो संख्या ५४६
(ठ) 'मीन' राशि पर स्थित हो तो संख्या ५५०
●
'कर्क' लग्न में 'सूर्य'
'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश
कर्क लग्न : प्रथमभाव : सूर्य
प्रथमभाव में मित्र चन्द्रमा की राशि पर
स्थित सूर्य के प्रभाव से जातक के शारीरिक सौन्दर्य,
तेज तथा प्रभाव में वृद्धि होती है। उसे धन तथा
कुटुम्ब की शक्ति भी प्राप्त होती है।
सातवीं शत्रुदृष्टि से सप्तमभाव को देखने
के कारण स्त्री तथा व्यवसाय के क्षेत्र में कुछ
कठिनाइयों के साथ लाभ होता है।
७४३

२१६
'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश
कर्क लग्न : द्वितीयभाव : सूर्य दूसरे भाव में स्वराशि-स्थित सूर्य के प्रभाव
से जातक के धन, कुटुम्ब, यश तथा प्रतिष्ठा में वृद्धि
होती है।
सातवीं शत्रुदृष्टि से अष्टमभाव को देखने
के कारण जातक की आयु में कमी आती है तथा
पुरातत्त्व एवं दैनिक चर्या में भी सामान्य कठिनाइयों
का शिकार होना पड़ता है।
'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश
कर्क लग्न : तृतीयभाव : सूर्य तीसरे भाव में मित्र बुध की राशि पर स्थित
सूर्य के प्रभाव से जातक के पराक्रम की वृद्धि होती
है तथा भाई-बहिनों का सुख कुछ त्रुटियों के साथ
प्राप्त होता है। पराक्रम के द्वारा धन-वृद्धि भी
होती है। सातवीं मित्रदृष्टि से नवमभाव को देखने
से जातक पराक्रम द्वारा भाग्य की वृद्धि तथा धर्म
का पालन करता है। उसका प्रभाव एवं सम्मान भी
बढ़ता है।
'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थ भाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश
कर्क लग्न : चतुर्थभाव : सूर्य
चौथे भाव में शत्रु शुक्र की राशिस्थ नीच के
सूर्य के प्रभाव से जातक के माता, भूमि तथा भवन
के सुख में कमी रहती है। धन तथा कुटुम्ब का सुख
भी कम मिलता है।
सातवीं उच्च दृष्टि से दशमभाव को देखने
से पिता, राज्य तथा व्यवसाय के क्षेत्र में सफलता,
यश तथा धन की प्राप्ति होती है।

२१७
'कर्क' लग्न को कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश
कर्क लग्न : पंचमभाव : सूर्य पाँचवें भाव में मित्र मंगल की राशि पर स्थित
सूर्य के प्रभाव से जातक के सन्तान-सुख में बाधा
आती है, परन्तु एक सन्तान अत्यन्त प्रभावशालिनी
होती है । विद्या तथा बुद्धि के क्षेत्र में पूर्ण सफलता
प्राप्त होती है तथा धन की वृद्धि की होती है ।
सातवीं शत्रुदृष्टि से एकादशभाव को देखने
से आमदनी अच्छी रहती है। ऐसा जातक स्पष्ट
वक्ता तथा उग्र स्वभाव का होता है ।
४४७
'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश
कर्क लग्न : षष्ठभाव : सूर्य छठें भाव में मित्र गुरु की राशि पर स्थित
सूर्य के प्रभाव से जातक शत्रु-पक्ष पर अत्यन्त प्रभाव
रखता है, परन्तु धन तथा कुटुम्ब के सुख में कमी
रहती है ।
सातवीं मित्रदृष्टि से द्वादशभाव को देखने से
बाहरी सम्बन्धो से लाभ होता है तथा खर्च अधिक
[

२१८
'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'अष्टमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश
कर्क लग्न : अष्टमभाव : सूर्य
सातवें भाव में शत्रु शनि की राशि पर
स्थित सूर्य के प्रभाव से जातक की आयु पर कभी-
कभी संकट आते रहते हैं तथा पुरातत्त्व के लाभ में
भी कमी आती है।
सातवीं दृष्टि से स्वराशि के द्वितीयभाव के
देखने से धन तथा कुटुम्ब के सुख में कुछ कमी रहती
है तथा पेट में भी कोई रोग हो सकता है। ऐसे
व्यक्ति का रहन-सहन धनवानों जैसा होता है।
४५०

'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'नवमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश
कर्क लग्न : नवमभाव : सूर्य
नवें भाव में मित्र सूर्य की राशि पर स्थित
सूर्य के प्रभाव से जातक का भाग्य प्रबल होता है।
वह धर्म का पालन भी करता है तथा मान-प्रतिष्ठा
भी पाता है।
सातवीं मित्रदृष्टि से तृतीयभाव को देखने
के कारण पराक्रम में वृद्धि होती है तथा भाई-बहिनों
का सुख मिलता है। ऐसा व्यक्ति पराक्रमी, सुखी,
स्वार्थी तथा परमार्थी होता है।
४५१

'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'दशमभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश
कर्क लग्न : दशमभाव : सूर्य
दसवें भाव में स्थित उच्च के सूर्य के प्रभाव से
जातक की पिता, राज्य तथा व्यवसाय के क्षेत्र में
सहयोग, प्रतिष्ठा तथा लाभ की प्राप्ति होती है।
सातवीं नीचदृष्टि से चतुर्थभाव की देखने के
कारण माता, भूमि तथा भवन के साथ ही घरेलू सुख
में भी कुछ कमियां बनी रहती हैं।
४५२

२१६
'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'एकादशभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश
कर्क लग्न : एकादशभाव : सूर्य ग्यारहवें भाव में शत्रु शुक्र की राशि पर
स्थित सूर्य के प्रभाव से जातक को धन का विशेष
लाभ होता है, परन्तु कौटुम्बिक सुख में कमी
रहती है।
सातवीं मित्रदृष्टि से पंचमभाव को देखने
के कारण विद्या-बुद्धि में प्रवीणता तथा सन्तान-
पक्ष से लाभ होता है। ऐसा व्यक्ति ऐश्वर्यशाली
जीवन बिताता है।
'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'द्वादशभाव' स्थित 'सूर्य' का फलादेश
कर्क लग्न : द्वादशभाव : सूर्य बारहवें भाव में मित्र बुध की राशि पर
स्थित सूर्य के प्रभाव से जातक को बाहरी स्थानों के
सम्बन्ध से धन का श्रेष्ठ लाभ होता है, परन्तु खर्च
की अधिकता रहती है। वह रईसी ढंग का जीवन
बिताता है। धन तथा कौटुम्बिक सुख में कमी बनी
रहती है।
सातवीं मित्रदृष्टि से षष्ठभाव को देखने से
शत्रुओं पर विजय प्राप्त होती है।
'कर्क' लग्न में 'चन्द्रमा'
'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'प्रथमभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश
कर्क लग्न : प्रथमभाव : चन्द्र पहले भाव में स्वराशि में स्थित चन्द्रमा के
प्रभाव से जातक को सौन्दर्य, स्वास्थ्य, अधिक शक्ति,
यश एवं प्रतिष्ठा प्राप्त होती है। ऐसा व्यक्ति उच्च
कोटि का विचारक तथा सुखी होता है।
सातवीं शत्रु-दृष्टि से सप्तमभाव को देखने
से स्त्री-पक्ष में असन्तोषपूर्ण सुख प्राप्त होता है,
परन्तु व्यवसाय के क्षेत्र में बड़ी सफलता मिलती है।

२२०
'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'द्वितीयभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश
कर्क लग्न : द्वितीयभाव : चन्द्र
दूसरे भाव में मित्र सूर्य की राशि पर स्थित
चन्द्रमा के प्रभाव से जातक को कुछ परेशानियों के
साथ धन तथा कौटुम्बिक सुख पर्याप्त मात्रा में
उपलब्ध होता है।
सातवीं शत्रु-दृष्टि से अष्टम भाव को देखने
से आयु के विषय में परेशानियां आती हैं तथा
पुरातत्त्व का लाभ कम होता है। ऐसा व्यक्ति
शान-शौकत का जीवन बिताने वाला, प्रतिष्ठित या भाग्यशाली होता है।
'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'तृतीयभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश
कर्क लग्न : तृतीयभाव : चन्द्र
तीसरे भाव में मित्र बुध की राशि पर स्थित
चन्द्रमा के प्रभाव से जातक के पराक्रम एवं भाई-
बहिन के सुख में अत्यन्त वृद्धि होती है।
सातवीं मित्र दृष्टि से नवमभाव को देखने
से धर्म तथा भाग्य की भी पर्याप्त उन्नति होती है।
ऐसा व्यक्ति धार्मिक, दानी, उदार, ईश्वर-भक्त,
धनी, उत्साही, पराक्रमी तथा पुरुषार्थी होता है।
'कर्क' लग्न की कुण्डली के 'चतुर्थभाव' स्थित 'चन्द्रमा' का फलादेश
कर्क लग्न : चतुर्थभाव : चन्द्र
चौथे भाव में सामान्य-मित्र शुक्र की राशि
पर स्थित चन्द्रमा के प्रभाव से जातक को माता,
भूमि भवन आदि का पर्याप्त सुख उपलब्ध होता है।
उसका शरीर सुन्दर तथा मन कोमल होता है।
सातवीं मित्र दृष्टि से दशमभाव को देखने
से पिता, राज्य तथा व्यवसाय के पक्ष में सफलता,
सहयोग एवं यश की प्राप्ति होती है। ऐसा जातक
हर प्रकार से सम्पन्न एवं सुखी रहता है।