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सर्वकोश
भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)

Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary

महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा

DevanagariHindipublished638 पृष्ठ

पृष्ठ 186, कुल 638 में से

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'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'पंचमभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश
मिथुन लग्न : पंचमभाव : शुक्र
पांचवें भाव में स्वराशि-स्थित शुक्र के
प्रभाव से जातक को सन्तान तथा विद्या के क्षेत्र
में कुछ त्रुटिपूर्ण सफलता मिलती है। ऐसा
व्यक्ति चतुर होता है तथा बाहरी स्थानों के
सम्बन्ध से लाभ उठाता है।
सातवीं मित्र-दृष्टि से एकादश भाव को
देखने से बुद्धि द्वारा लाभ अधिक होता है, परन्तु
शुक्र के व्ययेश होने के कारण आमदनी से खर्च
अधिक रहता है।
'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'षष्ठभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश
मिथुन लग्न : षष्ठभाव : शुक्र
छठे भाव में सामान्य मित्र मंगल की
राशि पर स्थित शुक्र के प्रभाव से जातक शत्रु-
पक्ष में अपनी गुप्त चतुराई एवं खर्च करने की
शक्ति से सफलता प्राप्त करता है। सन्तान-पक्ष
तथा विद्याध्ययन के क्षेत्र में भी कठिनाइयां
आती हैं।
सातवीं दृष्टि से स्वराशि वाले द्वादश
भाव को देखने से खर्च आमदनी से अधिक बना
रहता है। ऐसा व्यक्ति झगड़े-टंटे एवं मुकदमेबाजी में अधिक फंसा रहता है और
उसी में उसकी शक्तियां व्यय होती रहती हैं।
'मिथुन' लग्न की कुण्डली के 'सप्तमभाव' स्थित 'शुक्र' का फलादेश
मिथुन लग्न : सप्तमभाव : शुक्र
सातवें भाव में सामान्य मित्र गुरु की
राशि पर स्थित शुक्र के प्रभाव से जातक की
पत्नी बुद्धिमान् तथा चतुर होती है। परन्तु उसे
स्त्री-पक्ष से कष्ट तथा चिन्ताएं भी प्राप्त होती
रहती हैं। दैनिक खर्च चलाने के लिए उसे
बुद्धिमानी तथा बड़ी चतुराई से काम लेना
पड़ता है।
सातवीं मित्र-दृष्टि से प्रथमभाव को
देखने से शरीर दुर्बल होता है, परन्तु सम्मान की वृद्धि होती है। ऐसे व्यक्ति की
विद्या, बुद्धि, सन्तान तथा बाहरी सम्बन्धों के क्षेत्र में भी सफलताएँ मिलती हैं।