भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)
Bhoja Prabandha with Hindi Commentary
बल्लाल सेन / पं. जगदीशलाल शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६४ भोजप्रबन्धः
रानी उसे सुन अर्थ के स्वरूप को जानने वाली सरस्वती के समान उसका
अर्थ समझ कर किंचित् मुस्कुरा दी । राजा ने यह देख कर सोचा-‘यह पहिले
से कालिदास से प्रेम करता है; इसीसे इस ( कालिदास ) ने इस ( रानी )
के निकट रहने पर भी इस प्रकार कह डाला । और यह मुस्कुरा दी । स्त्री
चरित्र कौन जानता है ?
घोड़े की कुदान, वासव ( धनिष्ठा नक्षत्र ) की गरज, स्त्रियों का चित्त,
पुरुष का भाग्य, अवृष्टि और अतिवृष्टि—इनको देव नहीं जानता, मनुष्य की
तो गिनती क्या ?
किन्त्वयं ब्राह्मणो दारुणापराधित्वेऽपि न हन्तव्य इति विशेषेण
सरस्वत्याः पुरुषावतारः' इति विचार्य कालिदासं प्राह—'कवे, सर्वथा-
स्मद्देशे न स्थातव्यम् । किं बहुनोक्तेन । प्रतिवाक्यं किमपि न
वक्तव्यम् ।
परन्तु कठोर अपराधी होने पर भी इस ब्राह्मण; विशेषतया सरस्वती के
पुरुषावतार की हत्या उचित नहीं है, ऐसा विचार कर राजा ने कालिदास से
कहा—'कवि, हमारे देश में एक क्षण मत ठहरो । अधिक कहने से क्या ?
कोई प्रत्युत्तर मत दो।'
ततः कालिदासोऽपि वेगेनोत्थाय वेश्यागृहमेत्य तां प्रत्याह—'प्रिये,
अनुज्ञां देहि । मयि भोजः कुपितः स्वदेशे न स्थातव्यमित्युवाच । अहह—
अघटितघटितं घटयति सुघटितघटितानि दुर्घटीकुरुते ।
विधिरैव तानि घटयति तानि पुमान्नैष चिन्त्यति ॥ १४४ ॥
किं च किमपि विद्वद्वृन्दचेष्टितमेवेति प्रतिभाति ।
तत्पश्चात् कालिदास भी तुरन्त उठ कर वेश्या के घर पहुँच उससे बोला-
'प्रिये, अनुमति दो । क्रुद्ध होकर भोज ने स्वदेश में न रहने की आज्ञा दी है।'
अहा—
जो घटना न हो सके, उसे घटा देता है और जो सरलता से घट सकती
है, उसे दुर्घट बना देता है। जिन्हें पुरुष सोचता भी नहीं, विधाता उन्हें
घटित कर देता है ।
किंतु यह विद्वन्मंडली ने ही कुछ किया है—ऐसा प्रतीत होता है ।