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भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)

भावप्रकाश निघण्टु (हरिताक्यादि वर्ग - हिन्दी व्याख्या सहित)

Bhavaprakasha Nighantu with Hindi Commentary

भावमिश्र द्वारा

स्रोत: चौखम्बा भारती अकादमी · चौखम्बा भारती अकादमी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished143 पृष्ठ

पृष्ठ 18, कुल 143 में से

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पृष्ठ 18

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१८ | भावप्रकाशनिघण्टुः ।


रवेदार क्षाराम ५-९%, पाइपरीडीन ५%, चविसीन नामक कटुरस, एक अन्य हरे रंग की कडुराल
६%, उड़नशील तैल १-२.५%, स्टार्च ३०%, ईथर में घुलनशील न उड़ने वाला पदार्थ ६%,
प्रोटीड ७% तथा लिगनिन, गोंद आदि कुछ अन्य द्रव्य पाये जाते हैं।
**गुण और प्रयोग—**मरिच का प्रयोग अनेक योगों में किया जाता है। यह सुगन्धि, उत्तेजक,
पाचक, अग्निदीपक, रुचिकर, स्वेदकर, कफघ्न एवं कृमिहर है। इसका उत्तेजक प्रभाव आंत्र एवं
मूत्र संस्थान की श्लेष्मल कला पर पड़ता है। इसके सेवन से मूत्र की मात्रा बढ़ती है और इसका
उपयोग पुराने सुजाक में किया जाता है। इसके सेवन से आमाशयिक रस की वृद्धि होती है और
पाचन की क्रिया सुधरती है। घृत के पाचन में यह विशेष उपयोगी है। इसका उपयोग आध्मान,
अपचन, प्रवाहिका, आमाशय शैथिल्य आदि में अच्छा होता है।
(१) प्रवाहिका में इसके सूक्ष्म चूर्ण को हींग एवं अफीम के साथ दिया जाता है।
(२) स्याहजीरा एवं काली मिर्च मधु के साथ नित्य सेवन से गुदा की श्लेष्मकला का
संकोच होकर गुदभ्रंश एवं अर्श में बहुत लाभ होता है।
(३) इसके पाइपरीन नामक क्षार के ज्वरघ्न गुण के कारण इसका उपयोग मलेरिया में
कौनीन के साथ अधिक प्रभावकारी है।
(४) विसूचिका के प्रारम्भ में मरिच, अफीम तथा हींग तीनों समान मात्रा में लेकर २ रत्ती
की मात्रा में प्रत्येक २ या ४ घण्टे के बाद में देने से लाभ होता है।
(५) खांसी में मधु एवं घृत के साथ देने से लाभ होता है।
(६) पुराने जुकाम में इसको गुड़ एवं दही के साथ सेवन करना चाहिये।
अधिक मात्रा में मरिच के सेवन से उदरशूल, वमन, बस्ति एवं मूत्र मार्ग प्रदाह, उदर्द आदि
विकार उत्पन्न होते हैं।
**बाह्य प्रयोग—**अनेक चर्म विकारों में एवं वायु के विकारों में किया जाता है।
(१) इससे सिद्ध तैल की मालिश आमवात, गठिया, अक्षघात एवं कण्डू, पामा आदि में
उपयोगी है।
(२) घृत के साथ इसका लेप अर्श के मस्से पर करने से वाताशंशूल एवं शिथिलता दूर होती है।
(३) फोड़े, फुन्सियों की आमावस्था में उनको बैठाने के लिए उन पर इसको पीस कर लगाया
जाता है।
(४) विषैले कीड़ों के काटने पर विनेगार (सिरका) के साथ इसको पीस कर लगाना चाहिये।
(५) दही के साथ घिसकर इसके अञ्जन से अनेक नेत्र रोग जैसे रात्र्यंध, कण्डू आदि में
लाभ होता है।
(६) सर की दद्रु के कारण यदि सर के बाल झड़ गये हों तो इसे प्याज और नमक के साथ
लगाने से लाभ होता है। इसी प्रकार इसका लेप शिरःशूल में भी उपयोगी है।
(७) इसके क्वाथ से कुल्ला करने से दंतशूल दूर होता है एवं बढ़ी हुई उपजिह्वा में भी लाभ होता है।
(८) इसका दंतमंजनों में भी व्यवहार होता है।
**मात्रा—**चूर्ण २-४ रत्ती।
**श्वेत मरिच—**काली मरिच के समान ही गुण वाली लेकिन उससे कुछ हीन गुण होती है।
इसका एक विशेष प्रयोग श्लीपद में शोथ के साथ बार २ ज्वर के आक्रमण को रोकने के लिए
किया जाता है। बचनाग एक भाग और सफेद मरीच १५ भाग दूध में भिगोया जाता है। रोज


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हरीतक्यादिवर्गः । | १६


दूध बदल दिया जाता है। इस प्रकार ३ दिन करने के बाद आदी के रस में घोंटकर १२० की
गोली बनाई जाती है। इसकी १ गोली दिन में ३ बार दी जाती है।

अथ त्रिकटुकनामलक्षणगुणानाह

विश्वोपकुल्या मरिचं त्रयं त्रिकटु कथ्यते। कटुत्रिकं तु त्रिकटु व्यूषणं व्योष उच्यते ॥६२॥
व्यूषणं दीपनं हन्ति श्वासकासत्वगामयान् । गुल्ममेहकफस्थौल्यमेदःश्लीपदपीनसान् ॥ ६३॥
त्रिकटु के लक्षण, नाम तथा गुण—सोंठ, पीपर तथा मरिच इन तीनों के योग को 'त्रिकटु'
कहते हैं। कटुत्रिक, त्रिकटु, व्यूषण और व्योष ये संस्कृत नाम 'त्रिकटु' के हैं। त्रिकटु-अग्निदीपक
होता है तथा श्वास, कास, चर्मसम्बन्धी रोग, गुल्म, मेह, कफ, स्थूलता, मेद, श्लीपद और पीनस
इन सब रोगों को दूर करता है ॥ ६२-६३ ॥

अथ पिप्पलीमूलस्य नामानि गुणाँश्चाह

ग्रन्थिकं पिप्पलीमूलमूषणं चटकांशिरः । दीपनं पिप्पलीमूलं कटूष्णं पाचनं लघु ॥ ६४ ॥
रूक्षं पित्तकरं भेदि कफवातोदरापहम् । आनाहप्लीहगुल्मघ्नं कृमिश्वासक्षयापहम् ॥ ६५ ॥
पिपरामूल के नाम तथा गुण—ग्रन्थिक, पिप्पलीमूल, ऊषण और चटकाशिर ये संस्कृत
नाम 'पिपरामूल' के हैं। पिपरामूल-अग्निदीपक, कटुरस वाला, उष्णवीर्य, पाचक, लघु, रूक्ष,
पित्तकारक, मल को भेदन करने वाला, कफ, वायु एवम् उदर सम्बन्धी रोगों को दूर करने
वाला होता है। तथा आनाह, प्लीहा, गुल्म, कृमि, श्वास और क्षय इन सब रोगों को नष्ट करने
वाला होता है ॥ ६४-६५ ॥

८ पिपलामूल

हि०- पीपलामूल, पीपरामूल । ब०- पिपुल मूल । म०- पिंपली मूल, पिंपलमूल, पिंपला मूल ।
गु०- पीपरी मूलना गंडोडा, पांपली मूल, पीपरी मूल । क०- पिप्पलीयवेरु, हिप्पलीयवेरु, हिप्पली
मूल । ते०- मोंडी, पिप्पली वेरु, पिप्ली दुम्प । पं०- पिप्पला मूल । मा०- पीपला मूल । ता०-
पिप्पली मूल । फा०- फिलुफिल्दवे, फिलिफिल् मूहह । अ०- फिलफिलादराज, फिलफिले मोया ।
अं०- Piper root (पाइपर रूट) । लै०- Root of the Piper longum Linn. (रूट ऑफ़
दी पाइपर लॉङ्गम) ।
पीपल लता की गांठदार जड़ को पीपलामूल कहते हैं। इसको जगह कितने पंसारी पीपल लता
की मोटी शाखाओं को छोटे-छोटे टुकड़े कर बेचते हैं। इसलिये अच्छी तरह देख भाल कर
खरीदना चाहिये ।
**गुण और प्रयोग—**पीपला मूल पीपल के ही समान लेकिन कम गुण वाला है। यह पीपल
से अधिक उत्तेजक है। डाक्टर देसाई के मतानुसार प्रसव होने में अधिक समय लग रहा हो तो
पीपरामूल, ईश्वर मूल और हींग, पान के साथ खिलाना चाहिये जिससे पीड़ा बढ़कर प्रसव हो
जाता है। प्रसव के पश्चात तुरत इसका फांट देने से आवल (अपरा) गिरने में सहायता होती है।

अथ चतुरुषणस्य लक्षणगुणानाह

व्यूषणं सकणामूलं कथितं चतुरुषणम् । व्योषस्येव गुणाः प्रोक्ता अधिकाश्चतुरुषणे ॥ ६६ ॥
चतुरुषण के लक्षण, नाम तथा गुण—त्रिकटु (सोंठ, पीपर, मरिच) में यदि पिपरामूल
मिला दिया जाय तो इसे चतुरुषण कहते हैं। पहले जितने गुण त्रिकटु के कह आये हैं, वही सब
गुण चतुरुषण में अधिक रूप से रहते हैं ॥ ६६ ॥