भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
९३४ भावप्रकाशनिघण्टुः
अथ नवपुराणमदिरागुणानाह
मद्यं नवमभिष्यन्दि त्रिदोषजनकं सरम्। अहृद्यं बृंहणं दाहि दुर्गन्धं विशदं गुरु।।३०।।
जीर्णं तदेव रोचिष्णु क्रिमिश्लेष्मानिलापहम्। हृद्यंसुगन्धिगुणवल्लघु स्रोतोविशोधनम्।।३१।।
**नई मदिरा—**अभिष्यन्दी, त्रिदोषजनक, सारक, हृदय के लिये अहितकर, बृंहण, दाह उत्पन्न करने वाली, दुर्गन्ध
तथा विशद गुण युक्त एवम् गुरु होती है।
**पुरानी मदिरा—**रुचि को उत्पन्न करने वाली, हृदय के लिये हितकर, सुगन्ध युक्त, गुणकारक, लघु, स्रोतोमार्ग
का शोधन करने वाली एवम् क्रिमि, कफ तथा वायु को नष्ट करने वाली होती है। [३०-३१]
अथ सात्त्विकादिमनुष्याणां मद्येन जाताश्चेष्टा आह
सात्त्विके गीतहास्यादि राजसे साहसादिकम्। तामसे निन्द्यकर्माणि निन्द्राञ्च मदिराऽऽचरेत् ।।३२।।
सात्त्विकादि मनुष्यों की मद्य से उत्पन्न हुई चेष्टायें—मदिरा सात्त्विक (सत्त्वगुणी) मनुष्यों में पीने से गाना तथा हँसना
आदि कार्यों को कराने लगती है—राजस (रजोगुणी) मनुष्यों में साहस आदि कार्यों को, तामस (तमोगुणी) मनुष्यों में
निन्द्यकर्म तथा निद्रा को कराती है। [३२]
❖ आचरेत् = कुर्यात् ।।३२।।
यहाँ पर "आचरेत्" पद से "कराने लगती है" यह भावार्थ समझना चाहिये। [३२]
अथ मद्यपानप्रकारमाह
विधिना मात्रया काले हितैरन्नैर्यथाबलम्। प्रहृष्टो यः पिबेन्मद्यं तस्य स्यादमृतं यथा ।।३३।।
किन्तु मद्यंस्वभावेन यथैवान्नं तथा स्मृतम्। अयुक्तियुक्तं रोगाय युक्तियुक्तं यथाऽमृतम् ।।३४।।
**मद्य पीने का प्रकार—**जो मनुष्य प्रसन्न होता हुआ, हितकारक अन्नों के साथ, बलानुसार यथासमय, विधिपूर्वक,
मात्रा के साथ मद्य पीता है, तो उसे वह (मद्य) अमृत के समान गुणकारी होता है। क्योंकि—मद्य का स्वभाव जिस प्रकार
अन्न का है ठीक वैसा ही है, जैसे अन्न—अविधिपूर्वक सेवन करने से रोग उत्पन्न करने वाला होता है और विधिपूर्वक
सेवन करने से अमृत के समान गुणकारी होता है वैसे ही मद्य को भी समझना चाहिये। [३३-३४]
अथ मद्यगन्धस्य दूरीकरणोपायमाह
मुस्तैलवालुगदजीरकधान्यकैला यश्चर्वयन्सदसि वाचमभिव्यनक्ति।
स्वाभाविकं मुखजमुज्झति पूतिगन्धं—गन्धञ्च मद्यलशुनादि भवञ्च नूनम् ।।३५।।
**मद्य के गन्ध को दूर करने का उपाय—**नागरमोथा, कूठ, एलवालु जीरा, धनिया और इलायची इन सबको
चबाता हुआ जो मद्य पीने वाला मनुष्य सभा के मध्य में बातचीत करता है, उसके मुख की स्वाभाविक दुर्गन्ध तथा मद्य
एवम् लहशुन आदि से उत्पन्न गन्ध निश्चय दूर हो जाती है। [३५]
इति श्रीमिश्रलटकनतनय श्रीमिश्रभावविरचिते भावप्रकाशे वर्गप्रकरणे
सन्धानवर्गः समाप्तः।
अथ मधुवर्गः
तत्र मधुनो नामगुणानाह
मधु माक्षिकमाध्वीकक्षौद्रसारघमीरितम् । मक्षिकावरटीभृङ्गवान्तं पुष्परसोद्भवम् ॥१॥
मधु शीतं लघु स्वादु रूक्षं ग्राहि विलेखनम् । चक्षुष्यं दीपनं स्वर्यं व्रणशोधनरोपणम् ॥२॥
सौकुमार्यकरं सूक्ष्मं परं स्रोतोविशोधनम् । कषायानुरसं ह्लादि प्रसादजनकं परम् ॥३॥
वर्ण्यं मेधाकरं वृष्यं विशदं हरेत् । कुष्ठार्शःकाशपित्तास्रकफमेहक्लमक्रिमीन् ॥४॥
मेदस्तृष्णावमिश्वासहिक्काऽतीसारविङ्ग्रहान् । दाहक्षतक्षयांस्तत्तुयोगवाह्यल्पवातलम् ॥५॥
मधु (शहद) के संस्कृत नाम—मधु, माक्षिक, माध्वीक, क्षौद्र सारघ, मक्षिकावान्त, वरटी वान्त, भृङ्गवान्त तथा
पुष्परसोद्भव ये सब हैं।
मधु—शीतल, लघु, स्वादिष्ट, रूक्ष, ग्राही, विलेखन, नेत्रों के लिये हितकर, अग्निदीपक, स्वर को उत्तम बनाने
वाला, व्रण का शोधन तथा रोपण करने वाला, सुकुमारता करने वाला, सूक्ष्म (सूक्ष्मस्रोतोगामी), स्रोतोमार्ग का अत्यन्त
शोधन करने वाला, आरम्भ में मधुर अन्त में कषाय रसयुक्त, आह्लादकारक, अत्यन्त प्रसादजनक, वर्ण (शरीर के रंग)
को उत्तम करने वाला, मेधाशक्ति को उत्पन्न करने वाला, वीर्यवर्धक, विशद गुणयुक्त, रोचक, योगवाही (जिसके साथ
इसका योग हो उसके सदृश गुण को करने वाला), थोड़ा वातजनक एवम् कुष्ठ, अर्श, कास, पित्त, रक्तविकार, कफ,
प्रमेह, क्लान्ति, क्रिमि, मेद, तृषा, वमन, श्वास, हिचकी, अतीसार, मलबन्ध, दाह, क्षत और क्षय को नष्ट करने वाला
होता है। [१-५]
अथ मधुभेदानाह
माक्षिकं भ्रामरं क्षौद्रं पौत्तिकं छात्रमित्यपि । आर्घ्यमौद्दालकं दालमित्यष्टौ मधुजातयः ॥६॥
मधु के भेद—(१) माक्षिक, (२) भ्रामर, (३) क्षौद्र, (४) पौत्तिक, (५) छात्र, (६) आर्घ्य, (७) औद्दालक,
(८) दाल, इस प्रकार से ८ मधु की जातियाँ हैं। [६]
अथ तेषां लक्षणं गुणाँश्च ।
तत्र माक्षिकस्य लक्षणगुणानाह
मक्षिकाः पिङ्गवर्णास्तु महत्यो मधुमक्षिकाः । ताभिः कृतं तैलवर्णं माक्षिकं परिकीर्त्तितम् ॥७॥
माक्षिकं मधुषु श्रेष्ठं नेत्रामयहरं लघु । कामलाऽर्शःक्षतश्वासकासक्षयविनाशनम् ॥८॥
पूर्वोक्त भेदों में प्रथम माक्षिकजातीय मधु के लक्षण—पिङ्गल वर्ण वाली जो बड़ी मधुमक्खियाँ होती हैं उनके
द्वारा उत्पन्न किये हुये तेल के समान वर्णवाले मधु को “माक्षिक” कहते हैं।
माक्षिकजातीय मधु—सभी प्रकार के मधुओं में श्रेष्ठ होता है एवम् नेत्र सम्बन्धी रोगों को दूर करने वाला, लघु
तथा कामला, अर्श, क्षत, श्वास, कास और क्षय को नष्ट करने वाला होता है। [७-८]
९३६ भावप्रकाशनिघण्टुः
अथ भ्रामरस्य लक्षणगुणानाह
किञ्चित्सूक्ष्मैः प्रसिद्धेभ्यः षट्पदेभ्योऽलिभिश्चितं । निर्मलं स्फटिकाभं यत्तन्मधु भ्रामरं स्मृतं ।।९।।
भ्रामरं रक्तपित्तघ्नं मूत्रजाड्यकरं गुरु । स्वादुपाकमभिष्यन्दि विशेषात्पिच्छिलं हिमम् ।।१०।।
भ्रामरजातीय मधु के लक्षण-प्रसिद्ध, छ पैरों वाले भौंरों से कुछ छोटे भ्रमरों (भौरों) से संगृहीत, स्फटिक के
समान निर्मल, जो मधु होता है उसे "भ्रामर" कहते हैं ।
भ्रामरजातीय मधु-रक्तपित्तनाशक, मूत्र में जड़ता उत्पन्न करने वाला, गुरु, विपाक में मधुर रस युक्त, अभिष्यन्दी,
विशेष रूप से पिच्छिल और शीतवीर्य होता है । [९-१०]
अथ क्षौद्रस्य लक्षणगुणानाह
माक्षिकाः कपिलाः सूक्ष्माः क्षुद्राऽऽख्यास्तत्कृतं मधु । मुनिभिः क्षौद्रमित्युक्तंतद्वर्णात्कपिलं भवेत् ।।
गुणैर्माक्षिकवत्क्षौद्रं विशेषान्मेहनाशनम् ।।११।।
क्षौद्रजातीय मधु के लक्षण-कपिल वर्ग की सूक्ष्म जो "क्षुद्रा" नामक मधुमक्खियाँ होती हैं उनके द्वारा बनाये
गये कपिल वर्ण के मधु को मुनियों ने "क्षौद्र" कहा है ।
क्षौद्रजातीय मधु-गुणों में पूर्वोक्त माक्षिक जातीय मधु के सदृश होता है और विशेष रूप से प्रमेहनाशक होता
है।।[११]
अथ पौत्तिकमधुनो लक्षणगुणानाह
कृष्णा या मशकोपमा लघुतराः प्रायो महापीड़िका वृक्षाणां पृथुकोटरान्तरगताः पुष्पासव कुर्वते ।
तास्तज्ज्ञैरिह पुत्तिका निगदितास्ताभिः कृतं सर्पिषा तुल्यं यन्मधु तद्वनेचरजनैः संकीर्तितं पौत्तिकम् ।।१२।।
पौत्तिकं मधु रूक्षोष्णं पित्तदाहास्त्रवातकृत् । विदाहि मेहकृच्छ्रघ्नं ग्रन्थ्यादिक्षतशोषि च ।।१३।।
पौत्तिकजातीय मधु के लक्षण-प्रायः करके मच्छरों के समान अत्यन्त छोटी-छोटी काले रंग की, काटने से
अत्यन्त पीड़ा पहुँचाने वाली, वृक्षों के कोटरों (खोढ़रों) में रहने वाली जो मधुमक्खियाँ होती है, जिन्हें उनके जानने वाले
लोग "पुत्तिका" कहते हैं उनके द्वारा संगृहीत, घी के समान जो मधु होता है उसे जंगली कोल, भिल्लादि लोग "पौत्तिक"
कहते हैं ।
पौत्तिकजातीय मधु-रूक्ष, उष्ण, पित्त-दाह-रक्तविकार तथा वात कारक, विदाही, प्रमेह तथा मूत्रकृच्छ्र को नष्ट
करने वाला, एवम्-गाँठ आदि तथा क्षत (घाव) को सुखाने वाला होता है । [१२-१३]
अथ छात्रमधुनो लक्षणं गुणाँश्चाह
वरटाः कपिलाः पीताः प्रायो हिमवतो वने ।।१४।।
कुर्वन्ति छत्रत्राकाकारं तज्जं छात्रं मधु स्मृतम् । छात्रं कपिलपीतं स्यात्पिच्छिलं शीतलं गुरु ।।१५।।
स्वादुपाकं कृमिश्वित्ररक्तपित्तप्रमेहजित् । भ्रमतृण्मोहविषहत्तर्पणञ्च गुणाधिकम् ।।१६।।
छात्रजातीय मधु के लक्षण-प्रायः करके हिमालय पर्वत के जंगलों में कपिल तथा पीत वर्ण की मधुमक्खियाँ
छत्ते के आकार का घर बनाती हैं, अतएव उस छत्र से उत्पन्न हुये मधु को "छात्र" कहते हैं ।
छात्रजातीय मधु-कपिल तथा पीत वर्ण युक्त, पिच्छिल, शीतल, गुरु, विपाक में मधुर रस युक्त,
तृप्तिदायक, अधिक गुणकारी एवम्-कृमि, श्वेत, कुष्ठ, रक्तपित्त, प्रमेह, भ्रम, तृषा, मोह तथा विष को दूर करने वाला
होता । [१४-१६]
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मधुवर्गः ९३७
अथार्घ्यस्य लक्षणगुणानाह
मधूकवृक्षनिर्यासं जरत्कार्वाश्रमोद्भवम्। स्रवत्यार्घ्यं तदाख्यातं श्वेतकं मालवे पुनः ॥१७॥
तीक्ष्णतुण्डास्तु याः पीता मक्षिकाः षट्पदोपमाः । अध्यस्तास्तत्कृतं यत्तदार्घ्यमित्य परे जगुः ॥१८॥
आर्घ्यं मध्वतिचक्षुष्यं कफपित्तहरं परम्। कषायं कटुकं पाके तिक्तञ्च बलपुष्टिकृत् ॥१९॥
आर्घ्यजातीय मधु के लक्षण– “जरत्कारु” ऋषि के आश्रम में उत्पन्न हुये, महुये के वृक्ष से जो गोंद स्रवता
है, उसे “आर्घ्य” कहते हैं तथा मालवा देश में उसी को “श्वेतक” कहते हैं। किन्तु अन्य कोई-कोई आचार्य ऐसा कहते
हैं कि—भौरों के समान आकारवाली, पीले रंग की तथा तीक्ष्ण मुखवाली जो मधुमक्खियाँ होती हैं, उन्हें “अर्घ्या” कहते
हैं और उनसे संगृहीत मधु को “आर्घ्य” कहते हैं।
आर्घ्यजातीय मधु–नेत्रों के लिये अत्यन्त हितकर और विशेष रूप से कफ तथा पित्त को दूर करने वाला, कषाय
तथा तिक्त रस युक्त, विपाक में कटु रस युक्त एवम्-बल तथा पुष्टिकारक होता है। [१७-१९]
अथौद्दालकमधुनो लक्षणगुणानाह
प्रायो वल्मीकमध्यस्थाः कपिलाः स्वल्पकीटकाः । कुर्वन्ति कपिलं स्वल्पं तत्स्यादौद्दालकं मधु ॥२०॥
औद्दालकं रुचिकरं स्वर्यं कुष्ठविषापहम्। कषायमुष्णमम्लञ्च कटुपाकञ्च पित्तकृत् ॥२१॥
औद्दालकजातीय मधु के लक्षण–प्रायः करके वल्मीक (विमवट) के अन्दर रहने वाले, कपिल वर्ण के छोटे-
छोटे कीड़े, जो कपिल वर्ण का थोड़ी मात्रा में मधु बनाते हैं उसी को “औद्दालक” कहते हैं।
औद्दालकजातीय मधु–रुचिकारक, स्वर को उत्तम बनाने वाला, कषाय तथा अम्ल रस युक्त, उष्ण, विपाक में
कटुरसयुक्त एवम् पित्तकारक होता है। [२०-२१]
अथ दालमधुनो लक्षणगुणानाह
संस्रुत्य पतितं पुष्पाद्यत्तु पत्रोपरि स्थितम्। मधुराम्लकषायञ्च तद्दालं मधु कीर्त्तितम् ॥२२॥
दालं मधु लघु प्रोक्तं दीपनीयं कफापहम्। कषायानुरसं रूक्षं रुच्यं छर्दिप्रमेहजित् ॥२३॥
अधिकं मधुरं स्निग्धं बृंहणं गुरु भारिकम् ॥२४॥
दालजातीय मधु के लक्षण–फूलों से टपक करके जो पुष्परस (मधु) पत्तों पर गिरता है और जो मधुर, अम्ल
तथा कषाय रसयुक्त होता है उसे “दाल” कहते हैं।
दालजातीय मधु–(पाक में) लघु, अग्निदीपक, कफनाशक, अधिक मधुररसयुक्त, अन्त में कषाय रसयुक्त, रूक्ष,
रुचिकारक, स्निग्ध गुण युक्त, बृंहण (रस-रक्तादि वर्धक), तौल में गुरु एवम् वमन तथा प्रमेह को दूर करने वाला होता
है। [२२-२४]
❖ लघु पाके । गुरु भारिकं, तुलितम् ॥ २२-२४॥
यहाँ पर मूल में “लघु” पद का “विपाक में लघु” ऐसा अर्थ समझना चाहिये।
और “गुरु भारिकम्” इस पद का “तौल में गुरु” (भारी) यह अर्थ समझना चाहिये।
अथ नवपुराणमधुगुणानाह
नवं मधु भवेत्पुष्ट्यै नातिश्लेष्महरं सरम्। पुराणं ग्राहकं रूक्षं मेदोघ्नमतिलेखनम् ॥२५॥
नया मधु–पुष्टिकारक, कफ को अत्यन्त दूर करने वाला नहीं (किञ्चित् कफनाशक) तथा सारक होता है।
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९३८ भावप्रकाशनिघण्टुः
पुराना मधु-ग्राही, रूक्ष, अत्यन्त लेखन गुण विशिष्ट एवम् मेद को दूर करने वाला होता है। [२५]
अथ परिभाषामाह
मधुनः शर्करायाश्च गुडस्यापि विशेषतः। एकसंवत्सरे वृत्ते पुराणत्वं स्मृतं बुधैः ।।२६।।
परिभाषा-मधु, शक्कर (चीनी) तथा गुड़ इन सबों को एक वर्ष बीत जाने पर पण्डित लोग पुराना कहते हैं।
अर्थात्-एक वर्ष के अन्दर के ये सब नये और बाद एक वर्ष के पुराने कहलाते हैं। [२६]
अथ शीतलोष्णमधुनोर्गुणदोषानाह
विषपुष्पादपि रसं सविषा भ्रमरादयः। गृहीत्वा मधु कुर्वन्ति तच्छीतं गुणवन्मधु ।।२७।।
विषान्वयात्तदुष्णान्तु द्रव्येणोष्णेन वा सह। उष्णार्त्तस्योष्णकाले च स्मृतं विषसमं मधु ।।२८।।
शीतल तथा उष्ण मधु की क्रम से गुणकारिता और दोषकारिता-विषैले भौंरे आदि विष के फूलों से भी
रस लेकर मधु बनाते हैं, अतएव शीतल मधु ही गुणकारी होता है।
और विष के फूलों का सम्बन्ध होने से मधु यदि उष्ण या उष्ण द्रव्यों के साथ वा उष्ण काल में वा गर्मी से दुःखी
रोगियों के लिये प्रयोग किया जाता हो तो विष के समान होता है। [२७-२८]
अथ मधूच्छिष्टम् (मोम) तस्य नामगुणानाह
मयनं तु मधूच्छिष्टं मधुशेषं च सिक्थकम्। मध्वाधारो मदनकं मधूषितमति स्मृतम् ।।२९।।
मदनं मृदु सुस्निग्धं भूतघ्नं व्रणरोपणम्। भग्नसन्धानकृद्वातकुष्ठवीसर्परक्तजित् ।।३०।।
मोम के संस्कृत नाम-मयन, मधूच्छिष्ट, मधुशेष, सिक्थक, मध्वाधार, मदनक तथा मधूषित ये सब हैं।
मोम-मृदु गुण युक्त, अत्यन्त स्निग्ध, भूतग्रहनाशक, व्रण का रोपण करने वाला, टूटे हुये अस्थियों को जोड़ने
वाला एवम्-वात, कुष्ठ, वीसर्प तथा रक्तविकार को दूर करने वाला होता है। [२९-३०]
इति श्रीमिश्रलटकनतनय श्रीमिश्रभावविरचिते भावप्रकाशे वर्गप्रकरणे
मधुवर्गः समाप्तः।
अथ इक्षुवर्गः
तत्रादाविक्षोर्नामगुणानाह
इक्षुर्दीर्घच्छदः प्रोक्तस्तथा भूरिरसोऽपि च। गुडमूलोऽसिपत्रश्च तथा मधुतृणः स्मृतः ॥१॥
ऊख के संस्कृत नाम—इक्षु, दीर्घच्छद, भूरिरस, गूढमूल, असिपत्र तथा मधुतृण ये सब हैं।
सभी प्रकार की ईख—रक्तपित्तनाशक, बलकारक, वीर्यवर्धक, कफजनक, रस तथा विपाक में मधुर, स्निग्ध,
गुरु, मूत्रकारक, एवम् शीतवीर्य होती हैं। [१-२]
हिं०-ईख, गन्ना। अं०-Sugar Cane (सुगर केन)। ले०-Sacharum officinarium (सेक्केरम्
ऑफिसिनेरम्) । Fam. Gramineae (ग्रैमिनी) ।
इसकी खेती भारतवर्ष के सभी उष्ण प्रदेशों में की जाती है। भावप्रकाशकार इसके १३ भेदों का उल्लेख करते
हैं। आजकल भी इसके अनेक कृषित प्रकार पाये जाते हैं।
इसके काण्ड स्वरस, मूल स्वरस तथा शर्करा, राव आदि इक्षुविकारों का उपयोग किया जाता है। अनेक योगों
को टिकाऊ बनाने के लिए शर्करा आदि का उपयोग करते हैं। इसमें शर्करा आदि के अतिरिक्त कैल्शियम ऑक्जेलेट
भी पाया जाता है।
यह मधुर, शीतल, मूत्रल, सारक, बल्य, कण्ठ्य, श्रमहर, शुक्रशोधक तथा वात एवं कफवर्धक है। इसका मूल
शीतल, मूत्रल एवं वृष्य है। यह मधुर होते हुये भी शीतवीर्य होने से वातवर्धक होता है (सुश्रुत)। इसको मूत्रजनन द्रव्यों
में श्रेष्ठ माना गया है (चरक)। इसका उपयोग रक्तपित्त, गुल्म, उदर, कामला एवं पांडु आदि में भी किया जाता है।
इसका बाह्य प्रयोग पित्ताभिष्यन्द में किया गया है।
अथेक्षुभेदानाह
पौण्ड्रको भीरुकश्चापि वंशकः शतपोरकः। कान्तारतापसेक्षुश्च काण्डेक्षुः सूचिपत्रकः।।३।।
नैपालो दीर्घपत्रश्च नीलपोरोऽथ कोशकृत्। मनोगुप्ता च इत्येता जातयस्तत्र कीर्तिताः ।।४।।
ऊख के भेद—पौण्ड्रक, भीरुक, वंशक, शतपोरक, कान्तार, तापसेक्षु, काण्डेक्षु, सूचिपत्रक, नैपाल, दीर्घपत्र,
नीलपोर, कोशकृत् तथा मनोगुप्ता ये सब ऊखकी जातियाँ मानी गई है। [३-४]
अथ श्वेतपौण्ड्रक-भीरुकेक्षुगुणानाह
वातपित्तप्रशमनो मधुरो रसपाकयोः। सुशीतो बृंहणो बल्यः पौण्ड्रको भीरुकस्तथा ।।५।।
पौण्ड्रक तथा भीरुक ये दोनों ईख—वात तथा पित्त को शमन करने वाला, रस तथा विपाक में मधुर, अत्यन्त
शीतल, बृंहण (रस-रक्तादिवर्धक) एवम् बलकारक होती हैं। [५]
अथ कोशकारेक्षुः । तस्य गुणानाह
कोशकारो गुरुः शीतो रक्तपित्तक्षयापहः ।।६।।
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९४० भावप्रकाशनिघण्टुः
कोशकार नामक ईख—गुरु, शीतल एवम् रक्तपित्त तथा क्षय को नष्ट करने वाली होती है । [६]
अथ कान्तारेक्षुगुणानाह
कान्तारेक्षुर्गुरुर्वृष्यः श्लेष्मलो बृंहणः सरः ।।७।।
कान्तार संज्ञक ईख—गुरु, वीर्यवर्धक, कफजनक, बृंहण (रसरक्तादि वर्धक) तथा सारक होती है । [७]
अथ वंशकेक्षुगुणानाह
दीर्घपोरः सुकठिनः सक्षारो वंशकः स्मृतः ।।८।।
वंशक नामक ईख—लम्बे-लम्बे पोरों वाली, अत्यन्त कठिन तथा क्षारयुक्त होती है । [८]
अथ शतपोरकेक्षुगुणानाह
शतपर्वा भवेत्किञ्चित्कोशकारगुणान्वितः । विशेषात्किञ्चिदुष्णश्च सक्षारः पवनापहः ।।९।।
शतपोरक संज्ञक ईख—औरों की अपेक्षा अधिक पोरोंवाली, किंचित् कोशकार संज्ञक ऊख के गुणों से युक्त,
विशेष करके किंचित् उष्ण, क्षारयुक्त तथा वातनाशक होती है । [९]
अथ तापसेक्षुगुणानाह
तापसेक्षुर्भवेन्मृद्वी मधुरा श्लेष्मकोपनी । तर्पणी रुचिकृच्चापि वृष्या च बलकारिणी ।।१०।।
तापसेक्षु संज्ञक ईख—कोमल, मधुर रसयुक्त, कफ को कुपित करने वाली, तृप्तिकारक, रुचि को उत्पन्न करने
वाली, वीर्यवर्धक तथा बलकारक होती है । [१०]
अथ काण्डेक्षुगुणानाह
एवं गुणैस्तु काण्डेक्षुः स तु वातप्रकोपणः ।।११।।
काण्डेक्षु नामक ईख—गुणों में यद्यपि "तापसेक्षु" के समान ही होती है तथापि यह वात को विशेष रूप से
कुपित करने वाली होती है । [११]
अथ सूचीपत्र-नीलपोर-नैपाल-दीर्घपत्राणां गुणानाह
सूचीपत्रो नीलपोरो नैपालो दीर्घपत्रकः । वातलाः कफपित्तघ्नाः सकषाया विदाहिनः ।।१२।।
सूचीपत्र, नीलपोर, नैपाल तथा दीर्घपत्रक संज्ञक ईख—वातजनक, कफ तथा पित्त नाशक, कषाय रसयुक्त
तथा विदाही होती है । [१२]
अथ मनोगुप्तेक्षुगुणानाह
मनोगुप्ता वातहरी तृष्णाऽऽमयविनाशिनी । सुशीता मधुराऽतीव रक्तपित्तप्रणाशिनी ।।१३।।
मनोगुप्ता संज्ञक ईख—वातनाशक, तृषा रोग को दूर करने वाली, अति शीतल, अत्यन्त मधुर एवम् रक्तपित्त
को नष्ट करने वाली होती है । [१३]
अथ बाल-तरुण-वृद्धेक्षुगुणानाह
बाल इक्षुः कफं कुर्य्यान्मेदोमेहकरश्च सः । युवा तु वातहृत् स्वादुरीषत्तीक्ष्णश्च पित्तनुत् ।।
रक्तपित्तहरो वृद्धः क्षतहृद् बलवीर्यकृत् ।।१४।।
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इक्षुवर्गः ९४१
बाल (कच्ची) अर्थात् थोड़े दिनों की ईख-कफकारक एवम् मेद तथा प्रमेह रोग को उत्पन्न करने वाली होती
है।
युवा (अधपकी) ईख-वातनाशक, स्वादिष्ट, किंचित् तीक्ष्ण एवम् पित्तनाशक होती है।
वृद्ध (पकी) ईख-रक्तपित्त को दूर करने वाली, क्षतनाशक एवम् बल तथा वीर्य उत्पन्न करने वाली होती
है।[१४]
अथेक्षोरङ्गभेदेन गुणभेदानाह
मूले तु मधुरोऽत्यर्थं मध्येऽपि मधुरः स्मृतः । अग्रे ग्रन्थिषु विज्ञेय इक्षुः पटुरसोजनैः ।।१५।।
ईख के अङ्गभेद से गुणभेद-जड़ भाग में अत्यन्त मधुर रसयुक्त, मध्यभाग में मधुर रसयुक्त और अग्रभाग तथा
गांठों में लवण रस युक्त ईख होता है, ऐसा लोगों को जानना चाहिये। [१५]
अथ चूषितेक्षुगुणानाह
दन्तनिष्पीडितस्येक्षो रसः पित्तास्रनाशनः । शर्करासमवीर्य स्यादविदाही कफप्रदः ।।१६।।
दाँतों से चूसे हुये ईख का रस-पित्त तथा रक्तविकार को दूर करने वाला, शक्कर के समान वीर्यवाला, अविदाही
(किंचित् दाह करने वाला) एवं कफ उत्पन्न करने वाला होता है। [१६]
अथ यान्त्रिकेक्षुरसगुणानाह
मूलाग्रजन्तुग्रन्थादिपीडनान्मलसङ्गराद् । किञ्चित्कालविधृत्या च विकृतिं याति यान्त्रिकः ।।
तस्माद्विदाही विष्टम्भी गुरुः स्याद्यान्त्रिको रसः ।।१७।
कोल्हू में पिरे हुये ईख का रस-ईख का यह मूल, अग्रभाग, जन्तु एवम् गाँठ आदि के कोल्हू में पिरे जाने
से तथा मैल के मिल जाने से और कुछ काल तक रखे रहने से विकृत (खराब) हो जाता है, अतएव वह विदाही,
विष्टम्भजनक तथा गुरु होता है। [१७]
अथ पर्युषितेक्षुरसगुणानाह
रसः पर्युषितो नेष्टो ह्यम्लो वातापहो गुरुः । कफपित्तकरः शोषी भेदनश्चातिमूत्रलः ।।१८।।
बासी ईख का रस-हितकर नहीं होता है और यह अम्ल रस युक्त, वातनाशक, गुरु, कफ तथा पित्त कारक,
शोष उत्पन्न करने वाला, मलभेदक एवम् अत्यन्त मूत्रजनक होता है। [१८]
अथ पक्वेक्षुरसगुणानाह
पक्वो रसो गुरुः स्निग्धः सुतीक्ष्णः कफवातनुत् । गुल्मानाहप्रशमनः किञ्चित्पित्तकरः स्मृतः ।।१९।।
पकाया हुआ ईख का रस-रूक्ष, स्निग्ध, अत्यन्त तीक्ष्ण, कफ तथा वात नाशक, किंचित् पित्तकारक एवम्
गुल्म तथा आनाह (अफारा) को दूर करने वाला होता है। [१९]
अथेक्षुरसनिर्मितपदार्थगुणानाह
इक्षोर्विकारास्तृड्दाहमूर्च्छापित्तास्रनाशनाः । गुरवो मधुरा बल्याः स्निग्धा वातहराः सराः ।।
वृष्या मोहहराः शीता बृंहणा विषहारिणः ।।२०।।
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९४२ भावप्रकाशनिघण्टुः
ईख के रस में बने हुए पदार्थ-तृषा, दाह, मूर्च्छा, पित्त तथा रक्तविकार को दूर करने वाले, गुरु, मधुर रसयुक्त,
बलकारक, स्निग्ध, वातनाशक, सारक, वीर्यवर्धक, मोह को दूर करने वाले, शीतल, बृंहण (रस-रक्तादिवर्धक) तथा
विषनाशक होते हैं । [२०]
अथ फाणितम् ("चरका, राब, छोवा" इति लोके) ।
तस्य लक्षणगुणानाह
इक्षो रसस्तु यः पक्वः किञ्चिद्गाढो बहुद्रवः । स एवेक्षुविकारेषु ख्यातः फाणितसंज्ञया ।।
फाणितं गुर्वभिष्यन्दि बृंहणं कफशुक्रकृत् । वातपित्तश्रमान्हन्ति मूत्रवस्तिविशोधनम् ।। २१ ।।
फाणित (चरका, राब, छोवा इस नाम से लोक प्रसिद्ध) के लक्षण—ईख का जो पकाया हुआ रस कुछ
गाढ़ा अंश तथा अधिक द्रव भाग से युक्त होता है वही ईख के रस से बने हुए पदार्थों में फाणित (राब) नाम से विख्यात
है।
फाणित (राब)—गुरु, अभिष्यन्दी, बृंहण (रस-रक्तादि वर्धक), कफ तथा शुक्र को उत्पन्न करने वाला, वात, पित्त
तथा श्रम को दूर करने वाला एवम् मूत्र तथा वस्ति का अधिक शोधन करने वाला होता है। [२१]
अथ मत्स्यण्डी ("राबकाकव, खण्डराब" इति लोके) ।
तस्य लक्षणगुणानाह
इक्षो रसो यः सम्पक्वो घनः किञ्चिद्द्रवान्वितः ।। २२ ।।
मंदं यत्स्यन्दते तस्मात्तन्मत्स्यण्डी निगद्यते । मत्स्यण्डी भेदिनी बल्या लघ्वी पित्तानिलापहा ।।
मधुरा बृंहणी वृष्या रक्तदोषापहा स्मृता ।। २३ ।।
मत्स्यण्डी ("राब काकव, खण्डराब" इस नाम से लोक प्रसिद्ध) के लक्षण—ईख का जो पकाया हुआ रस अधिक
घन भाग तथा स्वल्प द्रव भाग से युक्त होता है उसे मत्स्यण्डी कहते हैं और इससे मन्द-मन्द रस झरता है इस कारण
से इसका "मत्स्यण्डी" नाम रखा गया है।
मत्स्यण्डी—मलभेदक, बलकारक, लघु, पित्त तथा वात को दूर करने वाली, मधुर रसयुक्त, बृंहण (रस-
रक्तादिवर्धक), वीर्यवर्धक एवम् रक्तसंबन्धी दोष को नष्ट करने वाली होती है। [२२-२३]
अथ गुडस्य लक्षणं गुणाँश्चाह
इक्षो रसो यः सम्पक्वो जायते लोष्टवद् दृढः ।। २४ ।।
स गुडो गौडदेशे तु मत्स्यण्ड्येव गुडो मतः । गुडो वृष्यो गुरुः स्निग्धो वातघ्नो मूत्रशोधनः ।
नातिपित्तहरो मेदःकफक्रिमिबलप्रदः ।। २५ ।।
गुड़ क लक्षण—ईख का जो रस पकाते-पकाते गाढ़ा होने पर ढेले के समान बाँधने से दृढ़ हो जाता है उसे "गुड़"
कहते हैं। किन्तु "गौड़" देश में "मत्स्यण्डी" को ही "गुड़" मानते हैं।
गुड़—वीर्यवर्धक, गुरु, स्निग्ध, वातनाशक, मूत्र शोधन करने वाला, अत्यन्त पित्तनाशक नहीं (किञ्चित् पित्तनाशक)
एवम्—मेद, कफ, क्रिमि तथा बल को उत्पन्न करने वाला होता है। [२४-२५]
अथ पुराणगुडस्य गुणानाह
गुडो जीर्णो लघुः पथ्योऽनभिष्यन्द्यग्निपुष्टिकृत् । पित्तघ्नो मधुरो वृष्यो वातघ्नोऽसृक्प्रसादनः ।। २६ ।।
पुराना गुड़—लघु, पथ्य, अनभिष्यंदी (किञ्चित् अभिष्यन्दी), अग्निजनक तथा पुष्टिवर्धक, पित्तनाशक, मधुर,
वीर्यवर्धक, वातनाशक, एवम् रक्त को स्वच्छ (दोषरहित) करने वाला होता है। [२६]
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इक्षुवर्गः ९४३
अथ नवीनगुडस्य गुणानाह
गुडो नवः कफश्वासकासकृमिकरोऽग्निकृत् ।।२७।।
नवीन गुड़—कफ, श्वास, कास तथा कृमि को उत्पन्न करने वाला एवम् जठराग्नि की वृद्धि करने वाला होता
है। [२७]
अथानुपानभेदेन गुडस्य गुणानाह
श्लेष्माणमाशु विनिहन्ति सहार्द्रकेण पित्तं निहन्ति च तदेव हरीतकीभिः ।
शुण्ठ्या समं हरति वातमशेषमित्थं दोषत्रयक्षयकराय नमो गुडाय ।।२८।।
अनुपान भेद से गुड़ के गुण—गुड़ यदि अदरख के साथ सेवन किया जाय तो कफ को शीघ्र नष्ट करता है।
और हरीतकी (हर्रे) के साथ सेवन करने से पित्त को दूर करता है। एवम् सोंठ के साथ गुड़ का सेवन करने से समस्त
वातसम्बन्धी विकारों को दूर करता हैं। इस प्रकार से तीनों दोषों को दूर करने वाले गुड़ के लिये नमस्कार है अर्थात्
तीनों दोषों को दूर करने से गुड़ ओषधियों में सर्वोत्तम है। [२८]
अथ खण्डस्य गुणानाह
खण्डन्तु मधुरं वृष्यं चक्षुष्यं बृंहणं हिमम् । वातपित्तहरं स्निग्धं बल्यं वान्तिहरं परम् ।।२९।।
खण्ड—मधुर रसयुक्त, वीर्यवर्धक, नेत्रों के लिये हितकर, बृंहण (रस रक्तादि वर्धक), शीतवीर्य, वात तथा पित्त
नाशक, स्निग्ध, बलकारक एवम् अत्यन्त वमन को दूर करने वाला होता है। [२९]
खण्डमिति प्रसिद्धं (खांड) ।।२९।।
यहाँ पर "खण्ड" इस पद से लोक प्रसिद्ध "खांड" का ग्रहण करना चाहिये। [२९]
अथ शर्करा (‘‘चीनी’’ इति लोके) । तस्या लक्षणगुणानाह
खण्डन्तु सिकतारूपं सुश्वेतं शर्करा सिता । सिता सुमधुरा रुच्या वातपित्तास्रदाहहृत् ।
मूर्च्छार्च्छदिज्वरान्हन्ति सुशीता शुक्रकारिणी ।।३०।।
शर्करा (‘‘चीनी’’ इस नाम से लोक प्रसिद्ध) के लक्षण—जो खाँड बालू के समान तथा श्वेत हो उसे ‘‘शर्करा’’
अथवा ‘‘सिता’’ कहते हैं।
चीनी—अति मधुर, रुचिकारक, वात, पित्त, रक्तविकार तथा दाह को दूर करने वाली, अतिशीतल, शुक्र को उत्पन्न
करने वाली एवम्—मूर्च्छा, वमन तथा ज्वर को नष्ट करने वाली होती है। [३०]
अथ पुष्पसिता सितोपला च (फूल से बनाई हुई
चीनी और मिश्री) । तयोर्गुणानाह
भवेत्पुष्यसिता शीता रक्तपित्तहरी लघुः । सितोपला सरा लघ्वी वातपित्तहरी हिमा ।।३१।।
पुष्पसिता (फूलों से बनाई हुई चीनी)—शीतल, लघु एवम् रक्तपित्त को दूर करने वाली होती है।
सितोपला (मिश्री)—सारक, लघु, शीतवीर्य एवम् वात तथा पित्त को दूर करने वाली होती है। [३१]
अथ मधुखण्डगुणानाह
मधुजा शर्करा रूक्षा कफपित्तहरा गुरुः । छर्द्यतीसारतृड्दाहरक्तहृत्तुवरा हिमा ।।३२।।
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९४४ भावप्रकाशनिघण्टुः
मधुखण्ड (शहद से बनी हुई खाँड अथवा शक्कर)—रूक्ष, कफ तथा पित्तनाशक, गुरु, कषाय रसयुक्त,
शीतवीर्य एवम्-वमन, अतिसार, तृषा, दाह तथा रक्तविकार को दूर करने वाली होती है। [३२]
अथ परिभाषामाह
यथा यथैषां नैर्मल्यं मधुरत्वं यथा यथा। स्नेहलाघवशैत्यादि सरत्वञ्च तथा तथा।।३३।।
परिभाषा—जैसे-जैसे इन (खांड, बूरा आदि) सब में निर्मलता तथा मधुरता (मिठास) अधिक होती जाती है वैसे-
वैसे इनमें, स्निग्धता, लघुता, शीतलता एवम्-सारकता आदि (गुण) भी बढ़ते जाते हैं, अर्थात् निर्मलता तथा मधुरता
के अनुसार ही इन सब में स्निग्धता आदि गुण रहते हैं। [३३]
इति श्रीमिश्रलटकनतनय श्रीमिश्रभावविरचिते भावप्रकाशे वर्गप्रकरणे
इक्षुवर्गः समाप्तः।
अथ अनेकार्थनामवर्गः
वक्तव्य— प्रस्तुत अनेकार्थ वर्ग के पर्यायों को मूलनिघंटु भाग में आये पर्यायों के साथ मिलाकर अध्ययन करने
से अनेक परिवर्तन देखे गये, इसलिये पादटिप्पणी में इनका स्पष्टीकरण किया गया है। कुछ पर्याय इनमें ऐसे हैं जो ठीक
होते हुवे भी मूल भावप्रकाश निघंटु में नहीं हैं किन्तु अन्य निघंटुओं में हैं। कुछ पर्याय, मूल पर्यायों से कुछ ही भिन्न
हैं जैसे किसी में केवल लिंगभेद है या किसी में केवल विशेषण का अन्तर है। कुछ ऐसे भी पर्याय हैं जिनका उल्लेख
कहीं नहीं मिलता। इसी प्रकार संभव है कि कुछ पर्याय अनेकार्थवाची होते हुये भी यहाँ उनका उल्लेख न हुआ हो।
परिशिष्ट में दी हुई संपूर्ण पर्यायों की सूची से इनका ज्ञान हो सकता है।
तत्र द्व्यर्थानि नामान्याह
दो अर्थ वाले शब्द
अश्मन्तकः—अम्ललोणिका कोविदारश्च।
१. अश्मन्तक—तिनपतिया और कचनार।
कठिल्लकः—कारवेल्लः, रक्तपुनर्नवा च।
२. कठिल्लक—करैला और लाल पुनर्नवा।
कुलकः—पटोला, कुपीलुश्च (कुपीलुः ‘कुचिला’
इति लोके प्रसिद्धः)।
३. कुलक—परवर और कुचिला।
कोशातकी—महाकोशातकी, राजकोशातकी च।
४. कोशातकी—नेनुआ और तरोई।
दीप्यकः—यवानी, अजमोदा च।
५. दीप्यक—अजवाइन और अजमोद।
मरुबकः—फणिज्जकः, पिण्डीतकश्च,
(फणिज्जका = ‘मरुआ’ इति लोके,
पिण्डीतकः = ‘मैनफल’ इति लोके)।
६. मरुबक—मरुआ और मैनफल।
मधूलिका—मूर्वा, जलयष्टी च।
७. मधूलिका—मूर्वा और जलमुलेठी।
रुचकम्—सौवर्चलं, बीजपूरकञ्च।
८. रुचक—सोंचरनमक और बिजौरा नींबू।
लोणिका—लोणीशाकं, चाङ्गेरीशाकञ्च।
९. लोणिका—नोनीशाक और चांगेरीशाक (तिनपतिया)।
वसुकः—रक्तार्कः १, क्षारलवणं च २।
१०. वसुकः—लाल आक और रेहगवा नोन।
बाह्लीकम्—कुङ्कुमं, हिङ्गु च।
११. बाह्लीक—केशर और हींग।
वितुन्नकम—धान्यकं, तुत्थञ्च।
१२. वितुन्नक—धनिया और नीला थोथा।
स्वादुकण्टकः—गोक्षुरः, विकङ्कतश्च।
१३. स्वादुकण्टक—गोखरू और कंटाई।
अग्निमुखी—भल्लातकी, लाङ्गली च।
१४. अग्निमुखी—भिलावा और कलिहारी।
अग्निशिखम्—कुङ्कुमं, कुसुम्भञ्च।
१५. अग्निशिखा—केसर और कुसुम (बर्रें)।
अजशृङ्गी—मेषशृङ्गी, कर्कटशृङ्गी च।
१६. अजशृङ्गी—मेढ़ासिङ्गी और काकड़ासिङ्गी।
प्रियङ्गु—फलिनी, कङ्गुश्च।
१७. प्रियङ्गु—फूलप्रियङ्गु और कंगुनी।
भृङ्गः—भृङ्गराजः, त्वक् च।
१८. भृङ्ग—भांगरा और तज।
समङ्गा—मञ्जिष्ठा, लज्जालुश्च।
१. वसुक पर्याय श्वेतार्क (मन्दार) का होने से यहाँ रक्तार्क के स्थान पर श्वेतार्क होना चाहिये।
२. क्षारलवण के लिये वसुक पर्याय मूल में नहीं है। ध. नि. ने. वसुक पर्याय ‘उद्भिदलवण’ के लिये दिया है।
६३ भाव. I
१४६ भावप्रकाशनिघण्टुः
[ बायाँ स्तम्भ ]
१९. समङ्गा—मंजीठ और लजालू।
अमोघा—विडङ्गं, पाटला च।
२०. अमोघा—वायविडंग और पाढल।
मोचा—कदली, शाल्मलिश्च।
२१. मोचा—केला और सेमर।
कुटन्नटः—श्योनाकः, कैवर्तीमुस्तञ्च।
२२. कुटन्नट—सोनापाठा और केवटी मोथा।
कुनटी—धनिका, मनःशिला च।
२३. कुनटी—धनियाँ और मैनसिल।
घोण्टा—पूगः, बदरी च।
२४. घोण्टा—सुपारी और बेर।
त्रिपुटा—त्रिवृत्, सूक्ष्मैला च।
२५. त्रिपुटा—निशोथ और छोटी इलायची।
शटी—कचूरः, गन्धपलाशी च।
२६. शटी—कचूर और गन्धपलाशी (कपूर-
कचरी)।
दन्तशठः—जम्बीरः, कपित्थश्च
२७. दन्तशठ—जम्बीरी नींबू और कैथा।
दन्तशठा—अम्लिका, चाङ्गेरी च।
२८. दन्तशठा—इमली और तिनपतिया।
अरुणम्१—मञ्जिष्ठा, अतिविषा च।
२९. अरुणा—मञ्जीठ और अतीस।
कणा—पिप्पली, जीरकञ्च।
३०. कणा—पीपल और जीरा।
तालपर्णी२—मुशली, मुरा च।
३१. तालपर्णी—मूसली और मुरा (एकाङ्गी)।
पीलुपर्णी—मूर्वा, बिम्बी च।
३२. पीलुपर्णी—मूर्वा और कन्दूरी।
ब्राह्मणी—भार्ङ्गी, स्पृक्का च।
३३. ब्राह्मणी—भारङ्गी और स्पृक्का।
अपराजिता३—विष्णुक़्रान्ता, शालिपर्णी च।
३४. अपराजिता—कोयल और शालिपर्णी।
आस्फोटा—अपराजिता, सारिवा च।
[ दायाँ स्तम्भ ]
३५. आस्फोटा—अपराजिता (कोयल) और
श्वेत सारिवा (अनन्तमूल)।
पारावत पदी—ज्योतिष्मती, काकजङ्घा च।
३६. पारावतपदी—मालकांगुनी और काकजङ्घा।
शारदी४—शारिवा, जलपिप्पली च।
३७. शारदी—अनन्तमूल और जलपीपल।
उग्रगन्धा—वचा, यवानी च।
३८. उग्रगन्धा—घोडवच और अजवाइन।
परिव्याधः—कर्णिकारः जलवेतसश्च।
३९. परिव्याध—कर्णिकार और जलवेतस।
अञ्जनम्—स्रोतोञ्जनम्, सौवीरञ्च।
४०. अञ्जन—काला सुरमा और सफेद सुरमा।
अग्निः—चित्रकः भल्लातश्च।
४१. अग्नि—चीता और भिलावा।
कृमिघ्नः—विडङ्गः, हरिद्रा च।
४२. कृमिघ्न—वायविडङ्ग और हरदी।
तेजनः—शरः, वेणुश्च।
४३. तेजन—सरपत और बाँस।
तेजनी—तेजस्वती, मूर्वा च।
४४. तेजनी—तेजवल और मूर्वा।
रोचनः—कम्पिल्लः रोचना च।
४५. रोचन—कबीला और गोलोचन।
[ रोचना—गोरोचना, रक्तकह्लारश्च५ ]।
४६. रोचना—गोलोचन और लाल कुमुद।
राजादनम्—क्षीरिका, प्रियालश्च।
४७. राजादन—खिरनी और चिरौंजी।
शकुलादनी—कटुका, जलपिप्पली च।
४८. शकुलादनी—कटुकी और जलपीपल।
गोलोमी—श्वेतदूर्वा, वचा च।
४९. गोलोमी—सफेद दूब और घोडवच।
पद्मा—पद्मचारिणी, भार्ङ्गी च।
५०. पद्मा—स्थलकमल और भारङ्गी।
श्यामा—सारिवा, प्रियङ्गुश्च।
[ पाद-टिप्पणियाँ ]
१. मञ्जिष्ठा एवं अतिविषा का पर्याय अरुणा आया हुआ है न कि अरुणम्।
२. तालपर्णी यह न मुशली का पर्याय है न मुरा का। अन्य निघण्टुओं में यह मिश्रेया का पर्याय दिया हुआ है। मुशली का
पर्याय तालमूली मिलता है एवं मुरा का शालपर्णिका मिलता है।
३. 'अपराजिता' यह नाम शालिपर्णी (पाठा०-शालपर्णी) के पर्यायों में नहीं आया है।
४. 'शारदी' यह 'सारिवा' के पर्यायों में नहीं है।
५. कल्हार के पर्यायों में रोचना नहीं है।
अनेकार्थनामवर्गः १४७
५१. श्यामा—अनन्तमूल और प्रियङ्गु।
उत्तमा—त्रिफला, सर्वतोभद्रा च।
५२. उत्तमा—त्रिफला और गम्भारी।
धान्यम्—धान्याकं, शाल्यादि च।
५३. धान्य—धनिया और शालि (जड़हन) आदि धान्य।
सहस्रवीर्या—नीलदूर्वा, महाशतावरी च।
५४. सहस्रवीर्या—हरी दूब और बड़ी शतावर।
सेव्यम्—उशीरं, लामज्जकञ्च।
५५. सेव्य—खस और लामज्जक
उदुम्बरः—जन्तुफलं, ताम्रञ्च।
५६. उदुम्बर—गूलर और ताँबा।
ऐन्द्री—इन्द्रवारुणी, इन्द्राणी¹ च।
५७. ऐन्द्री—इन्द्रायन, निर्गुण्डी और बड़ी इलायची।
कटम्भरा—कटुका, श्योनाकश्च।
५८. कटम्भरा—कुटकी और सोनापाठा।
क्षारः—यवक्षारः स्वर्जिका च।
५९. क्षारः—जवाखार और सज्जीखार।
गण्डीरः—गण्डारी, मञ्जिष्ठा च [ गण्डारी शाकविशेषो
'गण्डानी' इति लोके]।
६०. गण्डीर—गण्डारी शाक (इसे लोक में
'गण्डानी' भी कहते हैं) और मंजीठ।
गान्धारी—दुरालभा गन्धपलाशी च।
६१. गान्धारी—धमासा और गन्धपलाशी² (कपूरकचरी)।
चित्रा—इन्द्रवारुणी, बृहदन्ती च।
६२. चित्रा—इन्द्रायन और बड़ी दन्ती।
तुण्डीकेरी—कार्पासी, बिम्बी च।
६३. तुण्डीकेरी—कपास और कन्दूरी।
धीरा—गुडूची, क्षीरकाकोली च।
६४. धीरा—गिलोय और क्षीरकाकोली
बालपत्रः—खदिरः, यवासश्च³।
६५. बालपत्र—खैर और जवासा।
वारि—बालकम्, उदकञ्च।
६६. वारि—सुगन्धवाला और जल।
अङ्गारवल्ली—भार्गी गुञ्जा च।
६७. अङ्गारवल्ली—भारङ्गी और गुंजा (घुँघची)।
अमृणालम्—लामज्जकम्, उशीरञ्च।
६८. अमृणाल—लामज्जक और खस।
कुण्डली—गुडूची, कोविदारश्च।
६९. कुण्डली—गिलोय और कचनार।
गन्धफली—प्रियङ्गु और गन्धफली—प्रियङ्गुः,
चम्पककलिका च।
७०. गन्धफली—प्रियङ्गु और चम्पे की कली।
दीर्घमूलः⁴—यवासः, शालिपर्णी च।
७१. दीर्घमूल—जवासा और सरिवन।
पिच्छिला—शाल्मली शिंशपा च।
७२. पिच्छिला—सेमर और सीसम।
पुष्पफलः—कपित्थः, कुष्माण्डश्च।
७३. पुष्पफल—कैथा और पेठा।
पोटगलः—नलः, काशश्च।
७४. पोटगल—नरसल और कास।
यवफल—कुटजः, वंशश्च।
७५. यवफल—कुड़ा और बांस
देवी—मूर्वा, स्पृक्का च।
७६. देवी—मूर्वा और स्पृक्का।
विश्वा—शुण्ठी, अतिविषा च।
७७. विश्वा—सोंठ और अतीस।
शीतशिव—सैन्धवं, मिश्रेया⁵ च।
७८. शीतशिव—सेन्धा नमक और मिश्रेया।
कर्कशः—काम्पिल्यः, कासमर्दश्च।
७९. कर्कश—कबीला और कसौंदी।
चर्मकषा—शातला, मांसरोहिणी च।
८०. चर्मकषा—शातला, मांसरोहिणी च।
१. भा. प्र. में इन्द्राणी के निर्गुण्डी तथा बृहदेला पर्याय नहीं हैं किन्तु रा. नि. ने दिये हैं।
२. कपूरकचरी का गन्धारि का पर्याय भा. प्र. में है, गान्धारी नहीं है।
३. भा. प्र. में यवासा का बालपत्र पर्याय नहीं है किन्तु रा. नि. एवं ध. नि. में है।
४. यवासा और शालापर्णी का दीर्घमूलः पर्याय भा. प्र. में नहीं है किन्तु रा. नि. एवं ध. नि. में यवासा के लिये दीर्घमूलः एवं
शालिपर्णी के लिये दीर्घमूला पर्याय मिलते हैं।
५. मिश्रेया के लिये शीतशीव पर्याय भा. प्र. में नहीं है किन्तु ध. नि. एवं रा. नि. में है।
९४८ भावप्रकाशनिघण्टुः
नन्दिवृक्षः -अश्वत्थभेदः (अधोमुखपत्रशाखी
'वेलिया पीपर' इति लोके), तूणिश्च ।
८१. नन्दिवृक्ष-पीपलभेद (अधोमुख पत्ते तथा
शाखाओं वाला 'बेलिया पीपर' इस नाम
से लोकप्रसिद्ध वृक्ष) और तून ।
पयः -क्षीरम्, उदकञ्च ।
८२. पयः-दूध और जल ।
रुहा -दूर्वा, मांसरोहिणी १ च ।
८३. रुहा-दूब और मांसरोहिणी ।
सिंही-बृहती, वासा च ।
८४. सिंही-बड़ी कटेरी और अडूसा ।
कतकम्-विड्लवणम् २, निर्मलीफलं च ।
८५. कतक-विरियाँ सञ्चर नोन और निर्मली
का फल ।
कण्टकाढ्या-कुब्जकः, शाल्मली च ।
८६. कण्टकाढ्या-कूजा और सेमर ।
यक्षधूपः -सरलनिर्यासः, ३ रालश्च ।
८७. यक्षधूप-गन्धाविरोजा और राल ।
द्राविडी-शटी, सूक्ष्मैला च ।
८८. द्राविडी-कचूर और छोटी इलायची ।
हट्टविलासिनी -हरिद्रा, नखी च ।
८९. हट्टविलासिनी-हरदी और नखी ।
तिलपर्णम् ४ -रक्तचन्दनम्, ग्रन्थिपर्णं च ।
९०. तिलपर्ण-लालचन्दन और गठिवन ।
मधुरः-जीवकः जीवनीयगणश्च ।
९१. मधुर-जीवक और जीवनीय गण ।
लोहद्रावणी ५ -गण्डदूर्वा अम्लवेतसश्च ।
९२. लोहद्रावणी-गाँडरदूब और अमलबेंत ।
नागिनी-ताम्बूली, नागपुष्पी च ।
९३. नागिनी-पान और नागपुष्पी ।
मृदुरेचनी-त्रिवृत् ६, मार्कण्डिका च ।
९४. मृदुरेचनी-निसोत और सनाय ।
नटः-श्योनाकः, अशोकश्च ।
९५. नट-सोनापाठा और अशोक ।
वनस्पतिः -वटः, नन्दिवृक्षश्च ।
९६. वनस्पति-बरगद और बेलियापीपर ।
मन्दारः -श्वेतार्कः, महानिम्बश्च । ७
९७. मन्दार-सफेद आक और बकायन ।
अम्बुजः-कमलम् ८, इज्जलश्च ।
९८. अम्बुज-कमल और इज्जल (समुद्र-फल) ।
कबरी -बर्बरी ९, हिङ्गुपत्री च ।
९९. कबरी-बर्बरी (वनतुलसी और हींगपत्री) ।
कुमारी -घृतकुमारिका, शतपत्री १० च ।
१००. कुमारी-घीकुवार और गुलाब ।
वरतिक्तकः-पाठा, पर्पटश्च ।
१०१. वरतिक्तक-पाठी और पित्तपापड़ा ।
चित्रकः -एरण्डः, ११ अनलनामा च ।
१०२. चित्रक-एरण्ड और चिता ।
यज्ञियः-खदिरः, पलाशश्च ।
१०३. यज्ञिय-खैर और पलाश ।
रक्तबीजः -अरिष्टकः, कन्दुंरी १२ च ।
१०४. रक्तबीज-रीठा और कन्दुंरी ।
क्षारश्रेष्ठः -पलाशः, मोक्षकश्च ।
१०५. क्षारश्रेष्ठः-पलाश और मोखा ।
१. मांसरोहिणी का पर्याय अतिरुहा आया है न कि केवल रुहा । ध. नि. में रुहा है ।
२. विडलवण का पर्याय कृतक है न कि कतक ।
३. भा. प्र. में सरलनिर्यास के लिये वृक्षधूप आया है न कि यक्षधूप ।
४. मूल में तैलपर्णकम् यह ग्रन्थिपर्ण के लिये पर्याय आया है ।
५. गण्डदूर्वा का पर्याय लोहदद्राविणी आया है एवं अम्लवेतस के लिये यह पर्याय नहीं है ।
६. त्रिवृत् का रेचनी पर्याय आया है न कि मृदुरेचनी ।
७. महानिम्ब के लिये मन्दार पर्याय नहीं है । भा. प्र. में पारिभद्र के पर्याय में भण्डार लिखा हैं ।
८. कमल के लिये अंबुज पर्याय अन्य निघण्टुओं में है ।
९. बर्बरी के पर्याय में कबरी नहीं मिलता ।
१०. शतपत्री का पर्याय महाकुमारी आया है न कि कुमारी ।
११. एरण्ड का पर्याय चित्रः दिया हुआ है ।
१२. कन्दुंरी नाम सन्दिग्ध है । रक्तबीज यह अनार का पर्याय अन्य निघण्टु में है । अनार का रक्तपुष्प पर्याय अन्य निघण्टुओं में
मिलता है ।
यहाँ पृष्ठ का पूर्ण एवं शुद्ध लिप्यन्तरण (transcription) प्रस्तुत है:
अनेकार्थनामवर्गः १४१
श्वेतपुष्पः-श्वेतार्कः, इन्द्रवारुणी च।
१०६. श्वेतपुष्प-सफेद आक और इन्द्रायण।
तुवरी-सौराष्ट्री, आढकी च।
१०७. तुवरी-सोरठी माटी और अरहर।
कुम्भिका-कट्फलः, वारिपर्णी च।
१०८. कुम्भिका-कायफल और जलकुम्भी।
राजपुत्रिका-रेणुका, जाती च।
१०९. राजपुत्रिका-रेणुका और जाई (चमेली)।
रक्तपुष्पः-रक्तार्कः, कन्दुंरी१ च।
११०. रक्तपुष्प-लाल आक और कन्दुरी।
सप्तला-शातला, वासन्ती च।
१११. सप्तला-शातला और नेवारी।
विषमुष्टिकः-महानिम्बः विषतिन्दुकश्च। १
११२. विषमुष्टिक-बकायन और कुचला।
[L16
९५० भावप्रकाशनिघण्टुः
श्रीपर्णी-गम्भारी, गणिकारिका, कट्फलं च।
१६. श्रीपर्णी-गम्भारि, अरनी और कायफर।
अमृता-गुडूची, हरीतकी, धात्री च।
१७. अमृता-गिलोय, हर्रा और आँवला।
अनन्ता-दुरालभा, नीलदूर्वा, लाङ्गली च।
१८. अनन्ता-धमासा, हरी दूब और कलिहारी।
ऋष्यप्रोक्ता-अतिबला, महाशातावरी, कपि-कच्छुश्च।
१९. ऋष्यप्रोक्ता-ककही, बड़ी शातावर और केवा च।
कृष्णवृन्तः-पाढल, गम्भारी, माषपर्णी च।
२०. कृष्णवृन्ता-पाटला, गम्भारी, माषपर्णी।
जीवन्ती-गुडूची, शाकविशेषः, वन्द१ च।
२१. जीवन्ती-गिलोय, जीवन्ती शाकविशेष और बन्दा।
लता-सारिवा, प्रियङ्गु, ज्योतिष्मती च।
२२. लता-अनन्तमूल (सारिवा), प्रियङ्गु और मालकांगुनी।
समुद्रान्ता-दुरालभा, कार्पासी, स्पृक्का च।
२३. समुद्रान्ता-धमासा, कपास और स्पृक्का।
हैमवती-हरीतकी, श्वेतवचा, पीतदुग्धः
सेहुण्डश्च२ (यस्य मूलं 'चोक' इति प्रसिद्धम्)।
२४. हैमवती-हर्रा, सफेद वच और पीले दूध का सेहुंड,
भड़भाड़ (इसके मूल को लोक में 'चोक' कहते हैं)।
अव्यथा-हरीतकी, महाश्रावणी, पद्माचारिणी च।
२५. अव्यथा-हर्रा, बड़ी मुण्डी और स्थल-कमल।
२६. षड्ग्रन्था-गन्धकचरी, वच और करञ्जी।
वरदा-सुवर्चला ('हुरहुर' इति लोके), अश्वगन्धा, वाराही
('गेठी'ति लोके)।
२७. वरदा-हुरहुर, असगन्ध और वाराहीकंद ('गेंठी'
नाम से लोकप्रसिद्ध)।
इक्षुगन्धा-काशः, कोकिलाक्षा, क्षीरविदारी (गोक्षुरः) च।
२८. इक्षुगन्धा-कास, तालमखाना और विदारी। (और
इक्षुगन्धिका-गोखरू भी है)।
कालस्कन्धः-तमालः तिन्दुकं कालखदिरश्च।३
२९. कालस्कन्ध-तमाल, तेन्दू और दुर्गन्ध-खैर।
महौषधम्-शुण्ठी, रसोनरू, विषञ्च।४
३०. महौषध-सोंठ, लहसुन और विष (वत्सनाभ)।
मधु-क्षौद्रं, पुष्परसः, मद्यञ्च।
३१. मधु-शहद, फूल का रस और मद्य।
कपीतनः-आम्रातकः, शिरीषः, गर्दभाण्डश्च।
३२. कपीतन-अम्बाडा, सिरस और पारस पीपल।
मदनः-पिण्डीतकः, धत्तूरः, सिक्थकश्च।
३३. मदन-मैनफल, धतूर और मोम।
शतपर्वा-वंशः, दूर्वा और वच।
३४. शतपर्वा-बाँस, दूब और वच।
सहस्रवेधी५-अम्लवेतसः, मृगमदः, हिङ्गु च।
३५. सहस्रवेधी-अमलवेत, कस्तूरी और हींग।
ताम्रपुष्पी-धातकी, पाटला, श्यामा त्रिवृच्च।६
३६. ताम्रपुष्पी-धाय का फूल, पाढ़लभेद और काली
निशोथ।
सदापुष्पः-श्वेतार्कः, रक्तार्कः, ७कुन्दश्च।
३७. सदापुष्प-सफेद आक, लाल आक और कुन्द।
सुरभिः-शल्लकी, मुरा, एलवालुकं८ च।
३८. सुरभिः-सालई, मुरा और एलवालुक।
लक्ष्मीः-ऋद्धिः, वृद्धिः और शमी च।
३९ लक्ष्मी-ऋद्धि, वृद्धि और शमी।
कालानुसार्यम्-कालीयकं, तगरं शैलेयञ्च।
४०. कालानुसार्य-पीला चन्दन (कलम्बक), तगर और
भूरिछरीला।
चाम्पेयः-चम्पकः नागकेसरः, पद्मकेसरश्च९।
४१. चाम्पेय-चंपा, नागकेशर और कमलका केसर।
नादेयी-गणिकारिका, जलजम्बूः, जलवेतसञ्च।
१. वन्दा का पर्याय जीवन्ती नहीं है यद्यपि जीवन्तीभेद, स्वर्ण जीवन्ती एक प्रकार का बांदा ही होता है।
२. वास्तव में यह सेहुण्ड भेद नहीं है।
३. कालखदिर पर्याय भा. प्र. ने नहीं दिया है। इरिमेद (विट्खदिर) का पर्याय कालस्कन्ध दिया हुआ है।
४. ध. नि. में विष का पर्याय महौषध दिया है।
५. भा. प्र. में अम्लवेतस् के पर्याय शतवेधी एवं सहस्रनुत् हैं एवं कस्तूरी का पर्याय सहस्रभित् है।
६. रा. नि. ने श्यामाविशेष का ताम्रपुष्पिका पर्याय दिया है।
७. रक्तार्क के लिये सदापुष्प पर्याय नहीं दिया हुआ है।
८. भा. प्र. में एलवालुक का सुगन्धि पर्याय दिया है न कि सुरभिः।
९. रा. नि. ने पद्मकेसर का पर्याय चाम्पेयकं दिया है।
अनेकार्थनामवर्गः ९५९
४२. नादेयी-अग्निमंथ, जलजामुन और जलवेतस ।
पाक्यम्-विडम्, सौवर्चलम्¹, यवक्षारश्च ।
४३. पाक्य-बिरिया सञ्चर नमक, कालानोन और जवाखार ।
विशल्या-लाङ्गली, गुडूची लघुदन्ती च ।
४४. विशल्या-कलिहारी, गिलोय और छोटीदंती ।
इन्द्रद्रुः-ककुभः देवदारुः,² कुटजश्च ।
४५. इन्द्रद्रु-अर्जुन, देवदार और कुड़ा ।
काश्मीरं काश्मीरी च-कुङ्कुमम्, पुष्करमूलम्, गम्भारी
च।
४६. काश्मीर और काश्मीरी-केशर, पुष्करमूल और
गम्भारि ।
गुन्द्रः³-पटेरकः, मुञ्जः शरश्च ।
४७. गुन्द्र-गोंदपटेर, मूँज और सरपत ।
गुन्द्रा-प्रियङ्गुः, गवेधुका⁴, भद्रमुस्तकञ्च ।
४८. गुन्द्रा-प्रियङ्गु, गर हेडुओ और नागरमोथा ।
चुक्रम्-शुक्तम्, अम्लवेतसम्, वृक्षाम्लञ्च ।
४९. चुक्र-चूक, अमलवेंत और कोकम ।
पारिभद्रः-निम्बः, पारिजातः, देवदारुश्च ।⁵
५०. पारिभद्र-नीम, फरहद और देवदारु ।
पीतदारुः-हरिद्रा,⁶ देवदारुः⁷ सरलश्च ।⁸
५१. पीतदारु-हरदी, देवदार और धूपसरल ।
वीरः-ककुभः, वीरणं, काकोली च ।
५२. वीर-कोह, वीरण तृण और काकोली ।
वीरतरुः-ककुभः⁹, वीरणम्, शरश्च ।¹⁰
५३. वीरतरु-कोह, वीरण तृण और सरपत ।
मयूरः-अपामार्गः, अजमोदा, तुत्थञ्च ।
५४. मयूर-चिचिड़ा, अजमोद और तूतिया ।
रक्तसारः-रक्तचन्दनं, पुतङ्गः, खदिरश्च ।
५५. रक्तसार-लालचन्दन, पतङ्ग और खैर ।
बदरा¹¹-सुवर्चला, अश्वगन्धा, वाराही च ।
५६. बदरा-हरहुर, असगंध और बाराहीकंद ।
वशिरः-रक्तापामार्गः, गजपिप्पली, समुद्रलवणश्च ।
५७. वशिर-लाल अपामार्ग, गजपीपर और समुद्री नोन ।
सौवीरम्-अञ्जनभेदः, वदरम्, सन्धानभेदश्च ।
५८. सौवीर-सफेद सुरमा, बेर, कांजी का भेद ।
वञ्जुलः-अशोकः, वेतसः, तिनिशश्च ।
५९. वञ्जुल-अशोक, वेतस और तिनिस ।
शिला-मनःशिला, शिलाजतु,¹² गैरिकञ्च¹³ ।
६०. शिला-मैनसिल, शिलाजीत और गेरू ।
सोमवल्ली-वाकुची, गुडूची, ब्राह्मी च ।
६१. सोमवल्ली-वाकुची, गिलोय और ब्राह्मी ।
अक्षीवः-शोभाञ्जनः, महानिम्बः,¹⁴ समुद्रलवणश्च ।
६२. अक्षीव-सहिजन, वकायन और समुद्री नोन ।
कारवी-काकजाजी, शताह्वा अजमोदा च ।
६३. कारवी-कलौंजी, सोआ और अजमोदा ।
धामार्गवः-रक्तापामार्गः, राजकोशातकी, महाकोशातकी च ।
६४. धामार्गव-लाल अपामार्ग, तरोई और नेनुआ ।
दुःस्पर्शः-यवासः, कपिकच्छूः, कण्टकारी च ।
६५. दुःस्पर्श-जवासा, कौंच और भटकटैया ।
१. सौवर्चल का पर्याय मन्थपाकं आया है न कि पाक्यम् ।
२. देवदारुः का पर्याय भा. प्र. ने इन्द्रदारु लिखा है ।
३. मुंज एवं शर के लिये गुन्द्रः पर्याय नहीं दिखलाई देता ।
४. गवेधुका का गुन्द्रा पर्याय नहीं मिलता किन्तु एरका का पर्याय गुन्द्रा है ।
५. देवदारु का पर्याय पारिभद्र नहीं मिलता ।
६. हरिद्रा का पर्याय पीतदारु नहीं है किन्तु दारुहरिद्रा का है ।
७. देवदारु का पर्याय पीतदारु नहीं है ।
८. सरल का पर्याय पीतवृक्ष दिया हुआ है ।
९. ककुभ का पर्याय वीरवृक्ष है । वीरतरु अन्य वृक्ष है ।
१०. शर का पर्याय वीरतरु नहीं मिलता ।
११. बदरा के स्थान पर वरदा अधिक उचित है क्योंकि अश्वगन्धा तथा वाराही का पर्याय वरदा है ।
१२. शिलाजतु का पर्याय शिलांज है ।
१३. गैरिक के पर्याय गैरेयं, गिरिजं हैं न कि शिला ।
१४. महानिम्ब का अक्षीर पर्याय अन्य निघण्टुओं में मिलता है, अक्षीव नहीं ।
९५२ भावप्रकाशनिघण्टुः
[ बायाँ स्तम्भ ]
पलाशः—किंशुकः, गन्धपलाशी,१ पत्रङ्गं२ ।
६६. पलाश—पलाश, कपूरकचरी और तेजपात ।
कालमेषी—मञ्जिष्ठा, वाकुची, श्यामा त्रिवृच्च ।
६७. कालमेषी—मञ्जीठ, वाकुची और काली निसोध ।
पलङ्कषा—गुग्गुलुः, गोक्षुरः, लाक्षा च ।
६८. पलङ्कषा—गूगल, गोखरू और लाख ।
मधुरसा—द्राक्षा, मूर्वा, गम्भारी च ।
६९. मधुरसा—दाख, मूर्वा और गंभारि ।
रसा—रास्ना, शाल्लकी, पाठा च ।
७०. रसा—रास्ना, सलई और पाढ़ी ।
श्रेयसी—हरीतकी, रास्ना, गजपिप्पली च ।
७१. श्रेयसी—हर्रा, रास्ना और गजपीपल ।
लोहम्—अयः, कांस्यम्३, अगुरु च ।
७२. लोह—लोहा, कांसा और अगर ।
सहा—मुद्गपर्णी, बलाभेदः ('ककही' इति लोके), शतपत्री४
('सेवती गुलाब' इति लोके) ।
७३. सहा—मुगंवन, बरियारा का भेद (लोक प्रसिद्ध 'ककही')
और सेवती गुलाब ।
सुवहा—रास्ना, नाकुली५, नीलपुष्पः सिन्दुवारश्च ।
७४. सुवहा—रास्ना, नाकुली और नीले फूलकी मेउड़ी ।
कठिल्लकः—कारवेल्लः, रक्तपुनर्नवा, कृष्णबर्बरी च ।
[ दायाँ स्तम्भ ]
७५. कठिल्लक—करेला, लाल गदहपुर्ना और काली
बर्बरी ।
मधूलिका—मूर्वा, यष्टी, जलमधूकश्च ।
७६. मधूलिका—मूर्वा, मुलेठी और जल महुआ ।
वितुन्नकम्—धान्यकम्, तुत्थकम्, गोनर्दश्च ।
७७. वितुन्नक—धनिया तूतिया और केवटी मोथा ।
देवी—स्पृक्का, मूर्वा, वन्ध्याकर्कोटी च ।
७८. देवी—स्पृका, मूर्वा और बाँझ खेकसा ।
वसुकः—शिवमल्ल, श्वेतार्कः, रोमकं६ च ।
७९. वसुक—बड़ी मौलसिरी, सफेद आक और सांभर
नोन ।
गण्डीरः—शाकविशेषः, मञ्जिष्ठा, गण्ड दूर्वा च ।
८०. गण्डीर—गण्डारी नामक शाकविशेष, मंजीठ और
गांडर दू ।
लाङ्गली—कलिहारी, जलपिप्पली, नारिकेलश्च ।
८१. पिच्छिला—कलिहारी, जलपीपल और नारियल ।
पिच्छिला—शिंशपा, शाल्मलिः, भूतवृक्षश्च ।
८२. पिच्छिला—शीशम, सेमर और लिसोड़ा ।
महासहा—माषपर्णी, अम्लातकः, कुब्जकश्च ।
८३. महासहा—माषपर्णी, बाणपुष्प और कूबजा ।
चन्द्रिका—मेथी, चन्द्रशूरः, श्वेतकण्टकारी च ।
८४. चन्द्रिका—मेथी, चनसुर और सफेद भटकटैया ।
इति त्र्यर्थानि नामानि ।
अथ चतुर्थार्थकानि नामान्याह
चार अर्थ वाले शब्द
[ बायाँ स्तम्भ ]
श्वेतपुष्पा—इन्द्रवारुणी, सिन्दुवारः, श्वेतार्कः, सैरेयकश्च ।
१ श्वेतपुष्पा—इन्द्रायण, मेउड़ी, सफेद आक और कटसरैया ।
[ दायाँ स्तम्भ ]
कारवी—पृथ्वीका७, शतपुष्पा, कालाजाजी, अजमोदा च ।
२ कारवी—पृथ्वीका, शतपुष्पा, कलौंजी और अजमोदा ।
[ पाद-टिप्पणियाँ ]
१. गन्धपलाशी का पर्याय पलाशी है न कि पलाशः ।
२. ध. नि. एवं रा. नि. ने पलाशी पर्याय तेजपत्र के लिये लिखा है ।
३. ध. नि. एवं रा. नि. ने कांस्य का पर्याय लोह लिखा है ।
४. शतपत्री का सहा पर्याय भा. प्र. रा. नि. एवं ध. नि. में नहीं है ।
५. नाकुली का सुरसा पर्याय भा. प्र. में है, सुवहा नहीं ।
६. रा. नि. एवं ध. नि. में रोमक के वसुकं, वसु पर्याय मिलते हैं ।
७. पृथ्वीका का पर्याय कारवी नहीं मिलता । पृथ्वीका, बृहदेला तथा हिंगुपत्री दोनों का पर्याय है किन्तु इनके कारवी पर्याय न
होने से यहाँ दोनों में से कोई नहीं हो सकता । ध. नि. में कारवी का एक अन्य पर्याय कटुहुञ्जी (ऋतुसविशेष) दिया है ।
अनेकार्थनामवर्गः ९५३
अम्बष्ठा—पाठा, चाङ्गेरी, माचिका, यूथिका च इति ।
३ अम्बष्ठा—पाठी, चांगेरी, माचिका और जूही।
इति चतुर्थार्थकानि नामानि ।
अथ बह्वर्थकानि नामान्याह
बहुत अर्थवाले शब्द
अक्षशब्दः स्मृतोऽष्टासु सौवर्चलबिभीतके। कर्षपद्माक्षरुद्राक्षशकटेन्द्रियपाशके ॥१॥
१. अक्ष—(१) काला नमक, (२) बहेड़ा, (३) कर्षनामक तौल (४) कमलगट्टा, (५) रुद्राक्ष, (६) गाड़ी, (७)
इन्द्रिय और (८) पासा (जुआ खेलने का साधन) इन ८ अर्थों में अक्ष का प्रयोग होता है ॥१॥
काकाख्यः काकमाची च काकोली काकणन्तिका ।
काकजङ्घा काकनासा काकोदुम्बरिकाऽपि च॥
सप्तस्वर्थेषु कथितः काकशब्दो विचक्षणैः ॥२॥
२. काक—(१) कौवा, (२) मकोय, (३) काकोली, (४) लाल गुञ्जा, (५) काकजङ्घा, (६) काकनासा और (७)
कठूमर इन सात अर्थों में काक शब्द का प्रयोग होता हैं।।२।।
सर्पद्विरदमेषेषु सीसके नागकेसरे। नागवल्ल्यां नागदन्त्यां नागशब्दः प्रयुज्यते ॥३॥
३. नाग—(१) साँप, (२) हाथी, (३) भेड़ा, (४) सीसा (धातु), (५) नागकेसर, (६) पान और (७) नागदन्ती
(दन्तीभेद) इन ७ अर्थों में नाग शब्द का प्रयोग होता है ॥३॥
मांसद्रवे चेक्षुरसे पारदे मधुरादिषु । बोले¹ रागे विषे नीरे रसो नवसु वर्त्तते ॥४॥
४ रसः—(१) मांस का रस, (२) द्रव पदार्थ, (३) ऊख का रस, (४) पारा, (५) मधुरादि ६ प्रकार के रस,
(६) बोल, (७) राग (अनुराग), (८) विष और (९) जल इन ९ अर्थों में रस शब्द का प्रयोग होता है ॥४४॥
इति श्रीमिश्रलटकनतनय श्रीमिश्रभावविरचिते भावप्रकाशे वर्गप्रकरणे
अनेकार्थवर्गः समाप्तः ।
इति भावप्रकाशे पूर्वखण्डे प्रथमभागे द्रव्यगुणप्रकरणापरनामकं षष्ठं मिश्रप्रकरणं समाप्तम् ॥६॥
समाप्तश्चायं निघण्टुभागः ।
१. स्वादेति पाठा०।