भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
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चन्द्र और मंगल
[कुण्डली: लग्न में चं. १ मं., २, ३, ४, ५, ६, ७, ८, ९, १०, ११, १२]
१४३०
(७) चन्द्रमा और मंगल की युति हो तो जातक
युद्ध-कुशल, प्रतापी, वाचारहीन, कलह-प्रेमी, धातु-शिल्प
में कुशल, माता का शत्रु, रक्त-विकार का रोगी तथा
व्यवसाय द्वारा जीविका उपार्जन करने वाला होता है।
चन्द्र और बुध
[कुण्डली: लग्न में चं. १ बु., २, ३, ४, ५, ६, ७, ८, ९, १०, ११, १२]
१४३१
(८) चन्द्रमा और बुध की युति हो तो जातक
कवि, सुन्दर, गुणी, प्रियवादी, दयालु, हँसमुख, अधिक
बोलने वाला, विषयासक्त, कुल-धर्म का पालक तथा दुर्बल-
शरीर वाला होता है।
चन्द्र और गुरु
[कुण्डली: लग्न में चं. १ गु., २, ३, ४, ५, ६, ७, ८, ९, १०, ११, १२]
१४३२
(६) चन्द्रमा और गुरु की युति हो तो जातक
सुशील, विनम्र, धर्मात्मा, परोपकारी, सच्चा मित्र, देव-
ब्राह्मण-भक्त, भाई-बहिनों से स्नेह रखने वाला, धनी
तथा गुप्त मन्त्र वाला होता है।
चन्द्र और शुक्र
[कुण्डली: लग्न में चं. १ शु., २, ३, ४, ५, ६, ७, ८, ९, १०, ११, १२]
१४३३
(१०) चन्द्रमा और शुक्र की युति हो तो जातक
झगड़ालू, व्यसनी, सुगन्ध-प्रिय, विक्रय-कार्य में कुशल,
अनेक कार्यों का ज्ञाता तथा अल्प वस्त्राभूषणों वाला
होता है।