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भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)

Bhoja Prabandha with Hindi Commentary

बल्लाल सेन / पं. जगदीशलाल शास्त्री द्वारा

DevanagariHindipublished190 पृष्ठ

८६ भोजप्रबन्धः
ततः कदाचित्कुम्भकारवधू राजगृहमेंत्य द्वारपालं प्राह--द्वारपाल,
राजा द्रष्टव्यः।' स आह--'किं ते राज्ञा कार्यम् । सा चाह--'न तेऽभि-
धास्यामि। नृपाय एव कथयामि।' स सभायामागत्यप्राह--'देव, कुम्भ-
कारप्रिया काचिद्राज्ञो दर्शनाकाङ्क्षिणी न वक्ति मत्पुरः कार्यम्। भव-
त्पुरतः कथयिष्यति।' राजा--'प्रवेशय।' सा चागत्य नमस्कृत्य वक्ति--
'देव मृत्खननाद्दृष्टं निधानं वल्लभेन मे।
स पश्यन्नेव तत्रास्ते त्वां ज्ञापयितुमभ्यगाम्' । १७५॥
तदनंतर कभी कुम्हार की पत्नी राज भवन पहुँचकर द्वारपाल से बोली-
'द्वारपाल, राजा के दर्शन करना चाहती हूँ।' उसने पूछा-'राजा से तेरा
क्या काम है?' वह बोली-'तुझसे नहीं कहूँगी। राजा के संमुख ही कहूँगी।'
वह सभा में आकर बोला-'महाराज, आप के दर्शन की कांक्षिणी एक
कुम्हारिन मुझे अपना कार्य नहीं बताती, आपके संमुख ही कहेगी। राजा
ने कहा-'प्रवेश कराओ।' वह आकर और नमस्कार करके बोली-
'महाराज, मेरे प्रियतम ने मिट्टी खोदने पर धन देखा है, वे उसकी देख-
रेख करते वहीं हैं, मैं आप से निवेदन करने आयी हूँ।'
राजा च चमत्कृतो निधानकलशमानयामास। तद्द्वारमुद्घाट्य याव
त्पश्यति राजा तावत्तदन्तर्वर्तिद्रव्यमणिप्रभामण्डलमालोक्य कुम्भकारं
पृच्छति--'किमेतत्कुम्भकार।' स चाह--
'राजचन्द्रं समालोक्य त्वां तु भूतलमागतम्।
(१) रत्नश्रेणिमिषान्मन्ये नक्षत्राण्यभ्युपागमन्' ॥ १७६ ॥
राजा कुम्भकारमुखाच्छ्लोकं लोकोत्तरमाकर्ण्य चमत्कृतस्तस्मै सर्वं
ददौ।
आश्र्चर्यान्वित राजा ने धन का कलसा मँगवाया और उसका मुँह खोल
कर जैसे ही उसे देखा, वैसे ही उसके भीतर रखे धन और मणियों के प्रभा-
मंडल को देखकर कुम्भकार से पूछा--'हे कुंभकार, यह क्या है?' वह बोला-
'धरणी तल पर आये आप राजा रूपी चन्द्रमा को देखकर रत्नों के रूप
से मानो नक्षत्र आ गये हैं।'
( १ ) रत्नपङ्क्तिव्याजेनेत्यर्थः ।

राजा ने कुम्हार के मुँह से लोकोत्तर श्लोक सुनकर चमत्कृत हो उसे वह
सब धन दे दिया ।
—:०:—
( १२ ) भोजस्य विक्रमादित्यसमं दानम् ।
ततः कदाचिद्राजा रात्रावेकाकी सर्वतो नगरचेष्टितं पश्यन्पौरगिर-
माकर्णयंश्चचार । तदा क्वचिद्वैश्यगृहे वैश्यः स्वप्रियां प्राह—'प्रिये,
राजा स्वल्पदानरतोऽप्युज्जयिनीनगराधिपतेर्विक्रमार्कस्य दानप्रतिष्ठां
काङ्क्षते । सा किं भोजेन प्राप्यते । कैश्चित्स्तोत्रपरायणैर्मयूरादिकवि-
भिर्महिमानं प्रापितो भोजः । परन्तु भोजो भोज एव । प्रिये, शृणु ।
आबद्धकृत्रिमसटाजटिलांसभित्तिरारोपितो यदि पदं मृगवैरिणः श्वा ।
मत्तेभकुम्भतटपाटनलम्पटस्य नादं करिष्यति कथं (१)हरिणाधिपस्य'॥७७
फिर कभी राजा रात में अकेला सब ओर नगर व्यापार देखता, पुर-
वासियों की बातचीत सुनता विचरण कर रहा था । तभी एक वैश्य के घर
में वैश्य अपनी प्रिया से बोला—'प्रिये, थोड़ा दान करके भी राजा उज्जयिनी
नगर के अधिपति विक्रमादित्य को प्राप्त दान-प्रतिष्ठा की आकांक्षा करता
है । क्या वह भोज को मिल सकी है ? कुछ स्तुति परायण मयूरादि कवियों
ने भोज को महिमा प्राप्त करा दी है, परंतु भोज भोज ही है।
प्रिये, सुनो—
बनावटी सटाओं से परिपूर्ण खाल उड़ा कर यदि कुत्ता मृगों के शत्रु सिंह
के पद पर आरोपित कर दिया जाय तो वह क्या मदमत्त हाथियों की कुम्भ
स्थली का विदारण करने के व्यसनी मृगराज का नाद कर सकेगा ?
राजा श्रुत्वा विचारितवान्—'असौ सत्यमेव वदति ।' ततः पुनः
पुनर्वदन्तं शृणोति—
राजा ने सुनकर विचारा—'यह ठीक ही कहता है।' तब फिर उसे पुनः
कहते हुए सुनने लगा—
'आपन्न एव पात्रं देहीत्युच्चारणं न वैदुष्यम् ।
उपपन्नमेव देयं त्यागस्ते विक्रमार्क किमु वर्ण्यः ॥ १७८ ॥
( १ ) सिंहस्येत्यर्थः ।

८८ : भोजप्रबन्धः
विक्रमार्क त्वया दत्तं श्रीमन्ग्रामशताष्टकम् ।
अर्थिने द्विजपुत्राय भोजे त्वन्महिमा कुतः ॥ १७९ ॥
प्राप्नोति कुम्भकारो महिमानं प्रजापतेः ।
यदि भोजोऽप्यवाप्नोऽति प्रतिष्ठां तव विक्रम' ॥ १८० ॥
'हे विक्रमादित्य, तुम्हारे त्याग का वर्णन कैसे हो ?' तुम इसे उचित नहीं
समझते थे कि कोई अभागा 'बरतन दो'-- ऐसा आकर भी बोले, इतना पर्याप्त
देना उचित समझते थे कि मँगता भविष्य में मँगता रह ही न जाय।
'श्रीमन् विक्रमादित्य, तुमने याचक ब्राह्मण पुत्र को एक सौ आठ गाँव दे दिये
थे, भोज को आप जैसी महिमा कहाँ से प्राप्त हो ?
हे विक्रमादित्य, यदि कुम्हार भी प्रजापति ब्रह्मा की महिमा प्राप्त कर
सकता है, तो भोज भी आपके समान प्रतिष्ठा पा सकता है।'
राजा--'लोके सर्वोऽपि जनः स्वगृहे निःशङ्कं सत्यं वदति । मयि
वान्येन वा सर्वथा विक्रमार्कप्रतिष्ठा न शक्या प्राप्तुम्' ।
राजा ने सोचा-संसार में सभी लोग अपने घर में निःशंक हो सत्य
कहते हैं। मैं अथवा अन्य कोई विक्रमादित्य की प्रतिष्ठा नहीं प्राप्त कर सकता।
ततः कदाचित्कश्चित्कवी राजद्वारं समागत्याह-'राजा द्रष्टव्यः
इति । ततः प्रवेशितो राजानं 'स्वस्ति' इत्युक्त्वा तदाज्ञयोपविष्टः पठति-
'कविषु वादिषु भोगिषु देहिषु द्रविणवत्सु सतामुपकारिषु ।
धनिषु धन्विषु धर्मधनेष्वपि क्षितितले नहि भोजसमो नृपः ॥१८१॥
राजा तस्मै लक्षं प्रादात् । सर्वाभरणान्युत्तार्य तं च तुरगं ददौ ।
फिर कभी एक कवि राजद्वार में आकर बोला-'राजा का दर्शन चाहता
हूँ ।' तदनन्तर प्रविष्ट किये जाने पर राजा को 'स्वस्ति' यह कह कर उसकी
आज्ञा से बैठकर उसने पढ़ा--
भूतल पर कवियों, वक्ताओं, भोगियों, शरीरधारियों, पैसे वालों, सज्जनों
के उपकारियों, धनियों, धनुर्धारियों और धार्मिकों में भोज के समान नरपाल
नहीं है ।
राजा ने उसे लाख मुद्राएँ दी और उतार कर समस्त आभूषण और
घोड़ा दिया ।

ततः कदाचिद्राजा क्रीडोद्यानं प्रस्थितो मध्ये मार्गं कामपि मलिनां-
शुवसनां(१) तीक्ष्णतरतपनकरविदग्धमुखारविन्दां सुलोचनां लोचना-
भ्यामालोक्य पप्रच्छ—
'का त्वं पुत्रि' इति ।
सा च तं श्रीभोजभूपालं मुखश्रिया विदित्वा तुष्टा प्राह--
'नरेन्द्र, लुब्धकवधूः'
हर्षसम्भृतो राजा तस्याः पदुबन्धानुबन्धेनाह—
'हस्ते किमेतत्'
सा चाह—'पलम्'
राजाह—'क्षामं किम्'
सा चाह—'सहजं ब्रवीमि नृपते यद्यादराच्छ्रू यते ।
गायन्ति त्वदरिप्रियाश्रुतटिनीतीरेषु सिद्धाङ्गना ।
गीतान्धा न तृणं चरन्ति हरिणास्तेनामिषं दुर्बलम्' ॥१८२॥
राजा तस्यै प्रत्यक्षरं लक्षं प्रादात् ।
तदनंतर कभी राजा ने क्रीडा वाटिका को जाते हुए बीच रास्ते में किसी
मलिन वस्त्र धारिणी, तीव्र सूर्य किरणों से झुलसे मुख कमल वाली, सुनयना
को अपनी आँखों से देख कर पूछा—
'बेटी, तुम कौन हो ?'
मुख की कांति से उसे श्रीमान् राजा भोज समझ कर संतुष्ट हो वह बोलीं—
'राजन्, मैं हूँ व्याध पत्नी ।'
उसकी सुन्दर पद-योजना से प्रसन्नता में भर कर राजा ने कहा—
'क्या है यह हाथ में ?'
वह बोली—'मांस है ।'
राजा ने कहा—'सूखा है क्यों ?'
वह बोली—'कहती हूँ स्पष्ट, यदि आदर से सुनें आप—
गाती हैं, सुरांगनाएँ आपके वैरियों की प्रियाओं के आँसू से बनीं नदियों
के तीर पर--
(१) सूर्योष्णकिरणदग्धामित्यर्थः ।

६० भोजप्रबन्धः

गीतों पर अंधे बने मृग न घास चरते हैं,
उनका ही मांस है यह--दुर्बल, सूखा हुआ ।
राजा ने उसे प्रति अक्षर लाख मुद्राएँ दीं ।
ततो गृहमागत्य गवाक्ष उपविष्टः । तत्र चासीनं भोजं दृष्ट्वा राज-
वर्त्मनि स्थित्वा कश्चिदाह--'देव, सकलमहीपाल, आकर्णय ।
इतश्चेतश्चाद्भिर्विघटिततटः सेतुरुदरे
धरित्री दुर्लङ्घ्या बहुलहिमपङ्को गिरिरयम् ।
इदानीं निर्वृत्ते करितुरगनीराजनविधौ
न जाने यातारस्तव च रिपवः केन च पथा' ॥१८३॥
तुष्टो भोजो वर्त्मनि स्थितायैव तस्मै वंश्यान्पञ्च गजान्ददौ ।
तदनंतर घर, आकर राजा झरोखे में बैठ गया । वहाँ बैठे भोज को
देखकर मार्ग में खड़े होकर किसी ने कहा--'देव, संपूर्ण धरती के पालन-
कर्ता, सुनिए-
'इतस्ततः जल के कारण सेतु ( पुल ) के तट बीच में से टूट गये हैं,
धरती दुर्लंघ्य है और यह पर्वत भी बहुत हिमपात से पंकिल हो गया है ।
इस समय हाथी-घोड़ों ( के सैन्य ) के तैयार हो जाने पर आपके वैरी न जाने
किस मार्ग से भाग पायेंगे ?'
संतुष्ट भोज ने मार्ग में ही खड़े उस व्यक्ति को श्रेष्ठ पाँच हाथी दिये ।
कदाचिद्राजा मृगयारसपराधीनो हयमारुह्य प्रतस्थे ।
ततो नदीं समुत्तीर्णं शिरस्यारोपितेन्धनम् ।
वेषेण ब्राह्मणं ज्ञात्वा राजा पप्रच्छ सत्वरम् ॥ १८४ ॥
कभी राजा आखेट रस के अधीन हो घोड़े पर चढ़े जा रहे थे
तब नदी पार करते सिर पर ईंधन रखे एक व्यक्ति को वेष से उसे ब्राह्मण
जान कर राजा ने तुरंत उससे पूछा ।
राजा--कियन्मानं जलं विप्र ।
स आह—'जानुदघ्नं नराधिप ।'
चमत्कृतो राजाह—'ईदृशी किमवस्था ते'
स आह--'नहि सर्वे भवादृशाः' ॥ १८५ ॥

भोजप्रबन्धः ६१
राजा—हे विप्र; जल कितना गहरा है ? ( जल कितना मान है ? )
वह बोला—हे राजन्, घुटनों तक है। ( जानुदघ्न महाराज । )
अचरज में भर राजा—तुम्हारी यह अवस्था कैसी है ?
( ऐसी तेरी दशा क्यों ? )
वह बोला--सब आप जैसे नहीं हैं। ( तेरे जैसे सब नहीं । )
राजा प्राह कुतूहलात्—‘विद्वन्, याचस्व कोषाधिकारिणम् । लक्षं
दास्यति मद्वचसा ।' ततो विद्वान्काष्ठं भूमौ निक्षिप्य कोषाधिकारिणं
गत्वा प्राह—‘महाराजेन प्रेषितोऽहम् । लक्षं मे दीयताम् ।' ततः स हस-
न्नाह--‘विप्र, भवन्मूर्तिर्लक्षं नार्हति ।'
राजा ने कुतूहल से पूर्ण हो कहा—'हे पंडित, कोषाधिकारी से मांगो।
मेरी आज्ञा से लाख मुद्राएँ देगा ।' सो विद्वान् लकड़ियां धरती पर डाल कर
कोषाधिकारी से जाकर बोला--'मुझे महाराज ने भेजा है। मुझे लाख
मुद्राएँ दो ।' वह हँसता हुआ बोला--'ब्राह्मण, आपका स्वरूप लाख पाने
योग्य नहीं प्रतीत होता ।'
ततो विषादी स राजानमेत्याह--'स पुनर्हसति देव, नार्पयति ।'
राजा कुतूहलादाह-‘लक्षद्वयं प्रार्थय । दास्यति ।' पुनरागत्य विप्रः ‘लक्ष-
द्वयं देयमिति राज्ञोक्तम्' इत्याह । स पुनर्हसति ।
तो विषाद पूर्ण हो वह जाकर राजा से बोला—'महाराज, वह तो हँसता
है, देता नहीं ।' राजा कुतूहल से बोला—'दो लाख माँगो, देगा ।' ब्राह्मण
पहुँच कर फिर बोला--'राजा ने कहा है कि दो लाख देना है ।' वह फिर
हँसने लगा ।
विप्रः पुनरपि भोजं प्राप्याह—‘स पापिष्ठो मां हसति नार्पयति ।’
ततः कौतूहली लीलानिधिर्महीं शासच्छ्रीभोजराजः प्राह-‘विप्र, लक्षत्रयं
याचस्व । अवश्यं स दास्यति ।' स पुनरेत्य प्राह—‘राजा मे लक्षत्रयं
दापयति ।' स पुनर्हसति ।
ब्राह्मण ने फिर भोज के पास पहुँच कर कहा—'वह पापी मुझ पर
हँसता है, देता नहीं ।' तब कौतुकी और लीला के आगार, पृथ्वी के शासक
श्री भोजराज ने कहा—'विप्र, तीन लाख माँगो, वह अवश्य देगा ।' वह फिर

पहुँच कर बोला--'राजा ने मुझे तीन लाख देने को कहा है।' वह फिर
हँसने लगा।
ततः क्रुद्धो विप्रः पुनरेत्याह—'देव, स नार्पयत्येव।
राजन्कनकधाराभिस्त्वयि सर्वत्र वर्षति।
अभाग्यच्छत्रसंछन्ने मयि नायान्ति बिन्दवः॥ १८६॥
त्वयि वर्षति पर्जन्ये सर्वे पल्लविता द्रुमा।
अस्माकमर्कवृक्षाणां पूर्वपत्रेषु संशयः॥ १८७॥
एकमस्य परमेकमुद्यमं निष्त्रपत्वमपरस्य वस्तुनः।
नित्यमुष्णमहसा निरस्यते नित्यमन्धतमसं प्रधावति'॥ १८८॥
तब कुछ क्रुद्ध ब्राह्मण फिर राजा के पास जाकर बोला—'महाराज, वह
देता ही नहीं। राजन्, आप सर्वत्र स्वर्ण धाराओं की वर्षा कर रहे हैं, परन्तु
अभाग्य के छाते से ढके मुझपर बूँदें गिरती ही नहीं।
तुझ मेघ के बरसने पर सब वृक्षों पर नये पत्ते आगए पर हमारे मदार के
पुराने पत्ते ही संदेहास्पद हो गये।
एक ही—बस एक ही परम उद्योग है, दूसरे के प्रति निर्लज्जता धारण
कर लेना। प्रतिदिन सूर्य द्वारा भगा दिया जाता है, परन्तु घोर अंधकार
प्रतिदिन ही फिर दौड़ा आता है।'
ततो राजा प्राह—
'क्रोधं मा कुरु मद्वाक्याद्गत्वा कोषाधिकारिणम्।
लक्षत्रयं गजेन्द्रांश्च दश ग्राह्यास्त्वया द्विज'॥ १८६॥
ततस्त्वङ्गरक्षकं प्रेषयति। ततः कोषाधिकारी धर्मपत्रे लिखति—
'लक्षं लक्षं पुनर्लक्षं मत्ताश्च दश दन्तिनः।
दत्ता भोजेन तुष्टेन जानुदघ्नप्रभाषणात्'॥ १६०॥
तब राजा ने कहा—
'हे ब्राह्मण, क्रोध मत करो, कोषाधिकारी के पास जाकर मेरी आज्ञा से
तीन लाख मुद्राएँ और दस हाथी ले लो।'
और अंगरक्षक को (ब्राह्मण के साथ) भेज दिया। तब धर्म पत्र पर
कोषाधिकारी ने लिखा—

भोजप्रबन्धः ६३
'जानुदघ्न' कहने पर संतुष्ट हुए भोजराज ने लाख, लाख और फिर लाख
मुद्राएँ और दस मदमत्त हाथी दिये।'
ततः सिंहासनमलङ्कुर्वाणे श्रीभोजनृपतौ द्वारपाल आगत्य प्राह-
'राजन् कोऽपि शुकदेवनामा कश्चिद्दारिद्र्यविडम्बितो द्वारि वर्तते' ।
राजा बाणं प्राह- 'पण्डितवर, सुकवे, तत्त्वं विजानासि ।' बाणः-
'देव, शुकदेवपरिज्ञानासामर्थ्याभिज्ञः कालिदास एव, नान्यः।' राजा-
'सुकवे, सखे कालिदास, किं विजानासि शुकदेवकविम् ।' इत्याह-
एक बार नरपति श्री भोजराज सिंहासन को सुशोभित कर रहे थे कि
द्वारपाल आकर बोला- 'महाराज, दरिद्रता की विडंबना में पड़ा कोई
शुकदेव नाम का पंडित द्वार पर उपस्थित है।' राजा ने बाण से कहा-
'पंडितवर, सुकवे, तुम शुकदेव की विद्वत्ता जानते हो?' बाण ने कहा-
'देव, शुकदेव को पूर्णतया जानने वाला कालिदास ही है, अन्य नहीं।' राजा
ने पूछा- 'सुकवि मित्र कालिदास, तुम शुकदेव कवि को जानते हो ?'
कालिदासः- 'देव,
सुकविद्वितयं जाने निखिलेऽपि महीतले ।
भवभूतिः शुकश्चायं वाल्मीकिस्त्रितयोऽनयोः' ॥ १६१ ॥
कालिदास ने कहा- 'देव,
संपूर्ण भूतल पर मैं सुकवियों की जोड़ी ( दुगड्डा-जोड़ी ) जानता
हूँ- एक भवभूति और यह शुक । इन दोनों का वाल्मीकि के साथ त्रितय
( तिकड़ी ) बनता है।'
ततो विद्वद्वृन्दवन्दिता सीता प्राह-
'काकाः किं किं न कुर्वन्ति क्रोङ्कारं यत्र तत्र वा ।
शुक एव परं वक्ति (१) नृपहस्तो पला लितः' ॥ १६२ ॥
तदनंतर विद्वज्जनों द्वारा पूजित सीता ने कहा -
'जहाँ-तहाँ कौए कितनी काँव-काँव नहीं किया करते ? परन्तु, बोलता
राजा के हाथों लाड पाने वाला शुक ही है।'
ततो मयूरः प्राह-
( १. ) नृपस्य हस्तेनोपलालितः ।

३. कालिदास, बाण व विद्वन्मण्डल संवाद

६४ भोजप्रबन्धः
'अपृष्टस्तु नरः किञ्चिद्यो ब्रूते राजसंसदि ।
न केवलमसम्मानं लभते च विडम्बनाम् ॥ १६३ ॥
तब मयूर ने कहा--
'जो राजसभा में बिना पूछे जाने पर बोलता है, वह केवल असम्मान ही
नहीं पाता, उपहसित भी होता है।
देव, तथाप्युच्यते--
का सभा किं कविज्ञानं रसिकाः कवयश्च के ।
भोज किं नाम ते दानं शुकस्तुष्यति येन सः ॥ १६४ ॥
तथापि भवनद्वारमागतः शुकदेवः सभायामानेतव्य एव ।'
महाराज, तथापि कहता हूँ-
भोजराज, क्या तो आपकी सभा है और क्या कविज्ञान है और रसिक
कवि ही क्या हैं ? आपका दान भी क्या है, जिससे वह शुक संतुष्ट होगा ?
तो भी महल के द्वार पर आये शुकदेव को सभा में लाना ही चाहिए।
तदा राजा विचारयति शुकदेवसामर्थ्यं श्रुत्वा हर्षविषादयोः पात्र-
मासीत् । महाकविरवलोकित इति हर्षः । अस्मै सत्कविकोटिसुकुटमणये
किं नाम देयमिति च विषादः । 'भवतु । द्वारपाल, प्रवेशय ।'
तो राजा ने सोचा, शुकदेव के सामर्थ्य को सुनकर प्रसन्नता और दुःख-
दोनों का अनुभव हुआ । महाकवि को देखा-इसकी प्रसन्नता और श्रेष्ठकवि
मंडल के मुकुट मणि स्वरूप इसे दिया क्या जायगा-इसका दुःख । जो हो ।
द्वारपाल, कवि को भीतर लाओ, ( राजा ने आज्ञा दी ) ।
तत आयान्तं शुकदेवं दृष्ट्वा राजा सिंहासनादुदतिष्ठत् । सर्वे
पण्डितास्तं शुकदेवं प्रणम्य सविनयमुपवेशयन्ति । स च राजा तं सिंहा-
सन उपवेश्य स्वयं तदाज्ञयोपविष्टः ।
फिर शुकदेव को आता देख राजा सिंहासन से उठ खड़ा हुआ । सब
पंडित उस शुकदेव को प्रणाम करके विनय पूर्वक आसन देने लगे । राजा
उसे सिंहासन पर बैठा कर स्वयम् उसकी आज्ञा से बैठा ।
ततः शुकदेवः प्राह- 'देव, धाराराथ, श्रीविक्रमनरेन्द्रस्य या दान-
लक्ष्मीस्त्वामेव सेवते । देव, मालवेन्द्र एव धन्यः नान्ये नभुजः, यस्य ते

भोजप्रबन्धः ६५
कालिदासाद्यो महाकवयः सूत्रबद्धाः पक्षिण एव निवसन्ति।' ततः
पठति--
'प्रतापभीत्या भोजस्य तपनो मित्रतामगात् ।
और्वो वाडवतां धत्ते तडिङ्क्षणिकतां गता' ॥ १६५ ॥
तदनंतर शुकदेव ने कहा--'महाराज, धारा के अधिपति, श्रीविक्रम
महाराज की जो दान लक्ष्मी है वह आपकी ही सेवा कर रही है। देव, धन्य
केवल आप मालवाधिपति ही हैं, जिन आपके यहाँ कालिदास आदि महाकवि
डोरी में बँधे पक्षियों की भाँति निवास करते हैं--अन्य धरती को भोगने
वाले राजा नहीं। फिर पढ़ा--
भोज के प्रताप से डरकर तपनशील सूर्य 'मित्र' (सूर्य का अपर पर्याय
तथा सखा) बन गया, 'और्व' (च्यवन-पौत्र अर्चिःस्वरूप तेजस्वी भृगुकृषि
जिन्होंने कालांतर में सगर को अग्नेयास्त्र दिया-तथा सागर में रहने वाली
वडवाग्नि) ने वडवाग्नि का रूप लिया और बिजली क्षणभर चमकने वाली बन
गयी (चंचला)।
राजा--'तिष्ठ सुकवे, नापरः श्लोकः पठनीयः।'
'सुवर्णकलशं प्रादाद्दिव्यमाणिक्यसम्भृतम् ।
भोजः शुकाय सन्तुष्टो दन्तिनश्च चतुःशतम्' ॥ १६६ ॥
इति पुण्यपत्रे लिखित्वा सर्वं दत्त्वा कोषाधिकारी शुकं प्रस्थापयामास।
राजा स्वदेशं प्रतिगतं शुकं ज्ञात्वा तुतोष। सा च परिषद्सन्तुष्टा।
राजा ने कहा--'हे सुकवि, रुकिये, दूसरा श्लोक न पढ़िए।'
'संतुष्ट भोज ने अलौकिक मणियों से परिपूर्ण स्वर्ण कलश और चार सौ
दंती हाथी शुक को दिये।'--यह पुण्यपत्र पर लिख कर और सब कुछ
देकर कोषाधिकारी ने शुक को विदा किया। शुक अपने देश चला गया-यह
जानकर राजा को तुष्टि हुई। --:०:--
१३-भोजस्य काव्यानुरागः कतिपयकथा
अन्यथा वर्षाकाले वासुदेवो नाम कविः कश्चिदागत्य राजानं दृष्ट-
वान्। राजाह--'सुकवे, पर्जन्यं पठ।' अतः कविराह-
(१) धुरि साधुः धौरेयः।

६६ भोजप्रबन्धः
'नो चिन्तामणिभिर्न कल्पतरुभिर्नो कामधेन्वादिभि-
र्नो देवैश्च परोपकारनिरतैः स्थूलैर्न सूक्ष्मैरपि ।
अम्भोदेह निरन्तरं जलभरैस्तामुर्वरां सिञ्चतां
(१)धौरेयेण धुरं त्वयाद्य बहता मन्ये जगज्जीवति ॥१६७॥
राजा लक्षं ददौ।
दूसरी बार वर्षा ऋतु में एक वासुदेव नामक कवि ने आकर राजा
का दर्शन किया। राजा ने कहा-'हे सुकवि, मेघ पर पढ़ो।' तो कवि
ने कहा-
आज यह जगत् न तो चिंतामणियों, न कल्पवृक्षों और न कामधेनु आदि
के कारण जीवित है और न परोपकार में संलग्न बड़े-छोटे अन्य देवों के
कारण, हे जलदाता यह जीवित है निरंतर जल धाराओं में इस धरती को
सींचकर उर्वरा बनाते धुराधारी तेरे धुरा को धारण करने के कारण। राजा
ने लाख मुद्राएँ दीं।
कदाचिद्राजानं निरन्तरं दीयमानमालोक्य मुख्यमात्यो वक्तुम-
शक्तो राज्ञः शयनभवनभित्तौ व्यक्तान्यक्षराणि लिखितवान्-
'आपदर्थं धनं रक्षेत्'
राजा शयनादुत्थितो गच्छन्भित्तौ तान्यक्षराणि वीक्ष्य स्वयं द्वितीय-
चरणं लिलेख-श्रीमन्तामापदः कुतः।
अपरेद्यु रमात्यो द्वितीय चरणं लिखितं दृष्ट्वा स्वयं तृतीयं लिलेख-
'सा चेदपगता लक्ष्मीः'
परेद्यु राजा चतुर्थं चरणं लिखति-'सञ्चितार्थो विनश्यति' ॥ १६८॥
ततो मुख्यमात्यो राज्ञः पादयोः पतति--'देव, क्षन्तव्योऽयं ममा-
पराधः।
एक बार राजा को निरन्तर दान करते देख कुछ मुँह से कहने में
असमर्थ मुख्य मंत्री ने राजा के शयन गृह की दीवार पर स्पष्ट अक्षरों में
लिख दिया-
'आपत्काल निमित्त उचित है धन की रक्षा।'
सोकर जागे सजा ने जाते हुए दीवार पर उन अक्षरों को देखकर स्वयं
दूसरा चरण लिखा-'श्रीमन्तों पर भला कहाँ आपत् आती है?'

भोजप्रबन्धः ६७
दूसरे दिन दूसरा चरण लिखा देख मन्त्री ने स्वयं तीसरा चरण लिख दिया-
'यदि वह लक्ष्मी चली जाय तो फिर क्या होगा ?' अगले दिन राजा ने
चौथा चरण लिख दिया---'उसके संग ही चला जायगा सब संचित धन ।' तो
मुख्य मंत्री राजा के चरणों में गिर गया और बोला---'महाराज, मेरा यह
अपराध क्षमा करें ।'
अन्यदा धाराधीश्वरमुपरि सौधभूमौ शयानं मत्वा कश्चिद्द्विजचोरः
खातपातपूर्व राज्ञः कोशगृहं प्रविश्य बहूनि विविधरत्नानि वैडूर्यादीनि
हृत्वा तानि परलोकऋणानि मत्वा तत्रैव वैराग्यमापन्नो विचारयामास-
'यद्व्यङ्गाः कुष्ठिनश्चान्धाः पङ्गवश्च दरिद्रिणः ।
पूर्वोपार्जितपापस्य फलमश्नन्ति देहिनः' ॥ १९९ ॥
और एकवार धाराविपति को ऊपर प्रासाद में सोया जान कोई
ब्राह्मण चोर सेंध लगा कर राजा के खजाने में घुस गया और बहुत से अनेक
प्रकार के रत्न लहसुनिया आदि चुराकर और यह समझ कर कि यह सब
परलोक में चुकाया जाने के निमित्त ऋण उसपर चढ़ गया, वैराग्य को प्राप्त
हो विचारने लगा -
अंगहीन, कोढ़ी, अंधे, लंगड़े और दरिद्री देहधारी प्राणी संचित पाप
का फल भोगा करते हैं ।
ततो राजा निद्राक्षये दिव्यशयनस्थितो विविधमणिकङ्कणालङ्कृतं
दयितवर्गं दर्शनीयमालोक्य गजतुरगरथपदातिसामग्रीं च चिन्तयन्
राज्यसुखसन्तुष्टः प्रमोद्भरादाह-
'चेतोहरा युवतयः सुहृदोऽनुकूलाः
सद्बान्धवाः प्रणयगर्भगिरश्च भृत्याः ।
वल्गन्ति दन्तिनिवहास्तरलास्तुरङ्गाः'
इति चरणत्रयं राज्ञोक्तम् । चतुर्थचरणं राज्ञो मुखान्न निःसरति
तदा चोरेण श्रुत्वा पूरितम्-
'सम्मीलने नयनयोर्नहि किञ्चिदस्ति' ॥ २०० ॥
तदनंतर नींद टूटने पर दिव्य शैया पर बैठा, अनेक विध मणि जटित
कंकणों से सुसज्जित अपनी प्रिया मंडली और हाथी, घोड़े, रथ और पैदल
७ भोज०

६८ भोजप्रबन्धः
सेना के वैभव को देख राज्यसुख से संतुष्ट विचार करता राजा उल्लास से
परिपूर्ण हो बोला—
'मनोहर युवतियाँ, अनुकूल मित्र, अच्छे और प्रेममयी वाणी बोलने वाले
बंधुगण और सेवक और चिघाड़ते हिन हिनाते हाथी और पानी दार घोड़े—
(मनोहर युवति, मित्र अनुकूल, प्रणय भाषी सद बंधु, सुभृत्य, मत्तगज-
राज, पवन गति अश्व—)
इस प्रकार राजा श्लोक के तीन चरण कह गया, पर चतुर्थ चरण उसके
मुख से न निकला तो सुनकर चोर ने पूर्ति कर दी—
'नेत्रबंद करने पर कुछ नहीं है।' (मूँदलो नयन, न कुछ अवशिष्ट)।'
(मूँदहुनयन कतहूँ कछु नाहीं—गो० तुलसीदास ।)
ततो ग्रथितग्रन्थो राजा चोरं वीक्ष्य तस्मै वीरवलयमदात्। ततस्त-
स्कुरो वीरवलयमादाय ब्राह्मणगृहं गत्वा शयानं ब्राह्मणमुत्थाप्य तस्मै
दत्त्वा प्राह—'विप्र, एतद्राज्ञः पाणिवलयं बहुमूल्यम् अल्पमूल्येन न
विक्रेयम्।' ततो ब्राह्मणः पण्यवीथ्यां तद्विक्रीय दिव्यभूषणानि पट्टदु-
कूलानि च जग्राह। ततो राजकीयाः केचनैनं चोरं मन्यमाना राज्ञो
निवेदयन्ति। ततो राजनिकटे नीतः।
तब पद्य के पूर्ण हो जाने पर राजा ने चोर को देखकर उसे वीर-कंकण
दिया। वह चोर वीर कंकण लेकर एक ब्राह्मण के घर पहुँचा और
सोते ब्राह्मण को जगाकर उसे कंकण देकर बोला—'विप्रवर, यह राजा के
हाथ का कंगन है, यह बहुमूल्य है, थोड़े मूल्य पर न बेंचना तो ब्राह्मण ने
हाट बाजार में उसे बेंचकर दिव्य आभूषण और रेशमी वस्त्र खरीद लिये।
तो कुछ राज्य कर्मचारियों ने उसे चोर समझा और राजा से निवेदन
किया। ब्राह्मण राजा के पास ले जाया गया।
राजा पृच्छति—'विटधार्यं पटमपि नास्ति। अद्य प्रातरेव दिव्य-
कुण्डलाभरणपट्टदुकूलानि कुतः ?' विप्रः प्राह—
'भेकैः कोटरशायिभिर्मृतमिव द्ममान्तर्गतं कच्छपैः
पाठीनैः पृथुपङ्कपीठलुठनाद्यास्मिन् मुहुर्मूच्छितम् ।
तस्मिञ्छुष्कसरस्थकालजलदेनागत्य तच्चेष्टितं
यत्राकुम्भनिमग्नवन्यकरिणां यूथैः पयः पीयते' ॥ २०१ ॥

भोजप्रबन्धः ६६
तुष्टो राजा तस्मै वीरवलयं चोरप्रदत्तं निश्चित्य स्वयं च लक्षं ददौ।
राजा ने पूछा--'तुम्हारे पास एक अति सामान्य व्यक्ति के धारण योग्य
वस्त्र तक नहीं हैं, आज प्रातः काल ही दिव्य कुंडल आभूषण और रेशमी
वस्त्र कहाँ से मिल गये ?' ब्राह्मण ने कहा—
जिस सरोवर में मेढ़क और कछुए धरती के भीतर मृतक के समान
बिलों में सोये पड़े थे और भारी कीचड़ में तड़पती मछलियाँ मूर्च्छित हो
चली थीं, एक असमय के बादल ने आकर उस सूखे ताल में ऐसा कर दिया
कि आज वहाँ सिर तक डूबे वन-हस्तियों के झुण्ड जल पी रहे हैं ।
संतुष्ट राजा ने समझ लिया कि जो वीर कंकण चोर को दिया गया था,
वह उसने इसे ही दे दिया है और स्वयम् उसे लाख मुद्राएँ दीं।
—:०:—
( १४ ) विष्णु-कविः
अन्यदा कोऽपि कवीश्वरो विष्ण्वाख्यो राजद्वारि समागत्य तैः
प्रवेशितो राजानं दृष्ट्वा स्वस्तिपूर्वकं प्राह--
‘धाराधीश धरामहेन्द्रगणना कौतूहलीयानयं
वेधास्त्वद्गणने चकार खटिकाखण्डेन रेखां दिवि ।
सैवेयं त्रिदशापगा समभवत्त्वत्तुल्यभूमीधरा-
भावात्तु त्यजति स्म सोऽयमवनीपीठे तुषाराचलः ॥’
राजा लोकोत्तरं श्लोकमाकर्ण्य ‘किं देयम्’ इति व्यचिन्तयत् ।
और वार एक विष्णु नामक कविराज राजद्वार पर पहुँचा और भीतर
प्रविष्ट कराया जाने पर राजा को देख ‘स्वस्ति’-वचन-पूर्वक बोला—
हे धारा के स्वामी, धरती के महान् राजाओं की गणना करने के इच्छुक
ब्रह्मा ने आपकी गणना करते समय आकाश में जो खरिया से लकीर खींची,
वही यह आकाश गंगा है, और आपके समान पृथ्वी पालक न पाकर जो
पृथ्वी पर उसे फेंक दिया, वही यह हिमाचल है।
अपूर्व श्लोक राजा सोचने लगा कि इसे क्या दूँ ।
तस्मिन्क्षणे तदीयकवित्वमप्रतिद्वन्द्वमाकर्ण्य सोमनाथाख्यकवेर्मुखं
विच्छायमभवत् । ततः स दौष्ट्याद्राजानं प्राह—‘देव, असौ सुकवि-

१०० भोजप्रबन्धः
र्भवति । परमनेन न कदापि वीक्षितास्ति राजसभा । यतो दारिद्र्य-
वारिधिरयम् । अस्य च जीर्णमपि कौपीनं नास्ति ।' ततो राजा सोम-
नाथं प्राह--
'निरवद्यानि पद्यानि यद्यनाथस्य का क्षतिः ।
भिक्षुणा कक्षनिक्षिप्तः किमिच्छुर्नीरसो भवेत्' ॥ २०३ ॥
ततः सर्वेभ्यस्ताम्बूलं दत्त्वा राजा सभाया उदतिष्ठत् ।
उस क्षण जिससे प्रतिद्वन्द्विता न हो सके, ऐसी उसकी कविता सुनकर
सोमनाथ नाम के कवि का मुँह उतर गया । और वह दुष्टतापूर्वक राजा से
बोला--'महाराज, यह कवि तो अच्छा है, पर इसने कभी राज सभा नहीं
देखी है, क्योंकि यह दरिद्रता का समुद्र है । इसके पास तो फटा-पुराना
कौपीन तक नहीं है ।' तब राजा ने सोमनाथ से कहा--
यदि किसी निःसहाय का काव्य श्रेष्ठ है, तो इसमें हानि क्या है ?
भिखारी की काँख में रखा गन्ना कहीं नीरस होता है ?
फिर सब को पान देकर राजा सभा से उठ गया ।
ततः सर्वैरप्यन्योन्यमित्यभ्यधायि--'अद्य विष्णुकवेः कवित्वमाकर्ण्य
सोमनाथेन सम्यग्दौष्ट्यमकारि ।' ततः समुत्थिता विद्वत्परिषत् । ततो
विष्णुकविरेकं पद्यं पत्रे लिखित्वा सोमनाथकविहस्ते दत्त्वा प्रणम्य गन्तु-
मारभत । 'अत्र सभायां त्वमेव चिरं नन्द ।'
तब सब परस्पर कहने लगे--'आज विष्णु कवि की कविता सुनकर
सोमनाथ ने बड़ी दुष्टता की ।' इसके बाद विद्वत्-सभा उठायी । तब विष्णु
कवि ने एक पद्य पत्र पर लिख कर सोमनाथ कवि के हाथ में दिया और
प्रणाम करके जाने लगा--'यहाँ सभा में तुम्हीं चिरकाल तक सानंद रहो ।'
ततो वाचयति सोमनाथकविः--
'एतेषु हा तरुणमारुतधूयमान-
दावानलैः कवलितेषु महीरुहेषु ।
अम्भो न चेज्जलद मुञ्चसि मा विमुञ्च
वज्रं पुनः क्षिपसि निर्दय कस्य हेतोः' ॥ २०४ ॥
ततः सोमनाथकविर्निखिलमपि पट्टदुकूलवित्त हिरण्मयीं तुरङ्गमादि-
संपत्तिं कलत्रवस्त्रावशेषं दत्तवान् ।

भोजप्रबन्धः १०१
तब सोमनाथ कवि ने उसे वांचा--
प्रवल वायु के द्वारा भड़कार्या जाती दावाग्नि के ग्रास लग गये इन वृक्षों
पर हे जलद, यदि तुम पानी नहीं बरसाते तो न बरसाओ, किंतु हे निर्दय,
इन पर वज्र किस लिए गिराते हो ?
तो सोमनाथ कवि ने पत्नी और देह वस्त्र मात्र शेष रख कर, रेशमी
वस्त्र, धन, स्वर्ण और अश्व आदि संपूर्ण संपत्ति विष्णु कवि को दे डाली।
ततो राजा मृगयारसप्रवृत्तो गच्छंस्तं विष्णुकविमालोक्य व्यचिन्त-
यत्-मयास्मै भोजनमपि न प्रदत्तम् । मामनादृत्यायं सम्पत्तिपूर्णः स्वदेशं
प्रति यास्यति । पृच्छामि । 'विष्णुकवे, कुतः सम्पत्तिः प्राप्ता ।' कविराह--
सोमनाथेन राजेन्द्र देव तद्गृहभिक्षुणा ।
अद्य शोच्यतमे पूर्णे मयि कल्पद्रुमायितम् ।। २०५ ।।
तदनंतर आखेट के निमित्त जाते राजा ने उस विष्णु कवि को देख कर
विचार किया-'मैंने तो इसे भोजन भी नहीं दिया। मेरा अनादर करके
संपत्ति से भरा पूरा हो यह अपने देश चला जायेगा पूछता हूँ। हे विष्णु कवि,
संपत्ति कहाँ से पा ली ?' कवि बोला--
हे राजेश्वर, महाराज, आपके घर के भिक्षुक सोमनाथ ने आज मुझ दीन
तम व्यक्ति पर पूर्णतः कल्पवृक्ष की भाँति कृपा की ।
राजा पूर्व सभायां श्रुतस्य श्लोकस्याक्षरलक्षं ददौ। सोमनाथेन च
यावद्दत्तं तावदपि सोमनाथाय दत्तवान् । सोमनाथः प्राह-
'किसलयानि कुतः कुसुमानि वा
क्व च फलानि तथा वनवीरुधाम् ।
अयमकारणकारुणिको यदा
न तरतीह पयांसि पयोधरः ॥२०६॥
राजा ने पहिले सभा में सुने श्लोक पर प्रत्यक्षर लक्ष मुद्राएँ दी और
सोमनाथ ने जितना दिया था, उतना सोमनाथ को भी दिया। सोमनाथ बोला-
वन के वृक्षों ने कहाँ से तो पत्ते आते और कहाँ से फूल और फल, यदि
विना कारण के करुणा करने वाला यह जल धर इन्हें जल से तर न कर देता ?

१०२ भोजप्रबन्धः
ततो विष्णुकविः सोमनाथदत्तेन राज्ञा दत्तेन च तुष्टवान् । तदा
सीमन्तकविः प्राह—
‘वहति भुवनश्रेणीं शेषः फणाफलकस्थितां
कमठपतिना मध्ये पृष्ठं सदा स च धार्यते ।
तमपि कुरुते क्रोडाधीनं पयोनिधिरादरा-
दहह महतां निःसीमानश्चरित्रविभूतयः’ ॥ २०७ ॥
विष्णु कवि सोमनाथ और राजा द्वारा दिये हुए से संतुष्ट हुआ तो सीमंत
कवि ने कहा—
शेषनाग अपने फन के ऊपर रख कर, भुवन धारिणी धरणी का भार
धारण करता है, कच्छपराज अपनी पीठ पर शेषनाग को धारता है, उसको
जलनिधि सादर अपने गोद में रख लेता है । अहाहा, महज्जनों के चरित्र का
ऐश्वर्य असीम होता है ।
—:०:—
( १५ ) समाप्तेऽपि कोशे राज्ञा दानम्
कदाचित्सौधतले राजानमेत्य भृत्यः प्राह—‘देव, अखिलेष्वपि
कोशेषु यद्वित्तजातमस्ति तत्सर्वं देवेन कविभ्यो दत्तम् । परन्तु कोशगृहे
धनलेशोपि नास्ति । कोऽपि कविः प्रत्यहं द्वारि तिष्ठति । इतः परं कवि-
र्विद्वान् वा कोऽपि राज्ञे न प्राप्य इति मुख्यामात्येन देवसन्निधौ विज्ञाप-
नीयमित्युक्तम् ।’
एक बार प्रासाद के नीचे राजा के पास आकर सेवक ने कहा—‘महा-
राज, संपूर्ण कोशों में जो भी धन था, वह सब कवियों को दे दिया गया,
कोषागार में अब धन का लेश भी नहीं है । प्रति दिन कोई न कोई कवि द्वार
पर आ जाता है । अब से आगे कोई कवि या विद्वान् महाराज से न मिल
पाये—मुख्य मंत्री जी ने आप से यह निवेदन करने को कहा है ।’
राजा कोशस्थं सर्वं दत्तमिति जानन्नपि प्राह—‘अद्य द्वारस्थं कविं
प्रवेशय ।’ ततो विद्वानागत्य ‘स्वस्ति’ इति वदन् प्राह--
‘नभसि निरवलम्बे सीदता दीर्घकालं
त्वदभिमुखविसृष्टोत्तानचञ्चुपुटेन ।

भोजप्रबन्धः १०३
जलधरजलधारा दूरतस्तावदास्तां
ध्वनिरपि मधुरस्ते न श्रुतश्चातकेन' ॥
राजा तदाकर्ण्य 'धिग्जीवितं यदिद्वांसः कवयश्च द्वारमागत्य
सीदन्ति' इति तस्मै विप्राय सर्वाण्याभरणान्युत्तार्य ददौ ।
कोश में जो था, वह सब दे दिया गया-यह जानता हुआ भी राजा
बोला-'आज द्वार पर आये कवि को प्रविष्ट करा दो तब विद्वान ने आकर
'स्वस्ति' यह उच्चारण करते हुए कहा-
हे जलधर, निराधार आकाश में बहुत समय तक कष्ट उठाते, तुम्हारी
ओर ऊपर को चोंच उठाये चातक ने तुम्हारी मधुर ध्वनि भी नहीं सुनी,
जलधारा तो दूर रही ।
यह सुनकर राजा ने सोचा कि उस जीवन को धिक्कार है कि द्वार
पर आकर विद्वान् और कवि कष्ट भोगते हैं- और सब आभूषण उतार कर
उस ब्राह्मण को दे दिये ।
ततो राजा कोशाधिकारिणमाहूयाह- 'भाण्डारिक, मुञ्जराज्यस्य
तथा मे पूर्वेषां च ये कोशाः सन्ति तेषां मध्ये रत्नपूर्णाः कलशाः कुत्र ।'
ततः काश्मीरदेशान्मुचुकुन्दकविरागत्य 'स्वस्ति' इत्युक्त्वा प्राह-
'त्वद्यशोजलधौ भोज निमज्जनभयादिव ।
सूर्येन्दुबिम्बमिषतो धत्ते कुम्भद्वयं नभः' ॥ २०९ ॥
राजा तस्मै प्रत्यक्षरं लक्षं ददौ ।
इस के पश्चात् राजाने कोशाधिकारी को बुला कर कहा-'भंडारीजी
मुंजराज के और मेरे पूर्व पुरुषों के जो कोश हैं, उनके बीच रत्नों से भरे
कलश थे, वे कहाँ हैं ? तभी कश्मीर देश से मुचुकुंद कवि आकर और 'स्वस्ति'
कह कर बोला-
हे भोज, तुम्हारी यशरूपी समुद्र में डूब जाने के डर से आकाश मानो
सूर्य और चंद्र के बिंब के व्याज से दो घड़े धारे हुए हैं।
राजा ने उसे प्रत्येक अक्षर पर लक्ष मुद्राएँ दीं ।
पुनः कविराह-
'आसन्क्षीर्णानि यावन्ति चातकाश्रूणि तेऽम्बुद ।
तावन्तोऽपि त्वयोदार न मुक्ता जलबिन्दवः' ॥ २१० ॥

१०४ भोजप्रबन्धः
ततः स राजा तस्मै शतंतुरगानपि ददौ । ततो भाण्डारिको लिखति-
'मुचुकुन्दाय कवये जात्यानश्वाञ्शतं ददौ ।
भोजः प्रदत्तलक्षोऽपि तेनासौ याचितः पुनः' ॥ २११ ॥
कवि ने फिर कहा-
हे जलधर, चातक ने तेरे लिए जितने आंसू गिराये, हे उदार, तूने उतने
भी जलबिंदु नहीं गिराये ।
तो राजाने उसे सौ घोड़े भी दे दिये । तब भंडारी ने लिखा--
भोज ने यद्यपि लाख मुद्राएँ दीं, तथापि उसने पुनः याचना की तो मुचुकुंद
कवि को राजाने सौ अच्छी जाति के घोड़े दिये ।
ततो राजा सर्वानपि वेश्म प्रेषयित्वान्तर्गच्छति । ततो राज्ञश्चामरग्रा-
हिणी प्राह-
'राजन्मुञ्जकुलप्रदीप सकलक्ष्मापालचूडामणे
युक्तं सञ्चरणं तवादद्भुतमणिच्छत्रेण रात्रावपि ।
मा भूत्त्वद्वदनावलोकनवशाद्व्रीडाभिनम्रः शशी
मा भूच्चेयमरुन्धती भगवती दुःशीलताभाजनम्' ॥ २१२ ॥
राज तस्यै प्रत्यक्षरं लक्षं ददौ ।
तदनंतर राजा सब को घर भेजकर महल में जाने लगा तो राजा की
चँवर डुलाने वाली ने कहा-
हे मुंज के कुलदीपक, समस्त नृपालों की चूडास्थित मणि समान श्रेष्ठ
भोजराज, रात में भी इस प्रकार अद्भुत मणिच्छत्र लगाकर आपका चलना
युक्ति पूर्ण ही है क्योंकि आपके मुख को देख लेने के कारण कहीं चंद्रमा लज्जा
से अवनत न हो जाय और भगवती अरुंधती ( नक्षत्र-रूप में स्थित ) दुःशीलता
की पात्र न हो जायें ।
राजा ने उसे प्रत्यक्षर लक्ष मुद्राएँ दे दीं ।
अन्यदा कुण्डिननगराद्गोपालो नाम कविरागत्य स्वस्तिपूर्वकं प्राह-
'त्वच्चित्ते भोज निर्यातं द्वयं तृणकणायते ।
क्रोधे विरोधिनां सैन्यं प्रसादे कनकोच्चयः' ॥ २१३ ॥

भोजप्रबन्धः १०५
राजा श्रुत्वापि तुष्टो न दास्यति । राजपुरुषैः सह चर्चां कुर्वाण-
स्तिष्ठति । ततः कविर्व्यचिन्तयत्--'किमु राजा नाश्रावि' ।
दूसरे दिन कुंडिन नगर से गोपाल नामक कवि आया और 'स्वस्ति'
कहकर बोला-
हे भोज, आपके चित्त में आकर दो वस्तुएँ तृण और कण के समान हो
जाती हैं--क्रोध आने पर विरोधियों की सेना (तृण तुल्य) और प्रसन्न
होने पर सुवर्ण का ढेर (कण के समान) ।
यह सुनकर संतुष्ट हो कर भी राजा ने कुछ दिया नहीं, राजपुरुषों के साथ
चर्चा करता रहा । तो कवि सोचने लगा-क्या राजा ने नहीं सुना ?'
ततः क्षणेन समुन्नतमैवावलोक्य राजानं कविराह--
'हे पाथोद् यथोन्नतं हि भवता दिग्व्यावृता सर्वतो
मन्ये धीर तथा करिष्यसि खलु क्षीराब्धितुल्यं सरः ।
किन्त्वेष क्षमते नहि क्षणमपि ग्रीष्मोष्मणा व्याकुलः
पाठीनादिगणस्त्वदेकशरणस्तद्वर्ष तावत्कियत् ॥ २१४ ॥
राजा कविहृदयं विज्ञाय 'गोपालकवे' दारिद्र्याग्निना नितान्तं
दग्धोऽसि ।'
इति वदन् षोडशमणीननर्घ्यान् षोडशदन्तीन्द्रांश्च ददौ ।
तदनंतर क्षण में राजा के ऊपर मुँह उठाते ही देख कर कवि बोला---
हे जलद, आपने जैसे उमड़ कर दिशा को सब ओर से ढक लिया है
उससे मैं समझता हूँ कि हे धीर आप सरोवर को क्षीरसमुद्र की भाँति बना
देंगे, परंतु ग्रीष्म ऋतु की गरमी से व्याकुल ये मछलियाँ आदि प्राणी क्षण
भर का विलंब भी नहीं सह पा रहे हैं, आप ही इनकी एक शरणस्थली हैं;
तो कुछ बरसिए ।
राजा ने कवि के हृदय का मर्म समझा और यह कहते हुए कि गोपाल
कवि, तुम दरिद्रता की आग से पूर्णतया दग्ध हो गये हो--,
सोलह अमोल मणियाँ और सोलह गजराज उसे दिये ।
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