भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)
Bhoja Prabandha with Hindi Commentary
बल्लाल सेन / पं. जगदीशलाल शास्त्री द्वारा
भोजप्रबन्धः ४७
दरिद्रता रूपी आग की जलन तो संतोष के जल से शांत हो गयी है, किंतु
माँगनेवालों की आशा नष्ट कर देने से जो अंतर्दाह है, उसका उपशमन
किसके द्वारा हो ?
राजा चैतस्सर्वं श्रुत्वा 'नेदानीं किमपि दातुं योग्यः । प्रातरेव वाणां
पूर्णमनोरथं करिष्यासि ।' इति निष्क्रान्तो राजा—
'कृतो यैर्न च वाग्मी च व्यसनी तं न यैः पदम् ।
यैरात्मसदृशो नार्थी किं तैः काव्यैर्बलैर्धनैः' ॥ १०४ ॥
राजा ने यह सब सुनकर विचारा कि इस समय तो मैं इसे
कुछ देने योग्य हूँ नहीं, प्रातः काल इसका मनोरथ पूर्ण करूँगा—और
चला गया—
जिस काव्य ने मनुष्य को वक्तृत्व कला में निपुण नहीं बनाया, जिस बल
ने किसी को अधीन—स्ववश—नहीं किया और जिस धन ने याचक को
अपने समान ( धनी ) नहीं कर दिया, वह काव्य, बल और धन व्यर्थ है ।
एवं पुरे परिभ्रममाणे राजनि वर्त्मनि चोरद्वयं गच्छति । तयोरेकः
प्राह शकुन्तः—'सखे, स्फारान्धकारविततेऽपि जगत्यञ्जनवशात्सर्वं परमा-
णुप्रायमपि वस्तु सर्वत्र पश्यामि । परन्तु सम्भारगृहानीतकनकजातमपि
न मे सुखाय' इति ।
जब राजा इस प्रकार नगर में भ्रमण करते फिर रहे थे, तो मार्ग में दो
चोर जा रहे थे । उनमें से एक शकुंत नामक चोर बोला--'मित्र, जगत् में
घोर अँधेरा फैला होने पर भी अंजन लगा होने के कारण परमाणु जैसी भी
छोटी सब वस्तुएँ सर्वत्र देख पा रहा हूँ किंतु कोषागार से चुरा लिया हुआ
स्वर्ण भी मुझे सुख नहीं दे रहा है ।'
द्वितीयो मरालनामा चोर आह—'आहृतं सम्भारगृहात्कनकजात-
मपि न हितमिति कस्माद्धेतोरुच्यते' इति । ततः शकुन्तः प्राह—'सर्वतो
नगररक्षकाः परिभ्रमन्ति । सर्वोऽपि जागरिष्यत्येषां भेरीपटहादीनां
निनादेन । तस्मादाहृतं विभज्य स्वस्वभागगतं धनमादाय शीघ्रमेव
गन्तव्यम्' इति ।
दूसरे मराल नाम के चोर ने कहा—'खजाने से चुरा लाया गया सोना
भी अच्छा नहीं लगता—ऐसा किस कारण से कहते हो ?' तो शकुंत बोला--
४८ भोजप्रबन्धः
'चारों ओर नगर रक्षक घूम रहे हैं। इन नगाड़ों और पटहों के शब्द से सब
जग जायेंगे। सो चुराये [ माल ] को बाँट कर अपने-अपने भाग में आये धन
को लेकर शीघ्र ही चला जाना उचित होगा।'
मरालः प्राह—'सखे, त्वमनेन कोटिद्वयपरिमितमणिकनकजातेन
किं करिष्यसि' इति।
मराल ने पूछा—'मित्र, तू इस दो करोड़ परिमाण के मणि और सोने
से क्या करेगा ?
शकुन्तः—'एतद्धनं कस्मैचिद्द्विजन्मने दास्यामि यथायं वेदवेदा-
ङ्गपारगोऽन्यं न प्रार्थयति।'
शकुंत—यह धन किसी ब्राह्मण को दे दूँगा कि वह वेद और वेदांग का
पारंगत होकर किसी और से न माँगेगा।
मरालः—'सखे चारु।
ददतो युध्यमानस्य पठतः पुलकोऽथ चेत्।
आत्मनश्च परेषां च तद्दानं पौरुषं स्मृतम् ॥ १०५ ॥
अनेन दानेन तव कथं पुण्यफलं भविष्यति।'
मराल—'मित्र, सुंदर। दान करते, युद्ध करते और काव्य पाठ करते
समय यदि अपने और दूसरो के रोंगटे खड़े हो जायँ तभी वह दान, पराक्रम
और पाठ कहा जाता है।
तो इस [ चोरी के ] दान से तुमको पुण्यफल कैसे मिलेगा?'
शकुन्तः—'अस्माकं पितृपैतामहोऽयं धर्मः, यच्चौर्येण वित्तम् नीयते'
शकुंत—'चोरी से धनार्जन तो हमारे बाप-दादा से चला आया धर्म है।'
मरालः—'शिरश्छेदमङ्गीकृत्यार्जितं द्रव्यं निखिलमपि कथं दीयते।'
मराल—'सिर कटाना स्वीकार करके कमाया हुआ सब धन क्यों दान
करते हो?'
शकुन्तः--मूर्खो नहि ददात्यर्थं नरो दारिद्र्यशङ्कया।
प्राज्ञस्तु वितरत्यर्थं नरो दारिद्र्यशङ्कया' ॥ १०६ ॥
शकुंत--'मूर्ख मनुष्य दरिद्रता की शंका से धन-दान नहीं करता और
बुद्धिमान् पुरुष भविष्य में आनेवाली दरिद्रता के निवारणार्थ धन वितरण कर
देता है।'
भोजप्रबन्धः ४६
मरालः—'किञ्चिद्वेदमयं पात्रं किञ्चित्पात्रं तपोमयम्।
पात्राणामुत्तमं पात्रं शूद्रान्नं यस्य नोदरे' ॥ १०७ ॥
मराल—वेद पाठी कुछ दान का पात्र होता है और कुछ तपस्वी दान के
योग्य होता है, दान पाने का उत्तम पात्र वह है, जिसके पेट में निकृष्ट अन्न
नहीं होता।'
शकुन्तः—'अनेन वित्तेन किं करिष्यति भवान्।'
शकुन्त—'आप इस धन का क्या करेंगे?'
मरालः—सखे, काशीवासी कोऽपि विप्रवटुरत्रागात्। तेनास्मत्पितुः
पुरः काशीवासफलं व्यावर्णितम्। ततोऽस्मत्तातॊ बाल्यादारभ्य चौर्यं
कुर्वाणो दैववशात्स्वपापान्निवृत्तो वैराग्यात्सकुटुम्बः काशीमेष्यति। तद-
र्थमिदं द्रविणजातम्।'
मराल—'मित्र, एक काशी का रहनेवाला ब्राह्मण विद्यार्थी यहाँ आया।
उसने मेरे पिता के संमुख काशीवास के फल का वर्णन किया। सो बचपन
से चोरी करनेवाले मेरे पिता दैववश अपने पाप से निवृत्त हो वैराग्य के
कारण सकुटुम्ब काशी जायेंगे। यह सब धन उसी निमित्त है।'
शकुन्तः—'महद्भाग्यं तव पितुः। तथा हि—
वाराणसीपुरीवासवासनावासितात्मना।
किं शुना समतां याति वराकः पाकशासनः ॥ १०८ ॥
ऊपरं कर्मसस्यानां क्षेत्रं वाराणसी पुरी।
यत्र सँल्लभ्यते मोक्षः समं चाण्डालपण्डितैः ॥ १०६ ॥
मरणं मङ्गलं यत्र विभूतिश्च विभूषणम्।
कौपीनं यत्र कौशेयं सा काशी केन मीयते ॥ ११० ॥
शकुंत—'तेरा पिता बड़ा भाग्यशाली है। जैसा कि है—
वाराणसी नगरी में निवास करने की इच्छा जिसके हृदय में व्याप्त है,
उस कुत्ते की समता में क्या बेचारा इन्द्र आ सकता है ?
वाराणसी नगरी कर्म रूपी खेती के लिए ऊसर हैं (कर्म फल के बंधन
से मुक्त), जहाँ कि चंडाल और ब्राह्मण-दोनों ही समान रूप में मोक्ष प्राप्त
करते है।
४ भोज०
५० भोजप्रबन्धः
जहाँ मृत्यु प्राप्त होना मंगल है, भस्म आभूषण है और जहाँ कौपीन ही
पटांबर है, उस काशी की समता किससे हो सकती है ?'
एवमुभयोः संवादं श्रुत्वा राजा तुतोष। अचिन्तयच्च मनसि-
'कर्मणां गतिः सर्वथैव विचित्रा उभयोरपि पवित्रा मतिः' इति।
ततो राजा विनिवृत्त्य भवनान्तरे पितृपुत्रावपश्यत्। तत्र पिता पुत्रं
प्राह--'इदानीं परिज्ञातशास्त्रतत्त्वोऽपि नृपतिः कार्पण्येन किमपि न
प्रयच्छति। किंतु--
अर्थिनि कवयति कवयति पठति च पठति स्तवोन्मुखे स्तौति।
पश्चाद्यामीत्युक्ते मौनी दृष्टिं निमीलयति' ।। १११ ।।
राजाप्येतच्छ्रुत्वा तत्समीपं प्राप्य 'मैवं वद्' इति स्वगात्रात्सर्वाभरणा-
न्युत्तार्य ददौ तस्मै।
इस प्रकार दोनों का वार्तालाप सुन कर राजा संतुष्ट हुआ और मन में
सोचने लगा-'कर्मगति सब प्रकार से विचित्र होती है। दोनों की ही मति
पवित्र है।'
तदनन्तर राजा ने उस स्थान से हट कर एक अन्य गृह में पिता-पुत्र
को देखा। वहाँ पिता ने कहा-'आजकल शास्त्रमर्म का परिज्ञानी भी राजा
कृपणता के कारण कुछ देता नहीं, परं च-
याचक (कवि) के कविता करने पर कविता कर देता है, काव्यपाठ
करने पर स्वयम् भी पढ़ देता है और प्रशंसा करने पर प्रशंसा कर देता है,
किन्तु बाद में कवि के 'जाता हूँ' कहने पर चुपचाप आँखें मूंद लेता है।
राजा यह सुन उसके समीप जाकर बोला कि ऐसा न कहो, और अपने
शरीर से सब आभूषण उतार कर उसे दे दिये।
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८-क्रीडाचन्द्रः
ततो गृहमासाद्य कालान्तरे सभामुपविष्टः कालिदासं प्राह-'सखे,
'कवीनां मानसं नौमि तरन्ति प्रतिभाम्भसि।'
ततः कविराह-
'यत्र हंसवयांसीव भुवनानि चतुर्दश' ।। ११२ ।।
भोजप्रबन्धः ५१
ततो राजा प्रत्यक्षरमुक्ताफललक्षं ददौ।
फिर घर पहुँच कर कुछ समय पश्चात् सभा में बैठा राजा कालिदास से
बोला—‘मित्र,
‘कवियों के मानसरूपी मन को नमस्कार, जिसके प्रतिभा-जल में तिरते
हैं। तब कवि ने कहा (पूर्ति कर दी)—
‘चौदहों भुवन हंस के बच्चों जैसे!’ तब राजा ने प्रत्यक्षर लाख-लाख
मोती दिये।
ततः प्रविशति द्वारपालः-- 'देव, कोऽपिकौपीनावशेषो विद्वान्द्वारि
तिष्ठति' इति। राजा—'प्रवेशय।' ततः प्रवेशितः कविरागत्य 'स्व-
स्ति' इत्युक्त्वाऽनुक्त एवोपविष्टः प्राह--
इह निवसति मेरुः शेखरो भूधराणा-
मिह हि निहितभाराः सागराः सप्त चैव।
इदमसुलमनन्तं भूतलं भूरिभूतो-
द्भवधरणसमर्थं स्थानमस्मद्विधानाम् ॥ ११३ ॥
तदनन्तर द्वारपाल ने प्रवेश किया (और कहा)—'देव, कौपीन मात्र
धारण किये एक विद्वान् द्वार पर प्रतीक्षा कर रहा है।' राजा ने कहा—
'भीतर ले आओ।' तब प्रवेशित कवि ने आकर कहा—'स्वस्ति' और बिना
किसी के कहे ही बैठ गया और बोला—
'इस ओर पर्वतों में श्रेष्ठ सुमेरु स्थित है और इधर ही पूर्ण भार युक्त
सातों समुद्र हैं, यह अतुलनीय, अन्त हीन, प्रभूत प्राणियों की उत्पत्ति और
उनका पालन-पोषण करने में समर्थ भूतल हम जैसे व्यक्तियों का स्थान है।'
राजा--'महाकवे, किं ते नाम ? अभिधत्स्व।
राजा—'महाकवे, तुम्हारा नाम क्या है ? बताओ।'
कविः—'नामग्रहणं नोचितं पण्डितानाम्। तथापि वदामो यदि
जानासि।
नहि स्तनन्धयी बुद्धिर्गम्भीरं गाहते वचः।
तलं तोयनिधेर्द्रष्टुं यष्टिरस्ति न वैष्णवी ॥ ११४ ॥
५२ भोजप्रबन्धः
देव, आकर्णय--
च्युतामिन्दोर्लेखां रतिकलहभग्नं च वलयं
समं चक्रीकृत्य प्रहसितमुखी शैलतनया ।
अवोचद्यं पश्येत्यवतु गिरिशः सा च गिरिजा
स चक्रीडाचन्द्रो दशनकिरणापूरिततनुः ॥ ११५ ॥
कवि--'पंडितों को अपना नाम लेना उचित नहीं होता, तथापि बताता
हूँ, यदि समझ सको।
दूध पीते बच्चों की बुद्धि गंभीर वचन की थाह नहीं पा पाती, जलनिधि
के तल को देखने के लिए बांस की लाठी नहीं होती।
देव, सुनिए--
रतिकलह में गिरी चंद्रमा की कला और टूटे कंगन को जोड़ गोलाकार
चक्र जैसा बनाकर हँसती हुई पर्वतपुत्री ने शिव से कहा--'यह देखो ! ( तो
देखनेवाले ) वह कैलाशशायी शिव और वह गिरिसुता और वह दंतकांति
समान किरणों से परिपूरित क्रीडाचन्द्र आपकी रक्षा करे।'
कालिदासः--'सखे क्रीडाचन्द्र, चिराद्दृष्टोऽसि । कथमीदृशी ते
दशा मण्डले विराजत्यपि राजनि बहुधनवति ?'
कालिदास ( ने कहा )--'मित्र क्रीडाचन्द्र, बहुत समय बाद दीखे हो
प्रभूत धनवान् राजाओं के रहने पर भी तुम्हारी यह कैसी दशा है ?'
क्रीडाचन्द्रः--
धन्निनोऽप्यदानविभवा गण्यन्ते धुरि महादरिद्राणाम् ।
हन्ति न यतः पिपासामतः समुद्रोऽपि मरुरेव ॥ ११६ ॥
क्रीडाचन्द्र--'जो अपनी सम्पत्ति का दान नहीं करते, ऐसे धनी भी महा-
दरिद्रों में ऊँचे स्थान पर गिने जाते हैं । क्योंकि प्यास नहीं बुझाता इसलिये
समुद्र भी मरुस्थल ही है ।
किं च--
उपभोग( १ )कातराणां पुरुषाणामर्थसञ्चयपराणाम् ।
कन्यामणिरिव संदने तिष्ठत्यर्थः परस्यार्थे ॥ ११७ ॥
( १ ) उपभोगे कातराः भीता । उपभोगमकुर्वाणा इति यावत् ।
भोजप्रबन्धः ५३
सुवर्णमणिकेयूराडम्बरैरन्यभूभृतः ।
कलयैव पदं भोज तेषामाप्नोति सारवित् ॥ ११८ ॥
सुधामयानीव सुधां गलन्ति विदग्धसंयोजनमन्तरेण ।
काव्यानि निर्व्याजमनोहराणि वाराङ्गनाङ्गमिव यौवनानि ॥ ११९ ॥
ज्ञायते जातु नामापि न राज्ञः कवितां विना ।
कवेस्तद्व्यतिरेकेण न कीर्तिः स्फुरति क्षितौ ॥ १२० ॥
और भी है—उपभोग करने में डरनेवाले (कंजूस), धन इकट्ठा करने
में लगे हुए पुरुषों का धन घर में कन्यारूपी मणि के समान दूसरे के लिए ही
रहता है ।
हे भोज, अन्य राजा स्वर्ण, मणि और केयूर के आडम्बरों के कारण
जिस स्थान को प्राप्त करते हैं, उनके उस स्थान को तत्त्ववेत्ता कला के द्वारा
ही प्राप्त कर लेते हैं ।
अमृत से परिपूर्ण-जैसे स्वभावतया मनोहर काव्य, मर्मज्ञ विद्वान् के संयोग
के बिना अपने अमृतरस को वाराङ्गनाओं के यौवन की भाँति व्यर्थ गला
देते हैं ।
कविता के बिना राजाओं का नाम भी नहीं जाना जाता और राजा से
व्यतिरिक्त हो (राज के अभाव में) कवि का यश धरती पर नहीं फैलता ।'
मयूरः—
'ते वन्द्यास्ते महात्मानस्तेषां लोके स्थिरं यशः ।
यैर्निबद्धानि काव्यानि ये च काव्ये प्रकीर्तिताः' ॥ १२१ ॥
मयूर—जिन्होंने काव्य-रचना की और जिनका काव्य में वर्णन हुआ वे
वंदनीय हैं वे महात्मा हैं और उन्हीं का यश संसार में स्थिर हैं ।
वररुचिः—
'पदव्यक्तिव्यक्तीकृतसहृदयाबन्धललिते
कवीनां मार्गेऽस्मिन्स्फुरति बुधमात्रस्य धिषणा ।
न च क्रीडालेशव्यसनपिशुनोऽयं कुलवधू-
कटाक्षाणां पन्थाः स खलु गणिकानामविषयः' ॥ १२२ ॥
२. भोज का राज्याभिषेक व धारा नगरी समृद्धि
५४ भोजप्रबन्धः
वररुचि-पदों द्वारा व्यक्त, सहृदयजन के आस्वादन के निमित्त साधारणी
कृत प्रसंग-योजना के कारण ललित चरण रखे जाने से बन गये चिह्नों के
कारण सज्जनों के लिए जिसमें दिशा का निर्देश स्पष्ट है, ऐसे मार्ग के समान
कवियों के इस मार्ग में ( काव्य में ) पंडितों की ही बुद्धि स्फुरित होती है । यह
पंथ कुलकामिनीयों के कटाक्षों का पंथ है, जो थोड़े से क्रीडाविलास का
व्यसनी होने पर भी निन्दनीय नहीं माना जाता । यह गणिकाओं का
विषय नहीं है । भाव यह है कि काव्य का रस, रसिक सहृदय पंडितों द्वारा
ही संवेद्य होता है । उसकी एक मर्यादित, सुनिश्चित योजना है, कुलकामिनीयों
के मर्यादित कटाक्ष-विलास के समान । वह काव्य जिस तिसके प्रति किये
गये वारवनिताओं के कटाक्ष की भाँति नहीं होता ।
राजा क्रीडाचन्द्राय विंशतिगजेन्द्रान्ग्रामपञ्चकं च ददौ । ततो
राजानं कविः स्तौति—
'कङ्कणं नयनद्वन्द्वे तिलकं करपल्लवे ।
अहो भूषणवैचित्र्यं भोजप्रत्यर्थियोषिताम्' ॥ १२३ ॥
तुष्टो राजा पुनरक्षरं लक्षं ददौ ।
राजा ने क्रीडाचंद्र को बीस हाथी और पाँच गाँव दिये । तब कविने
राजा की प्रशंसा की—
भोज के शत्रुओं की स्त्रियों के आभूषण पहिनने की रीति अनोखी है—
दोनों नेत्रों में उन्होंने कंगन पहिने हैं (आंसू) और करपल्लवों में तिलक
(मृतपतियों के तर्पण के निमित्त तिल) । भावार्थ यह कि शत्रु-स्त्रियाँ
आँखों में आँसू भरे हाथ में तिल लेकर मृतपतियों का तर्पण कर रही हैं ।
ये आंसू नेत्रों के कंगन हैं और हाथ के तिल तिलक ।
संतुष्ट होकर राजाने पुनः प्रत्यक्षर लाख मुद्राएँ दीं ।
--:०:--
६--रामेश्वरकवेरन्यसभाकवीनाञ्च सत्कारः
ततः कदाचित्कोऽपि जराजीर्णसर्वाङ्गसन्धिः पण्डितो रामेश्वर-
नामा सभामभ्यगात् । स चाह—
भोजप्रबन्धः ५५
पञ्चाननस्य सुकवेर्गजमांसैर्नृपश्रिया ।
पारणा जायते क्वापि सर्वत्रैवोपनासिनः ॥ १२४ ॥
वाहानां पण्डितानां च परेवामपरो जनः ।
कवीन्द्राणां गजेन्द्राणां ग्राहको नृपतिः परः ॥ १२५ ॥
तदनंतर कभी वृद्धावस्थाके कारण जिसके अंगों के सब जोड़ शिथिल
हो चले हैं, ऐसा कोई रामेश्वर नाम का पंडित सभा में पहुँचा और बोला—
सब स्थानों पर उपासे ( भूखे ) रहजानेवाले पंचानन सिंह की
पारणा ( व्रतांत भोजन ) हाथी के मांस से और कविकी पारणा ( तृप्ति )
राज-संपत्ति से होती है ।
घोड़ों और अन्य पंडितों का ग्राहक अन्य जन हो सकता है किन्तु कवि-
राजों और गजराजों का ग्राहक राजा ही होता है ।
एवं हि—
सुवर्णैः पट्टचैलैश्च शोभा स्याद्वारयोषिताम् ।
पराक्रमेण दानेन राजन्ते राजनन्दनाः । १२६ ॥
इत्याकर्ण्य राजा रामेश्वरपण्डिताय सर्वाभरणान्युत्तार्य लक्षद्वयं प्रायच्छत् ।
ततः स्तौति कविः—
भोज त्वत्कीर्तिकान्ताया नभोभालस्थितं महत् ।
कस्तूरीतिलकं राजन्गुणाकर विराजते ॥ १२७ ॥
बुधाग्रे न गुणान्ब्रूयात्साधु वेत्ति यतः स्वयम् ।
मूर्खाग्रेऽपि च न ब्रूयाद्बुधप्रोक्तं न वेत्ति सः ॥ १२८ ॥
तेन चमत्कृताः सर्वे ।
ऐसे ही—स्वर्णाभूषणों और पाटांबरों से वेश्याओं की शोभा होती है;
राजपुत्र तो पराक्रम और दान से सुशोभित होते हैं। यह सुनकर राजाने
रामेश्वर पंडित को उतार कर सारे आभूषण और दो लाख दिये ।
तब कवि ने स्तुति की—हे गुणों के भांडार भोजराज, आपकी कीर्तिरुपी
सुंदरी पत्नी का विशाल तिलक आकाशरूपी माथे पर स्थित हो सुशोभित
हो रहा है अर्थात् आपका यश नभोमंडल तक फैला है ।
५६ भोजप्रबन्धः
बुद्धिमान के संमुख स्वगुण कीर्तन उचित नहीं होता, क्यों कि वह तो
स्वयं भली भाँति जानता ही है। मूर्ख के आगे भी गुणकथन उचित नहीं
क्यों कि वह बुद्धिमान का कहा समझेगा ही नहीं।
उसने सब को चमत्कृत कर दिया ।
रामेश्वरकविः--
'ख्यातिं गमयति सुजनः सुकविर्विदधाति केवलं काव्यम् ।
पुष्णाति कमलमम्भो लक्ष्म्या तु रविर्नियोजयति' ॥ १२६॥
ततस्तुष्टो राजा प्रत्यक्षरं लक्षं ददौ।
कवि रामेश्वर ने सुनाया--
सुकवि तो केवल काव्य रचता है, सज्जन उससे प्रसिद्धि प्राप्त करता है।
जल कमल का केवल पोषण करता है परंतु सूर्य उसे लक्ष्मी (शोभा, विकास)
से युक्त करता है।
तब संतुष्ट राजा ने प्रत्यक्षर एक लाख मुद्राएँ दी।
राजेन्द्रं कविः प्राह्-
'कवित्वं न शृणोत्येव कृपणः कीर्तिवर्जितः ।
नपुंसकः किं कुरुते पुरःस्थितमृगीदृशा' ॥ १३०॥
कविराज भोज से बोला-
यशोहीन कृपण, काव्य सुनता ही नहीं, नपुंसक पुरुष संमुख बैठी मृगनयना
के साथ क्या करता है ?
सीता प्राह—
'हता दैवेन कवयो वराकास्ते गजा अपि ।
शोभा न जायते तेषां मण्डलेन्द्रगृहं विना' ॥ १३१ ॥
सीता ने कहा--
भाग्य ने उन बेचारे कवियों और हाथियों को भी मार डाला (जिन्हे
राजाश्रय नहीं मिला) । मंडलाधीश के घर को छोड़ उनकी शोभा
नहीं होती।
कालिदासः--
'अदातृमानसं क्वापि न स्पृशन्ति कवेर्गिरः ।
दुःखायैवातिवृद्धस्य विलासास्तरुणीकृताः' ॥ १३२॥
भोजप्रबन्धः ५७
कालिदास--कवि की वाणी: ( कविता ) न देनेवाले दाता के मन को
छू भी नहीं पाती है। तरुणी के द्वारा किये गए विलास बहुत बूढ़े पुरुष को
दुःख ही देते हैं।
राजा प्रतिपण्डितं लक्षं दत्तवान् ।
राजा ने प्रत्येक पंडित को लाख-लाख मुद्राएँ दीं।
--:o:--
१०--कालिदासस्य कलङ्कनिवारणम्,
ततः कदाचिद्राजा समस्तादपि कविमण्डलादधिकं कालिदासमव-
लोक्यायान्तं परं वेश्यालोलत्वेन चेतसि खेदत्वं चक्रे । तदा सीता
विद्वद्वृन्दवन्दिता तदभिप्रायं ज्ञात्वा प्राह--'देव'
दोषमपि गुणवति जने दृष्ट्वा गुणरागिणो न खिद्यन्ते ।
प्रीत्यैव शशिनि पतितं पश्यति लोकः कलङ्कमपि ॥ १३३ ॥
तुष्टो राजा सीतायै लक्षं ददौ ।
तदनंतर कभी राजा ने संपूर्ण कविमंडली से भी अधिक महत्त्व शाली
कालिदास को आता देखकर परन्तु मन में उनकी वेश्यालोलुपता विचारकर
थोड़ी-सी खिन्नता का अनुभव किया। तब विद्वज्जनद्वारा वंदिता सीता ने
राजा का अभिप्राय समझ कर कहा--
गुणानुरागी मनुष्य गुणवान व्यक्ति में दोष भी देख कर खिन्न
नहीं होते, संसार चंद्रमा में लगे कलंक को उसके प्रति प्रीति के कारण ही
देख लेता है।
तब संतुष्ट हो राजा ने सीता को लाख लिये ।
तथापि कालिदासं यथापूर्वं न मानयति यदा, तदा स च कालि-
दासो राज्ञोऽभिप्रायं विदित्वा तुलामिषेण प्राह-
'प्राप्य प्रमाणपदवीं को नामास्ते तुलेऽवलेपस्ते ।
नयसि गरिष्ठमधस्तात्तदितरमुच्चैस्तरांकुरुषे' ॥ १३४ ॥
तो भी राजा पहिले के समान कालिदास का संमान नहीं करता यह
बात समझ कर कालिदास ने तुला ( तराजू ) के व्याज से कहा--
५८ भोजप्रबन्धः
हे तुले, प्रमाण का पद ( छोटा-बड़ा बताने का काम, मूल्यांकन ) को
प्राप्त करके यह तेरी कैसी उद्धतता है कि तू भारी ( गौरवास्पद ) को नीचे
ले जाती है ( निम्न घोषित करती है ) और हल्के ( सारहीन ) को ऊपर
( संमाननीय ) उठा देती है ।
पुनराह--
'यस्यास्ति सर्वत्र गतिः स कस्मात्स्वदेशरागेण हि याति खेदम् ।
तातस्य कूपोऽयमिति ब्रुवाणाः क्षारं जलं कापुरुषाः पिबन्ति' ॥१३५॥
फिर कहा--जिसकी गति सर्वत्र समान है ( जो सब स्थानों में मान
पाने योग्य है ), वह स्वदेश-प्रेम के कारण क्यों कष्ट उठाये ? 'यह पिता का
कुआ है--' ऐसा विचार कर कायर जन ही खारा जल पिया करते हैं।
ततो राज्ञा कृतामवज्ञां मनसि विदित्वा कालिदासो दुर्मना निज-
वेश्म ययौ।
अवज्ञास्फुटितं प्रेम समीकर्तुं क ईश्वरः ।
सन्धिं न याति स्फुटितं लाक्षालेपेन मौक्तिकम् ॥ १३६ ॥
तदनंतर राजा द्वारा की गयी अवज्ञा ( अवहेलना ) को मन ही मन
समझ दुःखी कालिदास अपने घर चला गया ।
अवहेलना से भग्न प्रेम को जोड़ने में कौन समर्थ होता है ? टूटा मोती
लाख लगाने से नहीं जुड़ता ।
ततो राजापि खिन्नः स्थितः । ततो लीलावती खिन्नं दृष्ट्वा राजानं
विषादकारणमपृच्छत् । राजा च रहसि सर्वं तस्यै प्राह। सा च राजमुखेन
कालिदासावज्ञां ज्ञात्वा पुनः प्राह--'देव प्राणनाथ, सर्वज्ञोऽसि ।
स्नेहो हि वरमघटितो न वरं सञ्जातविघटितस्नेहः ।
हतनयनो हि त्रिपादी न विषादी भवति (१)जात्यन्धः ॥१३७॥
तब राजा भी खिन्न रहने लगा। तदनन्तर राजा को खिन्न देखकर रानी
लीलावती ने विषाद का कारण पूछा । एकांत में राजा ने उसे सब कुछ बताया ।
राजा के मुख से कालिदास की अवहेलना हुई जानकर उसने फिर कहा--
'देव. प्राणनाथ, आप सर्वज्ञ हैं।
( १ ) जन्मान्ध इति यावत् ।
प्रेम यदि उत्पन्न ही न हो तो अच्छा है परन्तु उत्पन्न होकर टूटा स्नेह
अच्छा नहीं। जिसकी आँखें न रहे, दुःखी वही होता है, जो जन्मान्ध है,
वह नहीं।
परन्तु कालिदासः कोऽपि भारत्याः पुरुषावतारः । तत्सर्वभावेन सम्मान-
यैनं विद्वद्भिः । पश्य—
दोषाकरोऽपि कुटिलोऽपि कलङ्कितोऽपि
मित्रावसानसमये विहितोद्योऽपि ।
चन्द्रस्तथापि हरव (१)ल्लभतामुपैति
नैवाश्रितेषु गुणदोषविचारणा स्यात् ॥ १३८ ॥
परंतु कालिदास तो वाग्देवता का नर रूप में एक अवतार है। तो
उसका सब विद्वानों से अधिक सम्मान कीजिए। देखिए--, दोषा रात्रि का
करने वाला इस प्रकार ) दोषों का भांडार होने पर भी, वक्र होने पर भी,
कलंक युक्त होने पर भी और मित्र (सूर्य) के अस्त होने के समय स्वयम्
उदित होने वाला होकर भी (मित्र की अवनति से स्वम् उन्नति कर लेने के
दोष से युक्त होकर भी) चंद्रमा ने शिव के प्रेम को प्राप्त कर लिया है।
(इससे सिद्ध है) आश्रित जनों के गुण-दोष का विचार नहीं किया जाता।
राजा-प्रिये, सर्वमेतत्सत्यमेव' इत्यङ्गीकृत्य 'श्वः कालिदासं प्रातरेव
सन्तोषयिष्यामि' इत्यवोचत् ।
अन्येद्यु राजा दन्तधावनादिविधिं विधाय निर्वार्तितनित्यकृत्यः सभां
प्राप । पण्डिताः कवयश्च गायका अन्ये प्रकृतयश्च सर्वे समाजग्मुः ।
कालिदासमेकमनागतं वीक्ष्य राजा स्वसेवकमेकं तदाकारणाय
वेश्यागृहं प्रेषयामास ।
राजा ने स्वीकारा और कहा—'प्रिये, यह सब सत्य है। कल सबेरे
ही कालिदास को संतुष्ट करूँगा।'
दूसरे दिन दतुअन आदि करके नित्य कर्म से निपट राजा सभा में
पहुँचा। पंडित, कवि, गायक और अन्य सब सामंत-सभासद आ गये। एक
(१) महेशनुरागतामित्यर्थः ।
६० भोजप्रबन्धः
कालिदास को न आया देख राजा ने उसे बुला लाने के लिए अपने सेवकों
में से एक को वेश्या के घर भेजा।
स च गत्वा कालिदासं नत्वा प्राह--'कवीन्द्र, त्वामाकारयति
भोजनरेन्द्रः' इति । ततः कविर्व्यचिन्तयत्--'गतेऽह्नि नृपेणावमा-
नितोऽहमद्य प्रातरेवाकारणे किं कारणमिति ।
यं यं नृपोऽनुरागेण सम्मानयति संसदि ।
तस्य तस्योत्सारणाय यतन्ते राजवल्लभाः ॥ १३९ ॥
वह पहुँच कर और कालिदास को प्रणाम करके बोला--'कविराज,
राजा भोज आपको बुलाते हैं।' तब कवि ने विचारा--'कल राजा ने मुझे
अवमानित किया था, आज प्रातः काल ही बुलाने में क्या कारण है ?
राजा सभा में प्रेम पूर्वक जिस-जिसका संमान करता है, राजा के प्रेम
पात्र व्यक्ति उसी को उखाड़ने का प्रयत्न करते हैं।
किन्तु विशेषतो राज्ञान्वहं मान्यमाने मयि मायाविनो मत्सराद्वैरं
बोधयन्ति ।
अविवेकमतिर्नृपतिर्मन्त्री गुणवत्सु वक्रितग्रीवः ।
यत्र खलाश्च प्रबलास्तत्र कथं सज्जनावसरः ॥ १४० ॥
इति विचारयन्सभामागच्छत् ।
परंतु, प्रतिदिन राजा के द्वारा मेरा विशेष रूप से सम्मान होने पर
मायावी लोग मेरे साथ ईर्ष्या और वैर मानते हैं।
जहाँ अविवेकी (कर्तव्य-बोध-रहित) राजा हो, गुणवानों पर टेढ़ी
गरदन किये रहनेवाला (अप्रसन्न) मंत्री हो और जहाँ दुष्ट जन बलवान्
पड़ते हों, वहाँ भले व्यक्तियों को अवसर कहाँ ?
ऐसा विचार करता हुआ सभा में पहुँचा।
ततो दूरे समायान्तं वीक्ष्य सानन्दमासनादुत्थाय 'सुकवे, मत्प्रिय-
तम, अद्य कथं विलम्बः क्रियते' इति भाषमाणः पञ्चषट्पदानि सम्मुखो
गच्छति ततो निखिलाऽपि सभा स्वासनादुत्थिता । सर्वे सभासदश्च
चमत्कृताः। वैरिणश्चास्य विच्छायवदना बभूवुः। ततो राजा निजकर-
भोजप्रबन्धः ६१
कमलेनास्य करकमलमवलम्ब्य स्वासनदेशं प्राप्य तं च सिंहासनमुपवेश्य
स्वयं च तदाज्ञया तत्रैवोपविष्टः ।
तब दूर पर ही उसे आता देख कर आनन्दित हो आसन से उठ कर
राजा यह कहता हुआ कि हे सुकवे, मेरे प्रियतम, आज क्यों विलंब किया—
'पाँच-छः डग आगे बढ़ आया । तब संपूर्ण सभा अपने आसन से उठ खड़ी
हुई । सब सभासद् चमत्कृत हो गये । वैरी जन के मुँह उतर गये । तब
राजा अपने कर कमल से उसके करकमल को पकड़ कर अपने आसन स्थान
पर पहुँचा और अपने सिंहासन पर उसे बैठा कर स्वयम् उसकी आज्ञा से
वहीं बैठ गया ।
ततो राजसिंहासनारूढे कालिदासे बाणकविर्दक्षिणां बाहुमुद्धृत्य प्राह—
'भोजः कलाविद्रुद्रो वा कालिदासस्य माननात् ।
विबुधेषु कृतो राजा येन दोषाकरोऽप्यसौ' ॥ १४१ ॥
ततोऽस्य विशेषेण विद्वद्भिः सह वैरानलः प्रदीप्तः ।
तत्पश्चात् कालिदास के राज सिंहासन पर बैठ जाने पर बाण कवि ने
दाहिनी भुजा उठा कर कहा—
कालिदास का मान करने में कला मर्मज्ञ यह राजा भोज है अथवा रुद्र शिव
कि इसने दोषाकर ( रात्रि का करने वाला ) चन्द्रमा के समान दोषाकर
( दोषों के आगार ) इस कालिदास को विद्वानों में राजा बना दिया । तो
इस कारण विद्वानों के साथ कालिदास की वैराग्नि और भी दीप्त हो गयी ।
ततः कैश्चिद्बुद्धिमद्भिर्मन्त्रयित्वा सर्वैरपि विद्वद्भिर्भोजस्य ताम्बूल-
वाहिनी दासी धनकनकादिना सम्मानिता । ते च तां प्रत्युपायमूचुः—
'सुभगे, अस्मत्कीर्तिमसौ कालिदासो गलयति । अस्मासु कोऽपि नैतेन
कलासाम्यं प्रवहते । वत्से, यथैनं राजा देशान्तरं निःसारयति तद्भवत्या
कर्तव्यम्' इति । दासी प्राह—'भवद्भ्यो हारं प्राप्य मया युष्मत्कार्यं
क्रियते । तन्मम प्रथमं हारो दातव्यः' इति । ततः सा ताम्बूलवाहिनी
तैर्दत्तं हारमादाय व्यचिन्तयत् । तथा हि—'बुद्धेरसाध्यं किं वास्ति ।'
तत्पश्चात् कुछ बुद्धिमानों ने सलाह करके सभी विद्वानों द्वारा भोज की
तांबूल वाहिका दासी का, धन मान और सुवर्ण आदि देकर संमान कराया ।
६२ भोजप्रबन्धः
और फिर उन्होंने उसे उपाय बताया—'हे सुभगे, यह कालिदास हमारे यश
को गला रहा है। हममें कोई कला के क्षेत्र में इसके समान नहीं है। सो
बच्ची, तुम ऐसा करो कि राजा इसे इस देश से दूसरे देश को निकाल दे।' दासी
बोली—'आप लोगों से हार पाकर मेरे द्वारा आपका काम हो सकता है।
सो पहिले मुझे हार दीजिए।' तदनन्तर उनके द्वारा दिया हार पाकर वह
पानवाली दासी विचार करने लगी कि—'विद्वानों द्वारा असाध्य क्या है?'
(विद्वान् क्या नहीं कर सकते ? )
ततः सन्नतिक्रामत्सु कतिपयवासरेषु दैवादेकाकिनि प्रसुप्ते राजनि
चरणसंवाहनादिसेवामस्य विधाय तत्रैव कपटेन नेत्रे निमील्य सुप्ता।
ततश्चरणचलनेन राजानमीषज्जागरूकं सम्यग्ज्ञात्वा प्राह—'सखि मदन-
मालिनि, सादुरात्मा कालिदासो दासीवेषेणान्तः पुरं प्राप्य लीलादेव्या
सह रमते।
तदनन्तर कुछ दिन बीतने पर भाग्य वश जब राजा अकेला सो गया तो
राजा के पैर दबाने आदि सेवा करके तांबूल वाहिका दासी वहीं कपट पूर्वक
नेत्र बन्द करके (नींद का बहाना करती) लेट गयी। तत्पश्चात् पैरों के
इधर उधर डुलाने से राजा को थोड़ा जागा हुआ भली भाँति समझ कर
(सोते-सोते जैसे) कहने लगी—'सखी मदनमालिनी, वह दुष्टात्मा कालिदास
दासी के वेष में रनिवास में प्रविष्ट होकर लीला देवी के साथ रमण
करता है।'
राजा तच्छ्रुत्वोत्थाय प्राह—'तरङ्गवति, किं जागर्षि' इति। सा च
निद्राव्याकुलेव न शृणोति। राजा च तस्या अपध्वनिं श्रुत्वा व्यचिन्त-
यन्—'इयं तरङ्गवती निद्रायां स्वप्नवशंगता वासनावशाद्देव्याः दुश्चरितं
प्राह। स च स्त्रीवेषेणान्तःपुरमागच्छतीत्येतदपि सम्भाव्यते। को नाम
स्त्रीचरितं वेद' इति।
राजा यह सुन उठ कर बोला—'तरङ्गवती, क्या जाग रही है?' उसने-
जैसे कि वह नींद में बेसुध हो, ऐसी स्थिति प्रकट करते हुए—सुना ही नहीं।
राजा ने उसकी बर्राहट सुनकर सोचा—'नींद में सपना देखते हुए अवचेतना
के वश इस तरंगवती ने रानी के दुश्चरित्र को कह दिया है। वह (कालिदास)
भोजप्रबन्धः ६३
भी स्त्री वेष में अन्तःपुर में आता हो, यह भी संभव है । स्त्री चरित्र को कौन
जानता है ?'
ततश्चेत्थं विचार्य राजा परेद्युः प्रातरात्मनि कृत्रिमज्वरं विधाय
शयानः कालिदासं दासीमुखेनानाय्य तदागमनानन्तरं तथैव लीला-
देवीं चानाय्य देवीं प्रत्यवदत्—'प्रिये, इदानीमेव मया पथ्यं भोक्तव्यम्'
इति । इत्युक्ते सापि 'तथैव' इति पथ्यं गृहीत्वा राज्ञे रजतपात्रे दत्त्वा
तत्र मुद्गदालीं प्रत्यवेषयत् ।
तत्पश्चात् ऐसा विचार कर दूसरे दिन प्रातः कपटज्वर का बहाना करके
लेटे राजा ने दासी द्वारा कालिदास को बुलवा लिया और तत्पश्चात् उसी
दासी द्वारा लीला देवी को बुलवा कर देवी से कहा—'प्रिये, इस समय मैं
पथ्य-भोजन ही करूँगा ।' राजा के ऐसा कहने पर वह भी 'ठीक है'—यह
मान पथ्य लाकर राजा को चांदी पात्र में देकर मूँग की दाल परोसी ।
ततो राजापि तयोरभिप्रायं जिज्ञासमानः श्लोकार्धं प्राह—
'मुद्गदाली गदव्याली कवीन्द्र वितुषा कथम् ।' इति ।
तब उन दोनों (रानी-कालिदास) के विचारों के जानने की आकांक्षा
से राजा ने आधा श्लोक कहा—
'कविराज, रोग के लिए सर्पिणी तुल्य मूँग की दाल भला क्यों छिलका
रहित हुई ?'
ततः कालिदासो देव्यां समीपवर्तिन्यामप्युत्तरार्धं प्राह—
'अन्धवल्लभसंयोगे जाता विगतकञ्चुकी' ॥ १४२ ॥
तब रानी के पास बैठे होने पर भी कालिदास ने श्लोक का उत्तरार्द्ध कह
दिया—'अन्धा प्रिय होने के कारण इसने चोली उतार दी ।'
देवीतच्छ्रुत्वा परिज्ञातार्थस्वरूपा सरस्वतीय तदर्थं विदित्वा स्मेरमुखी
मनागिव वभूव । राजाप्येतद् दृष्ट्वा विचारयामास—'इयं पुरा
कालिदासे स्निह्यति । अनेनैतस्यां समीपवर्तिन्यामपीत्थमभ्यधायि ।
इयं च स्मेरमुखी बभूव । स्त्रीणां चरित्रं को वेद ।
अश्व(१)प्लुतं वासवगर्जितं च स्त्रीणां च चित्तं पुरुषस्य भाग्यम् ।
अवर्षणं चाप्यतिवर्षणां च देवो न जानाति कुतो मनुष्यः ॥ १४३ ॥
(१) अश्वधावनम् ।
६४ भोजप्रबन्धः
रानी उसे सुन अर्थ के स्वरूप को जानने वाली सरस्वती के समान उसका
अर्थ समझ कर किंचित् मुस्कुरा दी । राजा ने यह देख कर सोचा-‘यह पहिले
से कालिदास से प्रेम करता है; इसीसे इस ( कालिदास ) ने इस ( रानी )
के निकट रहने पर भी इस प्रकार कह डाला । और यह मुस्कुरा दी । स्त्री
चरित्र कौन जानता है ?
घोड़े की कुदान, वासव ( धनिष्ठा नक्षत्र ) की गरज, स्त्रियों का चित्त,
पुरुष का भाग्य, अवृष्टि और अतिवृष्टि—इनको देव नहीं जानता, मनुष्य की
तो गिनती क्या ?
किन्त्वयं ब्राह्मणो दारुणापराधित्वेऽपि न हन्तव्य इति विशेषेण
सरस्वत्याः पुरुषावतारः' इति विचार्य कालिदासं प्राह—'कवे, सर्वथा-
स्मद्देशे न स्थातव्यम् । किं बहुनोक्तेन । प्रतिवाक्यं किमपि न
वक्तव्यम् ।
परन्तु कठोर अपराधी होने पर भी इस ब्राह्मण; विशेषतया सरस्वती के
पुरुषावतार की हत्या उचित नहीं है, ऐसा विचार कर राजा ने कालिदास से
कहा—'कवि, हमारे देश में एक क्षण मत ठहरो । अधिक कहने से क्या ?
कोई प्रत्युत्तर मत दो।'
ततः कालिदासोऽपि वेगेनोत्थाय वेश्यागृहमेत्य तां प्रत्याह—'प्रिये,
अनुज्ञां देहि । मयि भोजः कुपितः स्वदेशे न स्थातव्यमित्युवाच । अहह—
अघटितघटितं घटयति सुघटितघटितानि दुर्घटीकुरुते ।
विधिरैव तानि घटयति तानि पुमान्नैष चिन्त्यति ॥ १४४ ॥
किं च किमपि विद्वद्वृन्दचेष्टितमेवेति प्रतिभाति ।
तत्पश्चात् कालिदास भी तुरन्त उठ कर वेश्या के घर पहुँच उससे बोला-
'प्रिये, अनुमति दो । क्रुद्ध होकर भोज ने स्वदेश में न रहने की आज्ञा दी है।'
अहा—
जो घटना न हो सके, उसे घटा देता है और जो सरलता से घट सकती
है, उसे दुर्घट बना देता है। जिन्हें पुरुष सोचता भी नहीं, विधाता उन्हें
घटित कर देता है ।
किंतु यह विद्वन्मंडली ने ही कुछ किया है—ऐसा प्रतीत होता है ।
तथा हि—
बहूनामल्पसाराणां समवायो ( १ ) दुरत्ययः ।
तृणैर्विधीयते रज्जुर्बध्यन्ते तेन दन्तिनः ॥ १४५ ॥
और—अल्प बल वाले बहुतों का संगठित होना कठिनता से वश में आ
सकने वाला बन जाता है । रस्सी तिनकों से बनायी जाती है किंतु उससे दंतैल
हाथी बांध लिये जाते हैं ।
ततो विलासवती नाम वेश्या तं प्राह—
तद्देवांस्य परं मित्रं यत्र सङ्क्रामति द्वयम् ।
दृष्टे सुखं च दुःखं च प्रतिच्छायेव दर्पणे ॥
दयित, मयि विद्यमानायां किं ते राज्ञा, किं वा राजदत्तेन वित्तेन
कार्यम् । सुखेन निःशङ्कं तिष्ठ मद्गृहान्तः कुहरे' इति । ततः कालि-
दासस्तत्रैव वसन्कतिपयदिनानि गमयामास ।
तब विलासवती नाम की वेश्या ने उससे कहा—
'जैसे दर्पण में प्रतिविम्ब संक्रामित हो जाता है, वैसे ही सुख और दुःख—
दोनों जिसमें संक्रामित हो जायें, वही सबसे बड़ा मित्र होता है । ( मित्र सुख-
दुःख—दोनों का समान अनुभव करने वाला ही होता है । )
स्वामी, मेरे रहते क्या काम तुम्हें राजा से और क्या लेना तुम्हें राजा के
धन से ? मेरे घर के गुप्त आगार में सुख पूर्वक शंका त्याग कर रहो ।'
सो वहीं रहते कालिदास ने कुछ दिन बिता दिये ।
ततः कालिदासे गृहान्निर्गते राजानं लीलादेवी प्राह—'देव, कालि-
दासकविना साकं नितान्तं निविडतमा मैत्री । तदिदानीमनुचितं
कस्मात्कृतं यस्य देशेऽप्यवस्थानं निषिद्धम् ।
इक्षोरग्रात्क्रमशः पर्वणि पर्वणि यथा रसविशेषः ।
तद्वत्सज्जनमैत्री विपरीतानां च विपरीता ॥ १४७ ॥
शोकारातिपरित्राणं प्रीतिविस्रम्भभाजनम् ।
केन रत्नमिदं सृष्टं मित्रमित्यक्षरद्वयम् ॥ १४८ ॥
( १ ) अत्येतुमशक्यः ।
५ भोज०
६६ भोजप्रबन्धः
तदनन्तर कालिदास के घर से चले जाने पर राजा से लीला देवी ने कहा-
'महाराज, कालिदास के साथ आपकी बहुत घनी मित्रता है। सो इस सम
किस लिए उसका देश में रहना भी आपने अनुचित रूप से निषिद्ध कर दिया
जैसे गन्ने की फुलची ( ऊपरी भाग ) से क्रमशः नीचे के पोरों में र
( मिठास ) बढ़ता जाता है, वैसे ही सज्जनों की मित्रता क्षण-क्षण बढ़
जाती है और सज्जनों के विपरीत, जो दुर्जन हैं, उनकी इससे विपरी
घटती है।
शोक रूपी शत्रु से त्राण दिलाने वाले, प्रेम और विश्वास के पात्र दो अक्ष
के रत्न 'मित्र' की सृष्टि किसने की है ?'
राजाप्येतल्लीलादेवीवचनमाकर्ण्य प्राह - 'देवि, केनापि ममेत्यभि
धायि यत्कालिदासो दासीवेषेणान्तःपुरमासाद्य देव्या सह रमते' इति
मया चैतद्व्यापारजिज्ञासया कपटज्वरेणायं भवती च वीक्षितौ । तत
समीपवर्तिन्यामपि त्वय्युत्तरार्धमित्थं प्राह। तच्चाकर्ण्य त्वयापि कृतं
हासः। ततश्च सर्वमेतद्दृष्ट्वा ब्राह्मणहननभीरुणा मया देशान्निःसा
रितः। त्वां च न दाक्षिण्येन हन्मि' इति ।
लीलादेवी के ऐसे वचन सुनकर राजा ने भी कहा-'रानी किसी ने मुझ
यह कहा कि कालिदास दासी वेष में रनिवास में पहुँचकर रानी के साथ रम
करता है। मैंने इस बात को जानने की आकांक्षा से ज्वर का बहाना कर
उसे और आपको देखा। तब तुम्हारे निकट में उपस्थित रहने पर भी उस
ऐसा श्लोक का उत्तरार्द्ध पढ़ा। और उसे सुनकर तुम भी मुस्कुरा दीं। त
यह सब देखकर ब्राह्मण वध के डर से मैंने उसे देश से निकाल दिया, औ
तुम्हें मैं उदारता के कारण नहीं मार रहा हूँ।'
ततो हासपरा देवी चमत्कृता प्राह - 'निःशङ्कं देव, अहमे
धन्या यस्यास्त्वं पतिरीदृशः । यत्त्वया भुक्तशीलाया मम मनः कथमन्तः
गच्छति । यतः सर्वकामिनीभिरपि कान्तोपभोगे स्मर्तव्योऽसि । अहा
देव, त्वं यदि मां सतीमसतीं वा कृत्वा गमिष्यसि, तर्ह्यहं सर्वथा मरिष्ये
इति । ततो राजापि 'प्रिये, सत्यं वदसि' इति । ततः स नृपतिः पुरुषै
रहिमानयामास। तप्तं लोहगोलकं कारयामास। धनुश्च सज्जं चक्रे ।