भृगु संहिता (महर्षि भृगु - फलित सर्वाङ्ग दर्शन, कुण्डली-फल एवं कर्मविपाक सटीक)
Bhrigu Samhita Phalita Sarvanga Darshana with Commentary
महर्षि भृगु (सम्पादक: पं. नन्दलाल शास्त्री / खेमराज श्रीकृष्णदास) द्वारा
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चन्द्र और शनि
[कुण्डली १: लग्न १ (चं. श.), २, ३, ४, ५, ६, ७, ८, ९, १०, ११, १२ | नीचे संख्या: १४३७]
(११) चन्द्रमा और शनि की युति हो तो जातक
आचारहीन, पुरुषार्थहीन, अल्प सन्ततिवान्, परस्त्रीगामी,
वृद्धा स्त्री में आसक्त, हाथी-घोड़े रखने वाला, व्यवसायी
तथा वेश्या द्वारा धन प्राप्त करने वाला होता है।
मंगल और बुध
[कुण्डली २: लग्न १ (मं. बु.), २, ३, ४, ५, ६, ७, ८, ९, १०, ११, १२ | नीचे संख्या: १४३४]
(१२) मंगल और बुध की युति हो तो जातक
कुरूप, कृपण, धन-हीन, मल्ल-विद्या में कुशल, लोहे
अथवा सोने का व्यवसाय करने वाला, बहुस्त्री-गामी
विधवा से विवाह करने वाला तथा अनेक प्रकार की
औषधियों का सेवन करने वाला होता है।
मंगल और गुरु
[कुण्डली ३: लग्न १ (मं. गु.), २, ३, ४, ५, ६, ७, ८, ९, १०, ११, १२ | नीचे संख्या: १४३६]
(१३) मंगल और गुरु की युति हो तो जातक
मेधावी, शास्त्रज्ञ, शस्त्रज्ञ, मन्त्रज्ञ, वाक्पटु, शिल्प-निपुण,
शीलवान्, चतुर, घोड़ों का प्रेमी, सेना का अधिकारी,
प्रधान अथवा उच्च पद पाने वाला होता है।
मंगल और शुक्र
[कुण्डली ४: लग्न १ (मं. शु.), २, ३, ४, ५, ६, ७, ८, ९, १०, ११, १२ | नीचे संख्या: १४३७]
(१४) मंगल और शुक्र की युति हो तो जातक
गुणी, गणितज्ञ, प्रपंची, मिथ्यावादी, परस्त्रीगामी,
अहंकारी, पापी, शठ, सबसे शत्रुता रखने वाला, परन्तु
समाज में सम्मान पाने वाला होता है।