भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)
Bhoja Prabandha with Hindi Commentary
बल्लाल सेन / पं. जगदीशलाल शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभोजप्रबन्धः ६१
राजा—हे विप्र; जल कितना गहरा है ? ( जल कितना मान है ? )
वह बोला—हे राजन्, घुटनों तक है। ( जानुदघ्न महाराज । )
अचरज में भर राजा—तुम्हारी यह अवस्था कैसी है ?
( ऐसी तेरी दशा क्यों ? )
वह बोला--सब आप जैसे नहीं हैं। ( तेरे जैसे सब नहीं । )
राजा प्राह कुतूहलात्—‘विद्वन्, याचस्व कोषाधिकारिणम् । लक्षं
दास्यति मद्वचसा ।' ततो विद्वान्काष्ठं भूमौ निक्षिप्य कोषाधिकारिणं
गत्वा प्राह—‘महाराजेन प्रेषितोऽहम् । लक्षं मे दीयताम् ।' ततः स हस-
न्नाह--‘विप्र, भवन्मूर्तिर्लक्षं नार्हति ।'
राजा ने कुतूहल से पूर्ण हो कहा—'हे पंडित, कोषाधिकारी से मांगो।
मेरी आज्ञा से लाख मुद्राएँ देगा ।' सो विद्वान् लकड़ियां धरती पर डाल कर
कोषाधिकारी से जाकर बोला--'मुझे महाराज ने भेजा है। मुझे लाख
मुद्राएँ दो ।' वह हँसता हुआ बोला--'ब्राह्मण, आपका स्वरूप लाख पाने
योग्य नहीं प्रतीत होता ।'
ततो विषादी स राजानमेत्याह--'स पुनर्हसति देव, नार्पयति ।'
राजा कुतूहलादाह-‘लक्षद्वयं प्रार्थय । दास्यति ।' पुनरागत्य विप्रः ‘लक्ष-
द्वयं देयमिति राज्ञोक्तम्' इत्याह । स पुनर्हसति ।
तो विषाद पूर्ण हो वह जाकर राजा से बोला—'महाराज, वह तो हँसता
है, देता नहीं ।' राजा कुतूहल से बोला—'दो लाख माँगो, देगा ।' ब्राह्मण
पहुँच कर फिर बोला--'राजा ने कहा है कि दो लाख देना है ।' वह फिर
हँसने लगा ।
विप्रः पुनरपि भोजं प्राप्याह—‘स पापिष्ठो मां हसति नार्पयति ।’
ततः कौतूहली लीलानिधिर्महीं शासच्छ्रीभोजराजः प्राह-‘विप्र, लक्षत्रयं
याचस्व । अवश्यं स दास्यति ।' स पुनरेत्य प्राह—‘राजा मे लक्षत्रयं
दापयति ।' स पुनर्हसति ।
ब्राह्मण ने फिर भोज के पास पहुँच कर कहा—'वह पापी मुझ पर
हँसता है, देता नहीं ।' तब कौतुकी और लीला के आगार, पृथ्वी के शासक
श्री भोजराज ने कहा—'विप्र, तीन लाख माँगो, वह अवश्य देगा ।' वह फिर