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सर्वकोश
भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)

भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)

Bhoja Prabandha with Hindi Commentary

बल्लाल सेन / पं. जगदीशलाल शास्त्री द्वारा

DevanagariHindipublished190 पृष्ठ

पृष्ठ 101, कुल 190 में से

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पृष्ठ 101

६४ भोजप्रबन्धः
'अपृष्टस्तु नरः किञ्चिद्यो ब्रूते राजसंसदि ।
न केवलमसम्मानं लभते च विडम्बनाम् ॥ १६३ ॥
तब मयूर ने कहा--
'जो राजसभा में बिना पूछे जाने पर बोलता है, वह केवल असम्मान ही
नहीं पाता, उपहसित भी होता है।
देव, तथाप्युच्यते--
का सभा किं कविज्ञानं रसिकाः कवयश्च के ।
भोज किं नाम ते दानं शुकस्तुष्यति येन सः ॥ १६४ ॥
तथापि भवनद्वारमागतः शुकदेवः सभायामानेतव्य एव ।'
महाराज, तथापि कहता हूँ-
भोजराज, क्या तो आपकी सभा है और क्या कविज्ञान है और रसिक
कवि ही क्या हैं ? आपका दान भी क्या है, जिससे वह शुक संतुष्ट होगा ?
तो भी महल के द्वार पर आये शुकदेव को सभा में लाना ही चाहिए।
तदा राजा विचारयति शुकदेवसामर्थ्यं श्रुत्वा हर्षविषादयोः पात्र-
मासीत् । महाकविरवलोकित इति हर्षः । अस्मै सत्कविकोटिसुकुटमणये
किं नाम देयमिति च विषादः । 'भवतु । द्वारपाल, प्रवेशय ।'
तो राजा ने सोचा, शुकदेव के सामर्थ्य को सुनकर प्रसन्नता और दुःख-
दोनों का अनुभव हुआ । महाकवि को देखा-इसकी प्रसन्नता और श्रेष्ठकवि
मंडल के मुकुट मणि स्वरूप इसे दिया क्या जायगा-इसका दुःख । जो हो ।
द्वारपाल, कवि को भीतर लाओ, ( राजा ने आज्ञा दी ) ।
तत आयान्तं शुकदेवं दृष्ट्वा राजा सिंहासनादुदतिष्ठत् । सर्वे
पण्डितास्तं शुकदेवं प्रणम्य सविनयमुपवेशयन्ति । स च राजा तं सिंहा-
सन उपवेश्य स्वयं तदाज्ञयोपविष्टः ।
फिर शुकदेव को आता देख राजा सिंहासन से उठ खड़ा हुआ । सब
पंडित उस शुकदेव को प्रणाम करके विनय पूर्वक आसन देने लगे । राजा
उसे सिंहासन पर बैठा कर स्वयम् उसकी आज्ञा से बैठा ।
ततः शुकदेवः प्राह- 'देव, धाराराथ, श्रीविक्रमनरेन्द्रस्य या दान-
लक्ष्मीस्त्वामेव सेवते । देव, मालवेन्द्र एव धन्यः नान्ये नभुजः, यस्य ते