भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें९५० भावप्रकाशनिघण्टुः
श्रीपर्णी-गम्भारी, गणिकारिका, कट्फलं च।
१६. श्रीपर्णी-गम्भारि, अरनी और कायफर।
अमृता-गुडूची, हरीतकी, धात्री च।
१७. अमृता-गिलोय, हर्रा और आँवला।
अनन्ता-दुरालभा, नीलदूर्वा, लाङ्गली च।
१८. अनन्ता-धमासा, हरी दूब और कलिहारी।
ऋष्यप्रोक्ता-अतिबला, महाशातावरी, कपि-कच्छुश्च।
१९. ऋष्यप्रोक्ता-ककही, बड़ी शातावर और केवा च।
कृष्णवृन्तः-पाढल, गम्भारी, माषपर्णी च।
२०. कृष्णवृन्ता-पाटला, गम्भारी, माषपर्णी।
जीवन्ती-गुडूची, शाकविशेषः, वन्द१ च।
२१. जीवन्ती-गिलोय, जीवन्ती शाकविशेष और बन्दा।
लता-सारिवा, प्रियङ्गु, ज्योतिष्मती च।
२२. लता-अनन्तमूल (सारिवा), प्रियङ्गु और मालकांगुनी।
समुद्रान्ता-दुरालभा, कार्पासी, स्पृक्का च।
२३. समुद्रान्ता-धमासा, कपास और स्पृक्का।
हैमवती-हरीतकी, श्वेतवचा, पीतदुग्धः
सेहुण्डश्च२ (यस्य मूलं 'चोक' इति प्रसिद्धम्)।
२४. हैमवती-हर्रा, सफेद वच और पीले दूध का सेहुंड,
भड़भाड़ (इसके मूल को लोक में 'चोक' कहते हैं)।
अव्यथा-हरीतकी, महाश्रावणी, पद्माचारिणी च।
२५. अव्यथा-हर्रा, बड़ी मुण्डी और स्थल-कमल।
२६. षड्ग्रन्था-गन्धकचरी, वच और करञ्जी।
वरदा-सुवर्चला ('हुरहुर' इति लोके), अश्वगन्धा, वाराही
('गेठी'ति लोके)।
२७. वरदा-हुरहुर, असगन्ध और वाराहीकंद ('गेंठी'
नाम से लोकप्रसिद्ध)।
इक्षुगन्धा-काशः, कोकिलाक्षा, क्षीरविदारी (गोक्षुरः) च।
२८. इक्षुगन्धा-कास, तालमखाना और विदारी। (और
इक्षुगन्धिका-गोखरू भी है)।
कालस्कन्धः-तमालः तिन्दुकं कालखदिरश्च।३
२९. कालस्कन्ध-तमाल, तेन्दू और दुर्गन्ध-खैर।
महौषधम्-शुण्ठी, रसोनरू, विषञ्च।४
३०. महौषध-सोंठ, लहसुन और विष (वत्सनाभ)।
मधु-क्षौद्रं, पुष्परसः, मद्यञ्च।
३१. मधु-शहद, फूल का रस और मद्य।
कपीतनः-आम्रातकः, शिरीषः, गर्दभाण्डश्च।
३२. कपीतन-अम्बाडा, सिरस और पारस पीपल।
मदनः-पिण्डीतकः, धत्तूरः, सिक्थकश्च।
३३. मदन-मैनफल, धतूर और मोम।
शतपर्वा-वंशः, दूर्वा और वच।
३४. शतपर्वा-बाँस, दूब और वच।
सहस्रवेधी५-अम्लवेतसः, मृगमदः, हिङ्गु च।
३५. सहस्रवेधी-अमलवेत, कस्तूरी और हींग।
ताम्रपुष्पी-धातकी, पाटला, श्यामा त्रिवृच्च।६
३६. ताम्रपुष्पी-धाय का फूल, पाढ़लभेद और काली
निशोथ।
सदापुष्पः-श्वेतार्कः, रक्तार्कः, ७कुन्दश्च।
३७. सदापुष्प-सफेद आक, लाल आक और कुन्द।
सुरभिः-शल्लकी, मुरा, एलवालुकं८ च।
३८. सुरभिः-सालई, मुरा और एलवालुक।
लक्ष्मीः-ऋद्धिः, वृद्धिः और शमी च।
३९ लक्ष्मी-ऋद्धि, वृद्धि और शमी।
कालानुसार्यम्-कालीयकं, तगरं शैलेयञ्च।
४०. कालानुसार्य-पीला चन्दन (कलम्बक), तगर और
भूरिछरीला।
चाम्पेयः-चम्पकः नागकेसरः, पद्मकेसरश्च९।
४१. चाम्पेय-चंपा, नागकेशर और कमलका केसर।
नादेयी-गणिकारिका, जलजम्बूः, जलवेतसञ्च।
१. वन्दा का पर्याय जीवन्ती नहीं है यद्यपि जीवन्तीभेद, स्वर्ण जीवन्ती एक प्रकार का बांदा ही होता है।
२. वास्तव में यह सेहुण्ड भेद नहीं है।
३. कालखदिर पर्याय भा. प्र. ने नहीं दिया है। इरिमेद (विट्खदिर) का पर्याय कालस्कन्ध दिया हुआ है।
४. ध. नि. में विष का पर्याय महौषध दिया है।
५. भा. प्र. में अम्लवेतस् के पर्याय शतवेधी एवं सहस्रनुत् हैं एवं कस्तूरी का पर्याय सहस्रभित् है।
६. रा. नि. ने श्यामाविशेष का ताम्रपुष्पिका पर्याय दिया है।
७. रक्तार्क के लिये सदापुष्प पर्याय नहीं दिया हुआ है।
८. भा. प्र. में एलवालुक का सुगन्धि पर्याय दिया है न कि सुरभिः।
९. रा. नि. ने पद्मकेसर का पर्याय चाम्पेयकं दिया है।