भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)
Bhoja Prabandha with Hindi Commentary
बल्लाल सेन / पं. जगदीशलाल शास्त्री द्वारा
पृष्ठ 67, कुल 190 में से
संदर्भ में पढ़ें६० भोजप्रबन्धः
कालिदास को न आया देख राजा ने उसे बुला लाने के लिए अपने सेवकों
में से एक को वेश्या के घर भेजा।
स च गत्वा कालिदासं नत्वा प्राह--'कवीन्द्र, त्वामाकारयति
भोजनरेन्द्रः' इति । ततः कविर्व्यचिन्तयत्--'गतेऽह्नि नृपेणावमा-
नितोऽहमद्य प्रातरेवाकारणे किं कारणमिति ।
यं यं नृपोऽनुरागेण सम्मानयति संसदि ।
तस्य तस्योत्सारणाय यतन्ते राजवल्लभाः ॥ १३९ ॥
वह पहुँच कर और कालिदास को प्रणाम करके बोला--'कविराज,
राजा भोज आपको बुलाते हैं।' तब कवि ने विचारा--'कल राजा ने मुझे
अवमानित किया था, आज प्रातः काल ही बुलाने में क्या कारण है ?
राजा सभा में प्रेम पूर्वक जिस-जिसका संमान करता है, राजा के प्रेम
पात्र व्यक्ति उसी को उखाड़ने का प्रयत्न करते हैं।
किन्तु विशेषतो राज्ञान्वहं मान्यमाने मयि मायाविनो मत्सराद्वैरं
बोधयन्ति ।
अविवेकमतिर्नृपतिर्मन्त्री गुणवत्सु वक्रितग्रीवः ।
यत्र खलाश्च प्रबलास्तत्र कथं सज्जनावसरः ॥ १४० ॥
इति विचारयन्सभामागच्छत् ।
परंतु, प्रतिदिन राजा के द्वारा मेरा विशेष रूप से सम्मान होने पर
मायावी लोग मेरे साथ ईर्ष्या और वैर मानते हैं।
जहाँ अविवेकी (कर्तव्य-बोध-रहित) राजा हो, गुणवानों पर टेढ़ी
गरदन किये रहनेवाला (अप्रसन्न) मंत्री हो और जहाँ दुष्ट जन बलवान्
पड़ते हों, वहाँ भले व्यक्तियों को अवसर कहाँ ?
ऐसा विचार करता हुआ सभा में पहुँचा।
ततो दूरे समायान्तं वीक्ष्य सानन्दमासनादुत्थाय 'सुकवे, मत्प्रिय-
तम, अद्य कथं विलम्बः क्रियते' इति भाषमाणः पञ्चषट्पदानि सम्मुखो
गच्छति ततो निखिलाऽपि सभा स्वासनादुत्थिता । सर्वे सभासदश्च
चमत्कृताः। वैरिणश्चास्य विच्छायवदना बभूवुः। ततो राजा निजकर-